विदेश से आई भाभी और देसी देवर की चुदाई
गर्मियों की वो दोपहर थी जब मैंने पहली बार उन्हें देखा। मेरे बड़े भैया राहुल की शादी होकर वे अपनी नई पत्नी को लेकर अमेरिका से लौटे थे। मैं, अर्जुन, उस वक्त 22 साल का जवान था, कॉलेज का आखिरी साल चल रहा था। हमारा घाना शहर के बाहरी इलाके में था, एक पुरानी हवेली जहां हम दो भाइयों के अलावा माता-पिता रहते थे। विदेश से आई भाभी और देसी देवर की चुदाई
मैं दरवाजे पर खड़ा था जब कार रुकी। भैया तो पहले उतरे, लेकिन मेरी आंखें तब ठिठक गईं जब भाभी सामने आईं। प्रिया। वो नाम था उनका, लेकिन उनकी सूरत देखकर मैं सन्न रह गया।
वो 26-27 साल की होंगी, लेकिन अमेरिका की जीवनशैली ने उन्हें किसी बॉलीवुड अभिनेत्री से कम नहीं बना रखा था। उनकी हाइट करीब 5 फुट 6 इंच थी, गोरा रंग, लंबे काले बाल जो कंधों तक बिखरे हुए थे। लेकिन मेरी नजरें सीधे उनके शरीर पर टिक गईं। वो एक टाइट जींस और क्रॉप टॉप पहने हुए थीं जो भारतीय संस्कृति के लिए काफी बोल्ड था।
उनके स्तन… ओह भगवान! वो इतने बड़े और उभरे हुए थे कि टॉप उन पर चिपका हुआ था। मुझे अंदाजा हुआ कि वो करीब 34-36 इंच के होंगे, गोल और तने हुए, ऐसे लग रहा था जैसे कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब हों। क्रॉप टॉप की वजह से उनकी पेट की त्वचा दिख रही थी, बिल्कुल चिकनी, नाभि गहरी और आकर्षक। विदेश से आई भाभी और देसी देवर की चुदाई
“अर्जुन, यह तुम्हारी भाभी प्रिया,” भैया ने मुझे परिचय कराया।
मैंने हाथ जोड़े, “नमस्ते भाभी।”
प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाय! तुम मेरे देवर हो? कितने क्यूट हो!” और वो मुझे गले लगा लीं।
उस पल मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया। उनके स्तन मेरे सीने से चिपके, मुलायम और गर्म। उनकी खुशबू… एक अजीब सी परफ्यूम की महक जो मेरे दिमाग में बस गई। मेरा लंड, जो पहले से ही उनकी सुंदरता देखकर खड़ा होने लगा था, अब पूरी तरह तनकर मेरी पैंट में अकड़ गया।
“चलो अंदर चलें,” मां ने आवाज लगाई।
मैं उनके पीछे-पीछे चल रहा था, मेरी आंखें उनकी गांड पर टिकी हुई थीं। वो जींस उनकी गोल और भारी गांड को बिल्कुल साफ दिखा रही थी। वो इतनी बड़ी और उभरी हुई थी कि हर कदम पर वो थोड़ी हिलती, मानो दो गेंदें एक साथ चल रही हों। मैंने सोचा, यह तो करीब 38 इंच की गांड है, इतनी सुंदर और मोटी।
हमारे घर में पुराने जमाने की व्यवस्था थी। ऊपर दो बड़े कमरे, एक में माता-पिता, दूसरे में भैया-भाभी रहेंगे। मेरा कमरा नीचे ग्राउंड फ्लोर पर था, पुराना स्टडी रूम जिसे मैंने अपना बना रखा था।
पहले कुछ दिन तो सब ठीक रहा। लेकिन रात को जब मैं अपने कमरे में लेटा, तो भाभी की यादें मुझे सता रही थीं। मैंने अपनी पैंट उतारी और अपने लंड को देखा। मेरा लंड करीब 7 इंच लंबा था, मोटाई करीब 2 इंच। अंडे-शेप का सुपाड़ा गुलाबी था, नसें नीली-हरी उभरी हुई। मैंने उसे हाथ में लिया और सोचा, काश ये लंड एक बार भाभी की चूत में जा सके।
मैंने मुठ मारनी शुरू की, भाभी के स्तनों की कल्पना करते हुए, उनकी गांड की, उनकी चिकनी जांघों की। 10 मिनट बाद मेरा पानी निकल गया, गाढ़ा और सफेद, जो मेरे पेट पर गिरा।
एक हफ्ते बाद भैया को फिर से अमेरिका जाना पड़ा। उनका प्रोजेक्ट वहीं था, तो वो भाभी को यहीं छोड़कर चले गए। घर में अब मैं, माता-पिता, और भाभी थे।
भाभी ने धीरे-धीरे भारतीय कपड़े पहनने शुरू किए, लेकिन उनका अंदाज वही पश्चिमी था। वो साड़ी में भी इतनी सेक्सी लगतीं कि मेरा दिल धड़कने लगता। एक दिन मैंने उन्हें बाथरूम से बाहर आते देखा, तौलिये में लिपटी हुईं। विदेश से आई भाभी और देसी देवर की चुदाई
“ओह देवर जी, आप यहां?” वो चौंकीं।
“सॉरी भाभी, मुझे नहीं पता था,” मैंने आंखें झुकाईं।
लेकिन उस पल मैंने देख लिया था। तौलिया ऊपर से तो ढका हुआ था, लेकिन नीचे से उनके पैर, जांघें… वो इतनी गोरी और चिकनी थीं। मैंने कल्पना की कि उनकी चूत कैसी होगी। क्या वो साफ शेव्ड होगी जैसी अमेरिकन लड़कियों की होती है? या थोड़ी बाल वाली?
धीरे-धीरे हमारी बातचीत बढ़ने लगी। भाभी मुझसे खुलकर बात करतीं, कभी-कभी मजाक में मेरे कंधे पर हाथ रख देतीं। एक दिन रात को डिनर के बाद, हम छत पर बैठे थे।
“देवर जी, आपके यहां शादी की बात चल रही है?” उन्होंने पूछा।
“नहीं भाभी, अभी तो पढ़ाई खत्म करनी है,” मैंने कहा।
“स्मार्ट बॉय,” वो मुस्कुराईं और मेरे बालों में हाथ फेरा।
उनकी उंगलियां मेरे सिर पर घूम रही थीं और मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया। मैंने कहा, “भाभी, आप बहुत सुंदर हो।”
वो मुस्कुराईं, “थैंक यू देवर जी। अमेरिका में मुझे बहार लोग कहते थे कि मैं एक्सोटिक ब्यूटी हूं।”
“वो तो हैं,” मैंने कहा, “लेकिन मुझे लगता है आप भारत में और भी खूबसूरत लग रही हैं।”
वो मेरे करीब आईं, इतनी करीब कि मुझे उनकी सांसें महसूस हुईं। “देवर जी, आप बहुत स्वीट हो,” वो धीरे से बोलीं।
मैंने हिम्मत करके उनका हाथ पकड़ लिया। वो नहीं हटाईं। हम दोनों चुप बैठे, हवा में कुछ अलग सा था।
“चलो, सोने चलें,” अचानक वो खड़ी हो गईं।
लेकिन मैंने नोटिस किया कि उनके चेहरे पर एक अजीब सी लाली थी, और उनकी सांसें तेज चल रही थीं। शायद वो भी कुछ महसूस कर रही थीं।
तीसरे हफ्ते की बात है। माता-पिता किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए हुए थे, दो दिन के लिए। घर में सिर्फ मैं और भाभी थे।
रात को करीब 10 बजे, मैं अपने कमरे में पढ़ रहा था। तभी दरवाजे पर खटखट हुई।
“कौन?” मैंने पूछा।
“मैं हूं, देवर जी,” भाभी की आवाज आई।
मैंने दरवाजा खोला। भाभी एक नाइटी में थीं, हल्की सी पारदर्शी। अंदर से उनका ब्रा दिख रहा था, काले रंग का। उनके स्तन राती की रोशनी में इतने सेक्सी लग रहे थे कि मेरा मुंह सूख गया।
“क्या हुआ भाभी?” मैंने पूछा।
“वो… बिजली चली गई है ऊपर के कमरे में। मुझे डर लग रहा है, क्या मैं थोड़ी देर यहीं बैठ सकती हूं?” उन्होंने कहा।
“जी बिल्कुल,” मैंने उन्हें अंदर बुलाया।
मेरे कमरे में एक छोटा बेड था, एक कुर्सी, और जमीन पर गद्दा बिछा हुआ था। भाभी बेड पर बैठ गईं, मैं कुर्सी पर।
“देवर जी, आप यहां क्यों नहीं आते?” उन्होंने पूछा।
“कहां?”
“मेरे पास, बेड पर।”
मेरा दिल धड़कने लगा। मैं उठकर बेड पर गया, उनके पास बैठ गया। हम दोनों चुप थे। फिर अचानक, भाभी ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया।
“देवर जी, मुझे बहुत अकेलापन महसूस होता है,” वो धीरे से बोलीं, “आपके भैया तो महीने में एक बार आते हैं, वो भी दो दिन के लिए।”
“मैं समझ सकता हूं भाभी,” मैंने कहा।
“क्या आप मेरी देखभाल करोगे?” उन्होंने पूछा, अपनी आंखें मुझमें गड़ाए।
मैंने हिम्मत करके उनका चेहरा अपने हाथों में लिया। वो कुछ नहीं बोलीं। मैं धीरे से उनकी ओर झुका और उनके गाल पर एक चूमन लगाया। उनकी त्वचा इतनी मुलायम थी, गुलाब की पंखुड़ी जैसी।
भाभी ने अपना चेहरा मेरी ओर किया। हमारी आंखें मिलीं, और फिर हमारे होंठ। धीरे-धीरे, हम एक-दूसरे को चूमने लगे। पहले तो हल्का-फुल्का, फिर गहरा और जोशीला चुंबन।
मेरे हाथ उनकी पीठ पर घूम रहे थे, नीचे की ओर बढ़ रहे थे। मैंने उनकी गांड को छुआ, वो इतनी नरम और गोल थी। भाभी भी मेरे बालों में हाथ फेर रही थीं, मेरे कान को चूम रही थीं।
“देवर जी…” वो सिसकीं, “आप… आप बहुत अच्छे हो।”
मैंने उनकी नाइटी के ऊपर से ही उनके स्तन दबाने शुरू किए। वो इतने बड़े थे कि मेरा पूरा हाथ उनमें समा गया। मैंने उन्हें मसलना शुरू किया, निप्प्स को उंगलियों से कसना शुरू किया।
“आह… देवर जी… धीरे…” वो आहें भरने लगीं।
मैंने उनकी नाइटी ऊपर उठाई। उनकी जांघें सामने थीं, गोरी, चिकनी, बिल्कुल बेजान। मैंने उनकी जांघों को सहलाया, ऊपर की ओर बढ़ा। उनकी नाइटी के अंदर मेरा हाथ जा रहा था, और फिर मैंने उनकी पैंटी छुई।
वो गीली थी। मेरी उंगलियां उस गीलेपन को महसूस कर रही थीं। भाभी की सांसें तेज हो गईं, उनकी आंखें बंद हो गईं।
“देवर जी… प्लीज…” वो कराह रही थीं।
मैंने उनकी पैंटी के ऊपर से ही उनकी चूत को सहलाया। वो उभरी हुई थी, गर्म, और पूरी तरह गीली। मैंने उंगली से उस पर दबाव डाला, वो कांप उठीं।
“आह… हां… वहीं…” वो बड़बड़ा रही थीं।
तभी बाहर कुत्ते भौंकने लगे। हम दोनों चौंक गए। भाभी उठीं, अपने कपड़े ठीक किए।
“मैं… मैं चलती हूं,” वो घबराई हुई आंखों से बोलीं, “कल… कल बात करेंगे।”
वो चली गईं, लेकिन मेरे हाथ अभी भी उनकी खुशबू से महक रहे थे। मैंने अपनी उंगलियां सूंघीं, उनकी चूत की महक थी, मीठी और खट्टी, बिल्कुल अलग।
अगले दिन सुबह, मैं उठा तो माता-पिता आ चुके थे। पूरा दिन मैंने भाभी को ढूंढा, लेकिन वो बचती रहीं। शाम को, जब माता-पिता टहलने गए, भाभी मेरे कमरे में आईं।
“कल रात के लिए सॉरी,” वो बोलीं, “मुझे डर लग गया था।”
“कोई बात नहीं भाभी,” मैंने कहा, “लेकिन मुझे आपकी याद आ रही थी।”
वो मुस्कुराईं, “मुझे भी।”
अचानक उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू गिराया। वो एक गहरे लाल रंग की ब्लाउज में थीं, जो आधी खुली हुई थी। उनके स्तन का ऊपरी हिस्सा दिख रहा था, वो गहरी दरार जहां मेरा मन खोने को हो रहा था।
“देवर जी, क्या आप मुझे देखना चाहते हो?” उन्होंने पूछा, शर्माते हुए लेकिन आंखों में एक शरारत थी।
“हां भाभी,” मैंने कहा, मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था।
वो धीरे-धीरे अपने कपड़े उतारने लगीं। पहले साड़ी, फिर ब्लाउज। वो अब ब्रा और पेटीकोट में थीं। उनका पेट, कमर, सब कुछ इतना परफेक्ट था। कमर करीब 28 इंच की, पेट बिल्कुल सपाट, नाभि गहरी।
फिर उन्होंने अपनी ब्रा उतारी।
उनके स्तन आजाद हो गए। वो इतने बड़े थे, गोल, उभरे हुए। निप्प्स गुलाबी थे, छोटे से, खड़े हुए। वो थोड़े नीचे की ओर झुके हुए थे, लेकिन इतने सुंदर कि मैं देखता ही रह गया।
“कैसे हैं?” उन्होंने पूछा।
“बहुत सुंदर भाभी,” मैंने कहा, मेरा मुंह सूख रहा था।
मैं उनके पास गया, और एक स्तन को अपने हाथ में लिया। वो इतना भारी था, मुलायम, गर्म। मैंने उसे दबाया, निप्प को उंगली और अंगूठे से कसा। भाभी की आंखें बंद हो गईं, वो सिसकने लगीं।
फिर मैंने उसे मुंह में लिया। अपनी जीभ से निप्प को चाटा, चूसा, दांतों से हल्का काटा। भाभी मेरे सिर को अपने स्तनों में दबा रही थीं।
“आह… देवर जी… और जोर से…”
मैं दूसरे स्तन को भी वैसे ही चूसने लगा। 10 मिनट तक मैं उनके स्तनों से खेलता रहा। फिर मैं नीचे बढ़ा।
मैंने उनका पेटीकोट खोला। वो अब सिर्फ एक सफेद पैंटी में थीं। उनकी जांघें, उनका पेट, सब कुछ। मैंने उनकी पैंटी के ऊपर से उनकी चूत को देखा। वो उभरी हुई थी, एक साफ रेखा जो उनकी योनि की सेब दिखा रही थी।
“भाभी, क्या मैं…” मैंने पूछा।
“हां,” वो शर्माते हुए बोलीं, “देखो मुझे।”
मैंने उनकी पैंटी नीचे खींची।
और फिर मैंने उनकी चूत देखी।
वो बिल्कुल साफ शेव्ड थी, एक भी बाल नहीं था। उनकी योनि की होंठ गुलाबी थे, थोड़े मोटे, बाहर की ओर निकले हुए। बीच में एक पतली लकीर, जहां उनकी चूत का छेद था। वो गीली थी, चमक रही थी।
उपर एक छोटी सी गुलाबी गांठ, उनकी क्लिटोरिस। मैंने कभी इतनी सुंदर चूत नहीं देखी थी। अमेरिका में शायद लेजर से साफ की गई थी, बिल्कुल चिकनी।
“भाभी, आपकी चूत…” मैं बोल नहीं पाया।
“क्या हुई?” वो पूछीं।
“बहुत सुंदर है,” मैंने कहा, “बिल्कुल गुलाबी, चिकनी…”
वो मुस्कुराईं, “आपके भैया को भी पसंद है।”
मैंने अपनी उंगली उनकी चूत पर रखी। वो गीली थी, गर्म, और इतनी नरम। मैंने उंगली को ऊपर नीचे किया, उनकी होंठों को फैलाया। अंदर गुलाबी दीवारें, नमी से चमक रही थीं।
“देवर जी… प्लीज…” वो कराह रही थीं।
मैंने अपना मुंह उनकी चूत पर रख दिया।
मैंने अपनी जीभ उनकी चूत पर रखी। वो इतनी गीली थी कि मेरी जीभ तुरंत उनके रस से भीग गई। एक मीठा, थोड़ा खट्टा स्वाद, बिल्कुल अलग, बिल्कुल नशीला।
“आह… हां… देवर जी…” भाभी चिल्लाईं।
मैंने उनकी चूत की होंठों को चाटना शुरू किया, ऊपर से नीचे तक। फिर मैंने अपनी जीभ उनके छेद में डालने की कोशिश की। वो इतनी टाइट थी कि मेरी जीभ अंदर जाने में कठिनाई हो रही थी।
मैंने उनकी क्लिटोरिस को ढूंढा, वो छोटी सी गांठ जो अब पूरी तरह खड़ी हो चुकी थी। मैंने उसे चूसा, अपने होठों में लेकर दबाया।
“ओह माय गॉड… देवर जी… ये क्या कर रहे हो…” भाभी पागल हो रही थीं।
उनके हाथ मेरे सिर को उनकी चूत पर दबा रहे थे, उनकी कमर हवा में उछल रही थी। मैंने अपनी दो उंगलियां उनकी चूत में डाल दीं।
वो इतनी टाइट थी कि मेरी उंगलियों को दबा रही थी। गर्म, गीली, नरम दीवारें मेरी उंगलियों को चूस रही थीं। मैंने उंगलियों को अंदर-बाहर करना शुरू किया, साथ में उनकी क्लिट चूसता रहा।
“आह… हां… और तेज… मैं… मैं…” भाभी कांपने लगीं।
अचानक उनका शरीर अकड़ गया, उनकी चूत ने मेरी उंगलियों को कसकर पकड़ लिया, और एक गर्म तरल पदार्थ निकलकर मेरे मुंह पर गिरा। वो झड़ चुकी थीं, उनका पानी इतना साफ था, थोड़ा चिपचिपा, मीठा।
मैंने उसे चाट लिया, साफ कर दिया। भाभी थककर बेड पर गिर गईं, उनकी सांसें तेज चल रही थीं।
“देवर जी… आप… आपने मुझे…” वो बोल नहीं पा रही थीं।
मैं उनके पास लेट गया, उनके स्तनों को सहलाने लगा। “कैसा लगा भाभी?”
“बहुत अच्छा,” वो बोलीं, “आपके भैया भी ऐसे ही करते हैं, लेकिन आपने तो…”
मैंने उनके होंठों पर एक चुंबन लिया। “भाभी, अब मेरी बारी।”
वो समझ गईं। उन्होंने मेरे कपड़े खोलने शुरू किए। पहले मेरी टी-शर्ट, फिर पैंट। मैं अब अंडरवियर में था, और मेरा लंड उसमें एक तंबू की तरह खड़ा था।
“वाह,” भाभी ने कहा, “देवर जी, आपका तो…”
मैंने अपना अंडरवियर उतार दिया।
मेरा लंड सामने था, 7 इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ। सुपाड़ा गुलाबी, बड़ा, मशरूम की तरह। अंडकोश नीचे लटक रहे थे, भारी।
भाभी उसे देखती रहीं, उनकी आंखें बड़ी हो गईं। “ये तो… ये तो बहुत बड़ा है,” वो बोलीं, “आपके भैया से भी बड़ा।”
“पसंद आया?” मैंने पूछा।
वो बोल नहीं पाईं, बस हां में सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया, और मेरे लंड को छुआ।
एक झटका सा लगा। उनकी उंगलियां ठंडी थीं, नरम। उन्होंने मेरे लंड को पकड़ा, उसे सहलाया, ऊपर से नीचे तक।
“कितना गर्म है,” वो बोलीं, “और कितना सख्त।”
मैंने उनका सिर अपनी ओर खींचा। वो समझ गईं। उन्होंने अपने होठ मेरे लंड के सुपाड़े पर रखे, और एक हल्का चुंबन लिया।
“चूसो इसे,” मैंने कहा।
भाभी ने अपनी जीभ निकाली, और मेरे लंड के सुपाड़े पर लगाई। वो इतनी गर्म थी, इतनी नरम। उन्होंने चाटना शुरू किया, पूरे लंड को जीभ से सहलाया, फिर सुपाड़े को अपने होठों में ले लिया।
“ओह…” मैं आह भरा।
उन्होंने धीरे से मेरे लंड को अपने मुंह में लेना शुरू किया। वो इतना बड़ा था कि आधा ही अंदर जा सका। उनके मुंह की गर्मी, उनकी जीभ का स्पर्श… मैं स्वर्ग में था।
भाभी ने चूसना शुरू किया, ऊपर नीचे। उनके होठ मेरे लंड की त्वचा को खींच रहे थे, उनकी जीभ नीचे की नस पर चल रही थी। मैंने उनके सिर पर हाथ रखा, उनके बालों में उंगलियां फेरीं।
“भाभी… बहुत अच्छा लग रहा है…”
वो और तेज चूसने लगीं, उनकी आंखें मुझे देख रही थीं। वो एक पोर्नस्टार की तरह कर रही थीं, शायद अमेरिका में सीखा होगा। उन्होंने मेरे अंडकोश भी चाटे, फिर वापस लंड पर आ गईं।
मैं 15 मिनट तक उनके मुंह का मजा लेता रहा। फिर मुझे लगा कि मैं झड़ने वाला हूं।
“भाभी… मैं… मैं निकलने वाला हूं…”
वो नहीं रुकीं, बल्कि और तेज चूसने लगीं। मैंने उनका सिर पकड़ा, और अपना लंड उनके मुंह में पूरी तरह डाल दिया, जितना जा सकता था।
और फिर मेरा पानी निकला। गाढ़ा, गर्म, बहुत सारा। भाभी ने सब पी लिया, एक भी बूंद बाहर नहीं गिरने दी। उन्होंने मेरे लंड को चाट-चाटकर साफ किया, और मुस्कुराईं।
“कैसा था?” उन्होंने पूछा।
“अमृत था भाभी,” मैंने कहा, थककर।
हम दोनों बेड पर लेट गए, एक-दूसरे को चूमते रहे। मेरा लंड फिर से खड़ा होने लगा, भाभी के स्पर्श से।
“देवर जी, आप तो बहुत जल्दी तैयार हो गए,” वो हंसीं।
“भाभी, आपके सामने कैसे नहीं होता,” मैंने कहा।
वो मेरे ऊपर आ गईं, उनकी चूत मेरे लंड पर टिकी हुई थी। “तो फिर… अंदर डालो इसे।”
अध्याय 7: पहली चुदाई
भाभी ने अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ा, और अपनी चूत के छेद पर सेट किया। वो इतनी गीली थी कि सुपाड़ा आसानी से अंदर चला गया।
“आह…” हम दोनों एक साथ आह भरे।
भाभी धीरे-धीरे नीचे बैठने लगीं। मेरा लंड उनकी टाइट चूत में घुस रहा था, उनकी दीवारें मुझे चूस रही थीं। वो इतनी संकरी थी कि मुझे लग रहा था मेरा लंड कट जाएगा।
“भाभी… आप… आप बहुत टाइट हो…” मैंने कहा।
“आप… आप बहुत बड़े हो देवर जी…” वो सांस फूलते हुए बोलीं।
आखिरकार, मेरा पूरा लंड उनकी चूत में समा गया। वो मेरे ऊपर बैठी थीं, उनके स्तन मेरे सामने थे। मैंने उन्हें पकड़ा, दबाया, निप्प कसे।
“चलो… हिलो…” मैंने कहा।
भाभी ने अपनी कमर हिलानी शुरू की। पहले धीरे-धीरे, फिर तेज। वो ऊपर-नीचे उछल रही थीं, मेरा लंड उनकी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। आवाजें आ रही थीं, चप-चप की, गीली, सेक्सी।
“आह… हां… और तेज… देवर जी…” भाभी चिल्ला रही थीं।
मैंने उनकी कमर पकड़ी, और नीचे से धक्के मारने शुरू किए। हमारी ताल मिल गई, एक तेज लय में हम एक-दूसरे से टकरा रहे थे। भाभी के स्तन उछल रहे थे, मैं उन्हें दबाए जा रहा था।
“भाभी… मैं… मैं प्यार करता हूं आपसे…” मैंने कहा।
“मैं भी… आह… हां… और जोर से…”
मैंने उन्हें पलट दिया। अब वो नीचे थीं, मैं ऊपर। मैंने उनके पैर अपने कंधों पर रखे, और जोर-जोर से धक्के मारने शुरू किए। मेरा लंड पूरी तरह उनकी चूत में जा रहा था, उनकी गहराई तक।
“आह… देवर जी… मर गई… मैं… मैं झड़ने वाली हूं…”
“मैं भी… एक साथ…”
हम दोनों एक साथ झड़े। भाभी की चूत ने मेरे लंड को कसकर पकड़ा, और मेरा गर्म पानी उनकी गहराई में छूट गया। वो कांपती रहीं, मैं उनके ऊपर गिर गया।
हम 20 मिनट तक वैसे ही पड़े रहे, एक-दूसरे में लिपटे हुए। फिर मैंने अपना लंड बाहर निकाला, वो उनके रस से लथपथ था, सफेद मिश्रण से ढका हुआ।
“भाभी, ये तो…” मैंने कहा।
“हां,” वो शर्माते हुए बोलीं, “आपका और मेरा मिला हुआ।”
मैंने उसे चाटा, वो मीठा था, नमकीन, बिल्कुल अलग स्वाद।
कुछ दिनों तक हम रोज चुदाई करते रहे। कभी मेरे कमरे में, कभी उनके कमरे में जब माता-पिता बाहर जाते। भाभी की चूत अब मेरे लंड के आकार की हो गई थी, वो आसानी से अंदर-बाहर होता था।
एक दिन, चुदाई के बाद, भाभी ने पूछा, “देवर जी, क्या आपने कभी… गांड मारी है?”
मैं चौंक गया। “नहीं भाभी, कभी नहीं।”
“मैंने अमेरिका में सुना था,” वो बोलीं, “कुछ लड़कियां बहुत पसंद करती हैं। मुझे डर लगता है, लेकिन… आपके साथ ट्राई करना चाहती हूं।”
मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया। भाभी की वो गोल, मोटी, सुंदर गांड… मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि वहां भी मैं अपना लंड डाल सकूंगा।
“सच में भाभी?” मैंने पूछा।
“हां, लेकिन धीरे-धीरे,” वो बोलीं, “पहले तैयारी करनी होगी।”
अगले कुछ दिन, हमने तैयारी की। मैंने उनकी गांड को चाटना शुरू किया, जीभ से उसे गीला करना, अंदर तक। भाभी की गांद एकदम गोल थी, दोनों हिस्से बड़े-बड़े, बीच में गहरा गड्ढा। मैंने उस गड्ढे को चाटा, अपनी जीभ अंदर डालने की कोशिश की।
“आह… देवर जी… ये… ये अजीब सा है…” भाभी कांप रही थीं।
फिर मैंने उंगली से तैयारी की। पहले एक उंगली, वासलीन लगाकर। उनकी गांद इतनी टाइट थी कि उंगली भी मुश्किल से जा रही थी। धीरे-धीरे, मैंने उंगली अंदर-बाहर की, उन्हें आदत डाली।
फिर दो उंगलियां। भाभी को थोड़ा दर्द हो रहा था, लेकिन वो सहन कर रही थीं। “और अंदर… हां… धीरे…”
एक हफ्ते बाद, वो तैयार थीं।
उस रात, हमने बहुत सारा वासलीन इस्तेमाल किया। भाभी डॉगी स्टाइल में थीं, अपने घुटनों और हाथों पर, उनकी गोल गांड हवा में थी। मैंने वासलीन लगाई, उनके छेद पर, अंदर तक।
मेरा लंड पूरी तरह खड़ा था, मैंने उस पर भी वासलीन लगाई। सुपाड़ा चमक रहा था, तैयार।
“धीरे से देवर जी,” भाभी ने कहा, “पहली बार है।”
मैंने अपने लंड को उनकी गांद के छेद पर रखा। धीरे से धक्का दिया। सुपाड़ा अंदर घुसा, और भाभी चीख पड़ीं।
“आह… दर्द… रुको… रुको…”
मैं रुक गया, उनकी पीठ सहलाई। “शांत हो जाओ भाभी, शांत…”
कुछ मिनट बाद, वो थोड़ा शांत हुईं। “अब थोड़ा और…”
मैंने धीरे से और अंदर किया। वो इतनी टाइट थी कि मुझे लग रहा था मेरा लंड घुसेगा ही नहीं। लेकिन वासलीन की मदद से, धीरे-धीरे, आधा लंड अंदर चला गया।
“कैसा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“बहुत… बहर भरा सा…” वो सांस फूलते हुए बोलीं, “लेकिन… अजीब सा मजा भी आ रहा है…”
मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। छोटे-छोटे धक्के, आधा लंड अंदर-बाहर। भाभी की आवाजें बदलने लगीं, दर्द कम, मजा ज्यादा।
“हां… अब ठीक है… थोड़ा और तेज…”
मैंने गहरे धक्के मारने शुरू किए। अब पूरा लंड अंदर जाने लगा, उनकी गांद की गहराई तक। वो इतनी गर्म थी, इतनी टाइट, चूत से बिल्कुल अलग अनुभव था।
“भाभी… आपकी गांद… बहुत मस्त है…” मैंने कहा।
“आह… हां… चोदो मुझे… अपनी भाभी की गांद चोदो… देवर जी…”
मैं जोर-जोर से धक्के मारने लगा। उनकी गांद के दोनों हिस्से मेरे हर धक्के से हिल रहे थे, लाल हो गए थे। मैंने उनके बाल पकड़े, पीछे खींचा, और और तेज चोदने लगा।
“मैं… मैं झड़ने वाली हूं…” भाभी चिल्लाईं।
“मैं भी… अंदर… अंदर ही निकालूं?”
“हां… हां… अंदर… सब अंदर…”
मैंने जोर से एक धक्का मारा, और अपना पानी उनकी गांद में छोड़ दिया। गर्म, गाढ़ा, बहुत सारा। भाभी भी झड़ गईं, उनकी चूत से पानी निकला, बेड पर गिरा।
मैंने अपना लंड बाहर निकाला। वो उनकी गांद से बाहर आया, वासलीन और मेरे पानी से लथपथ। उनका छेद थोड़ा खुला हुआ था, लाल, और उसमें से मेरा सफेद पानी बह रहा था।
“भाभी, देखो…” मैंने कहा।
वो मुड़कर देखीं, शर्माते हुए मुस्कुराईं। “आपने मेरी गांद भर दी देवर जी…”
मैंने उसे चाटा, वासलीन का कड़वा, मेरे पानी का नमकीन स्वाद। फिर मैंने उनकी गांद को अपने मुंह से साफ किया, चाट-चाटकर।
उसके बाद, हम दोनों हर रोज चुदाई करने लगे। सुबह, दोपहर, रात, जब भी मौका मिलता। भाभी अब मेरी हो गई थीं, पूरी तरह।
हमने कई पोजीशन ट्राई कीं। मिशनरी, डॉगी, काउगर्ल, रिवर्स काउगर्ल, स्पून, 69। कभी चूत में, कभी गांद में, कभी मुंह में।
भाभी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। अमेरिकन तरीके, नए-नए खेल। हम खिलौने भी इस्तेमाल करने लगे, जो भाभी ऑनलाइन मंगवाती थीं।
एक दिन, भैया का फोन आया। वो दो महीने बाद आ रहे थे, और इस बार दो हफ्ते रहेंगे।
“देवर जी, क्या करेंगे?” भाभी ने पूछा।
“डरो मत,” मैंने कहा, “हम सावधानी से रहेंगे। वैसे भी, आप तो उनकी पत्नी हो, मुझे कौन शक करेगा?”
लेकिन अंदर ही अंदर, मुझे भी डर था। कहीं कोई देख न ले, कहीं कोई शक न कर ले। लेकिन भाभी के साथ ये रिश्ता इतना मीठा था कि मैं छोड़ नहीं सकता था।
भैया आए, हमने एक्टिंग की। भाभी उनके साथ रहीं, लेकिन रात को जब वो सो जाते, वो मेरे कमरे में आ जातीं। हम चुपचाप चुदाई करते, फिर वो चली जातीं।
एक रात, भैया नशे में थे। भाभी मेरे कमरे में आईं, और हमने उनके बगल में ही, बहुत धीरे-धीरे, चुदाई की। वो रिस्क था, लेकिन मजा दोगुना था।
6 महीने बीत गए। भाभी अब पूरी तरह भारतीन हो गई थीं, लेकिन उनका अंदाज वही पश्चिमी था। वो अब मेरे बच्चे की मां बनने वाली थीं।
“देवर जी, क्या करें?” उन्होंने पूछा, “भैया को लगेगा कि ये उनका है।”
“वही तो मैं चाहता हूं,” मैंने कहा, “मेरा बच्चा, उनके नाम पर।”
भाभी ने मुझे गले लगाया। “आप सच में मुझसे प्यार करते हो ना?”
“हां भाभी, बहुत प्यार,” मैंने कहा।
हमने फैसला किया कि ये रिश्ता यूं ही चलेगा। भैया अमेरिका में रहेंगे, हम यहां। वो महीने में एक बार आएंगे, और उनके जाने के बाद, हम अपनी दुनिया में खो जाएंगे।
बच्चा हुआ, एक लड़का। वो मेरी आंखों का था, मेरी नाक का। लेकिन सबको लगा कि ये भैया का है।
मैंने उसे पाला, पढ़ाया, बड़ा किया। भाभी के साथ मेरा रिश्ता और गहरा होता गया। हम अब बूढ़े हो गए हैं, लेकिन अभी भी, जब भी मौका मिलता है, हम एक-दूसरे को चूमते हैं, चोदते हैं।
ये कहानी है एक देसी देवर और विदेश से आई भाभी की। जिसमें प्यार था, पैशन था, और एक अनोखा रिश्ता था जो कभी खत्म नहीं हुआ।
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