भाग 1 — जिसे मैंने हमेशा ‘बुआ’ समझा
नमस्कार। मैं रोहित हूँ, 23 साल का, कानपुर का रहने वाला। कद पाँच फुट ग्यारह इंच, रंग गोरा-चिट्टा, बदन कसरती — जिम नहीं जाता पर खेत और कबड्डी ने शरीर गढ़ दिया है। और मेरा लंड… सात इंच का, मोटा, नस-नस फूला हुआ। पजामे में जब तन जाता है तो तंबू साफ़ दिख जाता है, और खुद शरम आती है। पर सबसे बड़ी बात — मुझे उम्रदराज़, शादीशुदा औरतें पसंद हैं। जवान लड़कियों से ज़्यादा वो औरतें, जिनकी चूत ने लंड का स्वाद चखा हो, जिनकी चूचियों में तपिश हो, जो चुदने पर ‘आह’ भरें — वो मुझे पागल कर देती हैं। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
बी.ए. के लिए लखनऊ आना था। किराया आसमान पर, और अम्मा-बाबूजी को मेरे खाने की फ़िक्र। तभी अम्मा बोलीं — “रोहित, तेरी सुमन बुआ तो वहीं रहती है ना? उसके पास ही रह ले। अपनी बुआ है, तेरा ख़याल रखेगी।”
सुमन बुआ। फूफा जी की बीवी। उम्र 41 — पर जब फोन पर आवाज़ आई, “आ जा रे रोहित, अकेला मत रह, बुआ के पास आ जा”, तो पता नहीं क्यों मेरा लंड बिना इजाज़त खड़ा हो गया।
दो दिन बाद जब मैं उनके सरकारी क्वार्टर के दरवाज़े पर खड़ा था, तो पहली नज़र में ही मेरे होश उड़ गए। सुमन बुआ ने उस दिन हल्का फ़िरोज़ी कॉटन का सूट पहना था। चेहरा चाँद सा, आँखों में काजल, होठों पर हल्की लाली। पर असली कहर उनका बदन था — भरा हुआ सीना, जिसमें सूट के नीचे चूचियाँ अपनी जगह से लड़ रही थीं, और कमर का वो झूला जिसके नीचे सिंदूर भरी माँग के साथ-साथ गोरी, मोटी जाँघें थीं। चलती तो थीं ऐसे जैसे हवा में तैर रही हों, और उनका भारी चूतड़ लय में झूलता। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“आ जा, आ जा… कितना बड़ा हो गया तू!” — कहते हुए बुआ ने मेरा गाल खींच लिया। उनकी उंगलियाँ गर्म थीं। छत पर लगा कूलर भी उनकी गर्मी के आगे फेल था।
भाग 2 — फूफा जी की कमज़ोरी, और बुआ की चुप-चाप प्यास
फूफा जी 53 साल के, शुगर के मरीज़। दो पैग पीते ही चूर, और रात नौ बजे तक बेड पर पसर। उन्हें दमे की भी शिकायत थी। घर के काम-काज, खाना, सब बुआ ही संभालतीं। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
पहली रात डिनर पर बैठे-बैठे फूफा जी दो पैग लगाकर बोले, “बेटा, अब हमारी उम्र हो गई… ये बुआ तेरी जवान है अभी। इसे पूरा सुख नहीं दे पाता।” और मेरी तरफ़ आँख मारकर हँसे। बुआ ने नज़रें झुका लीं, पर मैंने देखा — उनके कान तक शरम से लाल हो गए थे।
तब मुझे समझ नहीं आया था। अब आता है। फूफा जी शुगर की दवा खाकर सो जाते, और बुआ अंदर बेड पर करवटें बदलती रहतीं। कभी-कभी रात में मुझे उनकी लंबी ‘आह’ सुनाई देती, जैसे कोई अधूरी प्यास हो। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
फूफा जी ने मेरे रहने का कमरा बड़े वाले बेडरूम के बिल्कुल बगल में दिया था — दरवाज़े में सिर्फ़ पर्दा, तख़्ता भी नहीं। और बीच में एक हल्की दरार… जिससे सब कुछ दिखता था। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
भाग 3 — आँखें, जो चोरी-चोरी चूमने लगीं
बुआ दिन में साड़ी पहनती थीं, पर रात को सोने से पहले साड़ी उतारकर सिर्फ़ ब्लाउज़ और पेटीकोट में रह जाती थीं। और मैं — बेशर्म भतीजा — उस दरार से उन्हें देखता रहता। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
तीसरी रात। बुआ ने साड़ी खोली, पल्लू कंधे से सरका। ब्लाउज़ के पीछे की तीन हुक खोलने के लिए वो हाथ पीछे ले जातीं, और उनकी मोटी गोरी बाँहें उठतीं — तो सीना ऊपर को उभर आता। उनकी चूचियाँ ब्लाउज़ से छूटकर भारी-भारी लटक जातीं, निप्पल कसे कपड़े के नीचे साफ़ उभरे हुए। और नीचे पेटीकोट की कमर पर चूत का वो उभार…
मेरा लंड पूरा लोहे की सरिया बन जाता। मैं दबा-दबा कर सहलाता, और अंदर जलता रहता। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
एक रात बुआ का पल्लू सोते-सोते गिर गया था। कूलर की हवा से पेटीकोट उनकी जाँघों तक चढ़ गया था। घुटनों से ऊपर तक सफ़ेद, मोटी जाँघें, और उनके बीच — पैरों को जोड़कर सो रही थीं इसलिए बालों का वो काला जंगल और उसके नीचे की गुलाबी दरार सिर्फ़ झलक रही थी। मैं दरवाज़े की दरार से चिपक गया और सुबह तक देखता रहा। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
अगली सुबह बुआ ने नाश्ता लगाया तो पूछा, “रोहित, ठीक से सोया?”
“बुआ…” मैंने बेधड़क कह दिया, “रात को ठंड लग रही थी क्या? आपका पेटीकोट ऊपर चढ़ा था।”
बुआ एक पल को रुक गईं। फिर हँसकर बोलीं, “देख रहा था तू? बदमाश!” — और थाली रखकर रसोई में भाग गईं। बस उसी पल से हमारे बीच एक तार सा खिंच गया। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
भाग 4 — बरसात, बिजली का कट, और टूटी हुई हद
उस रात बाहर ज़ोरों की बरसात थी। फूफा जी ऑफिस की पार्टी से देर से आए, बोतल गटक कर सीधे सो गए — इतने गहरे कि दस साल में भी न उठें। बिजली चली गई। पूरा घर अंधेरे में डूब गया। सिर्फ़ मैंने आगरबत्ती जलाकर उसकी लौ में मोमबत्ती सुलगाई — बुआ बिजली से बहुत डरती थीं, ये मुझे मालूम था। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
बुआ दबे पाँव मेरे कमरे की तरफ़ आईं, सिर्फ़ पेटीकोट और उनके नंगे बदन पर एक पतला ओढ़ना। “रोहित… अंदर अकेले डर लग रहा है।”
“बुआ, यहीं बैठो ना। मैं ज़िंदा हूँ ना।”
बुआ बिस्तर के किनारे बैठीं। मोमबत्ती की लौ उनके चेहरे पर नाच रही थी। बाहर बिजली चमकी — एक पल के लिए पूरा कमरा चमका, और फिर अंधेरा। बरसात की बूँदें खिड़की पर टपटपाती, और उसी लय में बुआ की साँसें ऊपर-नीचे। उनके सीने का उठना-गिरना साफ़ दिख रहा था, निप्पल उस पतले ओढ़ने के नीचे चुभे हुए। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“डर लग रहा है, बुआ?” — मैंने पूछा और बिना इजाज़त उनका हाथ पकड़ लिया।
हाथ गर्म था। काँप रहा था। उन्होंने हाथ खींचा नहीं। बस आँखें बंद कर लीं।
बस। और मैंने उनका चेहरा हल्के से उठाया। वो मेरी बुआ थीं — और इस वक़्त मेरे सामने एक प्यासी औरत थीं।
भाग 5 — पहला चुंबन, और ‘ना-ना’ की जंग
मैंने अपने होंठ उनके होठों पर रख दिए।
बुआ एक बार सिहर उठीं। फिर जैसे सपने से जागीं — “रोहित! ये क्या? मैं तेरी बुआ लगती हूँ!”
“बुआ, पता है। पर लगती हो या नहीं — ये आप बताओ।” बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
और मैंने फिर चूम लिया। इस बार उन्होंने रोका नहीं। उल्टा अपने रसीले होठों से जवाब दिया। मेरी जीभ उनके होठों की दरार खोलकर अंदर गई — और उनकी जीभ गर्म, तेज़, भूखी होकर मुझसे लिपट गई। दो साल की सूखी चूत की प्यास उनके चुंबन में घुल गई थी। हम दोनों के बीच सिर्फ़ बरसात और उनकी आहों की आवाज़ थी।
चुंबन के बीच उन्होंने मेरा मुँह अपने दोनों हाथों में थामा और दबाकर चूसा — जैसे कह रही हों, कुछ नहीं बोलो, बस चूमो।
फिर बुआ ने खुद को थोड़ा अलग किया, आँखें झुकाईं और बोलीं, “एक बात बताओ… बहुत दिन हो गए?”
“किसको, बुआ?”
“मुझे।” — बुआ ने हल्के से कहा, और आवाज़ फूट पड़ी। “तेरे फूफा शुगर के हैं। दो साल से सिर्फ़ नाम का आदमी हैं। औरत की चूत खाली पड़ी रह जाए तो कैसा लगता है, तुझे पता है?” बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
बस वो बात। और मैंने उन्हें गोद में उठा लिया। हल्की थीं — पर बदन भारी। उठाते ही उनका सीना मेरी छाती से चिपक गया, और उनकी गर्म साँस मेरी गर्दन पर टकराई।
मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। वो आँखें बंद किए, साँसें धौंकनी सी भरती रहीं। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
भाग 6 — चूचियों का राज़ खुला
मोमबत्ती की लौ में बुआ का नंगा बदन सुनहरा दिख रहा था। ओढ़ना खिसका, पेटीकोट ढीला, और उनकी चूचियाँ मेरी आँखों के सामने भरी हुई, गोल, दो कठोर निप्पल की चोटियों वाली। पेट पर हल्की सिलवटें — दो बच्चों की निशानी — जो उन्हें और मादक बनाती थीं।
“बुआ, आपकी चूचियाँ…” — मैं कह ही नहीं पाया।
“क्या? बोल ना।” — उन्होंने खुद मेरा हाथ अपनी चूची पर रख दिया। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
मैंने दोनों हाथों से भर-भर के दबाया। कितनी भारी, कितनी गर्म! मैंने उनके एक चूची को मुँह में ले लिया। निप्पल जैसे ही मेरी जीभ से टकराया, बुआ की पीठ कमान बन गई —
“आह्ह्ह… रोहित! हाँ… और चूस… आह्ह्ह…”
मैं लॉलीपॉप की तरह चूसता, दाँतों से हल्का काटता, जीभ से निप्पल के चारों तरफ़ चक्कर लगाता। दूसरी चूची को हाथ से मसलता, निप्पल को अंगूठे-उंगली के बीच नचाता। बुआ की साँसें बेकाबू हो गईं। उन्होंने मेरा सिर दोनों हाथों से दबा दिया — “आह, दबा… ज़ोर से दबा मेरी चूचियाँ… तेरी बुआ की चूचियाँ बहुत दिन से प्यासी थीं रे…” बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
भाग 7 — चूत का पहला स्वाद
मैं धीरे-धीरे नीचे सरका। पेट पर चुंबन करता, नाभि पर जीभ फेरता, और उनकी पेटीकोट की कमर पकड़कर नीचे खींचने लगा। बुआ ने कमर उठाकर साथ दिया। पेटीकोट जमीन पर।
अब सिर्फ़ लाल पेंटी। और वो पेंटी — पूरी भीगी हुई। चूत का पानी कपड़े में साफ़ छपा हुआ था।
मैंने पेंटी को सूँघा। वो गंध — हल्की नमकीन, कसैली, और किसी पके आम जैसी मीठी। मेरा लंड एकदम से झटका खा गया। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
पेंटी नीचे खींच दी। और सामने थी — बुआ की चूत। मोटी, भरी, लाल-गुलाबी। ऊपर घनी काले बालों की झाड़ी, जो नीचे जाकर खुलती थी — और उसके नीचे चूत के होठ मोटे, सूजे हुए, दरार चिकनी-चिकनी पानी से। भगशिशु छोटा-सा उभरा, गुलाबी, चमकता हुआ — जैसे कह रहा हो, आ गया तो सहलाओ।
मैंने पहले उंगली से सहलाया। बुआ कसकर सिहर उठीं, कमर उठा दी — “आह्ह्ह रोहित… वहीं… वहीं ठहर…”
मैंने उंगली चूत के पानी में डुबोकर ऊपर भगशिशु पर फेरी। बुआ का शरीर काँप उठा। फिर दो उंगलियाँ — धीरे से अंदर। गर्म, तंग, और पूरी पानी से भरी चूत। भीतर की दीवारें उंगलियों को चूसने लगीं। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“आह! रोहित… और अंदर… हाँ… वहीं हिला…”
और फिर मैंने मुँह नीचे कर दिया।
जैसे ही मेरी जीभ चूत की दरार पर पड़ी, बुआ पूरी मर गईं। “हाय्य्य! रोहित! तेरी जीभ… तेरी जीभ क्या कर रही है!” मैं जीभ चपटी करके नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे चाटता। भगशिशु पर जीभ की नोक से चक्कर लगाता। दो उंगलियाँ अंदर-बाहर करता, और अंगूठे से भगशिशु को मलता। बुआ की मोटी जाँघें मेरे कानों को दबाने लगीं, उनके हाथ मेरे बालों में घुस गए, और वो कमर उठा-उठाकर मेरे मुँह में अपनी चूत भरने लगीं। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“चाट रे… चाट अच्छे से… मेरी चूत सूखी पड़ी थी… आह्ह्ह रोहित… तेरा मुँह… तेरा मुँह मेरी चूत का… ओईईई!”
मैं चूत का रस पी-पीकर बहक गया। उसका पानी मेरी ठुड्डी से टपक रहा था। और तभी बुआ की जाँघें कस गईं, पेट अकड़ा, और एक लंबी आह के साथ — उनकी चूत ने मेरे मुँह पर फव्वारा छोड़ दिया। झड़ गईं। सिर्फ़ जीभ से।
“आह्ह्ह… रोहित… मर गई मैं… आज तो…”
भाग 8 — लंड का पहला वार (मिशनरी)
अब मैंने अपना पजामा खींचा। जैसे ही लंड बाहर निकला, बुआ की आँखें फट गईं।
“हे भगवान… रोहित! कितना मोटा है!” — उन्होंने हाथ बढ़ाकर पकड़ा, और सहलाने लगीं। उनकी मुलायम गरम हथेली की गिरफ़्त में लंड और अकड़ गया। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“बुआ… इतने दिन से तरसा है तेरी चूत के लिए…”
“आ जा रे… आ जा। मुझे चोद डाल।”
मैंने उनकी टाँगें फैलाईं। चूत पूरी खुली, गीली, चमकती हुई। लंड का सुपारा चूत के मुँह पर रखा — गर्मी चूत की, गर्मी लंड की। बस छूते ही बुआ कसमसा उठीं। फिर मैंने एक ज़ोरदार धक्का लगाया — और सुपारा भीतर उतर गया।
“आईईईई!” — बुआ का शरीर कमान बन गया। चूत कितनी तंग! दो साल से चुदी नहीं थी, और ये चूत मेरे लंड को पहचानने से इनकार कर रही थी। भीतर की दीवारें लंड को जकड़कर पीछे धकेलने लगीं।
मैंने दूसरा धक्का लगाया — आधा लंड भीतर। बुआ की आँखों में आँसू आ गए।
“दर्द हो रहा है, बुआ?”
“नहीं रे… छोड़ मत… चोदता रह… आदत पड़ जाएगी…”
तीसरे-चौथे धक्के में पूरा लंड चूत में समा गया। बुआ की झाँटें और मेरी झाँटें आपस में उलझ गईं। मेरी कमर उनकी जाँघों से चिपक गई। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
अब मैंने गति पकड़ी। धीरे-धीरे नहीं — गाँव के जवान की तरह, पूरे जोश में। बाहर-अंदर, बाहर-अंदर। हर धक्के पर चूत की दीवारें लंड को चूमकर छोड़तीं। ‘फच-फच-फच’ की आवाज़ बरसात में घुलने लगी। बुआ की चूचियाँ हर धक्के पर लहर बनकर हिलतीं, और मैं उन्हें हाथों में भरकर दबाता, निप्पल चूसता, उनकी गर्दन पर, कान पर, होठों पर चुंबन करता। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“आह रोहित… आह… और ज़ोर से… मेरी चूत को फाड़ दे… आह्ह्ह… तेरे फूफा ने कभी ऐसे नहीं चोदा… आह्ह्ह… जवान हो तू… जवान!”
भाग 9 — काउगर्ल: बुआ की सवारी
कुछ देर चुदने के बाद बुआ ने मेरी छाती पर हाथ रखकर मुझे पलटा दिया।
“अब मेरी बारी। आज मैं तेरी सवारी करूँगी।”
बुआ मेरे ऊपर चढ़ीं, टाँगें फैलाईं, और एक हाथ से मेरा लंड पकड़कर अपनी चूत के मुँह पर रखा। फिर धीरे-धीरे नीचे बैठीं — और पूरा लंड एक ही झटके में उनकी चूत में समा गया। बुआ ने आँखें बंद कर लीं और सिर पीछे को झुक गया।
फिर वो झूलने लगीं। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। उनकी भारी गांड मेरी जाँघों से टकराती — ‘थप-थप’ की आवाज़। उनकी चूचियाँ हवा में उछलतीं और मैं नीचे से हाथ बढ़ाकर उन्हें भर-भर के दबाता। बुआ की कमर एक कुशल औरत की तरह लहराती — बस वही हरकत, जो सिर्फ़ मैच्योर औरत जानती है। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“आह रोहित… तेरा लंड मेरी चूत को बर्बाद कर रहा है… आह्ह्ह… ऐसे ही… ऐसे ही अंदर तक… ओईईई!”
मैंने उनकी कमर पकड़कर धक्के तेज़ कर दिए — नीचे से ऊपर को धौल। बुआ की साँस टूटने लगी, आवाज़ बदलने लगी। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“आह… आह… मर… मर जाऊँगी… रुक मत… और…”
भाग 10 — डॉगी: पीछे से गहरा वार
फिर बुआ ने खुद करवट ली। घुटने बिस्तर पर टेके, गांड ऊपर उठाई, और पीछे से मुझे बुलाया — “आ रे… इस तरफ़ से भी चोद दे अपनी बुआ को।” बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
उनकी गांड मोटी, गोल, गोरी — ऊपर उठी हुई, और उसके नीचे चूत का गीला मुँह पीछे से चमकता। मैंने लंड रगड़कर भीतर घुसेड़ा। इस पोज़ में लंड और गहरा जाता है — बुआ ने चीख मार दी।
“आईईई! अंदर तक… हाँ… वहीं… वहीं छू रहा है… आह्ह्ह रोहित!”
अब मैं बुआ के चूतड़ों को दोनों हाथों से पकड़कर ज़ोरदार धक्के लगाने लगा। हर धक्के पर उनकी गांड लहराती, और ‘फचाक-फचाक’ की आवाज़ के साथ चूत का रस नीचे मेरी जाँघों पर टपकता। मैं झुककर उनकी पीठ पर चुंबन करता, कंधे से चूचियाँ पकड़कर दबाता, और बाल खींचकर उनका चेहरा ऊपर उठाता। बुआ पूरी बेकाबू हो चुकी थीं — मुँह खुला, आँखें बंद, लार टपकती हुई। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
“चोद… चोद… मेरी चूत को चोद… आह्ह्ह… आज तो… आज तो सारे दिन की प्यास बुझा दे… आह्ह्ह!”
कमरे में हमारी आवाज़ें बरसात की बूँदों से होड़ ले रही थीं। बाहर बिजली कड़कती और मेरी कमर उसी लय में धक्के देती।
भाग 11 — 69: एक साथ मुँह में
बुआ थककर करवट लेटीं। मैंने उन्हें पलटा — “अब एक बार साथ चख लो बुआ।”
उन्हें बिस्तर पर लिटाया, खुद उल्टा उनके ऊपर चढ़ गया। उनका मुँह मेरे लंड के नीचे, और मेरा मुँह उनकी गीली चूत पर। बुआ ने मेरा लंड मुँह में लिया — जैसे कोई मिठाई चूस रहा हो। गीला, गर्म, लार से भरा मुँह, और जीभ लंड के नीचे-ऊपर। मैं भी उनकी चूत चाटता रहा — ऊपर भगशिशु पर जीभ की नोक, और भीतर तक जीभ घुसाता। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
दोनों की चूसने की आवाज़ें, दोनों की आहें — मिलकर एक कामुक संगीत बना रही थीं। बुआ मुँह से लंड चूसते-चूसते सिसकतीं, और नीचे अपनी चूत मेरे मुँह में पेलतीं। हम दोनों उस लय में झूल रहे थे जैसे कोई जिस्मानी राग।
कुछ देर में बुआ का पानी फिर छूटने लगा। उन्होंने मेरी कमर पकड़कर मुझे अपनी तरफ़ खींचा — “अब तेरा… मुझे अंदर ही झड़ना है… चोद दे आख़िरी बार…” बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
भाग 12 — अंतिम वार, और एक साथ झड़ना
मैंने उन्हें फिर लिटाया। इस बार उनकी टाँगें मेरे कंधों पर रखीं, कमर नीचे से उठाई — और लंड भरत की तरह भीतर उतारा। गहरा, तेज़, पूरे वेग से। हर धक्के पर मेरी कमर उनकी चूत से टकराती — ‘थप थप थप’। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
बुआ ने मेरी कमर पकड़ ली, नाखून गड़ने लगे। उनकी साँसें टूट रही थीं।
“रोहित… रोहित… आ रहा है… मर… मर रही हूँ… और ज़ोर से… और… आह्ह्ह्ह… ओईईईई!”
मेरा भी पानी चढ़ने लगा। मैंने पूरी ताक़त से चार-पाँच धक्के लगाए। बुआ का शरीर कमान बना, चूत भीतर से जकड़ी — और उन्होंने चीख मार दी। उसी पल मेरा लंड फूट पड़ा। गर्म वीर्य की धार सीधे उनकी चूत में। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
मेरे वीर्य की गर्मी लगते ही बुआ फिर झड़ गईं — पानी की धार चूत से बाहर निकलकर मेरी जाँघों पर फैल गई। दोनों की साँसें धौंकनी, दोनों का बदन पसीने से तर। लंड भीतर ही रहा, चूत उसे निगलती रही। हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढेर हो गए।
कमरे में सिर्फ़ बरसात, मोमबत्ती, और दो जिस्मों की टूटी साँसें। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
भाग 13 — अगली सुबह, और नए मोर्चे
सुबह फूफा जी उठे, चाय पी, ऑफिस चले गए। बुआ बिल्कुल सामान्य — कोई शिकायत नहीं, कोई शरम नहीं। बस चाय देते वक़्त हल्के से मुस्कुरा दीं, और मेरे कान में फुसफुसाईं — “स्नानघर में गीज़र चालू कर देना… और अपना टॉवेल मत भूलना।”
बस। स्नानघर में हम फिर मिले। भाप, साबुन की फिसलन, और गीले बदन। बुआ ने पीछे से लिपटकर मेरी पीठ पर साबुन रगड़ा, और आगे से लंड सहलाया। मैंने उनकी चूत उठाकर दीवार से टिकाया और खड़े-खड़े चोद दिया — गीली चूत में लंड ऐसे फिसलता जैसे मक्खन में। बुआ दीवार से टिककर ‘आह’ भरतीं और पानी की धार उनके बदन पर बहती। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
उसके बाद वो हमारी रस्म बन गई। रसोई में खाना बनाते वक़्त पीछे से लिपट जाना, सब्ज़ी काटते-काटते चूचियाँ दबाना, दोपहर की नींद में अंग-अंग चूसना। होली आई तो रंग में भीगे बदन पर लंड का रंग चढ़ा। दिवाली आई तो मिठाई से ज़्यादा बुआ के होठों का स्वाद लिया। कभी डॉगी, कभी स्पून, कभी स्टैंडिंग, कभी बालकनी में चुपचाप।
भाग 14 — गुप्त राज़
फूफा जी को कभी शक नहीं हुआ। या शायद उन्हें मालूम था और वो जान-बूझकर बेख़बर बने रहे — क्योंकि उन्हें पता था कि बुआ की चूत को जवान लंड चाहिए, और उनके पास दो पैग और शुगर के सिवा कुछ नहीं था। बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
एक रात चुदाई के बाद बुआ मेरी छाती पर सिर रखकर लेटीं और आँखें भर आईं।
“रोहित… कभी किसी को बताएगा तो नहीं?”
“बताऊँगा क्यों, बुआ? तब तो ये राज़ ही नहीं रहेगा।”
बुआ हँस पड़ीं — फिर मेरी बाँहों में घुस आईं, और बोलीं, “तेरे फूफा जी ठीक कहते हैं… बुआ तेरी जवान है अभी। और आज तुझे पाकर लगा — जवानी तो अभी शुरू हुई है रे।” बुआ की प्यासी चूत में मेरा लंड
और उस रात उन्होंने मेरे होठों पर एक चुंबन दिया — लंबा, तर, और मीठा। जैसे वादा।
उस बरसात की रात से शुरू हुई हमारी कहानी आज भी चल रही है। फूफा जी सो जाते हैं, बुआ बेड पर करवट लेती हैं, और मैं दरवाज़े के उसी पर्दे के पीछे से आँख मारकर चला जाता हूँ। वो मुस्कुरा देती हैं। बस इतना ही काफ़ी है।
बाक़ी… बाक़ी सब हमारे उस एकांत के कमरे में होता है।
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