ऑफिस का एक खेल जिसने बदल दिया पूरी जिंदगी
मेरा नाम अर्जुन है और मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर के पद पर काम करता हूं। मेरी जिंदगी बहुत साधारण थी – सुबह उठना, ऑफिस जाना, काम करना, घर आना और सो जाना। लेकिन इस साधारण जिंदगी में एक चमक थी जिसका नाम था अर्चना। ऑफिस का एक खेल जिसने बदल दिया पूरी जिंदगी
अर्चना HR डिपार्टमेंट में काम करती थी। वह लगभग 5’4″ की हाइट की, गोरे रंग की, काले लंबे बालों वाली लड़की थी। उसकी आंखें इतनी खूबसूरत थीं कि उसमें डूब जाने का मन करता था। उसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों जैसे नरम और लाल थे। उसके चेहरे पर एक मासूमियत थी जो किसी को भी अपनी ओर खींच लेती थी।
मैंने उसे पहली बार ऑफिस के कॉमन एरिया में देखा था। वह कॉफी मशीन के पास खड़ी थी और अपने मोबाइल में कुछ देख रही थी। उस दिन उसने नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी जो उस पर बेहद खूबसूरत लग रही थी। उसकी साड़ी का पल्लू उसके बाएं कंधे पर था और उसकी कमर की पतली डोरी साफ दिख रही थी। मैं उसे देखता ही रह गया।
“अर्जुन, यहां क्या कर रहा है? मीटिंग शुरू होने वाली है,” मेरे दोस्त राहुल ने मुझे टोका।
“अरे हां, आ रहा हूं,” मैंने कहा और आखिरी बार उसकी ओर देखा।
उस दिन से मैंने अर्चना को ध्यान से देखना शुरू कर दिया। मैंने जानबूझकर HR डिपार्टमेंट के पास से गुजरना शुरू कर दिया ताकि उसे देख सकूं। धीरे-धीरे हमारी नजरें मिलने लगीं और एक दिन हमारी पहली बातचीत हुई।
यह एक फाइल वर्क के सिलसिले में था। मुझे कुछ दस्तावेज़ जमा कराने थे और वह वहां मौजूद थी।
“हाय, मैं अर्जुन हूं, डेवलपमेंट टीम से,” मैंने परिचय दिया।
“हाय, मैं अर्चना, HR से। आपके दस्तावेज़ दीजिए, मैं देखती हूं,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
उसकी आवाज इतनी मधुर थी कि मेरे कानों में गूंजती रही। उस दिन मैंने उसे करीब से देखा। उसके चेहरे पर हल्का मेकअप था, गालों पर हल्की लाली और होंठों पर नरम गुलाबी लिपस्टिक। उसकी आंखों में काजल उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहा था।
धीरे-धीरे हमारी दोस्ती हो गई। हम लंच ब्रेक में एक साथ बैठने लगे, कभी-कभी कैफेटेरिया में कॉफी पीने चले जाते। मैं हमेशा उसकी मदद करता था – चाहे ऑफिस का काम हो या निजी मामला। जब भी किसी ने उसे परेशान किया या कोई समस्या आई, मैं हमेशा उसके साथ खड़ा रहा।मेरा नाम अर्जुन है और मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर के पद पर काम करता हूं। मेरी जिंदगी बहुत साधारण थी – सुबह उठना, ऑफिस जाना, काम करना, घर आना और सो जाना। लेकिन इस साधारण जिंदगी में एक चमक थी जिसका नाम था अर्चना। ऑफिस का एक खेल जिसने बदल दिया पूरी जिंदगी
एक बार ऑफिस में एक सीनियर ने उसे तंग किया था। मैंने बीच-बचाव किया और उस सीनियर से उलझ गया। उस दिन अर्चना ने मुझे धन्यवाद कहा और उसकी आंखों में मेरे लिए सम्मान और कृतज्ञता दिखी।
“तुम हमेशा मेरे लिए इतना क्यों करते हो?” उसने एक दिन पूछा।
“क्योंकि तुम मेरी दोस्त हो,” मैंने कहा था, लेकिन मेरे दिल में कुछ और ही था।

मैं उससे प्यार करने लगा था, लेकिन मैंने कभी अपनी भावनाएं जाहिर नहीं कीं। मुझे लगता था कि हम सिर्फ दोस्त हैं और शायद वह मुझे उस नजर से नहीं देखती। मैं उसकी खुशी में खुश रहता था, उसकी परेशानी में उदास। यह एकतरफा प्यार था, या शायद मुझे लगता था कि यह एकतरफा है।
हमारे ऑफिस में शनिवार को हाफ डे होता था। दोपहर के बाद जब सब काम खत्म करके फ्री हो जाते, तो हम सब कर्मचारी मिलकर कोई न कोई गेम खेलते थे। कभी कैरम, कभी लूडो, कभी एंटाक्षरी। यह हमारा रूटीन बन गया था। अर्चना भी हमारे साथ शामिल होती थी और हम सब मिलकर खूब मस्ती करते।
भाग 2: सच्चाई या चुनौती का खेल
वह शनिवार अलग था। बारिश का मौसम था और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। ऑफिस में बहुत कम लोग थे क्योंकि कई लोग बारिश की वजह से छुट्टी पर थे। हम सिर्फ चार-पांच लोग थे – मैं, अर्चना, राहुल, प्रिया और सिद्धार्थ।
“चलो आज कुछ मजेदार खेलते हैं,” राहुल ने सुझाव दिया।
“सच्चाई या चुनौती खेलें?” प्रिया ने कहा।
“यह अच्छा आइडिया है,” अर्चना ने मुस्कुराते हुए कहा।
हम सब कॉन्फ्रेंस रूम में इकट्ठा हुए। कमरे में एसी चल रहा था और बाहर बारिश की आवाज आ रही थी। अर्चना ने उस दिन हल्के पीले रंग की कुर्ती और सफेद लेगिंग पहनी हुई थी। उसकी कुर्ती थोड़ी छोटी थी और जब वह हाथ उठाती तो उसकी कमर का हल्का सा हिस्सा दिख जाता था। उसके बाल खुले थे और गीली बारिश की हवा में उसके बाल हल्के उड़ रहे थे।
हमने बोतल घुमाना शुरू किया। पहले कुछ राउंड सामान्य थे – सबने अपने बारे में कुछ बातें बताईं, कुछ मजेदार चुनौतियां पूरी कीं। फिर बोतल अर्चना की ओर रुकी।
“सच्चाई या चुनौती?” राहुल ने पूछा।
“सच्चाई,” अर्चना ने कहा।
“बताओ, ऑफिस में तुम्हें कौन सा लड़का सबसे ज्यादा पसंद है?” सिद्धार्थ ने शरारत से पूछा।
अर्चना ने शर्माते हुए नीचे देखा, फिर उसकी आंखें मुझसे मिलीं और वह मुस्कुराई।
“मुझे… मुझे अर्जुन सबसे ज्यादा पसंद है,” उसने धीरे से कहा।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। क्या मैंने सही सुना? अर्चना ने मेरा नाम लिया? मैं उसे हैरान होकर देखने लगा। उसने भी मुझे देखा और उसकी आंखों में कुछ अलग ही चमक थी।
“वाह! यह तो बड़ी खबर है,” राहुल ने मजाक किया।
“चलो अगला राउंड,” अर्चना ने शर्माते हुए कहा।
बोतल फिर घूमी और इस बार मेरी ओर आकर रुकी।
“सच्चाई या चुनौती?” अर्चना ने पूछा, उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी।
“सच्चाई,” मैंने कहा।
“तो बताओ, क्या तुम किसी से प्यार करते हो?” उसने सीधे सवाल पूछा।
मैंने गहरी सांस ली। यह मौका था सच कहने का। मैंने अर्चना की आंखों में देखा और कहा, “हां, मैं किसी से बहुत प्यार करता हूं।”
“कौन है वो लकी लड़की?” प्रिया ने पूछा।
“वो यहीं बैठी है,” मैंने कहा और अर्चना की ओर इशारा किया। ऑफिस का एक खेल जिसने बदल दिया पूरी जिंदगी
कमरे में एक पल की खामोशी छा गई। फिर सब हंसने लगे। लेकिन मेरी और अर्चना की आंखें एक-दूसरे में खो गईं। उसने मुझे एक अलग ही नजर से देखा – नजर में प्यार, शर्म और कुछ पूछने की इच्छा थी।
खेल खत्म होने के बाद जब सब जाने लगे, तो अर्चना ने मुझे रोका।
“अर्जुन, क्या तुम सच में मुझसे प्यार करते हो?” उसने पूछा।
“हां अर्चना, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं। शायद तुम्हें पता नहीं, लेकिन मैं हमेशा तुम्हारी मदद इसलिए करता था क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता था। तुम्हारी एक मुस्कान के लिए मैं कुछ भी कर सकता था,” मैंने अपने दिल की बात कह दी।
अर्चना की आंखें नम हो गईं। “मुझे लगता था कि तुम मुझसे सिर्फ दोस्ती करते हो। मैं भी तुमसे प्यार करती हूं, अर्जुन। लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं की कहने की,” उसने कहा।
वह पल मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल था। बारिश की आवाज, खाली ऑफिस, और मेरे सामने मेरी मुहब्बत खड़ी थी जो मुझसे प्यार करती थी। मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने करीब खींच लिया।
“क्या मैं तुम्हें…” मैंने पूछना चाहा।
“हां,” उसने शर्माते हुए कहा।
मैंने धीरे से उसके गाल पर एक चूमन लगाया। उसकी त्वचा इतनी नरम थी, इतनी मुलायम। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और मेरी बांहों में आ गई। हम दोनों वहीं खड़े रहे, एक-दूसरे को गले लगाए, बारिश की आवाज सुनते हुए।
भाग 3: पहली मुलाकात
उस दिन के बाद हमारे बीच कुछ बदल गया। अब हम सिर्फ दोस्त नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के प्रेमी थे। हम रोज लंच में एक साथ बैठते, कभी-कभी ऑफिस के बाद कॉफी पीने चले जाते।
एक हफ्ते बाद मैंने उसे डिनर पर बुलाया। हमने एक अच्छे रेस्टोरेंट में टेबल बुक की। वह उस दिन लाल रंग की ड्रेस में आई थी। उसकी ड्रेस उसके घुटनों से थोड़ी ऊपर थी और उसने हल्का मेकअप किया हुआ था। उसके गले में एक सुंदर सा लॉकेट था जो उसके गहरे गले में सुंदर लग रहा था।
“तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो,” मैंने कहा।
“शुक्रिया,” उसने शर्माते हुए कहा।
हमने डिनर किया, बातें कीं। उसने मुझे अपने बारे में बताया – उसके बचपन की कहानियां, उसके सपने, उसकी पसंद-नापसंद। मैंने भी उसे अपनी जिंदगी के बारे में बताया। हम दोनों को पता चला कि हमारी कितनी सारी चीजें मिलती-जुलती हैं।
डिनर के बाद मैंने उसे घर छोड़ने का प्रस्ताव रखा। उसका एक छोटा सा अपार्टमेंट था जो ऑफिस से करीब 20 मिनट की दूरी पर था। मैंने उसे उसके अपार्टमेंट के नीचे छोड़ा।
“ऊपर आओगे? कॉफी पिएंगे,” उसने पूछा।
मैंने हां कहा। उसका अपार्टमेंट छोटा लेकिन बहुत सुंदर था। उसने गुलाबी और सफेद रंग की सजावट की थी। उसके लिविंग रूम में एक छोटी सी सोफा थी और दीवारों पर उसकी तस्वीरें लगी हुई थीं।
“बैठो, मैं कॉफी बनाती हूं,” उसने कहा।
मैं सोफे पर बैठ गया। कुछ देर बाद वह कॉफी लेकर आई। वह मेरे बगल में बैठी। हमने कॉफी पी और बातें करते रहे।
अचानक बाहर बारिश शुरू हो गई। गरजने की आवाज आई।
“अरे, मुझे तो बहुत डर लगता है बारिश और गरज से,” अर्चना ने कहा और मेरे करीब आ गई।
मैंने उसे अपनी बांहों में भर लिया। “डरो मत, मैं हूं ना,” मैंने कहा।
वह मेरी गोद में सिर रखकर लेट गई। मैंने उसके बालों को सहलाना शुरू किया। उसके बाल इतने रेशमी थे, इतने मुलायम। मैंने धीरे से उसके माथे पर चूमा। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।
मैंने धीरे-धीरे उसके चेहरे पर चूमना शुरू किया – पहले माथे पर, फिर आंखों पर, फिर गालों पर। उसकी सांसें तेज होने लगीं। मैंने उसके होंठों की ओर बढ़ा और धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वह पहली बार था जब हम किस कर रहे थे। उसके होंठ इतने नरम थे, इतने मीठे। मैंने धीरे से उसके होंठों को चूमा, फिर धीरे-धीरे किस गहरा होने लगा। उसने भी मेरा साथ दिया और अपने होंठों से मेरे होंठों को दबाया।
हमारी जीभें एक-दूसरे से मिलीं। मैंने उसकी जीभ को अपने मुंह में खींचा और चूसने लगा। उसने भी मेरी जीभ के साथ खेलना शुरू किया। हमारी सांसें एक-दूसरे में मिल रही थीं। वह किस इतना लंबा था, इतना गहरा। मैंने उसके होंठों को चूमा, काटा, फिर फिर से चूमा।
किस करते-करते मेरा हाथ उसकी पीठ पर घूमने लगा। मैंने धीरे से उसकी कमर को सहलाया। वह कांप गई। मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके पेट को छुआ। उसका पेट इतना सॉफ्ट था, इतना चिकना। मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ ऊपर की ओर बढ़ाया।
“अर्जुन…” उसने धीरे से मेरा नाम लिया।
“क्या हुआ?” मैंने रुककर पूछा।
“कुछ नहीं… बस…” उसने शर्माते हुए कहा।
मैं समझ गया कि वह भी चाहती है लेकिन शर्मा रही है। मैंने फिर से उसे किस करना शुरू किया और इस बार मेरा हाथ उसकी छाती की ओर बढ़ा। मैंने धीरे से उसके स्तनों को छुआ। वह साड़ी पहने हुई थी और मेरा हाथ उसके ब्लाउज के ऊपर से उसके स्तनों को महसूस कर रहा था।
उसके स्तन इतने मुलायम थे, इतने नरम। मैंने धीरे से दबाया और वह सिसकी। “आह… अर्जुन…” उसने कहा।
मैंने उसके स्तनों को सहलाना शुरू किया, धीरे-धीरे दबाना शुरू किया। उसकी सांसें तेज होने लगीं। मैंने एक हाथ से उसके ब्लाउज के हुक खोलने की कोशिश की। वह और करीब आ गई।
“रुको… पहले लाइट बंद कर दो,” उसने कहा।
मैंने लिविंग रूम की लाइट बंद कर दी। सिर्फ बाहर की रोशनी आ रही थी। अब अंधेरे में मैंने फिर से उसे अपनी बांहों में भरा और किस करने लगा। इस बार मैंने उसके ब्लाउज के हुक खोल दिए। उसका ब्लाउज खुल गया और मैंने उसे हटा दिया।
अंधेरे में भी मैं उसके सफेद ब्रा में भरे हुए स्तनों को देख सकता था। वह इतने बड़े और गोल थे। मैंने एक हाथ से उसके ब्रा को ऊपर किया और उसके नंगे स्तन को छू लिया।
उसकी त्वचा इतनी गर्म थी, इतनी नरम। मैंने उसके स्तन को अपने हाथ में लिया और धीरे से दबाया। वह मदहोश हो रही थी। मैंने उसके निप्पल को अपनी उंगलियों से कुचलना शुरू किया। वह निप्पल इतना कठोर हो गया था।
मैंने अपना सिर नीचे किया और उसके स्तन को अपने मुंह में ले लिया। मैंने उसे चूसना शुरू किया, जीभ से चाटना शुरू किया। “आह… हां… अर्जुन…” उसने सिसकते हुए कहा।
मैंने एक स्तन को मुंह में रखकर चूस रहा था और दूसरे को हाथ से दबा रहा था। वह अपने हाथ मेरे सिर में फेर रही थी। मैंने उसके निप्पल को काटा और वह तड़प उठी।
“दर्द हो रहा है?” मैंने पूछा।
“नहीं… अच्छा लग रहा है… और करो,” उसने कहा।
मैंने फिर से उसके स्तनों को चूसना शुरू किया, कभी दाएं, कभी बाएं। उसकी सांसें तेज हो रही थीं और वह मदहोश होती जा रही थी। मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ नीचे की ओर बढ़ाया और उसके पेट से होते हुए उसकी नाभि पर रुका। मैंने उसकी नाभि को चूमा।
“अर्जुन… मैं…” उसने कुछ कहना चाहा।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“मैं पहली बार…” उसने शर्माते हुए कहा।
मैं समझ गया। “डरो मत, मैं बहुत प्यार से करूंगा। तुम्हें बिल्कुल दर्द नहीं होगा,” मैंने उसे assurance दी।
मैंने उसे अपनी गोद में उठाया और बेडरूम की ओर बढ़ा। उसका बेडरूम छोटा लेकिन सुंदर था। मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर लेट गया।
मैंने उसे फिर से किस किया, इस बार और गहरा, और ज्यादा प्यार से। मेरे हाथ उसके सारे शरीर पर घूम रहे थे – उसके गाल, गर्दन, स्तन, पेट, कमर। मैंने उसकी साड़ी का नाड़ा खोलना शुरू किया और धीरे-धीरे उसकी साड़ी खोल दी।
अब वह सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। उसका शरीर अंधेरे में भी चमक रहा था। मैंने उसकी पैंटी के ऊपर से उसकी योनि को छुआ। वह गीली हो चुकी थी। मैंने धीरे से उसकी पैंटी नीचे की और उसकी योनि को देखा। ऑफिस का एक खेल जिसने बदल दिया पूरी जिंदगी
वह पूरी तरह से साफ थी। उसकी योनि पर हल्के-हल्के बाल थे। मैंने उसकी योनि को छुआ और वह कांप गई। “ठंडा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“नहीं… बस…” उसने कहा।
मैंने उसकी योनि को सहलाना शुरू किया। वह गीली थी, बहुत ज्यादा गीली। मैंने धीरे से एक उंगली अंदर डाली। वह बहुत टाइट थी। मैंने धीरे-धीरे उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया।
“आह… अर्जुन… यह…” उसने सिसकी।
“क्या हुआ? अच्छा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“हां… बहुत अच्छा…” उसने कहा।
मैंने उसकी योनि को चूमना शुरू किया। मैंने अपनी जीभ से उसकी योनि को चाटना शुरू किया। वह पागल हो रही थी। “आह… हां… और करो…” उसने कहा।
मैंने उसकी योनि की दोनों पत्तियों को अपने हाथों से खोला और अंदर की गुलाबी त्वचा को चाटना शुरू किया। उसकी योनि का स्वाद इतना मीठा था। मैंने उसकी क्लिटोरिस को अपने मुंह में लिया और चूसने लगा।
“आह… अर्जुन… मैं… मैं झड़ने वाली हूं…” उसने कहा।
मैंने और तेजी से चूसना शुरू किया और उंगली अंदर-बाहर करने लगा। अचानक उसका शरीर कांपा और वह झड़ गई। उसकी योनि से पानी निकलने लगा और मैंने उसे चाट लिया।
वह थकी हुई लेटी थी। मैंने अपने कपड़े उतारे और उसके बगल में लेट गया। उसने मेरे लिंग को देखा। वह खड़ा था, बहुत मोटा और लंबा।
“यह… यह दर्द तो नहीं देगा?” उसने डरते हुए पूछा।
“थोड़ा सा होगा पहली बार, लेकिन फिर मजा आएगा,” मैंने कहा।
मैंने उसके ऊपर आकर अपने लिंग को उसकी योनि के मुंह पर रखा। वह बहुत गीली थी। मैंने धीरे से एक धक्का लगाया। थोड़ा अंदर गया, लेकिन वह बहुत टाइट थी।
“दर्द हो रहा है?” मैंने पूछा।
“थोड़ा सा… धीरे-धीरे करो,” उसने कहा।
मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए। थोड़ी देर बाद पूरा लिंग अंदर चला गया। वह दर्द से कराह उठी। मैंने रुककर उसे किस किया।
“अब ठीक है?” मैंने पूछा।
“हां… अब ठीक है,” उसने कहा।
मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। शुरू में धीरे-धीरे, फिर थोड़ा तेज। उसे भी मजा आने लगा। “आह… हां… और तेज…” उसने कहा।
मैंने गति बढ़ा दी। बिस्तर की चरमराहट की आवाज आ रही थी। हम दोनों पसीने से लथपथ थे। मैंने उसके पैरों को ऊपर उठाया और और गहराई से धक्के लगाने लगा।
“आह… अर्जुन… मैं फिर से झड़ने वाली हूं…” उसने कहा।
“मैं भी…” मैंने कहा।
हम दोनों एक साथ झड़े। मैंने अपना वीर्य उसकी योनि के अंदर ही छोड़ दिया। वह गर्म, गाढ़ा था। हम दोनों थककर एक-दूसरे से लिपटकर लेट गए।
यह हमारा पहला संभोग था। यादगार, प्यार भरा, और बहुत ही खूबसूरत।
भाग 4: जिम और नई शुरुआत
उस रात के बाद हमारा रिश्ता और भी गहरा हो गया। हम अब हर रोज मिलते, कभी ऑफिस के बाद डिनर पर जाते, कभी मूवी देखने। हम दोनों ने जिम ज्वाइन करने का फैसला किया। हमारा प्लान था कि हम सुबह-सुबह जिम जाएंगे और फिर ऑफिस जाएंगे।
जिम में हम दोनों साथ-साथ वर्कआउट करते। अर्चना जिम में टाइट लेगिंग और स्पोर्ट्स ब्रा पहनती थी। उसका फिगर जिम में और भी ज्यादा खूबसूरत लगता था। उसकी गोल गांड, उसकी कसी हुई कमर, और उसके स्तन जो हर एक्सरसाइज में हिलते थे – यह सब मुझे बहुत उत्तेजित करता था।
एक दिन जिम में हम दोनों अकेले थे। सुबह-सुबह का वक्त था और जिम में कोई नहीं था। अर्चना ट्रेडमिल पर दौड़ रही थी। मैं उसे देख रहा था। उसकी लेगिंग उसकी गांड के साथ पूरी तरह चिपकी हुई थी और उसकी हर कदम पर उसकी गांड हिल रही थी।
मेरा लिंग खड़ा हो गया। मैंने उसे पीछे से पकड़ लिया।
“अर्जुन, यहां कोई आ सकता है,” उसने कहा।
“सब लोग आने में अभी आधा घंटा लगेगा,” मैंने कहा और उसकी गांड को सहलाना शुरू किया।
मैंने उसे ट्रेडमिल से उतारा और शीशे के सामने खड़ा कर दिया। शीशे में हम दोनों दिख रहे थे। मैंने पीछे से उसकी लेगिंग नीचे की और उसकी गांड को चूमना शुरू कर दिया।
“आह… अर्जुन… यहां नहीं…” उसने कहा।
“क्यों? मजा नहीं आ रहा?” मैंने पूछा।
“आ रहा है… लेकिन…” उसने कहा।
मैंने उसकी बात नहीं सुनी और उसकी योनि को चाटना शुरू कर दिया। वह शीशे में देख रही थी और मजा ले रही थी। मैंने अपना लिंग बाहर निकाला और उसकी योनि में डाल दिया।
“आह…” उसने सिसकी।
मैंने पीछे से धक्के लगाने शुरू किए। शीशे में हम दोनों दिख रहे थे – मैं उसकी गांड मार रहा था और वह शीशे को पकड़ी हुई थी। यह नजारा बहुत ही उत्तेजक था।
थोड़ी देर बाद हम दोनों झड़ गए। हमने जल्दी से कपड़े ठीक किए और अपना वर्कआउट जारी रखा।
भाग 5: घूमने फिरने के दिन
हमारे रिश्ते के कुछ महीने बीत गए। अब हम एक-दूसरे के शरीर से पूरी तरह वाकिफ थे। हम जानते थे कि कहां छूने से क्या अनुभव होता है, क्या करने से कितना मजा आता है।
एक वीकेंड पर हमने पहाड़ों पर जाने का प्लान बनाया। हम एक छोटे से हिल स्टेशन गए जहां हमने एक होटल में कमरा बुक किया। वह जगह बहुत खूबसूरत थी – हरियाली, पहाड़, ठंडी हवा।
हम शाम को वहां पहुंचे। कमरा बड़ा था और उसमें एक बड़ी सी खिड़की थी जिससे बाहर पहाड़ों का नजारा दिखता था। अर्चना ने उस दिन टाइट जींस और छोटी टी-शर्ट पहनी हुई थी। उसकी गोल गांड जींस में बहुत सेक्सी लग रही थी।
“यह जगह बहुत खूबसूरत है,” उसने कहा और खिड़की के पास खड़ी हो गई।
मैं उसके पीछे गया और उसे पीछे से पकड़ लिया। “तुम इस जगह से भी ज्यादा खूबसूरत हो,” मैंने कहा और उसके गाल पर चूमा।
उसने अपना सिर पीछे किया और मुझे किस कर लिया। हम दोनों खिड़की के पास खड़े होकर एक-दूसरे को किस कर रहे थे। मेरे हाथ उसके स्तनों पर थे और मैं उन्हें दबा रहा था।
मैंने उसे घुमाया और उसकी टी-शर्ट उतार दी। उसने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी। उसके स्तन बाहर थे, गोल और सुडौल। मैंने उन्हें पकड़ा और चूसने लगा।
“आह… अर्जुन…” उसने सिसकी।
मैंने उसकी जींस भी उतार दी। वह सिर्फ पैंटी में थी। मैंने उसे खिड़की के पास ही घुटनों के बल बैठा दिया और उसकी गांड को चूमना शुरू कर दिया।
“कितनी खूबसूरत गांड है तुम्हारी,” मैंने कहा और उसे काटा।
“आह… दर्द हो रहा है…” उसने कहा।
“मजा आ रहा है ना?” मैंने पूछा।
“हां…” उसने शर्माते हुए कहा।
मैंने उसकी पैंटी नीचे की और उसकी योनि को चाटना शुरू कर दिया। वह खिड़की को पकड़ी हुई थी और मजा ले रही थी। बाहर से ठंडी हवा आ रही थी और अंदर मैं उसकी योनि को गर्म कर रहा था।
मैंने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। मैंने अपने कपड़े उतारे और उसके ऊपर आ गया। इस बार मैंने उसके पैरों को ऊपर उठाया और उसकी गांड के नीचे एक तकिया रख दिया ताकि वह और ऊपर उठ जाए।
मैंने अपने लिंग को उसकी योनि पर रखा और एक जोरदार धक्का लगाया। पूरा लिंग अंदर चला गया।
“आह… हां… और तेज…” उसने कहा।
मैंने जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू किए। बिस्तर की चरमराहट, हम दोनों की सांसें, और बाहर पहाड़ों का नजारा – यह सब मिलकर एक अद्भुत अनुभव बना रहा था।
मैंने उसकी टांगों को अपने कंधों पर रखा और और गहराई से धक्के लगाने लगा। उसकी योनि मेरे लिंग को कस रही थी।
“अर्जुन… मैं झड़ने वाली हूं…” उसने कहा।
“रुको… मैं भी…” मैंने कहा।
हम दोनों एक साथ झड़े। मैंने अपना सारा वीर्य उसकी योनि में भर दिया। वह गर्म था, बहुत गर्म।
थोड़ी देर आराम करने के बाद हमने फिर से किया। इस बार मैंने उसे पीछे से लिया। वह कुत्ते की तरह बैठी थी और मैं उसकी पीछे से उसकी योनि में अपना लिंग डालकर धक्के लगा रहा था। उसकी गांड हिल रही थी और मैं उसे पकड़कर जोर-जोर से धक्के लगा रहा था।
“आह… हां… और जोर से… मारो…” उसने कहा।
मैंने पूरी ताकत से धक्के लगाए। उसकी योनि से आवाजें आ रही थीं – चपाक-चपाक की आवाजें। यह बहुत उत्तेजक था।
हमने उस रात तीन बार किया। हर बार नई पोजीशन, नए तरीके। हम दोनों थककर सो गए।
भाग 6: ऑफिस में चोरी-छिपे
हमारा रिश्ता अब पूरी तरह से स्थापित हो चुका था। हम दोनों एक-दूसरे को बिना किसी शर्म के प्यार करते थे। ऑफिस में भी हम चोरी-छिपे मौके ढूंढकर एक-दूसरे को चूम लेते या छू लेते।
एक दिन लंच ब्रेक में हम दोनों ऑफिस की टेरेस पर गए। वहां कोई नहीं था। हमने एक कोने में खड़े होकर एक-दूसरे को किस किया। मैंने उसकी साड़ी के अंदर हाथ डाला और उसके स्तनों को दबाया।
“अर्जुन, कोई देख लेगा,” उसने कहा।
“कोई नहीं है,” मैंने कहा और उसकी योनि को छूने लगा।
वह गीली थी। मैंने उसकी योनि में उंगली डाली और अंदर-बाहर करने लगा। वह मेरे कंधे को पकड़कर मजा ले रही थी।
अचानक हमें किसी के आने की आवाज सुनाई दी। हम जल्दी से अलग हो गए और नॉर्मल होकर वापस चले गए।
एक और बार, ऑफिस के बाथरूम में हम दोनों अकेले थे। मैंने उसे अंदर खींच लिया और किस करने लगा। मैंने उसकी साड़ी उठाई और उसकी गांड को सहलाया।
“यहां नहीं… कभी और…” उसने कहा।
“थोड़ी देर के लिए…” मैंने कहा और उसकी योनि में उंगली डाल दी।
मैंने उसे जल्दी-जल्दी उंगली की और वह झड़ गई। फिर हम दोनों अलग-अलग बाहर निकले।
भाग 7: अर्चना का जन्मदिन
अर्चना का जन्मदिन आ रहा था। मैंने उसके लिए एक खास प्लान बनाया। मैंने एक होटल में सुइट रूम बुक किया, केक मंगवाया, और उसके लिए एक सेक्सी गिफ्ट भी लिया – एक लाल रंग की लेसी लिंजरी।
जन्मदिन के दिन मैंने उसे वहां ले गया। जब उसने कमरा देखा तो वह बहुत खुश हुई। मेज पर केक रखा था, गुलाब की पंखुड़ियां बिछी हुई थीं, और शराब भी थी।
“यह सब तुमने मेरे लिए किया?” उसने खुशी से पूछा।
“हां, मेरी जान,” मैंने कहा और उसे किस किया।
हमने पहले केक काटा। मैंने केक उसके मुंह में डाला और फिर उसके होंठों को चूमा। फिर हमने थोड़ी शराब पी।
शराब का नशा चढ़ने लगा था। अर्चना की आंखें लाल हो गई थीं और वह और भी ज्यादा सेक्सी लग रही थी। मैंने उसे गिफ्ट दिया।
“इसे पहनकर दिखाओ,” मैंने कहा।
वह बाथरूम में गई और थोड़ी देर बाद बाहर आई। वह लाल लिंजरी में बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। उसके स्तन आधे बाहर थे, उसकी योनि ढकी हुई थी लेकिन आंचल से झलक रही थी।
“तुम बहुत ही खूबसूरत लग रही हो,” मैंने कहा और उसे अपनी बांहों में भर लिया।
मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। इस बार मैं बहुत धीरे-धीरे, बहुत प्यार से उसे छूना चाहता था। मैंने उसके पैरों के अंगूठे से शुरुआत की, फिर धीरे-धीरे ऊपर बढ़ता गया – टखने, घुटने, जांघें।
मैंने उसकी जांघों को चूमा, काटा। वह कांप रही थी। फिर मैं उसकी योनि पर पहुंचा और उसे चाटने लगा। वह मदहोश हो रही थी।
“आह… अर्जुन… मैं…” उसने कहा।
“शांत रहो, आज मैं तुम्हें पूरा मजा दूंगा,” मैंने कहा।
मैंने उसकी योनि को बहुत देर तक चाटा, उसकी क्लिटोरिस को चूसा, उसकी पत्तियों को चाटा। वह दो बार झड़ चुकी थी।
फिर मैंने उसकी योनि में अपना लिंग डाला। इस बार मैंने बहुत धीरे-धीरे धक्के लगाए, हर धक्के के साथ उसे किस किया। हम दोनों एक-दूसरे में खोए हुए थे।
“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, अर्चना,” मैंने कहा।
“मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूं,” उसने कहा।
हम दोनों एक साथ झड़े। यह हमारा सबसे प्यारा संभोग था।
भाग 8: नए प्रयोग
हमारे रिश्ते में अब हर तरह की स्वतंत्रता थी। हम नई-नई चीजें आजमाते थे। एक बार हमने शॉवर सेक्स किया। बाथरूम में गर्म पानी बह रहा था और हम दोनों एक-दूसरे के नंगे बदन को साबुन लगा रहे थे।
मैंने उसके स्तनों पर साबुन लगाया और उन्हें दबाया। फिर मैंने उसे दीवार से सटाया और उसकी योनि में अपना लिंग डाल दिया। गर्म पानी बह रहा था और मैं उसे धक्के दे रहा था। यह एक अलग ही अनुभव था।
एक और बार हमने कार में किया। रात का वक्त था और हम एक सुनसान जगह पर थे। मैंने उसे पीछे की सीट पर लिटाया और उसकी योनि में लिंग डालकर धक्के लगाए। कार हिल रही थी और हम दोनों मजे ले रहे थे।
हमने किचन सेक्स भी किया। अर्चना खाना बना रही थी और मैंने पीछे से आकर उसकी साड़ी उठाई और उसकी योनि में लिंग डाल दिया। वह चूल्हे के पास खड़ी थी और मैं उसकी पीछे से धक्के लगा रहा था।
“अर्जुन… खाना जल जाएगा…” उसने कहा।
“रहने दो… पहले यह कर लेते हैं…” मैंने कहा और और तेज धक्के लगाने लगा।
भाग 9: गांड की चुदाई
एक दिन अर्चना ने कहा, “अर्जुन, मैंने सुना है कि पीछे से भी करते हैं… क्या हम वो भी आजमाएंगे?”
मैं थोड़ा हैरान हुआ लेकिन खुश भी। “तुम्हें करना है?” मैंने पूछा।
“हां, लेकिन धीरे-धीरे… मुझे डर लग रहा है,” उसने कहा।
मैंने उसे समझाया कि मैं बहुत प्यार से करूंगा और अगर दर्द होगा तो रुक जाएंगे।
उस रात हमने यह आजमाने का फैसला किया। मैंने उसे बहुत सारा ल्यूब लगाने को कहा। हम दोनों नंगे थे। मैंने उसे कुत्ते की तरह बैठने को कहा।
उसकी गांड इतनी गोल और सुंदर थी। मैंने उसकी गांड को चूमा, चाटा। फिर मैंने उसकी योनि में उंगली की ताकि वह गीली हो जाए और उसकी योनि का रस उसकी गांड पर लग जाए।
फिर मैंने धीरे से एक उंगली उसकी गांड में डाली। वह टाइट थी, बहुत ज्यादा। मैंने धीरे-धीरे उंगली अंदर-बाहर की। वह थोड़ा असहज लग रही थी लेकिन दर्द नहीं हो रहा था।
“कैसा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“अजीब सा… लेकिन ठीक है,” उसने कहा।
मैंने दो उंगलियां डालीं और थोड़ी देर तक अंदर-बाहर की। फिर मैंने अपने लिंग पर बहुत सारा ल्यूब लगाया और उसकी गांड के मुंह पर रखा।
“धीरे-धीरे करना,” उसने कहा।
मैंने धीरे से एक धक्का लगाया। लिंग का सिरा अंदर गया। वह दर्द से चीखी।
“रुक जाऊं?” मैंने पूछा।
“नहीं… थोड़ा और अंदर करो… धीरे-धीरे…” उसने कहा।
मैंने धीरे-धीरे पूरा लिंग अंदर डाल दिया। वह सांसें तेज-तेज ले रही थी। मैंने रुककर उसे किस किया और उसके स्तनों को दबाया।
थोड़ी देर बाद मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। शुरू में धीरे, फिर थोड़ा तेज। उसे भी मजा आने लगा।
“आह… अर्जुन… यह अलग ही अनुभव है…” उसने कहा।
“मजा आ रहा है?” मैंने पूछा।
“हां… बहुत…” उसने कहा।
मैंने गति बढ़ा दी। उसकी गांड इतनी टाइट थी कि मुझे बहुत मजा आ रहा था। मैंने उसकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। ऑफिस का एक खेल जिसने बदल दिया पूरी जिंदगी
“आह… हां… और तेज… मारो…” उसने कहा।
मैंने पूरी ताकत से धक्के लगाए। बिस्तर की चरमराहट, हमारी सांसें, और उसकी गांड की टाइटनेस – यह सब मिलकर मुझे बहुत उत्तेजित कर रहा था।
कुछ देर बाद मैंने अपना वीर्य उसकी गांड में ही छोड़ दिया। वह गर्म था, बहुत गर्म। मैंने अपना लिंग बाहर निकाला और उसकी गांड को देखा – वह थोड़ी लाल हो गई थी लेकिन खूबसूरत लग रही थी।
“कैसा लगा?” मैंने पूछा।
“अच्छा था… अगली बार और करेंगे,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
भाग 10: साथ की जिंदगी
समय बीतता गया और हमारा प्यार और भी गहरा होता गया। हमने एक साथ रहने का फैसला किया और एक अपार्टमेंट ले लिया।
हर सुबह मैं उसे उठाता, उसे किस करता, उसके स्तनों को दबाता। कभी-कभी सुबह-सुबह ही हम सेक्स कर लेते थे। फिर हम साथ नहाते, नाश्ता करते, और ऑफिस जाते।
रात को हम साथ खाना बनाते, साथ खाते, और फिर बिस्तर पर एक-दूसरे को प्यार करते। हम हर रात सेक्स करते थे – कभी धीरे-धीरे प्यार से, कभी जोर-जोर से जंगली अंदाज में।
हमने हर तरह की पोजीशन आजमाई – मिशनरी, डॉगी स्टाइल, काउगर्ल, रिवर्स काउगर्ल, स्पूनिंग, स्टैंडिंग। हर पोजीशन में अलग मजा था।
मिशनरी में हम एक-दूसरे की आंखों में देखकर प्यार करते थे। डॉगी में मैं उसकी गांड देखकर उत्तेजित होता था। काउगर्ल में वह मुझ पर बैठकर खुद हिलती थी और मुझे बहुत मजा आता था।
हमने ऑरल सेक्स भी बहुत किया। मैं उसकी योनि को चाटता और वह मेरे लिंग को चूसती। वह धीरे-धीरे चूसना सीख गई थी और अब वह मेरा पूरा लिंग अपने मुंह में ले लेती थी।
“तुम बहुत अच्छा चूसती हो,” मैंने एक दिन कहा।
“तुम्हें पसंद आया?” उसने पूछा।
“बहुत पसंद आया,” मैंने कहा और उसे फिर से किस किया।
भाग 11: वो शनिवार
एक शनिवार यादगार रहा। हम दोनों घर पर थे और बाहर बहुत तेज बारिश हो रही थी। हमने बाहर जाने का प्लान कैंसिल कर दिया और घर पर ही रहने का फैसला किया।
हमने सोफे पर बैठकर मूवी देखना शुरू किया। अर्चना ने मेरे कंधे पर सिर रखा हुआ था। मैंने उसे अपनी बांहों में भर लिया।
मूवी देखते-देखते मेरा हाथ उसके स्तनों की ओर बढ़ गया। मैंने उसके स्तनों को दबाना शुरू कर दिया। वह भी गर्म होने लगी।
“यहीं करेंगे?” उसने पूछा।
“क्यों, मजा नहीं आएगा सोफे पर?” मैंने पूछा।
“आएगा…” उसने शर्माते हुए कहा।
मैंने उसकी टी-शर्ट उतार दी और उसके ब्रा को भी खोल दिया। उसके स्तन बाहर आ गए। मैंने उन्हें चूसना शुरू कर दिया। वह सोफे पर लेटी हुई थी और मैं उसके ऊपर था।
मैंने उसकी शॉर्ट्स भी उतार दी। वह पूरी तरह से नंगी थी। मैंने उसकी टांगें फैलाईं और उसकी योनि को चाटने लगा। वह सोफे पर मजे ले रही थी।
“आह… अर्जुन… बहुत मजा आ रहा है…” उसने कहा।
मैंने उसकी योनि को बहुत देर तक चाटा। फिर मैंने अपने कपड़े उतारे और उसकी योनि में अपना लिंग डाल दिया।
सोफे पर सेक्स करना अलग अनुभव था। हम दोनों सीमित जगह में थे लेकिन यही बात और उत्तेजक बना रही थी। मैंने उसके एक पैर को सोफे पर रखा और दूसरे को हवा में उठाया और धक्के लगाने लगा। ऑफिस का एक खेल जिसने बदल दिया पूरी जिंदगी
“आह… हां… और तेज…” उसने कहा।
बाहर बारिश की आवाज, अंदर हमारी सांसें और धक्कों की आवाजें। यह सब मिलकर एक अद्भुत माहौल बना रहा था।
हमने सोफे पर दो बार किया। फिर हम बेडरूम में गए और वहां भी किया। वह दिन हमने चार बार सेक्स किया।
अब वो मेरी स्थायी सेक्स पार्टनर बन गई है। जब भी मुझे सेक्स करने का मन होता है, मैं उसे बुला लेता हूँ। वो मेरी ऑफिस की सेक्स पार्टनर थी, जितना ज़्यादा मैं उसके साथ सेक्स करता था, उतना ही ज़्यादा वो सेक्स करने की इच्छुक लगती थी।
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