जीजा साली की गुप्त चुदाई
मैं राजेश हूँ। उम्र बत्तीस साल(32)। मेरी शादी को पाँच साल हो चुके हैं। पत्नी मीरा बहुत अच्छी औरत है, लेकिन जिंदगी में एक खालीपन हमेशा रहा। वो खालीपन भरने आई मेरी साली, गीता। गीता ने मुझे साली का ऐसा प्यार दिया जिसे मैंने सोचा नहीं था । जीजा साली की गुप्त चुदाई जो पहली बार हुई थी मुझे आज भी याद है । मैं आज अपनी साली की चुदाई की कहानी बताने जा रहा हूँ
गीता मीरा की छोटी बहन है। उम्र पच्चीस साल(25)। जब भी वो हमारे घर आती, पूरा माहौल बदल जाता। उसकी हँसी, उसकी बातें, उसकी आँखों में छिपी उदासी… सब कुछ मुझे गहराई से छू जाता। उसका फिगर 34-26-34 है उसको देख के वो मेरी लाल टपकने लगती है ।
हमारा घर छोटा सा है। पिता जी के निधन के बाद मीरा और गीता दोनों ने मिलकर परिवार को संभाला था। गीता अक्सर आती, कभी-कभी रुक भी जाती। हर बार वो चली जाती तो मैं बेचैन रहता।
धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि ये बेचैनी सिर्फ आकर्षण नहीं, कुछ और है। गीता भी मुझे देखकर शरमा जाती। उसकी नजरें मेरी नजरों से मिलतीं, फिर झुक जातीं।
जीजा साली की चुदाई/ हिंदी सेक्स कहानियाँ
एक शाम बारिश हो रही थी। मीरा बाजार गई हुई थी। गीता रसोई में चाय बना रही थी। मैंने जाकर उसकी पीठ पर हाथ रखा।
“गीता… तू ठीक है ना?”
वो घूमी। आँखों में आँसू थे।
“जिजाजी… मम्मी की बहुत याद आ रही है।”
मैंने उसे अपनी बाहों में ले लिया। वो रो पड़ी। मैंने उसके बाल सहलाए।
“रो मत… मैं हूँ ना।”
उस पल कुछ बदल गया। गीता ने मुझे गले लगाया। उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसके माथे पर चूमा।
“जिजाजी… आप बहुत अच्छे हो।”
उस रात से हमारी बातें गहरी होने लगीं। रात को छत पर बैठकर घंटों बात करते। गीता अपनी जिंदगी के दर्द सुनाती। मैं अपनी शादी की खुशियों और खामियों के बारे में।
“जिजाजी, कभी-कभी लगता है कि मैं अकेली हूँ।”
“तू अकेली नहीं है गीता। मैं हूँ।”
एक दिन मीरा मायके गई। घर में सिर्फ हम दोनों थे। गीता बीमार पड़ गई थी। मैंने उसकी देखभाल की। दवा दी, सरहाने बैठा रहा।
रात को बुखार बढ़ गया। गीता बेचैनी से करवट ले रही थी। मैंने उसे पानी पिलाया।
“जिजाजी… थोड़ा पास बैठो।”
मैं उसके बिस्तर के पास बैठ गया। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“जिजाजी… आपकी वजह से मुझे लगता है कि शायद जिंदगी में कोई साथी है।”
मैं चुप रहा। लेकिन दिल में तूफान था।
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धीरे-धीरे हमारी दोस्ती प्यार में बदल रही थी। गीता अब खुलकर मेरे पास बैठती। कभी-कभी उसके हाथ मेरे हाथ से छू जाते।
एक शाम मैंने उसे बताया, “गीता… मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूँ।”
वो चुप रही। फिर धीरे से बोली, “जिजाजी… मुझे भी… लेकिन ये गलत है।”
“प्यार कभी गलत नहीं होता गीता।”
उस रात हमने पहली बार गहरी बात की। गीता ने कहा कि वो बचपन से ही मुझे पसंद करती थी। लेकिन डरती थी।
“जिजाजी… अगर मीरा दीदी को पता चला तो?”
“हम चुपचाप रखेंगे।”
फिर शुरू हुआ वो सफर।
मैंने गीता को पटाने की कोशिश की, लेकिन वो पहले से ही तैयार थी। बस डर था।
एक रात जब बारिश जोरों से हो रही थी, गीता मेरे कमरे में आई।
“जिजाजी… डर लग रहा है।”
मैंने उसे बिस्तर पर बिठाया। हम दोनों बातें करने लगे। फिर चुप्पी छा गई।
मैंने उसके गाल पर हाथ फेरा। गीता ने आँखें बंद कर लीं।
“जिजाजी… अगर आप चाहो तो…”
मैंने उसे चूमा। पहली बार। वो भी जवाब देने लगी।
“गीता… तू मेरी जान है।”
“आप भी मेरे… जिजाजी।”
हमने कपड़े उतारे। गीता नंगी मेरे सामने थी। मैंने उसे देखा। वो शरमा रही थी।
“जिजाजी… शर्म आ रही है।”
“तू बहुत खूबसूरत है गीता।”
मैंने उसके स्तनों को चूमा। वो सिसकने लगी।
“आह… जिजाजी…”
मैंने उसकी जांघें खोलीं। उसकी चूत गीली थी। मैंने धीरे से उंगली डाली।
“जिजाजी… मर जाऊँगी…”
“धीरे-धीरे… मजा आएगा।”
मैंने जीभ से चाटा। गीता पागल हो रही थी।
“जिजाजी… अब डालो… प्लीज…”
मैंने अपना लंड निकाला। गीता ने उसे हाथ में लिया।
“इतना… बड़ा…”
मैंने उसे लेटाया। धीरे से अंदर डाला।
“आह्ह… दर्द…”
“सह ले गीता… अब हम एक हो गए।”
मैंने धीरे-धीरे धक्के मारे। गीता चीख रही थी।
“जिजाजी… और… और…”
हम दोनों एक साथ झड़ गए।
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लेकिन ये सिर्फ शुरूआत थी।
अगले दिनों हमने और गहरे प्यार किया। कभी रसोई में, कभी छत पर, कभी कार में।
हर बार गीता कहती, “जिजाजी… मैं आपकी हूँ… हमेशा।”
मैं जवाब देता, “और मैं तेरा… गीता।”
लेकिन दिल में हमेशा डर और ग्लानि भी रहती।
“जिजाजी… अगर ये सब ख़त्म हो गया तो?”
“कभी नहीं होगा गीता।”
हमारी ये कहानी आज भी चल रही है। गीता अब और खुलकर आती है। हम चोरी-छुपे मिलते हैं।
लेकिन प्यार वही है। गहरा। सच्चा।
गीता मेरी साली है… लेकिन दिल से मेरी जान।
गीता और मैं अब हर पल को याद रखने लगे थे।
मीरा जब मायके रहती, तो गीता रुक जाती। हम दोनों रात भर बातें करते। कभी-कभी वो रो देती।
“जिजाजी… मुझे लगता है कि मैं पाप कर रही हूँ। दीदी की शादी में मैंने उनका पति छीन लिया।”
“नहीं गीता… प्यार पाप नहीं होता।”
मैं उसे गले लगाता। उसके आँसू पोंछता। फिर धीरे से उसके होंठों को चूमता।
“जिजाजी… आपकी बाहों में लगता है जैसे पूरी दुनिया रुक गई हो।”
“ये दुनिया सिर्फ हमारी है गीता।”
एक शाम हमने पुरानी तस्वीरें देखीं। बचपन की। गीता छोटी थी, मैं नया दामाद।
“जिजाजी… तब से आप मुझे अच्छे लगते थे।”
“मुझे भी… लेकिन डरता था।”
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हमने एक-दूसरे को और करीब से जाना। गीता ने बताया कि वो कितनी अकेली महसूस करती है। मैंने अपनी शादी की थकान सुनाई।
धीरे-धीरे शारीरिक लगाव भी बढ़ा।
एक रात गीता ने कहा, “जिजाजी… आज मुझे अपनी बनाओ। पूरी तरह।”
मैंने उसे नंगा किया। उसके शरीर को चूमा। हर इंच को।
“जिजाजी… आपकी जीभ… आह…”
मैंने उसके स्तनों को चूसा। निप्पल को काटा। गीता चीख पड़ी।
फिर मैंने उसकी चूत में उंगली डाली। अंदर-बाहर।
“जिजाजी… और… और गहरा…”
मैंने अपना लंड उसके मुँह में डाला। गीता ने चूसा।
“गीता… तू बहुत अच्छा करती है।”
फिर मैंने उसे लेटाया और धीरे से अंदर घुसा।
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“आह्ह… जिजाजी… भर दो मुझे…”
हमने घंटों सेक्स किया। अलग-अलग पोजीशन में। गीता हर बार नई माँग करती।
“जिजाजी… मेरी गांड मारो…”
मैंने धीरे से उसकी गांड में लंड डाला। गीता दर्द से काँप रही थी लेकिन मजा ले रही थी।
“जिजाजी… और… जोर से…”
हम दोनों थककर गिर पड़े।
लेकिन अगली सुबह ग्लानि आती।
“जिजाजी… हम क्या कर रहे हैं?”
“प्यार कर रहे हैं गीता।”
“फिर भी… डर लगता है।”
मैं उसे आश्वासन देता।
“मैं कभी नहीं छोड़ूँगा।”
हमारी ये कहानी अब दो साल से चल रही है। गीता कभी-कभी कहती है कि वो शादी नहीं करेगी।
“जिजाजी… आप ही मेरे पति हो।”
“और तू मेरी जान।”
हर बार मिलने पर हम और गहराई से जुड़ते।
कभी आँसू, कभी हँसी, कभी जोश भरा सेक्स।
गीता अब खुलकर कहती, “जिजाजी… मेरी चूत आपकी है… हमेशा।”
“और मेरा लंड तेरा… गीता।”
ये रिश्ता गहरा है। दिल को छूने वाला।
हम जानते हैं कि ये गलत है, लेकिन रुक नहीं सकते।
गीता मेरी साली है… लेकिन मेरी सबसे बड़ी चाहत भी।
समय बीतता गया। गीता और मैं अब एक-दूसरे के बिना अधूरे लगने लगे।
एक बार मीरा को पता चलने का डर सता गया। गीता रो पड़ी।
“जिजाजी… अगर दीदी को सब पता चल गया तो?”
“चुप रह गीता… हम सावधानी बरतेंगे।”
मैंने उसे गले लगाया। उसके आँसू चूमे। फिर धीरे से उसके कपड़े उतारे।
“जिजाजी… आज मुझे बहुत प्यार करो।”
मैंने उसकी पूरी देह को चूमा। उसके स्तन, उसकी कमर, उसकी जांघें… हर जगह।
गीता सिसक रही थी।
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“आह… जिजाजी… आपकी साँसें… मुझे पागल कर रही हैं।”
मैंने उसकी चूत चाटी। गीता उछल रही थी।
“जिजाजी… अब रुक मत… डाल दो…”
मैंने लंड अंदर घुसाया। धीरे-धीरे, गहरे।
“गीता… तू मेरी जिंदगी है।”
“आप भी… मेरे सब कुछ।”
हमने घंटों तक प्यार किया। गीता ने कई बार चरम सुख पाया।
“जिजाजी… मैं मर जाऊँगी… इतना अच्छा लग रहा है…”
मैं भी झड़ गया। उसके अंदर।
उसके बाद हम चुपचाप लेटे रहे। गीता ने मेरा हाथ थामा।
“जिजाजी… कभी-कभी लगता है कि ये सपना है।”
“सपना नहीं… हकीकत है गीता।”
हमारी मुलाकातें अब और भावुक हो गईं।
एक बार गीता ने कहा, “जिजाजी… अगर मैं शादी कर लूँ तो?”
“मत कर… मैं तुझे खो नहीं सकता।”
“मैं भी… आप ही मेरे हैं।”
हमने और गहरे रिश्ते बनाए। कभी गीता मेरे सरहाने बैठकर गाना गाती। कभी मैं उसे पुरानी कहानियाँ सुनाता।
लेकिन सेक्स में हमेशा नया जोश।
गीता ने एक दिन पूछा, “जिजाजी… मेरी गांड में फिर से डालो।”
मैंने उसे घुमाया। धीरे से अंदर घुसा। गीता चीखी।
“आह्ह… दर्द… लेकिन अच्छा…”
हम दोनों थक गए।
अंत में गीता ने कहा, “जिजाजी… आप मेरे दिल में हमेशा रहोगे।”
“और तू मेरे… गीता।”
ये कहानी अब भी जारी है। गीता आती है, हम मिलते हैं, प्यार करते हैं।
कभी आँसू, कभी हँसी, कभी गहरा सेक्स।
लेकिन दिल में हमेशा एक दर्द… कि ये रिश्ता गुप्त है।
गीता मेरी साली है… लेकिन मेरी सबसे गहरी चाहत, सबसे सच्चा प्यार भी।
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Jija Sali ki aur kahaniya :- sali ki chudai ka asli maja