भाग 1 — सुबह: थाली, रोली और एक सुनहरा लिफ़ाफ़ा
दिवाली की रौशनी अभी दीवारों से उतरी भी नहीं थी कि भैयादूज आ गया। आर्यन। उम्र तेईस। कद पूरा छह फुट, बाज़ुओं में नसें, और उस उम्र का लड़का जिसे अपने ही जिस्म की गर्मी से फ़ुरसत नहीं मिलती। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
अम्मा-पापा सुबह आठ बजे ही मामा के घर चले गए थे। जाते-जाते अम्मा ने पीछे मुड़कर कहा, “आर्यन, बुआ को तकलीफ़ नहीं होने देना। और हाँ — बुआ के साथ बाहर जाना है तो बता देना।”
घर में बस मैं और मेरी बुआ मीरा।
बुआ पापा की छोटी बहन। छत्तीस की। शादी आठ साल पहले हुई थी, और शादी के तीसरे महीने में ही राकेश फूफा दुबई चले गए थे। तब से बुआ दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में अकेली। कोई बच्चा नहीं। कोई शिकायत नहीं। हर महीने पैसा आ जाता है, हर दो महीने में एक फ़ोन आ जाता है। बस।
बुआ हर साल भैयादूज और राखी पर अपने भाई के घर आती हैं। थाली सजाने। तिलक करने। और वापस चले जाने के लिए।
आज उन्होंने गहरा मैरून साड़ी पहनी थी — गोल्ड बॉर्डर वाली। ब्लाउज़ इतना टाइट कि सीना तन जाए। कमर इतनी पतली कि एक हाथ में लपेट लो। और उसके नीचे कूल्हे — जैसे दो गरम मटके। कलाइयों में सफ़ेद चूड़ियाँ, कानों में छोटे सोने के झुमके, माथे पर लाल बिंदी, और आँखों में वो कजरा जो दिवाली पर सब लगाती हैं। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
उनका रंग दूध जैसा। बड़ी-बड़ी हिरनी आँखें। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे — जैसे नींद और ख़्वाब दोनों साथ रोते हों। बाल कमर तक, पर हमेशा ऊँचे जूड़े में, जैसे कोई औरत अपने आप को कसकर बाँधकर रखती हो।
दस बजे उन्होंने आवाज़ दी।
“आर्यन! इधर आ। बैठ।”
मैं गया। बैठ गया। बुआ ने थाली रखी — पीतल की थाली, जिसे वो हर साल अपने साथ लाती हैं। उसमें रोली, चावल, सुपारी, दीया, मिठाई। और बग़ल में एक सुनहरे लिफ़ाफ़े में गिफ्ट।
“हाथ जोड़।”
मैंने हाथ जोड़े। बुआ झुकीं। उनका पल्लू मेरे कंधे को छू गया, और उसमें से वो ख़ुशबू आई — चमेली, हल्दी, और किसी गरम जिस्म का पसीना। तीन चीज़ें एक साथ, और तीनों मेरे सिर के पीछे कहीं चुभ गईं।
उन्होंने अँगूठे में रोली ली और मेरे माथे पर लगाई। ठंडी रोली, गरम उँगली। फिर चावल के दाने — एक-एक, बड़े ध्यान से, जैसे कोई तस्वीर बना रही हों। फिर दीया उठाया और मेरे माथे के सामने घुमाने लगीं — तीन बार इस तरफ़, तीन बार उस तरफ़।
दीये की लौ हमारे बीच काँप रही थी। और बुआ की आँखें उस लौ में चमक रही थीं।
“मुँह खोल।”
मैंने खोला। बुआ ने अपने हाथ से मिठाई उठाई और मेरे मुँह में रख दी। उनकी उँगली मेरे होंठों को छू गई — और हटने में उसने आधा सेकंड ज़्यादा लिया।
बस आधा सेकंड।
उस आधे सेकंड में मेरे पेट के नीचे कुछ हुआ जो मिठाई से नहीं हुआ।
“अब ख़त्म?” मैंने कहा, मुँह भरा हुआ।
“अभी नहीं।” बुआ ने लिफ़ाफ़ा उठाया और मेरी हथेली पर रख दिया। “ये तेरा गिफ्ट है। पहन के दिखाना ज़रूर।” Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
फिर उन्होंने ठुड्डी पर उँगली रखकर कहा, “और सुन — भैयादूज में भाई भी तो कुछ देता है ना? अब तक तूने मुझे क्या दिया?”
“अभी तो कुछ नहीं दिया बुआ।”
“तो सोच। पूरा दिन पड़ा है।”
बुआ मुस्कुराईं। और वो मुस्कान कुछ ऐसी थी जैसे किसी ने आठ साल से बंद किताब खोली हो। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
भाग 2 — दोपहर: रसोई, आँच और एक ग़लती
लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा — क्रीम रंग की शर्ट। महँगी। बाज़ार वाली नहीं, किसी अच्छी दुकान वाली।
बुआ ने पहनवाई भी। कॉलर ठीक किया, दोनों हाथ कंधों पर रखकर बोलीं, “बिल्कुल फ़िल्मी हीरो लग रहा है।” फिर एक कदम पीछे हटकर ऊपर से नीचे देखा — और नज़र उनकी एक सेकंड ज़्यादा रुकी। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
दोपहर में बुआ रसोई में गईं। मैं बरामदे में बैठा था, पर मेरी नज़र दरवाज़े की तरफ़ थी। बुआ गैस पर रोटी बना रही थीं, और आँच की गर्मी से उनके माथे पर पसीने की पतली लकीर आ गई थी। साड़ी का पल्लू उन्होंने पीठ पर डाल रखा था — यानी पीछे से उनकी कमर और कूल्हे बिल्कुल साफ़ दिख रहे थे।
पल्लू की तह कमर से सरक-सरक कर नीचे जा रही थी। बुआ बार-बार उसे ऊपर खींच रही थीं, और वो बार-बार सरक रही थी। जैसे कोई जान-बूझकर। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
“आर्यन, आकर थाली लगा दे।”
मैं रसोई में गया। बुआ गैस के सामने खड़ी थीं। मैं उनके पीछे से गुज़रा — और गुज़रते वक़्त मेरी जाँघ उनके कूल्हे से रगड़ गई।
बुआ की रोटी बनाना रुक गया।
“ओह!” वो मुड़ीं। “सॉरी।”
“सॉरी आप किसको कह रही हो बुआ? रसोई आपकी है, मैं मेहमान हूँ।”
बुआ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर मुस्कुराकर कहा, “तेरे घर में तू मेहमान है, और मेरे लिए तू… तू तो भांजा है। बड़ा भांजा।”
“बड़ा भांजा” — वो जिस तरह बोलीं, वो सीधे मेरी रीढ़ में उतर गया।
खाना खाते वक़्त बुआ मेरे सामने बैठीं। हर बार जब वो झुककर सालन डालतीं, उनका पल्लू कंधे से खिसक जाता और सीने की गहरी लकीर दिख जाती। मैं तीन बार सालन वाली तरफ़ देख चुका था, चौथी बार बुआ ने पकड़ लिया। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
“क्या देख रहा है?”
“खाना।”
“झूठ।”
मैंने सिर झुका लिया। बुआ हँसीं।
दोपहर दो बजे बुआ को नींद आ गई। वो बैठक के दीवान पर लेट गईं और साड़ी का पल्लू चेहरे पर डाल लिया। मैं बग़ल की कुर्सी पर बैठा रहा और उन्हें देखता रहा — साँस के साथ उनका सीना उठता-गिरता, होंठ हल्के खुले, और पैर का एक पंजा दीवान से नीचे लटका हुआ। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
उस दोपहर मैंने अपनी क़मीज़ की जेब में हाथ डालकर अपने आप को “ठीक” किया। बुआ सो रही थीं, पर उनके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
जैसे वो जानती हों।
भाग 3 — शाम: ठंड, वाइन और एक सवाल
शाम को ठंड बढ़ गई। दिवाली के बाद की पहली ठंड — हल्की, कुहासे वाली। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
बुआ ने किचन से एक आधी बोतल वाइन निकाली।
“ये कब से रखी है?”
“दो साल से। एक दोस्त ने भेजी थी। अकेले पीने का मन नहीं हुआ।”
दो गिलास। दीये जला दिए। बैठक की बत्ती बंद कर दी। और हम बैठ गए — फ़र्श पर, तकियों के सहारे, आमने-सामने।
बुआ ने घूँट भरा और घूँट के साथ वो बोलीं जो शायद आठ साल से भीतर दबा था।
“आर्यन, तुझे पता है सबसे बुरा क्या है? ये नहीं कि आदमी दूर है। बुरा ये है कि आदमी को फ़र्क़ भी नहीं पड़ता।”
“फ़र्क़ नहीं पड़ता?”
“दो महीने में एक कॉल। ‘खाना ठीक से खा रही हो?’ बस। मैं पिछले साल बीमार पड़ी थी, तीन दिन बुख़ार था — तूने सुना? नहीं सुना। उसे भी नहीं बताया। क्योंकि वो पूछेगा भी नहीं कि कैसी है।” Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
उन्होंने गिलास रखा और घुटनों को सीने से लगाकर बैठ गईं। इस मुद्रा में साड़ी का पल्लू खिसक गया और उनकी पूरी गर्दन, कॉलरबोन, और ब्लाउज़ का ऊपरी किनारा दिखने लगा।
“और मैं तीस की हूँ। छत्तीस की हूँ। अभी मरी नहीं हूँ, आर्यन। रात को कमरा बंद होता है तो लगता है किसी ने मुझे भी बंद कर दिया है। हाथ लगाने को कोई नहीं। छूने को कोई नहीं। और जिस्म… जिस्म भूलने को तैयार ही नहीं।”
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ पूरा बदन घुमाया। आँखें सीधी मेरी आँखों में। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
“आज भैयादूज है। तूने मुझे गिफ्ट नहीं दिया।”
“क्या दूँ बुआ?”
“ख़ुद को दे दे।”
और फिर वो हँस पड़ीं — “नहीं, हँसो मत। सोच तो। तेरा घर है, तेरे माँ-बाप नहीं हैं, और मैं… मैं अकेली हूँ। इतना मौक़ा फिर कब मिलेगा?”
मैंने कहा, “तो बुआ, आज मैं आपको गिफ्ट देता हूँ। पर शिकायत नहीं करना।”
बुआ ने गिलास आख़िरी बार उठाया, पूरा पीया, और रख दिया। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
“शिकायत?” उन्होंने धीरे से कहा। “आर्यन, आज शिकायत मैं करूँगी नहीं — आज गिनती तू करेगा।”
भाग 4 — पहला स्पर्श: जब दीये की लौ काँपी
मैं उठा। उनके सामने खड़ा हुआ। बुआ भी उठीं — हल्की लड़खड़ाते हुए, और उस लड़खड़ाहट में उनका हाथ मेरे सीने पर पड़ गया। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
बीच में बस एक फुट की दूरी थी। और वो भी जलती हुई।
मैंने हाथ बढ़ाया और उनका पल्लू पकड़ा। धीरे से खींचा। साड़ी का पल्लू कंधे से सरका — और उनका नंगा कंधा बाहर आ गया। गोरा, गोल, और ठंडी हवा से रोंगटे खड़े।
बुआ की साँस लंबी हुई।
मैंने उस कंधे पर होंठ रखे। पहले बस स्पर्श। फिर दबाकर। फिर दाँत से ज़रा सा दबाया। बुआ की गर्दन झुक गई और उनका माथा मेरे माथे से टकरा गया। हम दोनों की आँखें बंद हो गईं। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
और फिर वो चुम्बन।
पहला चुम्बन ऐसा था जैसे आठ साल की प्यास एक झटके में उतर गई हो।
बुआ ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा — दोनों हथेलियाँ मेरे जबड़ों पर, उँगलियाँ कानों के पीछे — और मेरे होंठ चूसने लगीं। पहले धीमे। फिर भूखे। फिर बेसब्र।
उनकी जीभ मेरे मुँह में आई, हटी, फिर आई, और इस बार हटने का नाम ही नहीं लिया। मैंने अपनी जीभ उनके मुँह में डाली तो उन्होंने हल्का सा दाँत लगा दिया — जैसे सबक सिखा रही हों।
दीये की लौ हमारी साँसों से काँप रही थी।
मेरा हाथ उनकी कमर पर गया। जैसा अंदाज़ा था — पूरी कमर एक हाथ में आ गई। मैंने दबाया, और बुआ मेरे से चिपक गईं। उनके भारी सीने मेरी छाती पर दब गए और उस दबाव में वो एक हल्की “हम्म” निकाल गईं जो सीधे मेरे पेट में उतरी।
मैंने उनकी पीठ पर हाथ सरकाया — कमर से नीचे, कूल्हों पर। बुआ का पूरा बदन एक झटके में सख़्त हुआ, फिर ढीला पड़ गया, जैसे किसी ने कहा हो — “ठीक है, अब छोड़ दो सब।”
मैंने साड़ी की तह खोलनी शुरू की। बुआ ने खुद पल्लू गिरा दिया। साड़ी फ़र्श पर ढेर हो गई — मैरून रंग का वो ढेर, जिस पर दीये की रौशनी पड़ रही थी। अब सिर्फ़ ब्लाउज़ और पेटीकोट।
मैंने उन्हें दीवार से लगा दिया। उनके बालों का जूड़ा ढीला होकर खुल गया और बाल कंधों पर बिखर गए। बुआ ने मेरी क़मीज़ के बटन खोलने शुरू किए — उँगलियाँ काँप रही थीं, बटन बार-बार फिसल रहे थे।
“आर्यन… जल्दी मत करना।” वो फुसफुसाईं। “आज पूरा लेना है। हर चीज़।”
मैंने उन्हें गोद में उठा लिया। वो मुझसे काफ़ी छोटी थीं — पूरी औरत, पर हल्की। उन्होंने मेरी गर्दन में हाथ डाल दिए और मुँह मेरे कंधे की गड्ढे में छिपा दिया।
कमरे की तरफ़ चलते वक़्त दीये पीछे रह गए। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
भाग 5 — पलंग: पहली बार
मैंने उन्हें पलंग पर लिटाया।
ब्लाउज़ के हुक्स पीछे थे। मैंने उन्हें पेट के बल पलटाया, और एक-एक हुक खोलना शुरू किया। पहला, दूसरा, तीसरा। हर हुक के साथ बुआ की साँस गहरी होती गई, जैसे कोई गिनती गिन रहा हो। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
आख़िरी हुक खुला — और ब्लाउज़ ढीला होकर गिर गया।
बुआ ने शरमाकर हाथ से सीना ढकने की कोशिश की। मैंने उनका हाथ हटा दिया और आँख भरकर देखा।
बड़े, भरे, गोरे। निपल के चारों तरफ़ हल्का भूरा घेरा — जैसे कोई नक़्शा — और बीच में सुर्ख़, सख़्त टिप। एक सीने के ऊपरी हिस्से पर छोटा सा तिल। मन किया कि वही चूम लूँ।
मैंने चूम लिया। बुआ काँपकर मुस्कुरा दीं।
फिर मुँह नीचे किया और निपल होंठों में लिया। दबाया। जीभ घुमाई। चूसा। हल्के दाँत लगाए। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
बुआ की पूरी रीढ़ चादर से उठ गई। “आआआहहह… ओ मेरे… आर्यन…”
उन्होंने मेरे बाल पकड़कर सिर और दबा दिया — जैसे बच्चा हो, पर यहाँ ममता की बारी ख़त्म हो चुकी थी। दूसरा सीना भी वही सलूक। बुआ की आवाज़ रुक-रुक कर निकल रही थी, और हर बार जब मैं दाँत लगाता, वो अपनी कमर ज़रा ऊपर उठा देतीं। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
मेरा हाथ नीचे गया। पेटीकोट की नाड़ खोली। फिर पैंटी।
और उँगली जैसे ही उस सिलवट पर पड़ी — पूरी तरह भीगी हुई।
“बुआ…” मैंने कहा। “इतनी गीली?”
“आठ साल की बात है बेटा।” उन्होंने आँखें बंद करके कहा। “आठ साल। तू उँगली लगाकर देख, अंदर कैसे मचल रही है।”
मैंने उँगली अंदर सरकाई। बुआ ने मुँह दबा लिया, पर आवाज़ निकल ही गई। दो उँगलियाँ। ऊपर-नीचे। अंदर की दीवारें मेरी उँगलियों को जकड़ रही थीं, छोड़ नहीं रही थीं।
फिर मैं नीचे झुका। पैंटी खींचकर पूरी उतार दी। और अपनी जीभ उस पर रख दी।
बुआ पूरी उठ बैठीं।
“अरे वहाँ? वहाँ भी कोई करता है?”
“करते हैं बुआ। आप बस लेटिए। और आँखें बंद कीजिए।”
जब जीभ उस मोती पर चक्कर काटने लगी, बुआ की जाँघें मेरे कंधों पर काँपने लगीं। उन्होंने दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़ा और कूल्हे ऊपर उठा दिए — अपनी चूत मेरे मुँह पर रगड़ने लगीं।
“आर्यन… मत रुको… यूँ ही करो… आआआहहह… ओ अल्लाह जैसा…”
जब वो पहली बार झड़ीं, उनका पूरा बदन थरथराया। पैर मेरी पीठ पर तन गए, आँखों से पानी निकल आया। कुछ सेकंड वो ऐसे ही रहीं, फिर मुझे खींचकर ऊपर ले आईं और मेरी पैंट के बटन खोलने लगीं। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
लंड बाहर आया — अकड़ा हुआ, नसों से भरा, टिप चमकता हुआ। बुआ ने उसे दोनों हाथों में लिया और एक लंबी साँस छोड़ी।
“हाय… ये तो बड़ा है। सच में बड़ा है।”
और फिर वो झुकीं। पहले टिप चूमा — बस होंठों से। फिर पूरा मुँह में लिया।
गला छोटा था, पर वो पूरी कोशिश कर रही थीं — हर बार थोड़ा और, थोड़ा और। गीला मुँह। जीभ का दबाव। दाँतों की हल्की रगड़। और जब-जब वो अंदर जातीं, उनकी नाक मेरे पेट से टकराती और एक हल्की आवाज़ निकलती।
मेरा दिमाग़ सुन्न। मैंने उनके खुले बालों में हाथ डाला और जूड़ा पूरा खोल दिया।
दो मिनट बाद उन्होंने लंड मुँह से निकाला, पोंछा, और पीठ के बल लेट गईं। घुटने मोड़े। जाँघें खोलीं। और मुझे अपनी तरफ़ खींचा।
“अब… अब आ जा।”
मैंने टिप रखा। गीली चूत के होंठ अपने आप खुल गए। जैसे अपनी मर्ज़ी से मेरा स्वागत कर रहे हों।
एक धक्का — अंदर।
बुआ ने लंबी साँस छोड़ी और दोनों बाँहें मेरी गर्दन में डाल दीं।
“रुक… रुक ज़रा। आठ साल बाद है। आदत डालनी है।”
मैं पूरा अंदर गया और रुक गया। भीतर की गर्मी। भीतर की सिकुड़न। जैसे उनकी चूत मेरे लंड को पहचान रही हो — “हाँ, यही है।”
मैंने उनके होंठ चूमे। माथा चूमा। गाल चूमा। आँखों के कोनों को चूमा — जहाँ आँसू सूख रहे थे। और फिर धीरे-धीरे आने-जाने लगा।
पहला जटका। दूसरा। तीसरा। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
बुआ ने मेरी पीठ पर नाख़ून गड़ा दिए। “आआआह… आर्यन… हाँ… यूँ ही… यूँ ही कर…”
फिर रफ़्तार बढ़ी। और कमरे में वो आवाज़ आने लगी — थप… थप… थप… थप… थप… जैसे कोई ताली बजा रहा हो।
बुआ अपनी कमर मेरे हिसाब से उठा-झुका रही थीं। मैंने उनकी कमर दोनों हाथों से पकड़ ली और नीचे से ज़ोर लगाकर उनकी चूत में अपना लंड ठोंकने लगा। हर जटके पर उनकी गर्दन पीछे झुक जाती, होंठ खुल जाते, और साँस एक छोटी सी चीख बन जाती।
बुआ मेरी आँखों में आँखें डालकर देख रही थीं। होठ खुले। माथे पर पसीना। बाल गालों पर चिपके। और हर जटके पर वो ज़रा और ऊपर उठतीं, ज़रा और मुँह फैलातीं — जैसे और गहरा माँग रही हों।
“तू तो आग है…” उन्होंने हाँफते हुए कहा। “आग!”
फिर मैंने उनकी दोनों टाँगें उठाकर अपने कंधों पर रख दीं। अब लंड और गहरा जाने लगा — जहाँ तक पहुँचना मुश्किल था, वहाँ तक।
बुआ की आवाज़ फूट पड़ी।
“ओ मेरे…! वहाँ तक! आआआहह… रुक मत… रुक मत…”
बीस मिनट इसी हाल में। उनके सीने मेरी छाती पर हिल-हिल कर रगड़ रहे थे। उनकी साँस मेरे कानों में गरम हवा भर रही थी। और बीच-बीच में वो मेरा कान दाँतों में लेकर हल्का चबा देतीं — जैसे कोई जानवर अपना निशान लगा रहा हो।
फिर उन्होंने कहा, “पलट दे मुझे।”
मैंने उन्हें पेट के बल लिटाया। कूल्हे उठाए। गांड ज़रा ऊपर कर दी — दोनों गोल, सफ़ेद, कमर से चौड़े। मैंने पीछे से लंड उसी भीगी चूत में सरका दिया।
बुआ ने मुँह तकिये में दबा लिया। पर आवाज़ रुक नहीं रही थी।
इसी मुद्रा में उनका सीना चादर पर रगड़ रहा था, कूल्हे मेरे हाथों में, और मेरी जाँघें उनकी जाँघों पर टकरा रहीं थीं — थप… थप… थप… थप…
मैंने एक हाथ से उनकी कमर पकड़ी और दूसरे से उनका एक सीना — जो चादर के नीचे दबा हुआ था — निकालकर हाथ में भर लिया। दबाया। निपल को उँगली और अंगूठे के बीच रखकर रगड़ा। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
बुआ का पूरा बदन काँप उठा। “आआआह… नहीं… दोनों तरफ़ से… रुक जाऊँगी…”
फिर मैंने उन्हें गोद में उठाया — वो मुझसे छोटी थीं, हल्की भी — और खड़े-खड़े चोदने लगा। उनकी टाँगें मेरी कमर पर लिपट गईं, गर्दन मेरे गले में। मैंने उन्हें दीवार से लगाकर उनके कूल्हे पकड़े और ऊपर-नीचे करने लगा।
हर बार जब वो नीचे आतीं, पूरा लंड अंदर धँस जाता। और हर बार वो मेरे कान में एक अधूरी गाली-सी बुदबुदातीं, जो सिर्फ़ चुदाई में निकलती है।
“आर्यन… रुक जाएगा तो मर जाऊँगी…”
आख़िर में मैंने उन्हें पलंग पर लिटाया। टाँगें खोलीं। और आख़िरी जटके लगाने शुरू किए। हर जटके के साथ पूरा कमरा हिल रहा था और पलंग की चरमराहट दीवारों से टकरा रही थी।
“अंदर… अंदर ही कर दे,” बुआ ने हाँफते हुए कहा। “गोली खाती हूँ।”
और जब मैंने वो आख़िरी गहरा जटका मारा, बुआ ने चादर मुँह में भरकर चीख दबाई और उनकी चूत ने मेरे लंड को इस क़दर जकड़ लिया कि मैं खुद को रोक न सका।
अंदर ही झड़ दिया। गहरे। पूरा।
बुआ की जाँघें काँपती रहीं। मैं उनके ऊपर गिर पड़ा। बाहर दीये अब भी जल रहे थे। और कमरे में सिर्फ़ हमारी साँसें थीं — भारी, धीमी, और एक दूसरे में घुली हुई। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
भाग 6 — रात भर
पहली बार के बाद बुआ दस मिनट तक हिली नहीं। बस मेरे सीने पर सिर रखकर पड़ी रहीं। मेरे पेट पर उनके आँसू की एक गरम लकीर सूख रही थी। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
फिर उन्होंने उठकर मेरा चेहरा देखा, और धीरे से कहा:
“आर्यन, एक बात पूछूँ? शर्माओगे नहीं?”
“नहीं।”
“ये… ये तो अब रुकेगा नहीं। मतलब… मैं रुकना नहीं चाहती।” Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
मैं हँसा। “कौन रुकना चाहता है बुआ?”
तो वो रात तीन बार हुई।
दूसरी बार वो ऊपर आईं। मेरे ऊपर बैठकर, घुटनों के बल, दोनों हाथ मेरी छाती पर टिकाकर। शुरू में धीमे — कूल्हे आगे-पीछे। फिर अपनी मर्ज़ी से रफ़्तार पकड़ी। उनके सीने मेरी छाती के ऊपर हवा में झूलते रहे और उनकी साँसें तेज़ होती गईं। मैंने दोनों हाथ उनके कूल्हों पर रखे और ज़ोर लगाया — और वो मेरी आवाज़ पर चलने लगीं, जैसे कोई हुक्म मान रही हों।
“आर्यन… मेरा बाल पकड़…” उन्होंने कहा।
मैंने उनके बिखरे बालों का एक गुच्छा मुट्ठी में लिया। बुआ ने गर्दन पीछे झुकाई, होठ खोले और उसी हाल में चलती रहीं — पूरी औरत, पूरे बदन के साथ, और आँखें बंद। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
तीसरी बार पलंग की जगह फ़र्श पर, उसी ढेर हुई साड़ी के ऊपर। ठंड लग रही थी तो मैंने रज़ाई खींच ली। अँधेरे में, कंबल के नीचे, हम बस एक-दूसरे से चिपके। मैंने उन्हें करवट लिटाया — मेरी तरफ़ मुँह करके — एक टाँग उठाई, और पीछे से अंदर गया।
यह सबसे धीमी बार थी। सबसे गहरी। हम बस आँखों में देखते रहे और धीरे-धीरे हिलते रहे। बुआ की उँगलियाँ मेरी छाती के बालों में घूमती रहीं।
“आर्यन।”
“हम्म।”
“आज अगर तेरे पापा-अम्मा लौट आए होते ना… तो सब बर्बाद हो जाता।”
“होने दो बर्बाद।”
बुआ हँसी — और उस हँसी में मेरी गर्दन पर होंठ रख दिए।
उस रात हम साथ नहाए भी। गीज़र की गरम पानी, भाप, और भीगे बाल। बुआ ने मेरी पीठ पर साबुन लगाया — धीरे-धीरे, बड़े मन से — और फिर मेरी पीठ से चिपककर खड़ी रहीं, जैसे भाप में खो जाना चाहती हों। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
दो बजे हम सोए। नंगे। कंबल एक ही।
भाग 7 — सुबह
सुबह जब उठा तो बग़ल ख़ाली थी। कंबल में उनकी ख़ुशबू बची हुई थी।
मैं किचन में गया।
बुआ वहीं थीं — उसी मैरून साड़ी में, जो अब तह लगी हुई थी और ढीली-ढाली लिपटी थी। बाल खुले हुए। माथे पर बिंदी हट गई थी और तिलक की जगह पर रोली का हल्का दाग़ अब भी मेरे माथे पर था।
वो चाय बना रही थीं। मेरी तरफ़ मुड़कर देखा और बस इतना कहा:
“कल से हर भैयादूज तेरे घर पर ही मनाऊँगी।”
फिर चाय का प्याला मेरी तरफ़ सरकाया।
और जब मैं प्याला उठाने लगा, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया — और पूरे हाथ को अपने हाथ में लेकर, हथेली पर अँगूठा रगड़ते हुए, धीरे से कहा:
“और गिफ्ट वापस नहीं होता, आर्यन। अब तू मेरा है।”
फिर उन्होंने प्याला छोड़ा, और पीछे मुड़कर रोटी बनाने लगीं — जैसे कुछ हुआ ही न हो। Bhai dooj Ka Gift – Bua Ki Chudai Kahani
बस कलाई पर उनकी चूड़ियाँ खनक रही थीं।
और उस खनक में कहीं दूर, पिछली रात की वो थप-थप भी बज रही थी।
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