भाग 1 : वो सुबह, वो तैयारी
मेरा नाम सुनीता है, उम्र 28 साल। पिछले साल जब मेरा तलाक हुआ तो पूरे मोहल्ले में एक ही चर्चा थी — “इतनी हसीन बीवी को भी कोई छोड़ता है?” पर सच ये था कि मेरे पति को औरत से ज़्यादा अपनी नौकरी और दोस्त प्यारे थे। शादी के बाद जब भी मैं किसी से बात करती, वो जल जाता। फिर झगड़े बढ़े, फिर तलाक हो गया, और मैं मायके आ गई। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
मायके आई तो पता चला कि घर में एक आँख मुझे रोज़ निहारती है — मेरे छोटे भाई आकाश की। उम्र बाईस साल, कॉलेज ख़त्म करके अब फ़ैमिली बिज़नेस संभाल रहा है। जवानी का पूरा दरिया, कसरत से बना जिस्म, और बातें करने में ऐसा मासूम कि पहले कभी मन में ख्याल भी नहीं आया। पर पिछले चार साल से जब-जब मैं मायके आती, वो मेरी हर हरकत देखता रहता। मेरी बिंदी, मेरी चूड़ी, मेरी साड़ी का पल्लू — सब उसे याद रहता। बस मुँह से कहता नहीं था।
इस साल करवा चौथ पर मम्मी-पापा नानी के घर गए थे, क्योंकि नानी की तबीयत ठीक नहीं थी और उन्हें देखने ज़रूरी था। घर में बस मैं और आकाश। सुबह सात बजे से माँ ने मेरी सजावट शुरू कर दी थी।
पहले मेहंदी लगाई गई — हथेलियों पर गहरे भूरे रंग की बेलें, बीच में एक-एक गोल घेरा, और कलाई तक बारीक डिज़ाइन। माँ ने कहा, “इतनी सुंदर मेहंदी तो तेरी शादी में भी नहीं लगी थी।” मैं मुस्कुरा दी। मन ही मन सोच रही थी — शादी में जिसके लिए लगी थी, वो तो निभा ही नहीं सका। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
फिर चूड़ी पहनाई गई — गहरे लाल रंग की चूड़ियाँ, जो मेरी गोरी कलाई पर एकदम झलक रही थीं। कानों में भारी झुमके, माथे पर लाल बिंदी, माँग में सिंदूर की पतली लकीर, और पैरों में मेहंदी के नीचे बिछिया। माँ ने मेरे बालों में गजरा लगाया — चमेली का, इतनी तेज़ महक कि पूरा कमरा महक उठा।
कपड़े की बात आई तो माँ ने अपनी बनारसी साड़ी निकाली — गहरा मैरून, सुनहरे किनारे वाली, बारीक ज़री के फूलों से भरी। “आज तू इसे पहन, बहुत लंबी उम्र मिलेगी तेरे नए घर की।”
मैंने साड़ी पहनी तो पता चला कि ब्लाउज ज़रा टाइट है — माँ ने मेरे लिए सिलवाया था, शादी के वक़्त के नाप पर। ब्लाउज सीने से ऐसा चिपका कि साँस लेने पर भी छाती ऊपर-नीचे होती साफ़ दिखे। बाजू थोड़ी चुभती थी, पर सब कुछ परफेक्ट फिट बैठ रहा था। नाभि ज़रा खुली रह गई थी — मैंने साड़ी का पल्लू ऐसे डाला कि वो नाज़ुक करीने से बाहर झाँकती रहे। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
शीशे के सामने खड़ी हुई और खुद को देखा। बालों में गजरा, गले से नीचे उतरती गहरी नाज़ुक लकीर, कमर पर साड़ी की करीने से लिपटी सिलवटें, और कूल्हों पर साड़ी का वो हिस्सा जो मेरी गोलाई को और उभार दे रहा था। मैंने खुद ही सोचा — आज मैं सच में बॉम्ब लग रही हूँ। चार साल की सूखी ज़िंदगी के बाद पहली बार खुद पर गर्व हुआ। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
दरवाज़े के सहारे आकाश खड़ा था, हाथ जेब में, और आँखें मुझ पर टिकी हुईं।
“दीदी…” वो अटक गया, फिर गला साफ़ करके बोला, “आज तो आप… आप बहुत ग़ज़ब लग रही हो। सच में। पूरे मोहल्ले की औरतें आज फीकी लगेंगी।”
मैं मुस्कुरा दी, पर दिल धक्-धक् कर रहा था। “अच्छा? और जिसके लिए व्रत रखा है, उसके लिए?”
वो हँसा — एक ऐसी हँसी जिसमें जलन छिपी थी। “उस बेवकूफ़ को क्या पता। वो तो शाम को एक मैसेज भर कर लेगा — ‘व्रत खोल लो, खाना खा लो’। और क्या? आज जो देखना है, दीदी, मुझे देख लो।” पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“तेरे देखने से व्रत थोड़े ही टूटेगा।”
“तो टूटे ना,” उसने कहा और चला गया। मैं कुछ देर वहीं खड़ी उसके जाने की तरफ़ देखती रही।
भाग 2 : दिन भर की रगड़
पूरे दिन वो मेरे आस-पास मंडराता रहा। दोपहर में जब वो चाय बनाकर लाया, तो कप रखते वक़्त उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर टिक गईं — एक, दो, तीन सेकेंड ज़्यादा। मैंने हाथ नहीं खींचा। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, चीनी कम है क्या?”
“नहीं, ठीक है।”
“फिर हाथ क्यों काँप रहा है?” वो मुस्कुराया।
“भूख से,” मैंने बहाना बनाया। व्रत में पानी भी नहीं पीया था, पर असली वजह भूख नहीं थी।
दोपहर में जब वो कुर्सी खींचकर मेरे पास बैठा, तो उसका घुटना मेरी जाँघ से टकराया और वहीं रुका रहा। मैंने भी नहीं हटाया। कुछ देर बाद उसने बातों-बातों में मेरे कंधे से सरकता पल्लू “ठीक” करने के बहाने उँगलियाँ मेरी गर्दन तक सरका दीं। नाखूनों की हल्की खरोंच मेरी रीढ़ तक दौड़ गई। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, साड़ी ढीली हो रही है। ठीक से बाँध लो, वरना गिर जाएगी।”
“तू बाँध दे ना,” मैंने कहा।
और फिर वो मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया। दोनों हाथों से साड़ी की सिलवटें पकड़कर, मेरी कमर के चारों तरफ़ घुमाते हुए उसने पल्लू खींचकर ठीक किया। पर जान-बूझकर उसके हाथ मेरी कमर पर ज़रूरत से ज़्यादा देर टिके रहे। मुझे लगा उसकी साँसें मेरी गर्दन पर गिर रही हैं। मैंने आँखें बंद कर लीं।
“दीदी…”
“हूँ?”
“कुछ नहीं,” कहकर वो पीछे हट गया। पर उसकी हिम्मत अभी नहीं जुटी थी। मैं भी इंतज़ार कर रही थी — करवा चौथ का, चाँद का, और उसकी हिम्मत का। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
शाम को पाँच बजे माँ का फ़ोन आया। “बेटी, हम देर से आएँगे, नानी की तबीयत ठीक नहीं। तुम चाँद देखकर व्रत खोल लेना। आकाश साथ है ना तेरे?”
“हाँ माँ, साथ है।”
“देखना, अच्छे से पूजा करना। और आकाश को भी बैठा लेना साथ।”
“हाँ माँ।”
फ़ोन रखा तो आकाश ने बरामदे के खंभे से टिककर मुझे देखा। “माँ ने क्या कहा?”
“कहा तुझे भी साथ बैठाना है पूजा में।”
“बैठ तो रहा हूँ, दीदी। सुबह से बैठा हूँ। बस नज़र नहीं आता।”
सात बजे मैंने थाली सजाई। चाँदी की थाली, उसमें छोटा दीया, करवा, सुहाग की सामग्री, एक लाल चुनरी का टुकड़ा, थोड़ा प्रसाद, और छलनी। आकाश दूसरी थाली में फल और मिठाई रख रहा था, और बार-बार मेरी तरफ़ देख रहा था।
“दीदी, इतनी देर से भूखी हो, चक्कर तो नहीं आ रहे?”
“नहीं। बस सिर ज़रा भारी है।”
“आओ, आप बैठो, मैं थाली लेकर छत पर रख दूँ?”
“नहीं, मैं ही ले जाऊँगी। तुझे दीया नहीं दिखेगा, आँखें ख़राब हैं तेरी।”
वो हँसा — “दीदी, मेरी आँखें तो आज सबसे तेज़ हैं।” और उसका इशारा सीधे मेरे चेहरे से उतरकर मेरी छाती पर आ गया। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
भाग 3 : छत पर चाँद
सवा आठ बजे चाँद निकल आया। आसमान साफ़ था और ठंडी हवा चल रही थी। मैं थाली लेकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। साड़ी में कदम छोटे पड़ रहे थे, इसलिए एक-एक सीढ़ी संभालकर चढ़ रही थी। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
आकाश पीछे-पीछे आया। तीसरी सीढ़ी पर ही उसने बिना पूछे मेरी कमर पर हाथ रख दिया।
“गिर न जाओ, दीदी।”
“कमर पकड़ने से गिरना कम होता है क्या?”
“पक्का नहीं,” वो मुस्कुराया, “पर मज़ा तो आता है।”
छत पर ठंडी हवा ने मेरी साड़ी का पल्लू उड़ा दिया। मैंने दीया जलाया, चारों तरफ़ सुगंध घूमने लगी। फिर छलनी उठाकर चाँद देखने लगी। पड़ोस की छतों पर भी औरतें खड़ी थीं, अपने-अपने थाली लेकर। कहीं दूर पटाखे फूट रहे थे। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
आकाश मेरे पीछे आया और झुककर मेरे कान के पास फुसफुसाया, “अरे, छलनी में चाँद क्या, चाँद तो ये है,” और उसने मेरे कंधे को हल्के से छुआ।
मेरी साँस रुक गई। मैंने पलटकर उसे देखा। उसकी आँखों में वही जवाब था जो चार साल से दबा हुआ था — और आज उसकी हिम्मत जुट चुकी थी।
“दीदी,” उसकी आवाज़ भर्रा गई, “जो माँगना है, माँग ले। आज शुभ दिन है।” पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“जो माँगूँ वो मिल जाएगा?”
“कोशिश करके देख ले।”
और फिर वो मुझसे लिपट गया। छत के उस कोने में, चाँद की ठंडी रोशनी में, हमारे होठ पहली बार मिले। पहला चुंबन झिझक भरा था — दोनों के होठ काँप रहे थे। फिर दूसरा चुंबन, और वो गहरा था। तीसरा तो ऐसा कि जैसे चार साल का सारा इंतज़ार एक-एक होठ के नीचे बह निकला। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
मेरे हाथ उसके बालों में चले गए और उसका एक हाथ मेरी कमर पर, दूसरा मेरे चेहरे पर। वो मेरे होठ चूमता, फिर होंठों के कोनों को, फिर ठुड्डी, फिर कान की लौ, फिर गर्दन। मेरी गर्दन पर जब उसके होठ पड़े, मैंने सिर पीछे झुका दिया और आह भर दी।
“दीदी,” उसने मेरी गर्दन में ही बोला, “सच में… बहुत हसीन हो।”
“तूने आज बहुत इंतज़ार कराया, आकाश।”
“चार साल,” उसने कहा। “चार साल से यही दिन देख रहा था।”
तभी नीचे से पड़ोस की आंटी ने आवाज़ दी — “सुनीता! चाँद देख लिया? व्रत खोलो बेटा!” हम दोनों हड़बड़ाकर अलग हुए, मुँह पोंछा, और हँसने लगे। मैंने जल्दी से चाँद देखा, आकाश की तरफ़ देखा, और पानी पी लिया। मुँह में मिठाई डाली तो लगा — आज मिठाई में भी वो स्वाद था जो पहले कभी नहीं था।
“चलो अंदर,” मैंने फुसफुसाया, “छत पर पड़ोसी देख रहे हैं।”
“तो देखने दो,” उसने कहा और मेरी कलाई पकड़कर नीचे उतरने लगा। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
भाग 4 : कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ
कमरे में पहुँचते-पहुँचते हमारी साँसें भारी हो चुकी थीं। मैंने पीछे पलटकर दरवाज़ा बंद किया और कुंडी चढ़ा दी। वो मेरे पास आया, दोनों हाथों से मेरा चेहरा पकड़ा, और गहरे से चूमने लगा। मेरी पीठ दरवाज़े से टिक गई। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, आज रात मुझे बेड पर ही सोने दो।”
“और मम्मी-पापा?”
“वो जागरण से देर से आएँगे। आ जाओ।”
उसने मुझे गोद में उठा लिया। मैं हल्की थी, और वो जवान। मेरा पल्लू सरक गया, बाल खुल गए, गजरा बेड पर गिर पड़ा और चमेली की महक चारों तरफ़ फैल गई।
वो मुझे बेड पर लिटा दिया। साड़ी का पल्लू पूरा अलग हो चुका था, और टाइट ब्लाउज से निकलती गोरी छाती देखकर उसकी आँखें भर आईं।
“दीदी, चार साल से यही सपना देख रहा हूँ।”
“अब सपना नहीं, बंद कर नज़र और पूरा कर ले।”
उसने पहले मेरे चेहरे को धीरे-धीरे चूमा, फिर मेहंदी वाली हथेलियों को, फिर चूड़ियों वाली कलाइयों को। उसने मेरी चूड़ियों को एक-एक करके उतारा और बेड की तरफ़ के मेज़ पर रख दिया — इतने प्यार से, जैसे कोई रत्न रख रहा हो।
“चूड़ियाँ क्यों उतार दीं?”
“कलाई खरोंच जाएगी ना, दीदी।”
इतनी छोटी सी बात, पर मेरा दिल भर आया। फिर वो मेरी कमर पर आया। साड़ी की सिलवटें ढीली करने लगा। उँगलियाँ जब पेटीकोट के नाड़े पर पहुँचीं, तो ठहर गया और आँखों में पूछा — “आगे?”
“आगे बढ़,” मैंने कहा।
उसने साड़ी खोल दी। पूरी साड़ी बेड पर गिर पड़ी। अब मैं बस ब्लाउज और पेटीकोट में थी। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खुलते गए। हर हुक के साथ मेरा दिल तेज़ धड़कता गया। पाँच हुक — पाँच बार धड़कन। आख़िरी हुक खुला और ब्लाउज खुलकर अलग हो गया। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
वो झुका और मेरी छाती पर सिर रखकर साँस लेने लगा — जैसे सुगंध भर रहा हो। उसकी साँसों की गर्मी कपड़े के ऊपर से भी महसूस हो रही थी।
मैंने पीछे हाथ करके अपनी ब्रा का हुक खोल दिया। “अब तू खोल,” मैंने कहा।
“नहीं, आप खोलो। देखना है।”
मैंने ब्रा खींची। ब्रा बेड पर गिरी और मेरी छाती पूरी खुल गई। गोरी, गोल, बड़ी चूचियाँ, और उनके बीच हल्के गुलाबी निप्पल — जवानी की तपिश से पहले से ही सख़्त। ठंडी हवा लगते ही निप्पल और सख़्त हो गए।
आकाश की साँस अटक गई। “दीदी… ये…”
“देखता रहेगा या छुएगा भी?”
उसने दोनों हाथ बढ़ाए। पहले बाहर से हल्के से सहलाया, फिर पूरी हथेली से भरकर पकड़ा। उसकी हथेली में मेरी चूची पूरी भर गई। उसने मसलना शुरू किया — धीरे-धीरे, फिर ज़ोर से। मेरी पीठ चाप में झुकने लगी। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
फिर वो झुका और मुँह से चूसने लगा। जीभ की नोक से निप्पल के चारों तरफ़ गोल घुमाता, फिर ज़ोर से खींच लेता। एक को चूसता, दूसरे को हाथ से मसलता। फिर पलटकर। मैं बस “आह… आह… आकाश…” कहती जा रही थी।
“दीदी, आपकी चूचियाँ… इतनी मुलायम, और ये निप्पल…” वो बोल नहीं पा रहा था।
“जब जी भर जाए, तब छोड़ना,” मैंने कहा और उसका सिर अपनी छाती पर दबा दिया।
वो पेट पर चूमता हुआ नीचे उतरा। नाभि पर जीभ घुमाई — मेरी नाभि संवेदनशील थी, और मैं झटके से उठ बैठी। “वहाँ मत कर, बहुत गुदगुदी होती है।” वो हँसा और फिर करने लगा, जान-बूझकर।
फिर पेटीकोट का नाड़ा खोला। पेटीकोट सरक गया। अब बस पैंटी। उसने पैंटी के ऊपर से ही हाथ रख दिया। मेरी चूत की गर्मी कपड़े के ऊपर भी साफ़ महसूस हो रही थी।
“दीदी… इतनी गर्म…”
“तो कपड़ा हटा,” मैंने हाँफते हुए कहा।
उसने पैंटी नीचे खींची। मेरी जाँघें फैली थीं और वो दोनों जाँघों के बीच बैठ गया, आँखें गड़ाकर देखने लगा। ऐसे देख रहा था जैसे पहली बार कुछ देखा हो। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, इतनी गीली… पूरा दिन इसी का इंतज़ार कर रही थीं क्या?”
“हाँ,” मैंने बेधड़क कहा। “सुबह तेरे हाथ कमर पर पड़े थे, तभी से। हर बार जब तू पास आता, मेरी चूत एक बूँद बहा देती। पूरे दिन पैंटी भीगती रही। तूने नहीं देखा?”
“देखा,” वो मुस्कुराया, “पर यक़ीन नहीं हुआ।”
“अब यक़ीन कर ले।”
भाग 5 : पहला स्वाद
वो झुककर वहीं चूमने लगा। पहले बाहरी होठों पर हल्के चुंबन, फिर अंदर की दरार पर जीभ। जीभ की नोक ने जब पहली बार छुआ, मेरी रीढ़ टूट गई और मुँह से एक लंबी आह निकली। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
उसने मुँह लगाकर चूसना शुरू किया। फच-फच की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी। मैंने उसके बाल पकड़ लिए और कूल्हे ऊपर उठा दिए। कभी जीभ तेज़, कभी धीमी, कभी दाँतों से हल्का काट, कभी जीभ को अंदर तक डालकर घुमाना। वो जानता था कि कहाँ मज़ा आता है — या शायद वो बस वहीं था जहाँ मुझे चाहिए था।
“आकाश… ऐसे ही… ऐसे ही…”
मेरी टाँगें उसके कंधों पर चढ़ गईं। मैं उसके मुँह पर खुद को दबाने लगी। वो हाँफ रहा था, पर रुका नहीं। दस मिनट तक वो बस चूसता रहा, और मैं एक बार तो कगार तक पहुँच गई, पर रोक लिया। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“अब रुक नहीं सकती,” मैं हाँफते हुए बोली, “अंदर आ जा।”
“दीदी, आप ऊपर आओ ना। देखना है।”
भाग 6 : कपड़े उतर गए
उसने अपनी टी-शर्ट सिर से खींचकर उतारी। सीना चौड़ा, पेट पर हल्के बालों की लकीर, हाथों में नसें उभरी हुईं। फिर पैंट खोली और शॉर्ट्स समेत नीचे कर दी। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
जब लंड बाहर निकला तो मेरी आँखें फैल गईं — गाढ़ा, मोटा, नसों से भरा, और एकदम खड़ा। लंबाई ठीक-ठाक थी, पर मोटाई कमाल की — ऐसा कि देखकर ही चूत में झुरझुरी दौड़ जाए। सिरा लाल-गुलाबी, और नीचे झूलते अंडे भरे हुए।
“दीदी, पसंद आया?” वो शरमाकर बोला।
“बहुत,” मैंने कहा और हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया। पकड़ते ही वो एक झटका खा गया। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, हाथ लगाते ही…”
“तो रुक मत।”
मैंने उसे धीरे-धीरे सहलाया — नीचे से ऊपर तक, हर नस पर उँगली घुमाते हुए। उसकी आँखें बंद हो गईं। सिरे से पहले एक बूँद पानी निकल आया, मैंने उँगली से लेकर उसे मुँह में लगा लिया। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी…”
“हूँ?”
“कुछ नहीं। बस… मर जाऊँगा आज।”
मैं हँस दी। फिर मैंने उसे खींचकर बेड पर लिटा दिया और खुद उसके ऊपर झुक गई। उसके लंड को मुँह में लिया। गले की गहराई तक ले जाती, फिर बाहर लाकर जीभ से नोक पर घुमाती। मेहंदी वाले हाथों से उसकी जाँघों को सहलाती रही। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“ओह दीदी… ओह… ऐसे मत करो, जल्दी निकल जाएगा…”
मैंने रुककर ऊपर देखा। “निकलने दे, अभी तो पूरी रात बाकी है। पहला तो जल्दी निकलेगा ही, फिर असली खेल होगा।”
वो हँसा। “आप भी ना, दीदी।”
“चार साल सूखी रही हूँ, आकाश। अब सब जानती हूँ।”
फिर मैंने फिर से मुँह में लिया, और इस बार तेज़। वो मेरे बालों में हाथ डालकर धीरे-धीरे धक्के दे रहा था। हर धक्के पर मेरी नाभि तक झुरझुरी दौड़ती। फच-फच, फच-फच। मेरी लार उसकी जाँघों पर बहने लगी। करीब पाँच मिनट में वो काँपने लगा। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी… आ रहा है…”
मैंने और गहरा लिया। और फिर उसने मेरे मुँह में ही निकल दिया। गाढ़ा, गर्म, और बहुत। मैंने पूरा पी लिया, और आख़िर में जीभ से साफ़ कर दिया। वो हाँफते हुए बेड पर पड़ा रहा।
“दीदी… आपने तो मार ही डाला।”
“पहला शॉट था, अब दूसरा तेरा।” मैंने कहा और उसके बगल में लेट गई। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
पाँच मिनट बाद वो उठा और मेरे ऊपर आ गया। इस बार लंड फिर खड़ा था — उतना ही मोटा, और शायद ज़्यादा गर्म।
“दीदी, अब अंदर जाना है।”
“हाँ, अब अंदर ही जाना है।”
उसने मेरी दोनों टाँगें कंधों पर उठाईं, लंड का सिरा चूत की दरार पर रखकर रगड़ा — दो-तीन बार ऊपर-नीचे, जिससे मेरी सारी गीलापन सिरे पर लग जाए। फिर एक ज़ोरदार धक्का दिया। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
भाग 7 : पहली बार अंदर
पूरा लंड अंदर समा गया और अंदर की दीवारें जैसे खुद बाहें फैलाकर उसे जकड़ लीं। मैं आह भरकर उठ बैठी और उसके कंधे पकड़ लिए। अंदर इतनी भरावट, इतनी गर्मी — जैसे चार साल की खाली जगह एक झटके में भर गई हो। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, दर्द तो नहीं?”
“दर्द कहाँ, आकाश। चार साल से यही जगह खाली थी। भर दे।”
वो ठहरा रहा, मेरे अंदर पूरा घुसा हुआ, और मुझे चूमने लगा — होठ, गाल, गर्दन। मेरा शरीर ढीला पड़ने लगा। जब मैंने कूल्हे हल्के से हिलाए, तो उसने समझ लिया और धक्के देने शुरू किए। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
पहले धीमे, गहरे धक्के — जैसे नाप-तोल कर अंदर जा रहा हो। पूरा बाहर निकालता, फिर पूरा अंदर। हर धक्के पर मेरी साँस फूलती। फिर रफ़्तार बढ़ी। छप-छप-छप।
मेरे हाथ बेड की चादर भींच रहे थे, और उसके हाथ मेरी दोनों चूचियों को मसल रहे थे। बीच-बीच में वो झुककर निप्पल चूस लेता और मैं और पागल हो जाती।
“आकाश… ज़ोर से… ऐसे ही… आह्ह्ह!”
वो मेरी कमर दबाकर अंदर तक जाता और वहीं घूमा-घुमाकर निकलता। मेरा पूरा शरीर काँप रहा था। पसीने से भीगी मेरी चूचियाँ उसके सीने से चिपक जाती थीं, और चिपचिपी आवाज़ भी होती। गजरे की चमेली और हमारे पसीने की बू मिलकर कमरे में एक और ही माहौल बना रही थी। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, आपकी चूत… इतनी टाइट…”
“तुझे पता है चार साल में किसी ने छुआ तक नहीं।”
“अब रोज़ छूऊँगा,” वो हाँफते हुए बोला। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
उसने गति और तेज़ की। अब धक्के इतने तेज़ थे कि बेड की चारपाई चरमराने लगी। मैंने उसकी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। वो दर्द और मज़े के बीच कराह उठा, पर रुका नहीं।
“कुत्ते की तरह कर ले,” मैंने हाँफते हुए कहा। मुझे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि मायके के बेडरूम में इस तरह बेबाक हो जाऊँगी। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
उसने मुझे पलटकर घुटनों के बल कर दिया। कूल्हे ऊँचे करके पीछे से लंड घुसाया। इस बार और गहरा, और तेज़। हर धक्के पर मेरी चूचियाँ झूलतीं, और मैं सिसकारियाँ भरती। उसने एक हाथ से मेरा कूल्हा पकड़ा और दूसरे से पीछे हल्की थप्पड़ लगाई — चटाक! मैं झटके से आगे को झुक गई। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“फिर मार,” मैं बोली। वो हँसा और फिर मारी। फिर मारी। हर थप्पड़ के साथ मेरी चूत सिकुड़ती और मज़ा दुगना हो जाता।
वो मेरे कान में झुककर बोला, “दीदी, आपकी गांड भी कमाल की है। इसे भी लेना है।”
“तेल ले आ,” मैंने कहा। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
भाग 8 : दोनों जगह
मैंने उसे रसोई से नारियल का तेल मँगाया। वो नंगा ही रसोई तक गया, और एक छोटी कटोरी में तेल ले आया। मैंने उसे देखकर कहा, “कपड़े तो पहन लेता।”
“किसके लिए? घर में बस हम दो हैं।”
फिर वो मेरे पीछे आया। मेरी गांड के छेद पर पहले उँगली से तेल लगाया, फिर अपने लंड पर। उँगली अंदर करके घुमाने लगा — पहले एक, फिर दो। मैं हाँफने लगी। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, ठीक है?”
“हाँ… अब डाल।”
पहला धक्का ज़रा दर्द भरा था — मैं हाँफी और झटके से आगे को झुकी। उसने रुककर इंतज़ार किया, मेरी पीठ पर चूमने लगा, हाथ से चूचियाँ सहलाता रहा। दर्द जाता रहा, और उसकी जगह एक और ही मज़ा भरने लगा — गहरा, खिंचाव भरा, अजीब सा पर नशीला।
“अब… हाँ अब कर,” मैंने कहा।
फिर तो जो चला, वो तब रुका जब दोनों के पसीने की बूँदें बेड पर गिरने लगीं। वो पीछे से धक्के दे रहा था, और मैं आगे से एक हाथ से अपनी चूत को सहला रही थी — दोनों जगह की उत्तेजना मिलकर एक ऐसा तूफ़ान बना रही थी जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
फच-फच-फच। चटाक-चटाक। मेरी सिसकारियाँ, उसकी कराहें, बेड की चरमराहट — पूरा कमरा संगीत से भर गया।
“दीदी… अब… निकल रहा हूँ…”
“अंदर ही… अंदर ही छोड़ दे…”
और फिर उसने आख़िरी, गहरा, काँपता हुआ धक्का दिया। पूरा शरीर झटके खाने लगा। उसकी उँगलियाँ मेरी कमर में धँस गईं। मैं भी उसी वक़्त चरम पर पहुँच गई — पैर सीधे खिंच गए, रीढ़ चाप में झुकी, और मुँह से एक लंबी सिसकारी निकली जो शायद बाहर तक सुनाई दी होगी। वो मेरे ऊपर गिर पड़ा, और दोनों पसीने में लथपथ, हाँफते हुए लेटे रहे। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
कुछ देर बाद उसने मेरे बाल हटाकर माथा चूमा। “दीदी…”
“हूँ?”
“मर गया आज। सच।”
मैं हँस दी। “अभी तो शुरुआत है। पूरी रात बाकी है, और तेरी उम्र बस बाईस है।”
“तो आज रात सोने कौन दे रहा है,” उसने मेरी गर्दन में मुँह गड़ाकर कहा। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
भाग 9 : घंटी बजी
तभी दरवाज़े की घंटी बजी। माँ-पापा लौट आए थे। हम दोनों हड़बड़ाकर उठे। आकाश ने जल्दी से शॉर्ट्स पहनी, टी-शर्ट खींची और कमरे से निकल गया — कपड़े बदलने के लिए, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
मैं जल्दी-जल्दी साड़ी लपेट रही थी। ब्लाउज के हुक ठीक कर रही थी। बाल संवार रही थी। तभी माँ ने अंदर झाँका।
“बेटी, व्रत खोल लिया?”
मैंने झटके से पलटकर आकाश की तरफ़ देखा — वो बरामदे में खड़ा था, और उसकी गर्दन पर मेरे नाखूनों का हल्का निशान था। मैं मुस्कुराकर बोली,
“हाँ माँ। आज जो माँगा था, वो मिल गया।”
माँ ने संतुष्ट होकर सिर हिलाया और अंदर चली गईं। पर आकाश की आँखों में जो शरारत थी, वो कह रही थी — “रात अभी बाकी है।”
और सच भी था। माँ-पापा के सो जाने के बाद, करीब डेढ़ बजे, मेरे कमरे की कुंडी फिर बजी — धीरे से, तीन बार। मैं दरवाज़ा खोलने उठी और मुस्कुरा दी।
आकाश खड़ा था, हाथ में नारियल का तेल की कटोरी, और चेहरे पर वो हँसी। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
“दीदी, दूसरा राउंड?”
“आ जा,” मैंने कहा और उसे अंदर खींच लिया। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदअंत में
अंदर ही अंदर मैं जानती थी — माँ को ये नहीं पता कि उसकी बेटी ने आज करवा चौथ पर सिर्फ़ चाँद नहीं देखा था, अपने भाई को भी पूरा देखा और पाया था। और चाँद ने जो व्रत पूरा कराया, उससे कहीं बड़ा व्रत आकाश ने पूरा किया था — चार साल का। पहले करवा चौथ पर भाई ने बहन को चोदा
उस रात के बाद से हर करवा चौथ, हर तीज, हर त्योहार — मेरे लिए सिर्फ़ पूजा का दिन नहीं रहा। वो हमारा दिन बन गया। और जब भी माँ पूछतीं — “बेटी, दूसरी शादी कब कर रही है?” — मैं बस मुस्कुरा देती हूँ और आकाश की तरफ़ देख लेती हूँ।
क्योंकि अब मुझे पता है — मेरा सुहाग अब किसी गैर के नाम पर नहीं, इसी घर में है।
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