भाग 1 — मैं, और मेरी अधूरी जवानी
मेरा नाम स्नेहा है। उम्र बत्तीस। कानपुर की रहने वाली, शादी के बाद से ससुराल में। मेरी लंबाई पाँच फुट चार इंच, रंग गोरा, और फ़िगर 36-30-40 — भरा हुआ सीना, पतली कमर, और नीचे ऐसी गोल-मटोल गांड जो साड़ी में चलने पर गली की हवा तक हिला दे। देवर के साथ ट्रेन की रात
शादी को छह साल हो गए। बच्चा एक भी नहीं। सास-ससुर अलग रहते हैं, तो घर में बस मैं और मेरे पति मनीष। मनीष, उम्र सैंतीस, बैंक में मैनेजर। बंदा ठीक है — पर बिस्तर पर… बस नाम का।
मनीष की चुदाई में कोई रस नहीं। कोई चूमना-चाटना नहीं, कोई पहल नहीं। हफ़्ते में एक बार, बत्तीस सेकंड, और बस। मेरी चूत तरसती रह जाती। मैं मुँह से कहती भी नहीं — शरम आती है। बस रात को करवट लेकर, अपनी उंगली से ख़ुद को शांत करती हूँ, और सोचती हूँ — “क्या यही पूरी ज़िंदगी है?”
और सबसे बड़ी बात — मनीष को मेरी साड़ी, मेरा ब्लाउज़, मेरी चूचियाँ, कुछ भी तो ‘देखने’ का शौक़ नहीं। मैं सजूँ, तो भी वो अख़बार में मुँह डाले रहे। जैसे घर की मुर्ग़ी दाल बराबर। देवर के साथ ट्रेन की रात
भाग 2 — आकाश आया
अक्टूबर में मनीष के चचेरे भाई की शादी थी — वाराणसी में। मनीष ने कहा, “स्नेहा, मेरा ऑडिट है, तीन दिन की छुट्टी नहीं मिलेगी। तू जा।”
“अकेली?”
“अकेली क्यों? आकाश आ रहा है ना। उसके साथ जा।”
आकाश — मनीष का छोटा भाई। यानी मेरा देवर। उम्र सत्ताईस। बैंगलोर में जॉब करता है। छह फुट का, कसरती बदन, गेहुँआ रंग, घनी भौंहें, और वो चाल जिसमें जवानी झलकती है। शादी में आने के लिए वो दो दिन पहले ही हमारे घर आ गया। देवर के साथ ट्रेन की रात
आकाश मुझे ‘भाभी’ कहता है। और वो जब भी ‘भाभी’ कहता है, आवाज़ में एक अजीब-सी गर्मी होती है। उसकी नज़रें… मैंने कई बार देखा — जब मैं झुकती हूँ, जब साड़ी ठीक करती हूँ — उसकी आँखें मेरे सीने पर, मेरी कमर पर रुक जाती हैं। और फिर झट से हट जाती हैं, जैसे पकड़ी गई हों।
मनीष को कभी फ़र्क़ नहीं पड़ा। वो कहता, “आकाश तो भाई है, भाभी को देखेगा ही।”
पर मुझे तो फ़र्क़ पड़ता था। बहुत पड़ता था। देवर के साथ ट्रेन की रात
भाग 3 — स्टेशन, और पहली नज़र
रविवार रात आठ बजे की ट्रेन थी — कानपुर से वाराणसी। मनीष ने हमें स्टेशन पर छोड़ा। आकाश ने टाइट ब्लैक टी-शर्ट और जीन्स पहनी थी — बाजू से उसकी मसलें दिख रही थीं। वो सामान उठा ले गया, और मनीष चला गया — बिना पीछे मुड़े, जैसे कोई फ़र्ज़ निभाकर चला हो। देवर के साथ ट्रेन की रात

ट्रेन आई। स्लीपर कोच था — C-2। हमारी सीट साथ-साथ — एक साइड लोअर बर्थ, और उसके ऊपर की। बाक़ी कोच ख़ाली-ख़ाली था। कुछ सीटों पर लोग सो रहे थे, कुछ बैठे फ़ोन में लगे थे।
मैंने उस दिन गहरे लाल रंग की शिफ़ॉन साड़ी पहनी थी — सुनहरी बूँदों वाली — और ऊपर टाइट काला ब्लाउज़। गले में हल्की चेन, नाक में छोटी नथ, माथे पर सिंदूर, और आँखों में भरपूर काजल। शादी में जाना था, इसलिए सजी थी। मुझे पता था — ट्रेन में मर्द देखेंगे। पर उस रात मुझे सिर्फ़ एक की नज़र महसूस हुई।
आकाश ने सामान रखा, और बोला — “भाभी, आप खिड़की के पास बैठिए। मैं गलियारे वाली सीट पर।”
मैं बैठ गई। ट्रेन चली। खिड़की से बाहर अंधेरा, अंदर पीली रोशनी, और ट्रेन की ‘खट-खट’ जो सब कुछ ढँक देती है।
कुछ देर चुप्पी। फिर बातें शुरू हुईं। पहले घर-परिवार, फिर नौकरी, फिर हँसी-मज़ाक़। आकाश बहुत हँसाता था। और जब वो हँसता, उसके गाल पर गड्ढे बन जाते — और मेरा दिल बैठ जाता। देवर के साथ ट्रेन की रात
“भाभी, आपने कभी बताया नहीं — इतनी सुंदर होकर भी शहर में घूमने क्यों नहीं जातीं?”
“किसके साथ जाऊँ?” — मैंने हँसकर कहा।
“अब तो मैं हूँ ना।” — आकाश ने कहा, और मेरी तरफ़ देखकर हल्का सा मुस्कुरा दिया।
बस। उस एक वाक्य ने मेरी चूत में हल्की-सी खुजली पैदा कर दी। मैंने पाँव क्रॉस किए, और आगे देखने लगी।
भाग 4 — छोटे-छोटे स्पर्श
खाना खाया, बातें चलीं। दस बजे लाइट्स मंद हो गईं। कोच में अंधेरा-सा छा गया। कुछ लोग सोने लगे। हम दोनों बैठे रहे।
आकाश ने पानी की बोतल उठाई और मुझे दी। देते वक़्त उसकी उंगलियाँ मेरी उंगलियों से छू गईं। दो सेकंड। पर वो दो सेकंड दो मिनट जैसे लगे। हम दोनों ने झट से हाथ नहीं खींचे। देवर के साथ ट्रेन की रात
फिर बातों-बातों में उसने मेरी तरफ़ झुककर कुछ कहा — और उसकी गर्म साँस मेरे कान से टकराई। मेरे शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई। उसने देखा, और पूछा — “भाभी, ठंड लग रही है? शॉल ले आऊँ?”
“नहीं… ऐसे ही।” — मैंने कहा।
तभी ट्रेन ने ज़ोरदार झटका मारा। मैं अपनी सीट से खिसकी — और सीधे आकाश के सामने जा गिरी। उसने झट से अपनी दोनों बाँहें फैलाईं और मुझे पकड़ लिया।
एक हाथ मेरी कमर पर, दूसरा… मेरी गांड पर।
दोनों पल भर के लिए जम गए। मैंने महसूस किया — उसका हाथ कितना बड़ा, कितना गर्म है, और वो मेरी गांड पर कसकर टिका है। मेरा दिल धक्-धक्।
“संभलो, भाभी…” — आकाश ने धीरे से कहा, और हाथ हटाया नहीं।
मैंने खुद को संभाला, उठकर बैठी — पर जब बैठी तो हमारे बीच की दूरी अब बस एक बालिश्त रह गई थी। उसका घुटना मेरे घुटने से टिका था। देवर के साथ ट्रेन की रात
भाग 5 — रात, अंधेरा, और पहला चुंबन
ग्यारह बजे। कोच में लगभग सब सो चुके। ऊपर की लाइट मंद, और खिड़की से चलती ट्रेन की नीली-पीली रोशनी अंदर आती-जाती।
आकाश ने अपनी आवाज़ धीमी करके कहा — “भाभी, आप कभी बताइए… भैया आपको ख़ुश रखते हैं?”
“कैसी ख़ुशी?” — मैंने पूछा।
“आप जानती हैं।” — उसने कहा, और आँखें सीधी मेरी आँखों में डाल दीं। देवर के साथ ट्रेन की रात
मैं चुप हो गई। क्या बताती कि छह साल से मेरी चूत तरस रही है? क्या बताती कि पति रात को पीठ फेरकर सो जाता है?
“भाभी… एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“अगर मैं ग़लत लगूँ तो बताइएगा।” — कहते-कहते आकाश ने अपना हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरी साँस रुक गई। उसने मेरी उंगलियाँ अपनी उंगलियों में फँसाईं और धीरे से दबाया।
“आकाश…” — बस इतना ही निकला मुझसे।
“भाभी, तीन साल से जब भी आता हूँ, आपको देखता हूँ और बेचैन हो जाता हूँ। भैया को कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता। पर मुझे पड़ता है।”
और फिर वो थोड़ा और झुका। मेरा हाथ अभी उसके हाथ में था। उसका चेहरा मेरे चेहरे के पास आया। खिड़की से एक बार फिर नीली रोशनी गुज़री — और उसने अपने होठ मेरे होठों पर रख दिए।
पहला चुंबन। धीमा। काँपता। मैंने छह साल में पहली बार महसूस किया कि किसी ने मुझे ‘चूमा’ है — सिर्फ़ चोदने के लिए नहीं, चूमने के लिए। देवर के साथ ट्रेन की रात
आकाश ने होठ नहीं हटाए। धीरे-धीरे चूमता रहा। फिर उसकी जीभ मेरे होठों की दरार खोलकर अंदर आई। मेरी जीभ उससे लिपट गई। मैं खुद को रोक नहीं पाई — उसके बालों में हाथ फेरने लगी।
ट्रेन की ‘खट-खट’ हमारी साँसों को ढँक रही थी। किसी को पता भी नहीं चला।
भाग 6 — जब ट्रेन में चूचियाँ निकलीं
चुंबन बढ़ता गया। आकाश का एक हाथ मेरी कमर पर, दूसरा मेरी पीठ पर। वो धीरे-धीरे मेरी पीठ सहलाने लगा, फिर कंधे, फिर गर्दन। मैं पिघल गई थी। देवर के साथ ट्रेन की रात
फिर उसका हाथ मेरे सीने की तरफ़ बढ़ा। ब्लाउज़ के ऊपर से उसने मेरी चूची दबाई। इतना धीरे कि जान निकल गई।
“उफ़्फ़…” — मेरे मुँह से आह निकल गई, और मैंने ख़ुद को उसकी तरफ़ खींच लिया।
उसने पीछे की तरफ़ देखा — सब सो रहे थे। फिर उसने मेरे ब्लाउज़ की हुक खोलनी शुरू कीं। एक-एक करके तीन हुक। और जैसे ही ब्लाउज़ ढीला हुआ, मेरी भारी चूचियाँ कपड़े से छूटकर उसके हाथों में आ गईं। पूरी, गर्म, भरी हुई। देवर के साथ ट्रेन की रात
आकाश ने आह भरी — “भाभी… हे भगवान…” — और उसने दोनों हाथों से भर-भरकर दबाया। फिर उसने झुककर एक चूची मुँह में ले ली।
जैसे ही उसके दाँत निप्पल से टकराए, मेरी पीठ कमान बन गई। मैंने दाँत से अपना होठ दबा लिया ताकि आवाज़ न हो। आकाश चूसता रहा — पहले एक, फिर दूसरी। जीभ से निप्पल के चारों तरफ़ चक्कर, और हाथ से दूसरी चूची मसलता रहा।
“आकाश… आह… ट्रेन में सब देख लेंगे…” — मैंने फुसफुसाया।
“देख लें भाभी।” — उसने चूची से मुँह हटाकर कहा — “आज कुछ तो होकर ही रहेगा।”
भाग 7 — टॉयलेट का बहाना
तभी गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी। कुछ लोग उतरे, नए चढ़े। मौक़ा देखकर आकाश ने फुसफुसाया — “भाभी, बाथरूम चलिए। तीन मिनट।” देवर के साथ ट्रेन की रात
“ट्रेन में? सब जानते हैं…”
“भाभी… प्लीज़। अगला स्टेशन पचास मिनट दूर है। कोई नहीं आएगा।”
मैं उठी। ब्लाउज़ ठीक किया, साड़ी सँभाली। आकाश मेरे पीछे-पीछे। कोच के पिछले हिस्से वाले शौचालय की तरफ़। मैं अंदर घुसी और दरवाज़ा अधखुला छोड़ दिया। देवर के साथ ट्रेन की रात
एक मिनट बाद आकाश आया। चारों तरफ़ देखा — कोई नहीं था। अंदर घुसा, और दरवाज़ा बंद कर दिया।
अंदर बहुत छोटी जगह। बस इतनी कि दो जिस्म एक-दूसरे से चिपके रहें। वो ठीक यही चाहता था। देवर के साथ ट्रेन की रात
उसने मुझे पीछे दीवार पर टिका दिया, और दोनों हाथों से मेरा चेहरा थामकर ज़ोर से चूमने लगा। इस बार कोई शरम नहीं थी। पूरी भूख। उसकी जीभ मेरे मुँह में, मेरी जीभ उसके मुँह में — जैसे दोनों एक-दूसरे को खा रहे हों।
फिर उसका हाथ नीचे गया। मेरी साड़ी उठाकर पेटीकोट की कमर पकड़ी, और मेरी पेंटी के ऊपर से ही अपना हाथ रखकर दबाया। देवर के साथ ट्रेन की रात
मैं मर गई। छह साल में पहली बार किसी और मर्द का हाथ मेरी चूत पर।
उसने धीरे-धीरे सहलाया, फिर पेंटी को एक तरफ़ सरकाकर अपनी दो उंगलियाँ मेरी चूत पर रख दीं। चूत पहले से ही पानी से भरी हुई। गीली। चिपचिपी।
“भाभी… आप तो पूरी पिघल चुकी हैं।” — आकाश ने गर्म आवाज़ में कहा।
“तेरे कारण…” — मैंने हाँफते हुए कहा।
उसने एक उंगली अंदर डाल दी। मैंने पूरे बदन से झटका खाया और उसके कंधे पर सिर रख दिया। उसकी उंगली अंदर-बाहर होने लगी। ट्रेन की खट-खट में मेरी सिसकारियाँ घुल गईं। देवर के साथ ट्रेन की रात
फिर उसने जल्दी से अपनी जीन्स का बटन खोला और चेन खींची। मैंने अपनी आँखें फैलाकर उसे देखा — “अभी? यहीं?”
“भाभी, बस डेढ़ मिनट। प्लीज़।”
उसने मेरी एक टाँग उठाकर शौचालय की दीवार पर टिकाई, और अपना लंड निकाला। मैंने देखा और मेरी साँस रुक गई — मोटा, लंबा, नस-नस फूला हुआ, सिर ऊपर उठाए। मनीष से कहीं ज़्यादा बड़ा। देवर के साथ ट्रेन की रात
उसने लंड चूत के मुँह पर रखा और एक ज़ोरदार धक्का लगाया।
पूरा अंदर। एक ही झटके में।
“आईईई!” — मेरी चीख दबाने के लिए उसने अपनी हथेली मेरे मुँह पर रख दी।
ट्रेन की आवाज़ ने बचा लिया। पर अंदर मेरी चूत तो जैसे सदियों बाद भरी गई थी। इतना मोटा, इतना गहरा, इतना पूरा।
आकाश ने धक्के शुरू किए — छोटे, तेज़, क्योंकि जगह कम थी। हर धक्के पर उसका पेट मेरे पेट से टकराता। मेरी चूचियाँ उसकी छाती से रगड़ खातीं। हम दोनों पसीने से तर हो रहे थे।
“भाभी… कैसा लग रहा है?” — आकाश ने कान में फुसफुसाया।
“आह… आकाश… और… और ज़ोर से…”
“अगले स्टेशन से पहले नहीं रुकूँगा।”
और उसने गति बढ़ा दी। मेरी चूत ‘फच-फच’ करने लगी। मैंने उसके कंधे पर नाखून गड़ा दिए। और तभी — मेरा शरीर अकड़ा, पैर काँपे — मैं झड़ गई। छह साल बाद, किसी और मर्द के लंड से। ट्रेन के शौचालय में। देवर के साथ ट्रेन की रात
आकाश ने भी दस-बारह और धक्के लगाए और ज़ोर से गुर्राकर मेरे अंदर ही भर दिया। गर्म वीर्य की धार। मैंने महसूस किया — और दूसरी बार मेरी चूत फड़क उठी।
फिर दोनों वहीं खड़े हाँफते रहे, लंड अंदर ही।
“भाभी…” — आकाश ने मेरे माथे पर चुंबन किया — “आपने तो मेरी जान ले ली।” देवर के साथ ट्रेन की रात
भाग 8 — बर्थ पर, आधी रात
हम टॉयलेट से निकले, हाथ-मुँह धोया, और सीट पर आ गए। कोच में सब सो रहे थे। मैंने अपनी साड़ी ठीक की, बाल सँभाले। आकाश मेरे पास बैठा और मेरा हाथ थाम लिया। दोनों चुप। देवर के साथ ट्रेन की रात
आधे घंटे बाद ट्रेन फिर रुकी। अब सब गहरी नींद में थे। आकाश ने धीरे से कहा — “भाभी, ऊपर चलो।”
“ऊपर?”
“मेरी बर्थ पर। कोई नहीं देखेगा।”
ऊपर की बर्थ। पर्दा। अंधेरा। बस इतनी जगह कि दो जिस्म लेट जाएँ। देवर के साथ ट्रेन की रात
हम चुपचाप ऊपर चढ़े। मैं पहले लेटी। आकाश पीछे। उसने पर्दा खींच दिया। और फिर — वो पूरी रात।
उसने मेरी साड़ी पूरी उतार दी। ब्लाउज़ खोला। पेटीकोट, पेंटी — सब। मैं पूरी नंगी। बर्थ की ऊँचाई पर ट्रेन की हर हलचल महसूस हो रही थी।
आकाश ने मुझे करवट लिटाया, और पीछे से लिपटकर मेरी गर्दन, कंधे, पीठ चूमने लगा। उसका लंड मेरी गांड के बीच रगड़ खा रहा था। मैंने अपनी गांड पीछे की तरफ़ उठा दी — निमंत्रण।
उसने लंड नीचे किया और पीछे से मेरी चूत में डाल दिया। इस बार और भी गहरा। इस पोज़ीशन में लंड चूत के ऊपर वाले हिस्से को छूता है — और मैं पागल हो गई।
“आह… आकाश… वहीं… वहीं…”
“भाभी, धीरे बोलिए… नीचे सब हैं…”
हम दोनों हँस दिए, फिर फिर धक्के। पीछे से, धीरे-धीरे, गहरे। ट्रेन की खट-खट हमारी लय बन गई थी। हर खट पर एक धक्का। मैंने अपना मुँह तकिये में दबा लिया। देवर के साथ ट्रेन की रात
फिर आकाश ने मुझे पलटा। मेरे ऊपर आ गया। मेरी दोनों टाँगें अपनी कमर पर लपेट लीं। और अब मिशनरी में चोदने लगा — पूरे वेग से, पूरी ताक़त से। ऊपर की बर्थ चरमराने लगी। मेरी चूचियाँ हर धक्के पर उसकी छाती से टकरातीं, और वो झुककर उन्हें चूसता, निप्पल दाँतों से हल्का काटता।
“आकाश… मर जाऊँगी… और… और…”
“भाभी… मेरे साथ झड़िए… साथ…”
उसकी आवाज़ भी टूट रही थी। हम दोनों का समय आ गया था। आकाश ने आख़िरी पाँच धक्के पूरी ताक़त से लगाए — और साथ-साथ, दोनों ने एक ही पल में ख़ुद को छोड़ दिया। मेरी चूत ने फव्वारा छोड़ा, और आकाश ने फिर मेरे अंदर भर दिया।
फिर वो मुझ पर ढेर हो गया। हम दोनों हाँफते रहे। पसीना, गर्मी, और ट्रेन की ठंडी हवा।
“भाभी…” — आकाश ने मेरे होठों पर चुंबन किया — “आज पता चला कि औरत क्या होती है।”
“और मुझे पता चला कि मर्द क्या होता है।” — मैंने कहा, और उसके गले लिपट गई। देवर के साथ ट्रेन की रात
भाग 9 — सुबह, शर्म, और वादा
सुबह पाँच बजे ट्रेन वाराणसी पहुँची। हम दोनों नीचे उतरे — आँखों में नींद नहीं, पर चेहरों पर एक गुनगुनी मुस्कान। मैंने साड़ी ठीक की, सिंदूर भरा — क्योंकि अब वो सिंदूर जैसे मेरा ही नहीं रहा। देवर के साथ ट्रेन की रात
बाहर स्टेशन पर भीड़ थी। हमने ऑटो लिया। बैठते-बैठते आकाश ने मेरा हाथ फिर पकड़ लिया — और इस बार खींचा नहीं।
शादी के तीन दिन में हमें और भी मौके मिले। बारात के शोर में, छत पर, पीछे के कमरे में — जहाँ-जहाँ भी लोग नहीं होते, आकाश मेरा हाथ पकड़ लेता। और एक रात शादी के मंडप के पीछे वाले अंधेरे कोने में हमने खड़े-खड़े चुदाई की — बस दो मिनट में, पर पूरी जान निकल गई। देवर के साथ ट्रेन की रात
कानपुर लौटते वक़्त फिर वही ट्रेन थी। और वो रात तो जैसे हमारी थी ही।
भाग 10 — अब
कानपुर पहुँचे। मनीष स्टेशन पर आया। गले लगाया, पूछा — “कैसी रही ट्रेन?”
“अच्छी…” — मैंने कहा, और आकाश की तरफ़ नज़र उठाई। आकाश ने हल्का सा सिर हिलाया — एक गुप्त इशारा।
और मेरी चूत फिर से गर्म हो गई। देवर के साथ ट्रेन की रात
अब आकाश महीने में एक बार आता है — भाई से मिलने के बहाने। और हर बार, जब मनीष ऑफ़िस या सो जाता है, हम मिलते हैं। कभी रसोई में, कभी छत पर, कभी आधी रात को बेडरूम में — जब मनीष बग़ल में सो रहा हो और मैं चुपचाप उठकर आकाश के पास जाती हूँ।
मनीष को पता भी नहीं। या शायद वो जान-बूझकर नहीं जानना चाहता।
और मैं? मैं आज भी हर शुक्रवार को वो लाल साड़ी निकाल लेती हूँ। और हर बार जब ट्रेन की खट-खट सुनती हूँ, मेरी चूत में एक हल्की-सी खुजली उठती है। देवर के साथ ट्रेन की रात
क्योंकि जो एक रात उस ट्रेन के शौचालय में शुरू हुआ था — वो अब मेरी ज़िंदगी की सबसे मीठी आदत है।
और अब मुझे कोई शक नहीं — मर्द वो नहीं जो नाम का पति होता है। मर्द वो है जो औरत की प्यास को पहचानता है, और बुझाता है।
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