मेरा नाम सलोनी है। बत्तीस साल, शादी के सात साल, और ससुराल नोएडा के एक शांत सेक्टर में। घर में हम तीन — मैं, मेरे ससुर जगदीश जी, और कमला बाई, जो शाम को खाना बनाकर अपने घर चली जाती है। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
मेरे पति आकाश बेंगलुरु में मैनेजर है। पैसा ढेर करता है, औरत तरसती रह जाती है। पिछले डेढ़ साल में वो तीन बार आया और हर बार दो धक्के मारकर खर्राटे लेने लगा। मेरा बदन अंदर से सुलगता रहता था।
और ससुर जी? जगदीश जी — अट्ठावन साल के, रिटायर्ड कॉन्ट्रैक्टर। कसा हुआ जिस्म, चौड़ा सीना, बांहों में वो नसें जो किसी जवान मज़दूर की लगती हैं। कमरे में बंद कमीज़ पहनते हैं और जब चलते हैं तो फर्श पर कुछ कांपता है। कमला बाई तो कहती थी — “बहू, तेरे ससुर की तो आज भी बल्ले-बल्ले हैं।”
पर यही असली कहानी है — ससुर जी कोई भोला-भाला पीछे पड़ने वाला नहीं था। वो मर्द था, जिसे अपनी उम्र का पूरा ग़ुरूर था। उसे पटाना आसान नहीं था। और उस रात तक पहुँचने के लिए मुझे महीनों लगे।
जब पहली चिंगारी उठी
बात तब शुरू हुई जब सास मरीं और घर में बस हम दो बचे। पहले महीने तो सब औपचारिक था — “बहू, चाय बना दो।” “जी पापा जी।” पर एक दिन सुबह मैं गीले बालों में, ढीली कुर्ती पहनकर रसोई में आई — और कुर्ती ऊपर से पूरी खुली थी। ससुर जी चाय लेने आए और नज़र सीधी मेरी छातियों पर टिक गई। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
एक सेकंड में उन्होंने नज़र हटा ली। पर मैंने देख लिया।
उस दिन के बाद मैं जान-बूझकर उनके सामने आने लगी। कभी झुककर पल्लू सरकाकर, कभी ऊपर की आलमारी से चीज़ निकालते हुए कमर उठाकर। पर ससुर जी… ठंडे। जैसे उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ता।
कमला बाई से मैंने पूछा भी — “बाई, ससुर जी कभी किसी लड़की को देखते भी हैं?”
वो हँस पड़ी। “बहू, ये आदमी है, पर सोचता हुकूमत वाला है। जब तक तू दरवाज़ा खटखटाएगी, ये नहीं खोलेगा। पलंग पर पहुँचा तो इतिहास बनाएगा, वरना दीवार बना रहेगा।”
समझ गई — मुझे खुद पहल करनी थी।
तीन हफ़्तों की चिंगारी
पहला हफ़्ता — नज़रों का खेल।
मैंने तय किया कि अब हर सुबह नहाकर उनके सामने से गुज़रूँगी। गीली साड़ी, खुली पीठ, और नज़र सीधी उन पर। वो देखते, और जैसे ही मैं देखती, वो अख़बार में छुप जाते। ये खेल मुझे गर्म करता था। हर रात बिस्तर पर लेटकर मैं उनके हाथों की कल्पना करती। सात साल से जो प्यास थी, अब उनकी उम्र और उनके जिस्म की तस्वीर उसमें मिल गई थी। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
दूसरा हफ़्ता — टकराव।
एक शाम मैं रसोई में खड़ी थी, उन्होंने पीछे से गुज़रते हुए जान-बूझकर या अनजाने में कमर से टकरा दिया। उनकी छाती मेरी पीठ से रगड़ खाई। मैंने मुड़कर देखा। उन्होंने “sorry” कहने के बजाय बस मुस्कुरा दिया।
बस उसी दिन मैंने तय किया — अब खेल बढ़ाऊँगी।
अगली सुबह मैंने जानबूझकर उनके कपड़े धोने के बहाने उनके कमरे में जाकर उनकी अलमारी खोली। उनकी कमीज़ों में सिर रखकर सूँघा। परफ्यूम और पसीने की वो ख़ास महक। उसी दिन मैंने उनकी कमीज़ धोते हुए देखा कि उनके अंडरवियर की एक जोड़ी बहुत पुरानी है। मैंने बाज़ार जाकर उनके लिए नए अंडरवियर खरीदे — और बेझिझक उनके बिस्तर पर रख आई। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
शाम को वो बोले — “बहू, तुमने ये क्यों लिए?”
“पापा जी, पुराने फटे हैं। बदल लीजिए।”
और उनके चेहरे पर पहली बार कुछ नरमी आई।
तीसरा हफ़्ता — पहला इशारा।
एक रात देर से लाइट गई। हम दोनों हॉल में थे। मैंने मोमबत्ती जलाई और उनके पास आकर बैठ गई। फ़र्क़ इतना था कि घुटने छू रहे थे।
मैंने हिम्मत करके कहा — “पापा जी, आपको अकेलेपन का एहसास नहीं होता?”
वो एक पल रुके। “आदत हो गई बहू।”
“मुझे तो होता है। आकाश की तरफ़ देखिए — वो वहाँ है, पर ज़िंदा कहाँ है मेरे लिए।” करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — पहली बार ऐसा देखा जैसे कोई हिसाब लगा रहा हो। फिर बोले — “तुम जवान हो बहू, तुम्हारा हक़ है।”
और उस रात नींद नहीं आई — दोनों को।
करवा चौथ का दिन
अब बात करवा चौथ तक आ पहुँची। दो दिन पहले मैंने आकाश को फ़ोन किया।
“आकाश, इस बार तो आ जाओ ना। हर साल अकेली व्रत नहीं रखूँगी।”
“प्रोजेक्ट रिलीज़ है, छुट्टी नहीं मिलेगी। तू चाँद देख लेना, छन्नी से किसी को देख लेना, हो गई पूजा।” — और कॉल काट दिया।
उस लापरवाही में एक पूरी औरत का सुख दबा हुआ था। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
करवा चौथ के दिन सुबह उठकर मैंने सरगी खाई। हाथों पर गहरी लाल मेहँदी लगाई — और जानबूझकर डिज़ाइन में दो नाम लिखवाए। एक आकाश का, और एक… जगदीश का। कमला बाई ने पूछा — “बहू, तीसरा नाम किसका?”
“पता चल जाएगा बाई।”
शाम को जब सब छतों पर जुटने लगे, मैं सजने लगी। उस दिन की लाल साड़ी, छोटा कट ब्लाउज़, पूरी पीठ खुली, और कमर पर लाल पेटीकोट। मैं आईना देखकर खुद पर रीझ गई — बत्तीस की औरत, जिसका जिस्म किसी बीस की को शर्मिंदा कर दे।
नीचे आई तो ससुर जी हॉल में अख़बार पढ़ रहे थे। अख़बार की स्याही जैसे उनकी आँखों में घुल गई। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“बहू! आज तो दुल्हन लग रही हो।”
“आपके बेटे के बिना ये दुल्हन आधी है पापा जी।”
वो उठे और अंदर गए। पाँच मिनट बाद लौटे, चेहरे पर कुछ बदला हुआ। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“चलो बहू, छत पर। आज तुम्हारा व्रत खुलवाऊँगा।”
छत पर — चाँद और छन्नी
चाँद पूरा निकल आया था। पड़ोस की छतों पर औरतें अपने पतियों की छन्नी से पूजा कर रही थीं। मैंने छन्नी उठाई, अर्घ्य दिया — और फिर ससुर जी की तरफ़ मुड़ी।
“पापा जी, किसे देखूँ छन्नी से? पति तो हैं नहीं।”
“जिसे देखना चाहो बहू। आज जिसका व्रत रखा है, उसे ही देखो।”
और उन्होंने अपना चेहरा छन्नी के पीछे ला खड़ा किया।
उस पल कुछ अजीब हुआ। छन्नी के जिस छेद से मैंने उनका चेहरा देखा, उसमें पति जैसी ही उम्मीदें चमक रही थीं। मैंने धीरे से आँखें बंद कर लीं और ससुर जी के हाथ से पानी पीकर व्रत खोला। एक-एक बूँद गले से उतरते हुए लगा जैसे अंदर बुझी हुई आग जग रही है। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
नीचे आकर मैंने उन्हें अपने हाथों से खाना परोसा। दोनों पूरे दिन भूखे थे — ससुर जी ने भी मेरे साथ व्रत रखा था। हॉल में बस दोनों की साँसें थीं।
रात ग्यारह बजे जब हम खाना खत्म कर चुके, मैंने आख़िरकार सवाल किया।
“पापा जी, आज आकाश का फ़ोन तो नहीं आया… आपने क्या बात की थी?”
उन्होंने गिलास रखा और लंबी साँस ली।
“बहू, सच बताऊँ? आज फ़ोन तो नहीं आया था… मैंने किया था। और उसने पहली बार सच बोला।”
“क्या सच?”
“बेटा अकेला नहीं है। उसके ऑफ़िस में नेहा नाम की लड़की है। दोनों साथ रहते हैं। छुट्टी इसलिए नहीं लेता क्योंकि यहाँ आकर उसे उससे दूरी झेलनी पड़ेगी।”
मेरे हाथ से काँटा छूटकर प्लेट में गिरा। सात साल, और आज पता चला कि मेरा पति यहाँ आता ही नहीं क्योंकि वो वहाँ किसी और के साथ सोता है। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
गला भर आया। आँखें भर आईं।
ससुर जी उठकर मेरे पास आए और पहली बार बेझिझक मेरे कंधे पर हाथ रखा। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“रो मत बहू। जिसे तेरी क़द्र नहीं, उसके लिए तू क्यों आँसू बहाए।”
मैंने अपना सिर उनके सीने पर रख दिया। उनके सीने की गर्मी, उनकी धड़कन, और पुरुष की महक — सब मुझे अंदर तक छू रहे थे। उन्होंने धीरे से मेरी पीठ सहलाई, फिर कमर पर हाथ फिसला। महीनों का धागा एक झटके में टूट गया।
मैंने मुँह उठाकर उन्हें देखा। वो भी मुझे। और फिर सोचने का वक़्त खत्म।
उन्होंने एक हाथ से गर्दन पकड़ी, दूसरे से कमर खींचकर सीने से चिपका लिया। मुँह मेरे मुँह पर आया — और पहला चुंबन ऐसा पड़ा जैसे सात साल की प्यास एक झोंके में बुझानी हो। होठ कच्चे आम की तरह चूसे जाने लगे। उनकी ज़ुबान मेरे होठों की दरार में घुसी और मैं उनके सहारे से गिर पड़ी। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
पूजा की थाल, मेहँदी, चाँद — सब भूल गई।
बेडरूम में — मेहनत का फल
ससुर जी ने मुझे गोद में उठा लिया। बत्तीस साल की औरत, और उन्होंने फूल की तरह उठा लिया। सीधा अपने बेडरूम में लाए और बिस्तर पर लिटा दिया।
मैं बस आँखें बंद किए लेटी थी। पर मन कह रहा था — जो हुआ, वो हिसाब था। जो होने वाला है, वो हक़ है। और जो आज तक दबाया, वो अब फूटेगा।
उन्होंने एक-एक करके कपड़े उतारे। शर्ट खोली तो सीना देखकर साँस तेज़ हो गई — कसा, चौड़ा, जैसे किसी जवान का। फिर पैंट उतरी, और जो सामने आया उसे देखकर मैं हक्की-बक्की रह गई। कमला बाई की बात याद आई — बल्ले-बल्ले हैं। कम से कम आठ इंच, कसा हुआ, जवान लंड की तरह तना।
उन्होंने मेरी साड़ी की बेल खोली और पल्लू हटाया। ब्लाउज़ की बटनें एक-एक करके नहीं खोलीं — जहाँ थीं वहीं से पकड़कर तोड़ दीं। पूरी छातियाँ बाहर। उनकी आँखें वासना से चमक उठीं। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“बहू, तुमने छन्नी में मुझे देखा था ना… तो आज तुम मेरी हो।”
कहकर उन्होंने गर्दन से लेकर सीने तक चुंबनों की बरसात कर दी। मैं पीछे झुक गई और उनकी बाँहों में पिघलने लगी।
मुँह मेरी छातियों पर आया। पहले सहलाया, फिर पकड़कर दबाया, फिर निप्पल मुँह में भरकर चूसने लगे। मैं सिसक उठी। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“आआह्ह्ह… पापा जी… ऐसे मत चूसो… पूरा जिस्म झनझना जाता है…”
वो बोले ही नहीं, बस चूसते गए। एक छाती छोड़ी, दूसरी पकड़ी। बारी-बारी से दोनों को मुँह में लेकर खींच-खींचकर पिया। मेरी चूत तब तक गीली हो चुकी थी। पेटीकोट पर गीलापन फैल रहा था।
फिर वो नीचे उतरे। जांघें चूमते हुए पेटीकोट खींचकर अलग किया। पैंटी उतारी और एक झटके में पैरों से निकाल दी। फिर घुटने पकड़कर टाँगें खोल दीं।
और फिर वो मेरी चूत पर झुक गए।
जीभ पहले बाहर के होठों पर फिरी, फिर दरार में घुसी, फिर ऊपर की गांठ पर रुकी। मैं बेडशीट मुट्ठी में भरकर कसने लगी। उन्होंने मेरी गीली चूत को ऐसे चाटा जैसे कोई प्यासा पानी पी रहा हो। कमर अपने-आप ऊपर उठने लगी। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“पापा जी… रुकिए… बहुत हो गया… अंदर आइए ना…”
उन्होंने मुँह उठाया, होठों पर मेरी रस लगी थी। मुस्कुराए और ऊपर आ गए। लंड को चूत के मुँह पर रखा — और पहला धक्का दिया।
आधा लंड अंदर घुसा और मैं चिल्ला उठी।
“आआआह्ह्ह्ह… पापा जी… आपका तो बहुत मोटा है…”
“सह लो बहू, अभी तो पूरा आना है।”
दूसरा धक्का — और वो पूरा अंदर। सात महीने बाद कोई मर्द मेरे अंदर था, वो भी इतना भरा हुआ। मैंने दोनों टाँगें उनकी कमर में लपेट दीं और बाँहें गर्दन के पीछे डाल दीं। उन्होंने होठ काटकर चूमा और धक्के देने लगे। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
धक्के… पहले धीरे, फिर तेज़। बिस्तर चरमराने लगा। मेरी छातियाँ हर धक्के पर हिलतीं और उनके सीने से रगड़ खातीं। कमरे में बस दो आवाज़ें — थप-थप और मेरी सिसकियाँ।
“पापा जी… और ज़ोर से… और तेज़…”
“आज रुकूँगा नहीं बहू। आज सात साल का हिसाब चुकाऊँगा।”
उन्होंने रफ़्तार पकड़ ली। मेरी कमर नीचे से ऊपर उठने लगी और दोनों जिस्म एक लय में मिल गए। पसीने की बूँदें उनके सीने से मेरे सीने पर गिरतीं। मैं उनकी पीठ पर नाखून चला रही थी और वो मेरी कमर पकड़कर जोर-जोर से पेल रहे थे। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
फिर उन्होंने मुझे करवट दी। घोड़ी की तरह बेड पर झुकाया, पीछे से घुसे। कमर ऊँची करके ऐसे चोदा कि चूत के साथ-साथ गुदा भी झनझना उठी। मेरा पूरा बदन झूल रहा था। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“आआआ… पापा जी… ऐसे ही… ऐसे ही… पूरी रात ऐसे ही…”
कुछ देर बाद उन्होंने फिर पीठ के बल पलटाया। अब आराम से, गहरे धक्कों से चोदने लगे — हर धक्का पूरे लंड के साथ, और हर बार उनकी गांठ मेरी गांठ से टकराती। मैंने आँखें बंद कर लीं। जिस्म अब उनका हो चुका था।
अचानक चूत में कुछ फूटा जो बहुत दिनों से जमा था। मैं बेड पर काँप उठी और चीखकर उनसे चिपक गई।
“पापा जी… आ गया… आ गया ना मुझे…”
वो मुस्कुराए और उसी कसावट में धक्के तेज़ कर दिए। पाँच-छह धक्कों बाद उनकी साँसें फूल गईं। पूरा जिस्म तन गया और उन्होंने मुझे अंदर तक पकड़कर अपनी गर्म धार छोड़ दी। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
धार इतनी गर्म थी कि चूत फड़क उठी। वो मेरे ऊपर ढह पड़े, दोनों की साँसें एक साथ चल रही थीं। मैंने उनके पसीने भरे माथे को चूमा।
कुछ देर वो वैसे ही रहे। फिर हम दोनों ने बिना शर्म, बिना झिझक एक-दूसरे की आँखों में देखा।
“पापा जी…”
“हूँ बहू?”
“आपने कहा था — छन्नी में जिसे देखा, वो आपका।”
“हाँ कहा था।”
“तो आज बहू ने व्रत पूरा किया। पर आपने आधा ही पूरा होने दिया।”
वो हँसे और मेरी कमर पर हाथ रख दिया। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“तो बताओ बहू, बाकी कब?”
मैंने उनकी बाँह में सिर रख दिया और कहा —
“जब तक आकाश यहाँ न आए, तब तक हर रात करवा चौथ।”
उस रात बिस्तर कई बार चरमराया। सुबह कमला बाई आई तो हॉल में पड़ी चूड़ियाँ और पूजा की थाल देखकर बस इतना बोली —
“बहू, मैंने तो पहले ही कहा था — तेरे ससुर की तो आज भी बल्ले-बल्ले हैं।”
और मैंने साड़ी के पल्लू से मुँह छुपा लिया। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
तीन महीने बाद
उस रात के बाद हमारी ज़िंदगी बदल गई। दिन में बहू-ससुर, रात में दो जिस्म। कमला बाई चली जाती और फिर हम बेझिझक एक-दूसरे में खो जाते। कभी बेडरूम, कभी हॉल का सोफा, कभी छत का वो कोना जहाँ चाँद दिखता था। जगदीश जी जैसे बीस साल जवान हो गए थे। और मैं — मैं तो जैसे जन्म ले रही थी फिर से। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
पर एक बात दोनों के मन में थी — आकाश। जब तक वो सामने न आए, ये किस्सा अधूरा था।
और फिर वो दिन आया।
आकाश का आना
दिवाली की छुट्टी में आकाश आ रहा था। दो हफ़्ते के लिए। उसने फ़ोन पर मुझे बताया — “सलोनी, इस बार पूरे दो हफ्ते रुकूँगा। तुझे घुमाने ले जाऊँगा।”
मैं हँस पड़ी। अब घुमाने वाला शहर से आ रहा था, और मेरे अंदर का सफ़र तो बहुत आगे निकल चुका था। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
वो जिस दिन घर पहुँचा, वो दोपहर थी। मैंने दरवाज़ा खोला। सामने वो खड़ा था — पतला, थका हुआ, और वो चेहरा जिस पर तीन महीने से मेरी कोई नज़र नहीं थी। उसने मुझे देखा और एक पल रुक गया।
“सलोनी… तू तो और जवान हो गई है।”
“तुमने कब देखा था पापा… मतलब आकाश।” — मैं गलती से बोल पड़ी और खुद हँस दी।
“अरे वाह! ‘पापा’ कब से?” आकाश ने बैग रखा और मेरे पास आया।
“पापा जी के साथ रहती हूँ ना, तो आदत है।” — मैंने सफ़ाई दी।
पर असली जवाब तो उसकी आँखों में आ रहा था, जो उसे नहीं दिख रहा था। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
रात का सन्नाटा
पहली रात आकाश जल्दी बिस्तर पर चला गया। मैं उसके पास आई। तीन महीने से जिस जिस्म को जगदीश जी पूरी तरह जान चुके थे, वो अब अपने क़ानूनी पति के नीचे लेटा था।
उसने ऊपर आकर शुरू किया। दो मिनट की फ़ोरप्ले, फिर अंदर, फिर पाँच-सात धक्के — और खत्म। पसीना पोंछकर वो करवट ले गया।
मैं वहीं तड़पती लेटी रही। और मेरे अंदर एक आवाज़ उठी — क्या यही था वो? तीन महीने से जिस आदमी ने मुझे पूरी रात चोदा था, उसके सामने ये कुछ भी नहीं था।
उसी रात मैं जान गई — मेरा तय अब बन चुका था।
जगदीश जी का बदलना
अब घर में तीन थे। और दोनों मर्द आमने-सामने। जगदीश जी ने खुद को संभाला हुआ था — किसी तरह का इशारा नहीं। बस एक बार जब आकाश कमरे से बाहर गया, तब उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और पूछा —
“बहू, बेटा ठीक है ना?”
“पापा जी, आप जानते हैं ना जवाब।” — मैंने कहा और दोनों चुप हो गए। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
तीसरे दिन मौका मिला। आकाश दोस्तों से मिलने गया। घर में बस हम दोनों।
जगदीश जी हॉल में बैठे थे। मैं पीछे से आई, उनके कंधे पर हाथ रखा, और फिर उनकी गर्दन पर होंठ फेर दिए।
“पापा जी… तीन दिन हो गए।”
“बहू, बेटा घर में है। पकड़ा जाएगा।”
“पकड़े भी जाएँ तो?” — मैंने कहा और उनके सामने आकर उनकी गोद में बैठ गई।
उन्होंने मेरी कमर पकड़ी और दबाकर चूम लिया। बस फिर वही पुरानी आग। हमने तीन दिन की दूरी एक ही चुंबन में मिटा दी। पर उस दिन सिर्फ़ चुंबन नहीं हुआ — उस दिन एक तरह का वादा हुआ। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
आख़िरी रात का फ़ैसला
दो हफ़्ते बीतने को थे। आकाश वापस जाने वाला था। उससे एक दिन पहले रात, उसने मुझे छत पर बुलाया। चाँद था, हवा ठंडी थी।
“सलोनी, कुछ पूछना है।”
“पूछो।”
“तू खुश है ना यहाँ? मेरे बिना?”
मैंने उसे देखा। सच बोलने का वक़्त आ गया था। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“आकाश, सच बताऊँ?”
“हाँ।”
“तुमने मुझे कभी पूछा कि मैं कैसी हूँ? तुम्हारे पास सब था — नौकरी, पैसा, शहर, और वो नेहा भी। और मेरे पास क्या था? एक खाली बिस्तर और बंद कमरे की दीवारें।” करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
वो चुप हो गया। शायद उसे पता था कि नेहा की बात मुझे पता है।
“तो फिर… तूने कुछ किया?” — उसने धीरे से पूछा।
मैंने हामी भरी। “किया।”
“किसके साथ?”
मैंने नीचे की तरफ़ इशारा किया — जहाँ हॉल की लाइट जल रही थी और जगदीश जी अख़बार पढ़ रहे थे।
आकाश ने एक लंबी साँस ली। फिर हँसा। “पापा… पापा के साथ?”
“हाँ। और आकाश, सच सुनो — जो आपने सात साल में नहीं दिया, उन्होंने तीन महीने में पूरा कर दिया।” करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
आकाश कुछ देर चुप रहा। फिर बोला —
“और तू क्या चाहती है सलोनी? तलाक? या…”
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
“आकाश, तलाक क्यों? तुम मेरे पति हो। पर मेरा जिस्म भी किसी का हक़ है। तुम जब यहाँ नहीं, तब घर में जगदीश जी हैं। और जब तुम यहाँ, तब… हम तय करेंगे।”
वो मुस्कुराया — पहली बार पूरे दिल से। “मतलब मेरी बीवी अब दो आदमियों की है।”
“और दोनों तुम्हारे ही घर के।”
उसने मुझे गले लगा लिया। उस रात वो बेंगलुरु जाने से पहले एक बार फिर मेरे पास आया। और इस बार… इस बार वो सिर्फ़ पाँच धक्के नहीं मारा। इस बार उसने मुझे ध्यान से चोदा। जैसे तीन महीने की कसर निकालनी हो। करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
जगदीश जी की हार
सुबह जब आकाश नहा रहा था, मैं हॉल में जगदीश जी के पास गई। वो अख़बार में छुपे हुए थे।
“पापा जी।”
“हूँ।”
“आकाश ने सब पूछ लिया।”
अख़बार एक पल के लिए रुका। “और तुमने?”
“सच बोल दिया।”
वो अख़बार रखकर मेरी तरफ़ देखने लगे — पहली बार डर के साथ।
“और बेटे ने क्या कहा?”
मैं मुस्कुरा दी। “कहा कि अगर मेरे पापा ही हैं, तो बुरा क्या है।”
जगदीश जी की साँस लौटी। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। फिर उन्होंने नीचे देखते हुए कहा —
“बहू, तुमने मेरी उम्र में मुझे जवान बना दिया।” करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
“पापा जी, आप जवान थे ही। बस कोई देखने वाला नहीं था।”
आख़िरी दृश्य
आकाश की गाड़ी गेट से निकली और शहर की तरफ़ मुड़ गई। दरवाज़ा बंद हुआ। घर में फिर बस दो।
मैं जगदीश जी की तरफ़ मुड़ी। वो भी मेरी तरफ़। और फिर दोनों हँस पड़े।
“अब क्या बहू?” — उन्होंने पूछा।
मैंने उनका हाथ पकड़ा और सीढ़ियों की तरफ़ खींच लिया।
“अब वही जो हर रात होता है, पापा जी। और आज तो आकाश गया भी है… तो आज पूरी छुट्टी।” करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
उस रात हमने खिड़कियाँ बंद कर दीं और फिर बिस्तर पर वो सिलसिला शुरू हुआ जो पहली रात से भी लंबा था। जगदीश जी ने पहले मुझे पूरा चूमा, फिर नीचे उतरे, फिर ऊपर आए — और इस बार कोई जल्दी नहीं थी। पूरी रात, बिना रुके।
और सुबह जब कमला बाई आई, तो हॉल में बिखरी साड़ी और खुली खिड़कियाँ देखकर बस इतना बोली —
“बहू… अब तो बेटा भी गया। अब तो ये घर पूरा तेरा ही है।”
मैंने हँसकर कहा — “बाई, घर तो पहले से मेरा था। अब बस घर का मर्द भी मेरा है।” करवा चौथ की रात – ससुर ने बहू को चोदा
और वो हँसते हुए रसोई में चली गई।
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