नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
मैं हर दिन मेट्रो से नोएडा से द्वारका जाता था। सुबह 8 बजे की भीड़, लोगों की धक्का-मुक्की, और वही रूटीन। लेकिन एक दिन कुछ अलग हुआ। नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
राजीव चौक स्टेशन पर मैंने उसे पहली बार देखा। वो नीली कुर्ती में थी, बाल खुले, चेहरे पर हल्का मेकअप। उसका फिगर औसत था, लेकिन चेहरे का कट बहुत खूबसूरत था – गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें, होंठ जो हमेशा मुस्कुराते हुए लगते थे।
लेकिन उस दिन वो मुस्कुरा नहीं रही थी। उसका बॉयफ्रेंड था साथ में, और दो-तीन दोस्त। वो उसे कुछ कह रहा था, और वो शर्मिंदा हो रही थी।
“देखो इसे,” बॉयफ्रेंड ने ज़ोर से कहा, “कितनी सादी लगती है ना? मैंने कहा था ना कुछ अच्छा पहनो, लेकिन यह तो…”
उसके दोस्त हंसने लगे। लड़की का चेहरा लाल हो गया, आँखें नीचे कर लीं।
मुझे बहुत बुरा लगा। मैं पास में ही खड़ा था। मन किया कुछ कहूँ, लेकिन मैं अजनबी था। मैंने बस उसकी तरफ देखा और एक हल्की सी मुस्कान दी – जैसे कह रहा हूँ, “कोई बात नहीं, तुम ठीक हो।” नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने भी हल्की सी मुस्कान दी।
तभी मैंने देखा उसकी एक सहेली मुझे घूर रही थी। मैंने नज़रें हटा लीं।
मुझे नोएडा से द्वारका जाना था, लेकिन उनको पहले उतरना था। जब वो उतरी, मैंने देखा वो सहेली मुझे फिर से देख रही थी।
भाग 2: अक्सर मुलाकातें
अगले कुछ हफ्तों में मैं उन्हें अक्सर देखने लगा। कभी-कभी वो लड़की अकेली होती, कभी उसकी सहेलियों के साथ। वो बॉयफ्रेंड अब नहीं दिखता था।
मैं उसे देखता, वो भी मुझे देखती। लेकिन बात नहीं हो पाती थी। मैं सोचता, “कैसे शुरू करूँ? क्या कहूँ?”
उसकी वो सहेली जो मुझे घूरती थी, वो अक्सर मुस्कुराती। शायद उसे पता था कि मैं उसकी दोस्त को पसंद करता हूँ।
मैंने पता लगाया – उसका नाम प्रिया था। और उसकी सहेली, जो मुझे घूरती थी, उसका नाम नेहा था।
भाग 3: पैर पर पैर – शुरुआत
फिर वो दिन आया। मेट्रो में भीड़ थी, जैसे हमेशा होती है। मैं खड़ा था, और प्रिया मेरे पास ही थी।
अचानक मेट्रो वालों ने बहुत तेज़ ब्रेक मारी। मैं आगे की तरफ गिरा, और मेरा पैर सीधा प्रिया के पैर पर पड़ा।
“ओह! सॉरी, सॉरी!” मैंने तुरंत कहा, पैर हटाते हुए।
प्रिया ने दर्द से अपना पैर उठाया, लेकिन फिर मुस्कुराई, “कोई बात नहीं, गलती से हो गया।”
“नहीं, माफ़ कीजिए, बहुत ज़ोर से लगा,” मैंने कहा।
“सच में कोई बात नहीं,” उसने कहा, और फिर शरमाते हुए, “आप… आप मुझे देखते हैं ना रोज़?”
मैं चौंक गया। “मैं… मतलब…”
“मैंने नोटिस किया है,” उसने कहा, “आप मुझे देखते हैं। और मैं भी…”
मेरी धड़कन तेज़ हो गई। “मैं… मैं अर्जुन हूँ,” मैंने अपना नाम बताया।
“प्रिया,” उसने कहा। नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
“मुझे पता है,” मैंने कहा, फिर रुक गया। “मतलब… मैंने सुना था किसी को आपका नाम लेते हुए।”
नेहा, जो पास में खड़ी थी, मुस्कुराई। “आखिरकार,” उसने कहा।
भाग 4: राजीव चौक पर कॉफी
अगले दिन। राजीव चौक स्टेशन पर मैंने हिम्मत की।
“प्रिया,” मैंने कहा, “क्या… क्या आप कॉफी पीना चाहेंगी? यहीं पास में एक अच्छा कैफे है।”
उसने नेहा की तरफ देखा। नेहा ने आँखें घुमाई, जैसे कह रही हो, “जा ना!”
“ठीक है,” प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा।
हम कैफे में बैठे। पहली बातचीत। अजीब सी, हिचकिचाहट भरी।
“वो दिन…” मैंने शुरू किया।
“कौन सा दिन?” प्रिया ने पूछा।
“जब आपका… जब वो आपको…”
“अच्छा, वो,” प्रिया का चेहरा उतर गया, “वो अब एक्स नहीं है।”
“मुझे बुरा लगा था,” मैंने कहा, “जब वो आपको…”
“आपने मुस्कुराई थी,” प्रिया ने कहा, “मुझे याद है। उसी दिन मुझे लगा कि कोई तो है जो…”
हम दोनों चुप हो गए।
“क्या आप सिंगल हैं?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा, “आप?”
“मैं भी।”
कॉफी आई। हम बातें करते रहे। दो घंटे। फिर उसे जाना था। नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
“कल फिर मिलें?” मैंने पूछा।
“मेट्रो में?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।
“नहीं, यहीं। जानबूझकर।”
“ठीक है,” उसने कहा।
भाग 5: धीरे-धीरे करीब
अगले महीने। हम अक्सर मिलने लगे थे। राजीव चौक, कनॉट प्लेस, हौज़ खास। घूमना, बातें करना, एक-दूसरे को जानना।
एक दिन शाम को। हम हौज़ खास गए थे। झील के पास बैठे थे।
“अर्जुन,” प्रिया ने कहा, “मैं… मैं कुछ कहना चाहती हूँ।”
“क्या?”
“मुझे लगता है… मुझे आप से…”
मैंने इंतज़ार नहीं किया। मैंने आगे बढ़कर उसके होंठों पर चुंबन कर दिया।
हल्का, पहला, शर्मीला। फिर वो भी जवाब देने लगी।
“उम्म्ह…” उसने हल्की सी आवाज़ निकाली।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “बस… बहुत अच्छा लग रहा है।”
भाग 6: पहली बार – मेरे अपार्टमेंट में
दो हफ्ते बाद। प्रिया मेरे अपार्टमेंट में आई थी। मैं अकेला रहता था, नोएडा सेक्टर 62 में।
वो पीली ड्रेस में थी। मैंने उसके लिए खाना बनाया था।
खाने के बाद, सोफे पर बैठे। फिल्म चल रही थी, लेकिन हम एक-दूसरे को देख रहे थे। नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
“प्रिया,” मैंने कहा।
“हाँ?”
“मैं… मैं आपको छू सकता हूँ?”
उसने जवाब नहीं दिया। बस अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया।
मैंने उसे अपनी ओर खींचा। वो मेरी गोद में आ गई। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और चुंबन किया। इस बार गहरा, लंबा।
“आह…” उसने सांस छोड़ी।
मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर फेरे। पीली ड्रेस के ऊपर से। फिर नीचे सरके।
“मैं… मैं इसे उतारू?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने शरमाते हुए कहा।
मैंने उसकी ड्रेस के कंधे से पट्टी नीचे की। एक, फिर दूसरा। ड्रेस नीचे सरकी। वो अपने हाथ ऊपर उठाई। ड्रेस उतर गई।
अब वो सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। सफेद रंग की।
“आप… आप बहुत सुंदर हैं,” मैंने कहा।
“आप भी…” उसने कहा।
मैंने उसे उठाया और बेडरूम में ले गया।
भाग 7: कपड़े उतरते हैं
बेडरूम में। मैंने लाइट डिम की।
प्रिया खड़ी थी। मैंने उसके पीछे गया और ब्रा का हुक खोला। ब्रा खुली। उसने आगे झुककर उसे निकाला।
उसके स्तन बाहर आए – गोल, भरे हुए, निप्पल गुलाबी और कड़े।
“सुंदर…” मैंने कहा।
मैंने अपनी शर्ट उतारी। फिर जींस। अब मैं भी सिर्फ अंडरवियर में था। मेरा लिंड पहले से ही कठोर हो चुका था, एक साफ उभार।
“वाह…” प्रिया ने नीचे देखा। नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
मैंने उसकी पैंटी नीचे की। उसकी योनी सामने आई – थोड़ी घनी झांटें, गुलाबी, गीली।
“खूबसूरत…” मैंने कहा।
मैंने अपना अंडरवियर नीचे किया। मेरा लिंड बाहर आया – लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ।
“कितना बड़ा है…” प्रिया ने कहा।
भाग 8: पहली चुदाई
मैंने प्रिया को बिस्तर पर लिटाया। वो पैर फैलाकर लेट गई।
मैं उसके बीच में आया। अपने लिंड को उसकी योनी पर रखा।
“धीरे से…” उसने कहा।
मैंने धीरे से दबाया। टॉप अंदर गया।
“उह्ह…” हम दोनों ने एक साथ कहा।
थोड़ा और… और अंदर… प्रिया की योनी बहुत तंग थी, गर्म थी।
“आह… बड़ा है…” उसने कहा।
मैंने एक ज़ोरदार झटके में पूरा अंदर डाल दिया।
“भर गई…” उसने कहा, “पूरी…”
मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। ऊपर-नीचे।
“आह… हाँ… ऐसे ही…” उसने कहा।
“आप… आप इतनी तंग हैं…” मैंने कहा।
“आपका… आपका लिंड… बहुत अच्छा है…” उसने कहा।
मेरी गति बढ़ गई। मैं अब तेज़ी से धक्के लगा रहा था। नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
“और तेज़… और तेज़…” उसने कहा, “उई… आह… ओह माय गॉड…”
“फक मी… तेज़ फक मी…” उसने कहा, “मेरी चूत… मेरी चूत को फाड़ दो…”
मैंने पूरी ताकत लगा दी। बिस्तर की चरपराहट, हमारी सांसें, उसकी आवाज़ें।
“मैं… मैं झड़ने वाली हूँ…” उसने कहा।
“मैं भी…” मैंने कहा।
“अंदर… अंदर ही… प्लीज़…”
हम दोनों एक साथ झड़ गए। मेरी गर्म तरल उसकी योनी में भर गई।
भाग 9: दूसरा दौर – प्रिया की गांड
कुछ देर बाद। हम एक-दूसरे में लिपटे हुए थे।
“अर्जुन,” प्रिया ने कहा।
“हाँ?”
“मैं… मैं कुछ और चाहती हूँ,” उसने शरमाते हुए कहा।
“क्या?”
“मैंने कभी… पीछे से नहीं किया,” उसने कहा, “लेकिन आपके साथ… मैं चाहती हूँ…”
मैंने उसे देखा। “क्या… क्या यह दर्द नहीं देगा?”
“थोड़ा… लेकिन आप धीरे से करिएगा…”
प्रिया ने पेट के बल लेट गई। मैंने उसकी गांड पर थूक लगाया, फिर उंगली से फैलाया।
“उह्ह…” उसने कहा।
मैंने अपने लिंड पर तेल लगाया। फिर टॉप को उसकी गांड पर रखा।
“धीरे…” उसने कहा।
मैंने धीरे से दबाया। टॉप अंदर गया। नोएडा से द्वारका तक की चुदाई
“आह्ह… बड़ा है…” उसने कहा।
थोड़ा-थोड़ा करके, पूरा अंदर।
“भर गई…” उसने कहा।
मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। फिर तेज़।
“ओह्ह… यह… यह अलग है…” उसने कहा, “और तेज़… मेरी गांड मारो… तेज़…”
“उई… आह… ओह माय गॉड…” उसने कहा।
“मैं… मैं झड़ने वाला हूँ…”
“अंदर… मेरी गांड में ही…”
मैंने एक ज़ोरदार धक्का लगाया और झड़ गया।
आज भी, जब मैं मेट्रो में जाता हूँ, मुझे वो दिन याद आता है। वो पैर पर पैर, वो माफ़ी, वो पहली मुस्कान।