
विधवा भाभी का रहस्य
मैं अपना नाम राजू रखता हूँ। उम्र 28 साल। मैं एक छोटे से शहर में रहता था, जहाँ घर एक-दूसरे से सटे हुए थे। मेरे घर के ठीक बगल में एक विधवा भाभी रहती थीं। उनका नाम सुनीता था। उम्र करीब 32-33 साल। उनके पति की मौत दो साल पहले हो गई थी। तब से वो अकेली रहती थीं। कोई बच्चा नहीं था। विधवा भाभी का रहस्य
सुनीता भाभी गोरी थीं, गेहुँआ रंग, लंबे काले बाल, भारी स्तन, पतली कमर और गोल-मटोल गांड। जब वो साड़ी पहनतीं तो उनकी कमर और गांड की आकृति साफ दिखती थी। साड़ी का पल्लू जब सरक जाता तो गले की हड्डियाँ और स्तनों की ऊपरी गोल रेखा नजर आ जाती थी। उनकी आँखें बड़ी-बड़ी और होंठ मोटे थे।
मेरे घर वाले अक्सर बाहर रहते थे। पापा ऑफिस जाते, मम्मी मार्केट या रिश्तेदारों के यहाँ। मैं घर पर अकेला रहता।
पहली बार मेरी नजर भाभी पर तब पड़ी जब वो सुबह दूध लेने निकली थीं। सफेद साड़ी में, बिना ब्लाउज के सिर्फ साड़ी लपेटी हुई। उनके स्तन साड़ी के अंदर से हिल रहे थे। मैं छत पर था, वो नीचे। मेरी नजर उनके स्तनों पर अटक गई। उन्होंने ऊपर देखा और मुस्कुरा दीं।
उस दिन से मेरी नींद उड़ गई।
एक शाम की बात है। बारिश हो रही थी। मैं घर पर अकेला था। अचानक दरवाजे पर खटखटाहट हुई। खोला तो सुनीता भाभी खड़ी थीं। साड़ी भीग चुकी थी। सफेद साड़ी उनके शरीर से चिपक गई थी। ब्लाउज के बिना उनके गोल-गोल स्तन साफ दिख रहे थे। निप्पल की काली छाया साड़ी पर उभर आई थी। विधवा भाभी का रहस्य
“राजू… बिजली चली गई है मेरे घर में। थोड़ी देर बैठ जाऊँ?”
“हाँ भाभी… आ जाओ।”
वो अंदर आईं। साड़ी पूरी तरह गीली। पानी उनकी गर्दन से स्तनों पर, स्तनों से पेट पर और पेट से नीचे की ओर बह रहा था। मैंने तौलिया दिया।
“सुखा लो भाभी।”
वो तौलिया लेकर बाथरूम गईं। पाँच मिनट बाद निकलीं तो सिर्फ एक पतली पेटीकोट और चोली पहनी हुई थीं। पेटीकोट गीला होने से पारदर्शी हो गया था। उनकी काली झाँट की रेखा साफ नजर आ रही थी। स्तन चोली के अंदर से लगभग बाहर आने को थे। विधवा भाभी का रहस्य
मैं बैठा उनकी तरफ देख रहा था। मेरा लंड पहले ही सख्त हो चुका था।
भाभी मेरे पास सोफे पर बैठ गईं।
“तुम्हारे घर में अच्छा अकेलापन है राजू… मेरे घर में तो सन्नाटा रहता है।”
मैंने हिम्मत करके कहा, “भाभी… आप बहुत अकेली लगती हो।”
वो मेरी आँखों में देखकर बोलीं, “तुम समझते हो क्या?”
फिर उनकी नजर मेरे जाँघ पर पड़ी जहाँ मेरा लंड तना हुआ था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “ये क्या है… इतना सख्त?”
मैं शरमा गया। भाभी ने खुद मेरा हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया।
“छू के देख… दो साल से किसी ने नहीं छुआ।”
उनके स्तन नरम और भारी थे। मैंने चोली के ऊपर से दबाया। निप्पल सख्त हो गए थे। भाभी ने आह भरी।
“और जोर से दबा…”
मैंने चोली ऊपर उठा दी। उनके बड़े-बड़े स्तन बाहर निकल आए। गोल, सफेद, गुलाबी निप्पल। मैंने मुँह लगा दिया। एक निप्पल मुँह में लेकर चूसने लगा, दूसरे को हाथ से मसलने लगा। भाभी की साँस तेज हो गई।
“आह्ह… राजू… ऐसे ही चूस… दो साल बाद कोई चूस रहा है…”
मैंने दोनों स्तनों को मुँह में लेकर चूसा, काटा, चाटा। भाभी की कमर ऐंठने लगी। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर अपनी जाँघों के बीच रख दिया। पेटीकोट के अंदर उनकी चुत पूरी गीली थी। उंगलियाँ घुसाईं तो गरम-गरम पानी जैसा रस लगा।
“अंदर डाल… उंगलियाँ अंदर डाल…”
मैंने दो उंगलियाँ उनकी चुत में घुसा दीं। अंदर दीवारें नरम और गीली थीं। उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। भाभी की टाँगें फैल गईं।
“आह्ह… और तेज… और अंदर…”
मैंने पेटीकोट फाड़ दिया। उनकी चुत बालों से भरी हुई, गुलाबी और गीली। मैंने मुँह लगा दिया। जीभ से उनकी क्लिट चाटने लगा। भाभी ने मेरे बाल पकड़ लिए।
“जीभ अंदर डाल… चुत चाट… आह्ह राजू…”
मैंने जीभ उनकी चुत के अंदर घुसा दी। रस मुँह में आने लगा। मीठा-खट्टा स्वाद। मैंने उनकी गांड भी चाटी। गांड की छेद पर जीभ फेरने लगा। भाभी पागल हो रही थीं।
“अब अपना लंड निकाल… मुझे दिखला…”
मैंने पैंट खोल दी। मेरा लंड 7-8 इंच का, मोटा और सख्त खड़ा था। भाभी ने हाथ से पकड़ लिया।
“इतना मोटा… दो साल बाद इतना बड़ा लंड देख रही हूँ…”
उन्होंने मुँह में ले लिया। होंठों से लंड को चूसने लगीं। जीभ से मोटे सिरे को चाट रही थीं। गले तक ले जा रही थीं। लार टपक रही थी।
“चूस भाभी… और गहरा…”
वो गले तक ले जाकर चूस रही थीं। मैंने उनके बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह में ठोकना शुरू कर दिया। गला भर रहा था उनका। आँखों से पानी आने लगा लेकिन वो रुक नहीं रहीं थीं।
थोड़ी देर बाद भाभी लेट गईं। टाँगें फैला दीं।
“अब डाल… अंदर डाल अपना लंड…”
मैंने लंड उनकी चुत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे धकेल दिया। अंदर जाने पर भाभी जोर से चिल्लाईं।
“आह्ह्ह… इतना मोटा… फट रहा है… लेकिन मत निकाल… और अंदर…”
पूरा लंड अंदर चला गया। उनकी चुत ने कसकर पकड़ लिया। मैंने धीरे-धीरे चलाना शुरू किया। हर धक्के पर उनके स्तन हिल रहे थे। मैंने स्तन मुँह में ले लिए और जोर-जोर से चोदने लगा।
“और जोर से… मार… अपनी विधवा भाभी को चोद…”
मैंने उनकी टाँगें कंधों पर रख दीं और गहराई तक ठोकने लगा। चुत की आवाज “छपाक-छपाक” हो रही थी। रस नीचे तक बह रहा था।
“आह्ह राजू… और तेज… मुझे आज पूरा चोद ले…”
मैंने उन्हें घुमाकर कुत्ते की तरह कर दिया। गांड ऊपर की तरफ। मैंने पीछे से लंड अंदर डाला और जोर-जोर से मारने लगा। एक हाथ से उनके बाल पकड़े, दूसरे से गांड थपथपाई।
“तेरी गांड कितनी गोल है भाभी…”
मैंने लार लगाकर उनकी गांड की छेद में उंगली घुसा दी। भाभी चीख पड़ीं लेकिन मना नहीं किया।
“गांड भी चोदना है क्या… तो चोद ले…”
मैंने लंड निकालकर गांड की छेद पर रखा। धीरे-धीरे धकेलना शुरू किया। भाभी की गांड बहुत टाइट थी। आधे तक अंदर गया तो उन्होंने जोर से चिल्लाया।
“आह्ह्ह… फट गई… लेकिन मत रोक… पूरा डाल…”
पूरा लंड गांड में घुस गया। मैंने धीरे-धीरे चलाना शुरू किया। थोड़ी देर बाद तेज। भाभी तकिये में मुँह दबाकर चीख रही थीं।
“मार… अपनी भाभी की गांड मार… आह्ह…”
मैंने दोनों जगह बारी-बारी चोदा। कभी चुत, कभी गांड। भाभी कई बार झड़ चुकी थीं। उनका शरीर पसीने से तर था। स्तन, पेट, जाँघें सब गीले।
आखिर में मैंने उनकी चुत में ही झड़ने का मन बनाया। जोर-जोर के धक्के दिए और पूरा वीर्य उनकी चुत के अंदर उड़ेल दिया। गरम-गरम वीर्य अंदर जाते ही भाभी फिर से काँप उठीं।
हम दोनों थककर लेट गए। भाभी ने मेरा लंड हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगीं।
“आज के बाद रोज आना राजू… मेरी प्यास नहीं बुझी…”
उस रात हमने तीन बार और किया।
सुबह होने से पहले भाभी अपने घर चली गईं। लेकिन उसके बाद लगभग हर रात वो आतीं। कभी साड़ी में, कभी सिर्फ पेटीकोट में, कभी नंगी।
एक दिन उन्होंने कहा, “आज मैं तुम्हें पूरा चूसना चाहती हूँ… मुँह में लेना चाहती हूँ तुम्हारा वीर्य।”
वो घुटनों के बल बैठ गईं और मेरे लंड को दोनों हाथों से पकड़कर चूसने लगीं। गले तक ले जा रही थीं। जब मैं झड़ने वाला था तो उन्होंने मुँह नहीं हटाया। पूरा वीर्य उनके मुँह में चला गया। उन्होंने निगल लिया और जीभ निकालकर दिखाया।
“देख… सब पी गई…”
कभी वो मुझे अपनी छातियों के बीच लंड रखवातीं और स्तनों से दबा-दबाकर हिलातीं। कभी मैं उन्हें गोद में बिठाकर चोदता। कभी दीवार से सटाकर।
एक बार उन्होंने कहा, “आज गांड में पूरा डाल और निकालना मत… अंदर ही झड़।”
मैंने उनकी गांड में पूरा लंड घुसाया और जोर-जोर से मारा। जब झड़ा तो पूरा वीर्य उनकी गांड के अंदर चला गया। भाभी लेटी रहीं और बोलीं, “अब अंदर ही रहने दो… अच्छा लग रहा है।”
दिन बीतते गए। हमारी मुलाकातें और गंदी होती गईं। कभी मैं उन्हें बाथरूम में चोदता, कभी छत पर रात में, कभी कार में।
भाभी एक दिन बोलीं, “राजू… मुझे लग रहा है मैं तुम्हारी हो गई हूँ… मेरी चुत, मेरी गांड, मेरे स्तन… सब तुम्हारे हैं।”
मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया और फिर से चोदना शुरू कर दिया।
उस रात के बाद से सुनीता भाभी और मेरे बीच कोई रोक-टोक नहीं रही।
अगली शाम को ही वो फिर आईं। इस बार दरवाजा खोलते ही उन्होंने खुद अपना पल्लू गिरा दिया। साड़ी के नीचे सिर्फ एक पतली सफेद पेटीकोट थी, ब्लाउज नहीं। उनके बड़े-बड़े स्तन साड़ी के अंदर से हिल रहे थे। निप्पल पहले से ही सख्त थे।
“आज पूरा नंगा कर दे मुझे राजू… आज मैं तेरी पूरी रंडी बनना चाहती हूँ।”
मैंने साड़ी खींचकर फर्श पर गिरा दी। पेटीकोट भी नीचे सरका दिया। भाभी बिल्कुल नंगी खड़ी थीं। गोल-मटोल स्तन, थोड़ा लटकते हुए, गुलाबी-काले निप्पल। पेट सपाट, कमर पतली, और नीचे घनी काली झाँट। झाँट के बीच उनकी चुत की लिपें पहले से ही थोड़ी खुली और चमक रही थीं। गांड गोल और कसी हुई।
मैंने उन्हें सोफे पर लिटा दिया। टाँगें फैला दीं।
पहले मैंने उनके स्तनों पर हमला किया। दोनों हाथों से मसलते हुए एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। दाँत से हल्के-हल्के काटा। भाभी की कमर उछलने लगी।
“आह्ह… और जोर से चूस… निप्पल काट… हाँ ऐसे…”
दूसरे स्तन को भी मुँह में लिया। दोनों स्तनों को एक साथ दबाने की कोशिश की। जीभ से निप्पल के चारों तरफ गोलाई में चाटा, फिर जोर से खींचा। भाभी की साँस फूलने लगी। उनके स्तनों से हल्की खुशबू आ रही थी – साबुन और पसीने की मिली-जुली।
फिर मैं नीचे गया। उनकी जाँघों को और फैलाया। चुत बिल्कुल पास से देखी। बाहरी लिपें मोटी और काली, अंदर की लिपें गुलाबी और गीली। क्लिट पहले से ही सूजी हुई थी। मैंने अंगूठे से क्लिट को दबाया और गोलाई में घुमाया।
“आह्ह राजू… वहाँ… ठीक वहाँ रगड़…”
मैंने जीभ निकालकर पहले बाहरी लिपों को चाटा। फिर जीभ को बीच में डालकर अंदर की दीवारों को चाटने लगा। रस पहले से ही बह रहा था – गाढ़ा, थोड़ा खट्टा-मीठा। मैंने पूरा मुँह चुत पर लगा दिया और जोर-जोर से चूसा। जीभ को अंदर जितना हो सके गहराई तक घुसाया। साथ में दो उंगलियाँ भी अंदर डाल दीं और ऊपर की तरफ उस जगह को रगड़ने लगा जहाँ से भाभी काँप जाती थीं।
भाभी की दोनों टाँगें मेरे सिर पर आ गईं। उन्होंने मेरे बाल पकड़ लिए।
“जीभ और तेज… उंगलियाँ और अंदर… आह्ह मैं झड़ने वाली हूँ…”
मैंने रफ्तार बढ़ा दी। जीभ और उंगलियाँ दोनों एक साथ काम कर रहे थे। अचानक भाभी की कमर जोर से उछली, उनकी चुत ने मेरी उंगलियों को कस लिया और गरम-गरम पानी जैसा रस मेरे मुँह और ठुड्डी पर बह निकला। वो जोर-जोर से काँप रही थीं।
“आह्ह्ह… झड़ गई… माँ… कितना जोर से झड़ी…”
मैं रुका नहीं। रस को चाटते हुए फिर से चुत चाटने लगा। भाभी संवेदनशील हो चुकी थीं, हल्के स्पर्श से भी काँप रही थीं।
अब मैं खड़ा हुआ। पैंट खोली। मेरा लंड पहले से ही इतना सख्त था कि दर्द हो रहा था। नसें फूली हुईं, सिर चमक रहा था। भाभी ने खुद हाथ बढ़ाकर पकड़ लिया।
“इतना गरम और सख्त… आज इसे अपनी चुत में पूरा लेना है…”
वो खुद लेटीं और टाँगें अपने कंधों तक खींच लीं। चुत पूरी तरह खुल गई। मैंने लंड का मोटा सिरा उनकी चुत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे धकेलना शुरू किया।
पहले सिरा अंदर गया। भाभी की आँखें बंद हो गईं।
“आह्ह… मोटा है… धीरे…”
मैंने और धकेला। आधा लंड अंदर चला गया। उनकी चुत की दीवारें मुझे कसकर पकड़ रही थीं – गरम, गीली और टाइट। फिर एक जोर का धक्का और पूरा लंड अंदर तक घुस गया। मेरी झाँट उनकी झाँट से मिल गई।
“आह्ह्ह्ह… पूरा अंदर है… फट रही हूँ… लेकिन मत निकाल…”
मैंने रुककर उन्हें साँस लेने दी। फिर धीरे-धीरे बाहर खींचा और फिर जोर से अंदर मारा। हर धक्के पर उनके बड़े स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने दोनों स्तनों को पकड़कर मसलते हुए चोदना शुरू किया।
“और जोर से मार… अपनी विधवा भाभी की चुत फाड़ दे…”
मैंने रफ्तार बढ़ा दी। छपाक-छपाक की आवाज पूरे कमरे में गूँजने लगी। रस इतना बह रहा था कि मेरी झाँट और अंडकोष गीले हो गए थे। मैंने उनकी टाँगें और फैला दीं और गहराई तक ठोकने लगा। हर धक्के पर भाभी की आह निकल रही थी।
थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें घुमाया। कुत्ते की पोजीशन। गांड मेरे सामने। गोल, सफेद, और बीच में गुलाबी छेद। मैंने पहले चुत में फिर से लंड डाल दिया और जोर-जोर से पीछे से मारने लगा। एक हाथ से उनके बाल पकड़े, दूसरे हाथ से गांड के दोनों पालों को फैलाकर देखा।
“तेरी गांड कितनी अच्छी है भाभी…”
मैंने लार थूककर गांड की छेद पर लगाई और एक उंगली धीरे से अंदर घुसा दी। भाभी की गांड बहुत टाइट थी। उंगली अंदर जाते ही उन्होंने जोर से आह भरी।
“आह्ह… गांड में उंगली… और अंदर डाल…”
मैंने दूसरी उंगली भी डाल दी। दोनों उंगलियों को अंदर-बाहर करने लगा जबकि लंड उनकी चुत में जोर-जोर से चल रहा था। भाभी पागल हो रही थीं।
“अब लंड गांड में डाल… आज गांड भी फाड़…”
मैंने लंड चुत से निकाला। पूरा चमक रहा था उनके रस से। गांड की छेद पर रखा और धीरे-धीरे दबाव डाला। सिरा अंदर गया। भाभी ने तकिया मुँह में दबा लिया।
“आह्ह्ह… दर्द हो रहा है… लेकिन डाल… पूरा डाल…”
मैंने धीरे-धीरे और धकेला। आधा लंड गांड में चला गया। उनकी गांड की दीवारें मुझे कसकर जकड़ रही थीं – चुत से भी ज्यादा टाइट। फिर एक जोर का धक्का और पूरा लंड उनकी गांड में समा गया।
“आह्ह्ह्ह… फट गई… माँ… पूरा अंदर है…”
मैंने रुककर उन्हें आदत डलवाई। फिर धीरे-धीरे चलाना शुरू किया। हर धक्के पर उनकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे लंड को निचोड़ रही थीं। मैंने रफ्तार बढ़ा दी। एक हाथ से उनके बाल पकड़े हुए जोर-जोर से गांड चोदने लगा। दूसरे हाथ से उनकी चुत में उंगलियाँ घुमा रहा था।
भाभी जोर-जोर से चीख रही थीं लेकिन मना नहीं कर रही थीं।
“मार… और जोर से मार… अपनी भाभी की गांड चोद… आह्ह…”
मैंने बहुत देर तक गांड मारी। फिर लंड निकालकर फिर से चुत में डाल दिया। बारी-बारी से दोनों छेदों को चोदता रहा। कभी चुत, कभी गांड। भाभी कई बार झड़ चुकी थीं। उनका शरीर पसीने से चमक रहा था। बाल बिखरे हुए, स्तन लाल, जाँघों के अंदर का हिस्सा गीला।
आखिर में मैंने उन्हें फिर से पीठ के बल लिटाया। टाँगें कंधों पर रखीं और चुत में पूरा लंड घुसाकर जोर-जोर के अंतिम धक्के देने लगा।
“अंदर झड़ूँगा भाभी…”
“हाँ… अंदर डाल… पूरा वीर्य अपनी भाभी की चुत में उड़ेल दे…”
मैंने आखिरी जोरदार धक्के दिए और पूरा गरम-गरम वीर्य उनकी चुत के अंदर छोड़ दिया। इतना ज्यादा कि बाहर भी निकलने लगा। भाभी की चुत ने मेरे लंड को निचोड़-निचोड़कर सारा वीर्य सोख लिया। वो खुद भी फिर से काँपते हुए झड़ गईं।
हम दोनों थककर एक-दूसरे से चिपके लेटे रहे। मेरा लंड अभी भी उनकी चुत के अंदर था, धीरे-धीरे ढीला हो रहा था। वीर्य उनकी जाँघों पर बह रहा था।
भाभी ने मेरे कान में फुसफुसाया,
“आज तो तूने मुझे पूरा तोड़ दिया राजू… लेकिन कल फिर आना। कल मैं तुझे अपनी छातियों के बीच ले जाऊँगी, मुँह में ले जाऊँगी, और फिर से गांड और चुत दोनों में ले जाऊँगी… जब तक तू थक न जाए।”
मैंने उनके स्तनों को सहलाते हुए कहा, “कल से भी ज्यादा जोर से चोदूँगा भाभी।”
वो मुस्कुराईं और मेरे लंड को अपनी चुत से निकालकर हाथ में ले लिया। अभी भी आधा सख्त था। उन्होंने धीरे से सहलाते हुए कहा,
“देख… फिर से खड़ा हो रहा है। आज रात अभी खत्म नहीं हुई…”
फिर उन्होंने अपना मुँह नीचे किया और मेरे लंड को, जो उनके रस और मेरे वीर्य से चमक रहा था, साफ करते हुए चूसने लगीं…
अगली रात।
घर में फिर अकेलापन था। मैंने पहले से तैयारी कर रखी थी। एक मोटी लेकिन नरम रस्सी (दरअसल पुरानी साड़ी के टुकड़ों से बनी मजबूत रस्सी) बिस्तर के पास रखी थी।
सुनीता भाभी आईं। इस बार काली साड़ी में। दरवाजा बंद होते ही उन्होंने खुद साड़ी और पेटीकोट उतार दिए। बिल्कुल नंगी खड़ी हो गईं। स्तन भारी, निप्पल सख्त, चुत पहले से ही हल्की गीली।
मैंने रस्सी उठाई। भाभी की नजर पड़ते ही उनकी साँस तेज हो गई।
“आज… बाँधोगे मुझे?”
“हाँ भाभी। आज तुम्हें पूरी तरह काबू में लेकर चोदूँगा। जब तक मैं चाहूँ, तुम हिल भी नहीं पाओगी।”
भाभी की आँखों में उत्तेजना चमक उठी। उन्होंने खुद दोनों हाथ आगे कर दिए।
मैंने पहले उनके दोनों हाथों को पीठ के पीछे ले जाकर रस्सी से कसकर बाँध दिया। गाँठ मजबूत। फिर उन्हें बिस्तर पर लिटाया। टाँगें फैलाईं और दोनों टखनों को भी रस्सी से बाँध दिया – एक-एक टखना बिस्तर के दोनों कोनों से। अब उनकी चुत और गांड पूरी तरह खुली और बेबस थी। हाथ पीठ के नीचे दबे हुए।
भाभी लेटी हुई थीं – नंगी, बाँधी हुई, साँस तेज। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे।
“राजू… मैं बिलकुल बेबस हूँ अब… जो चाहे कर…”
मैंने पहले उनके स्तनों पर झुका। दोनों निप्पलों को मुँह में लेकर जोर-जोर से चूसा, काटा, खींचा। भाभी की कमर उछलने की कोशिश कर रही थी लेकिन रस्सी ने उन्हें जकड़ रखा था। वो सिर्फ काँप सकती थीं।
“आह्ह… जोर से चूस… निप्पल काट… आह्ह मैं कुछ नहीं कर सकती…”
मैंने उनके स्तनों को मसलते हुए नीचे गया। खुली हुई चुत पर मुँह लगा दिया। जीभ से क्लिट को तेजी से चाटा, फिर जीभ अंदर घुसाकर दीवारों को चाटने लगा। दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं और जोर-जोर से ऊपर की तरफ रगड़ने लगा।
भाभी की टाँगें रस्सी में कसी हुई होने के कारण और ज्यादा फैल नहीं सकती थीं। वो सिर्फ काँप रही थीं और आहें भर रही थीं।
“जीभ… और तेज… उंगलियाँ और अंदर… आह्ह मुझे झड़ने दो…”
मैंने नहीं झड़ने दिया। ठीक जब वो चरम के करीब थीं, मैंने मुँह और उंगलियाँ हटा लीं। भाभी छटपटाईं।
“नहीं… मत रोक… मुझे झड़ने दे…”
मैं मुस्कुराया। “आज तुम्हारी इजाजत से नहीं, मेरी मर्जी से झड़ोगी।”
फिर मैं खड़ा हुआ। पैंट खोली। लंड पूरी तरह तना हुआ, नसें फूली हुईं। मैंने लंड उनके चेहरे के पास ले जाकर होंठों पर रगड़ा।
“मुँह खोल भाभी।”
उन्होंने मुँह खोला। मैंने लंड अंदर ठेल दिया। गले तक। भाभी की आँखें पानी से भर गईं लेकिन उन्होंने गले को ढीला रखा। मैंने उनके बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह में ठोकना शुरू कर दिया। गला भर रहा था, लार बह रही थी, आवाजें “घप-घप” हो रही थीं।
थोड़ी देर बाद लंड निकाला। लार से चमक रहा था।
अब मैं उनकी खुली चुत के बीच में आ गया। लंड का सिरा चुत पर रखा और एक ही जोर के धक्के में पूरा अंदर धकेल दिया।
“आह्ह्ह्ह…!” भाभी जोर से चिल्लाईं। रस्सी में बँधे होने की वजह से वो पीछे नहीं हट सकती थीं। पूरा लंड एकदम गहराई तक घुस गया।
मैंने बिना रुके जोर-जोर से चलाना शुरू कर दिया। हर धक्का इतना तेज था कि उनके स्तन जोर-जोर से हिल रहे थे। रस्सी की गाँठें उनके टखनों में धंस रही थीं।
“मार… और जोर से मार… मैं बाँधी हुई हूँ… फाड़ दे मेरी चुत…”
मैंने उनकी कमर पकड़कर और तेज धक्के दिए। छपाक-छपाक की आवाज तेज हो गई। रस बह-बहकर बिस्तर गीला कर रहा था। मैंने एक हाथ से उनके बाल पकड़े और दूसरे से स्तन मसलते हुए चोदता रहा।
थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला। भाभी की चुत खुली रह गई थी, रस से चमक रही थी।
अब मैंने उनकी गांड की तरफ ध्यान दिया। थोड़ी तकिया उनकी कमर के नीचे लगाकर गांड को और ऊपर कर दिया। गांड की छेद साफ दिख रही थी। मैंने लार थूककर उंगली से छेद को गीला किया, फिर दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं।
“आह्ह… गांड में… और अंदर…”
उंगलियाँ अंदर-बाहर करते हुए मैंने लंड फिर से उनकी चुत में डाल दिया। अब एक साथ चुत में लंड और गांड में उंगलियाँ। भाभी पागल हो रही थीं।
“दोनों जगह… आह्ह… बहुत हो रहा है…”
मैंने उंगलियाँ निकालकर लंड को गांड की छेद पर रखा। धीरे से दबाव दिया। सिरा अंदर गया। भाभी ने जोर से दाँत पीस लिए।
“आह्ह्ह… दर्द… लेकिन मत रोक… पूरा डाल…”
मैंने धीरे-धीरे पूरा लंड उनकी गांड में धकेल दिया। रस्सी में बँधी होने की वजह से वो हिल नहीं सकती थीं। पूरा लंड गांड में समा गया।
फिर मैंने जोर-जोर से गांड चोदनी शुरू कर दी। हर धक्के पर उनकी गांड की मांसपेशियाँ मेरे लंड को निचोड़ रही थीं। मैंने एक हाथ से उनकी चुत में उंगलियाँ घुमा रखी थीं।
“देख भाभी… तू पूरी तरह बाँधी हुई है… चुत और गांड दोनों मेरी मर्जी से चुद रही हैं…”
भाभी सिर्फ कराह रही थीं। आँखें बंद, मुँह खुला, पसीना बह रहा था।
मैंने बहुत देर तक गांड मारी। फिर लंड निकालकर फिर चुत में डाल दिया। बारी-बारी से दोनों छेदों को बेरहमी से चोदता रहा। भाभी कई बार झड़ने के करीब आईं लेकिन मैं हर बार रोक देता।
आखिर में जब मुझे खुद झड़ने का मन हुआ तो मैंने उनकी चुत में पूरा लंड घुसाकर जोर-जोर के अंतिम धक्के दिए।
“अंदर ले… पूरी तरह बाँधी हुई अपनी भाभी की चुत में वीर्य डाल…”
मैंने गरम-गरम वीर्य की धार उनकी चुत के अंदर छोड़ दी। इतना ज्यादा कि बाहर निकलकर उनकी गांड और जाँघों पर बहने लगा। भाभी भी उसी समय जोर से काँपते हुए झड़ गईं। उनकी चुत मेरे लंड को निचोड़ रही थी।
मैं लंड अंदर रखे हुए ऊपर गिरा। दोनों हाँफ रहे थे।
थोड़ी देर बाद मैंने रस्सी खोली। भाभी के हाथ और टखने लाल हो गए थे। उन्होंने मुझे कसकर गले लगा लिया।
“आज… तूने मुझे सच में अपनी रंडी बना दिया राजू… बाँधकर चोदना… बहुत अच्छा लगा…”
उनके शरीर से पसीना और वीर्य की महक आ रही थी। मैंने उनके स्तन सहलाते हुए कहा,
“अगली बार और कसकर बाँधूँगा। और देर तक चोदूँगा।”
भाभी मुस्कुराईं। उनका हाथ मेरे लंड पर चला गया जो अभी भी आधा सख्त था।
“फिर से खड़ा कर… इस बार मैं खुद ऊपर बैठूँगी… लेकिन हाथ बाँधकर…”
उसके अगले दिन शाम को।
मैंने घर में एक मजबूत लकड़ी की कुर्सी बिछा दी। कुर्सी की पीठ ऊँची थी, हाथ रखने की जगह और टाँगों के लिए नीचे जगह। रस्सी पहले से तैयार थी – मोटी, नरम लेकिन बहुत मजबूत।
सुनीता भाभी आईं। इस बार लाल रंग की साड़ी में। दरवाजा बंद होते ही उनकी नजर कुर्सी और रस्सी पर पड़ी। आँखें चमक उठीं।
“आज… कुर्सी पर बाँधोगे?”
“हाँ भाभी। आज तुम्हें कुर्सी से इस तरह बाँधूँगा कि न तो टाँगें बंद कर पाओगी, न हाथ हिला पाओगी। पूरी तरह खुली और बेबस।”
भाभी ने खुद साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट सब उतार दिए। बिल्कुल नंगी खड़ी हो गईं। स्तन भारी और निप्पल पहले से सख्त। चुत की लिपें हल्की चमक रही थीं।
मैंने उन्हें कुर्सी पर बैठाया। पीठ कुर्सी की पीठ से सटा दी। पहले उनके दोनों हाथों को कुर्सी के पीछे ले जाकर रस्सी से कसकर बाँध दिया। गाँठ इतनी मजबूत कि हाथ हिल भी न सकें।
फिर उनकी दोनों टाँगें कुर्सी की टाँगों के बाहर निकालकर फैला दीं और टखनों को कुर्सी की टाँगों से बाँध दिया। अब उनकी जाँघें पूरी तरह खुली हुई थीं। चुत और गांड बिलकुल बेपर्दा और आसानी से पहुँच में।
आखिर में एक और रस्सी उनके पेट के चारों तरफ लपेटकर कुर्सी से बाँध दी ताकि वो आगे-पीछे भी न हिल सकें।
अब सुनीता भाभी पूरी तरह कुर्सी से बँधी हुई थीं – नंगी, टाँगें फैली हुई, हाथ पीठ के पीछे, स्तन आगे को निकले हुए, चुत खुली और बेबस।
“राजू… मैं पूरी तरह तेरे काबू में हूँ… जो चाहे कर मेरे साथ…”
मैं उनके सामने खड़ा हो गया। पैंट उतार दी। लंड पहले से तना हुआ। मैंने लंड उनके चेहरे के पास ले जाकर होंठों और गालों पर रगड़ा।
“मुँह खोल।”
भाभी ने मुँह खोला। मैंने लंड अंदर ठेल दिया। गले तक। फिर उनके बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह में ठोकने लगा। कुर्सी से बँधी होने की वजह से वो सिर भी ज्यादा नहीं हिला सकती थीं। सिर्फ गला भर रहा था, लार बह रही थी, आँखों से पानी आ रहा था।
“घप-घप-घप…” आवाजें पूरे कमरे में गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद लंड निकाला। लार से लिसलिसा।
अब मैं नीचे झुका। उनकी खुली चुत के बिल्कुल सामने। जीभ निकालकर पहले क्लिट को तेजी से चाटा। फिर पूरी जीभ चुत के अंदर घुसा दी। उंगलियाँ भी अंदर डालकर जोर-जोर से ऊपर की तरफ रगड़ने लगा।
भाभी कुर्सी पर छटपटा रही थीं लेकिन रस्सी ने उन्हें जकड़ रखा था। सिर्फ स्तन हिल रहे थे और कराहें निकल रही थीं।
“आह्ह… जीभ और अंदर… उंगलियाँ… मत रोक… मुझे झड़ने दे…”
मैंने ठीक चरम के पहले मुँह हटा लिया। भाभी हताश होकर कराहने लगीं।
“नहीं… मत छोड़… प्लीज…”
मैं मुस्कुराया। “आज मेरी मर्जी से झड़ोगी भाभी।”
फिर मैं खड़ा हुआ। लंड उनकी चुत के मुँह पर रखा। एक ही जोर के धक्के में पूरा अंदर धकेल दिया।
“आह्ह्ह्ह…!”
कुर्सी हिल गई। पूरा लंड गहराई तक घुस गया। मैंने उनकी कमर पकड़कर जोर-जोर से चलाना शुरू कर दिया। हर धक्के पर कुर्सी की लकड़ी की आवाज आ रही थी। उनके स्तन जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रहे थे। रस बह-बहकर कुर्सी की सीट गीली कर रहा था।
“मार… और जोर से… कुर्सी से बाँधकर चोद… फाड़ दे मेरी चुत…”
मैंने रफ्तार बहुत तेज कर दी। छपाक-छपाक की आवाज तेज हो गई। एक हाथ से उनके स्तन मसल रहा था, दूसरे से क्लिट रगड़ रहा था। भाभी बार-बार झड़ने के करीब आ रही थीं लेकिन मैं हर बार थोड़ा धीमा कर देता।
थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला। उनकी चुत खुली रह गई, रस टपक रहा था।
अब मैंने कुर्सी को थोड़ा पीछे की तरफ झुकाया (कुर्सी ऐसी थी कि झुक सकती थी) और उनकी गांड को और आसानी से पहुँच में कर दिया। लार थूककर गांड की छेद को गीला किया। पहले दो उंगलियाँ अंदर घुसाईं, फिर लंड का सिरा रखा और धीरे-धीरे दबाव दिया।
“आह्ह्ह… गांड में… धीरे… लेकिन पूरा डाल…”
सिरा अंदर गया। फिर आधा। फिर एक जोर का धक्का और पूरा लंड उनकी गांड में समा गया।
“आह्ह्ह्ह… फट गई… माँ…”
मैंने गांड में जोर-जोर से चलाना शुरू कर दिया। कुर्सी हिल रही थी। भाभी की आँखें बंद थीं, मुँह खुला, पसीना बह रहा था। मैंने एक हाथ से उनकी चुत में उंगलियाँ घुमा रखी थीं।
“देख… कुर्सी से बँधी हुई अपनी भाभी की गांड चुद रही है… चुत में उंगलियाँ भी हैं…”
मैंने बहुत देर तक गांड मारी। फिर लंड निकालकर फिर चुत में डाल दिया। बारी-बारी से दोनों छेदों को बेरहमी से चोदता रहा। कभी चुत में गहराई तक, कभी गांड में पूरा।
भाभी कई बार काँप चुकी थीं। उनका शरीर पसीने से चमक रहा था। रस्सी उनके हाथों और टखनों में धंस रही थी।
आखिर में जब मुझे झड़ने का मन हुआ तो मैंने उनकी चुत में पूरा लंड घुसाकर अंतिम जोरदार धक्के दिए।
“अंदर ले… कुर्सी से बँधी हुई अपनी भाभी की चुत में पूरा वीर्य उड़ेल…”
मैंने गरम-गरम वीर्य की धार उनके अंदर छोड़ दी। इतना ज्यादा कि बाहर निकलकर उनकी गांड और कुर्सी पर बहने लगा। उसी समय भाभी भी जोर से काँपते हुए झड़ गईं। उनकी चुत मेरे लंड को कसकर निचोड़ रही थी।
मैं थोड़ी देर लंड अंदर रखे हुए खड़ा रहा। दोनों हाँफ रहे थे।
फिर मैंने धीरे-धीरे रस्सी खोली। भाभी के हाथ और टखने लाल हो गए थे। जैसे ही मुक्त हुईं, उन्होंने मुझे कसकर गले लगा लिया। शरीर अभी भी काँप रहा था।
“आज… कुर्सी पर बाँधकर चोदना… बहुत अलग और गहरा लगा राजू… मैं पूरी तरह तेरी थी… कुछ नहीं कर सकती थी…”
मैंने उनके गीले स्तनों को सहलाते हुए कहा, “अगली बार और कसकर बाँधूँगा। और देर तक दोनों जगह चोदूँगा।”
भाभी की आँखों में अभी भी उत्तेजना थी। उन्होंने मेरे लंड को हाथ में लिया जो अभी भी उनके रस और वीर्य से चमक रहा था।
“फिर से खड़ा कर… इस बार मैं कुर्सी पर ही बैठकर ऊपर से लूँगी… लेकिन हाथ बाँधकर…”
कुर्सी वाली रात के बाद सुनीता भाभी और मेरे बीच सब कुछ बदल चुका था।
अब वो सिर्फ पड़ोस की विधवा भाभी नहीं रह गई थीं। वो मेरी हो चुकी थीं – शरीर से, मन से, हर तरह से।
उस रात रस्सी खोलने के बाद हम दोनों बिस्तर पर लेट गए। भाभी अभी भी काँप रही थीं। उनके शरीर पर रस्सी के निशान थे – हाथों पर, टखनों पर, पेट पर। मैंने उन निशानों को धीरे-धीरे चूमना शुरू किया।
“दर्द तो नहीं हो रहा भाभी?”
वो मुस्कुराईं। आँखें आधी बंद।
“दर्द हो रहा है… लेकिन अच्छा दर्द है। आज पहली बार लगा कि मैं सच में किसी की हूँ।”
मैंने उन्हें अपनी बाँहों में खींच लिया। उनके बड़े स्तन मेरे सीने से चिपक गए। मेरा लंड अभी भी उनके रस और वीर्य से गीला था, उनके पेट से छू रहा था।
भाभी ने धीरे से कहा,
“राजू… दो साल से मैं अकेली थी। रातें काटनी मुश्किल हो गई थीं। तुमने मुझे फिर से जिंदा कर दिया। मेरी चुत, मेरी गांड, मेरे स्तन… सब तुम्हारे हो गए हैं।”
मैंने उनके होंठों को चूम लिया। लंबा, गहरा चुंबन। जीभ से जीभ मिल गई।
उस रात हमने आखिरी बार धीरे-धीरे प्यार किया। कोई जल्दबाजी नहीं, कोई रस्सी नहीं, कोई कुर्सी नहीं। सिर्फ दो शरीर। मैं उनके ऊपर था। लंड धीरे-धीरे उनकी चुत में जाता और निकलता। उनके स्तन मुँह में थे। वो मेरे बाल सहला रही थीं।
जब दोनों झड़े तो एक-दूसरे से चिपके रह गए।
सुबह होने से पहले भाभी उठने लगीं। मैंने हाथ पकड़ लिया।
“जा रही हो?”
वो मुस्कुराईं।
“जा रही हूँ… लेकिन वापस आऊँगी। रोज आऊँगी। जब तक तुम चाहोगे।”
उन्होंने अपने कपड़े पहने। दरवाजे पर खड़ी होकर पीछे मुड़ीं।
“राजू… तुमने एक विधवा को फिर से औरत बना दिया। ये शरीर अब सिर्फ तुम्हारा है। जब चाहो, जैसे चाहो… बाँधो, चोदो, इस्तेमाल करो।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस उन्हें देखा।
दरवाजा बंद हुआ।
उस दिन के बाद सुनीता भाभी मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गईं। कभी रात को चुपके से आतीं, कभी दोपहर में जब घर खाली होता। कभी रस्सी लेकर, कभी कुर्सी पर बैठने को कहतीं, कभी खुद ऊपर बैठकर अपना लंड अंदर लेतीं।
लेकिन सबसे ज्यादा वो उन रातों को याद रखतीं जब मैं उन्हें पूरी तरह बेबस करके चोदता था।
और मैं… मैं एक पड़ोसी लड़के से उनकी पूरी दुनिया बन गया था।
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