अंजलि और राजीव — एक रात, जो कभी खत्म नहीं हुई
भाग १: भीड़ के छंटने के बाद
रात के ग्यारह बज चुके थे। दांडिया ग्राउंड की तरफ से ढोल और बैंड की आवाज़ अब धीमी पड़ने लगी थी। पहले जो हज़ारों की भीड़ कलर-फुल चनिया-चोली और कुर्तों में झूम रही थी, वो अब धीरे-धीरे अपने-अपने घरों की तरफ खिसक रही थी। पंडाल के बाहर लगी रंग-बिरंगी लाइटें अब और भी ज़्यादा चमक रही थीं, क्योंकि अंधेरा गहरा हो गया था और लाइटों के सिवा कुछ दिखता ही नहीं था। दांडिया की रात : चेकिंग डेस्क से बिस्तर तक
चेकिंग डेस्क पर बैठी अंजलि ने अपने पैरों को थोड़ा फैलाया और लंबी सांस ली। पूरी शाम खड़े-खड़े उसकी एड़ियाँ दुख रही थीं। उसके हाथ में रजिस्टर था, जिसमें उसे हर आने-जाने वाले का नाम, फ्लैट नंबर और फोन नंबर लिखना पड़ता था। रात के इस वक्त भी कुछ लोग आ रहे थे — कुछ तो अभी-अभी आए थे और कुछ जा रहे थे।
“अंजलि दीदी, ये आख़िरी लिस्ट है क्या?” एक सिक्योरिटी गार्ड ने पूछा।
“नहीं भाई, अभी और भी आएँगे। बारह बजे तक चलता है ना ये सब।” अंजलि ने थकी हुई मुस्कान के साथ कहा।
उसने अपनी नज़र उठाई और सामने खड़े आदमी को देखा। राजीव। वो आज पूरी शाम से यहीं आस-पास ही घूम रहा था। असल में वो कुछ ज़्यादा ही घूम रहा था — पंडाल के अंदर, बाहर, पार्किंग की तरफ, फिर वापस। अंजलि ने देखा था कि वो कई बार चेकिंग डेस्क के पास से गुज़रा था, लेकिन हर बार कुछ और देखने-सा दिखावा करके निकल गया था। अब जब भीड़ कम हो गई थी, तब वो सीधा डेस्क के सामने आकर खड़ा हो गया था।
“अंजलि… जी, वो सोसाइटी की रेजिडेंट लिस्ट… ढूँढनी है मुझे। किसी का नाम है, पर फ्लैट नंबर पता नहीं है।” राजीव ने थोड़ा हकलाते हुए कहा।
अंजलि ने उसे देखा। राजीव लंबा, दुबला-पतला सा लड़का था, मगर उसके चेहरे पर एक अजीब-सी गंभीरता थी, जो उसकी उम्र से ज़्यादा बड़ी लगती थी। उसकी आँखों में एक हल्का-सा अकेलापन था, जो अंजलि ने पहली नज़र में ही पहचान लिया था। शायद इसलिए, क्योंकि अंजलि खुद भी अकेली थी।
“हाँ, बताइए नाम?” अंजलि ने रजिस्टर पलटते हुए पूछा।
“शर्मा… वो… मिसेज शर्मा। फ्लैट नंबर भूल गया।”
“शर्मा तो बहुत हैं सोसाइटी में। पूरा नाम?”
राजीव झेंप गया। “वो… बस शर्मा ही पता है। शायद… ए-विंग में होंगी।”
अंजलि हँस पड़ी। “ए-विंग में बीस शर्मा हैं। आप किस काम से गए थे उनके घर?”
“मतलब… ऑफिस का सिलसिला था।” राजीव ने झूठ बोला, जबकि असल में वो सोसाइटी में अंजलि को देखने ही आया था। उसे पता था कि अंजलि यहाँ चेकिंग डेस्क पर होती है, क्योंकि उसने पिछले दो साल से यही दांडिया डेकोरेशन की सेवा दी थी।
“ठीक है, रुकिए।” अंजलि ने रजिस्टर में पन्ने पलटे। “ए-विंग, ब्लॉक-२… शर्मा, सुनीता… शर्मा, राकेश… शर्मा, मंजू…” वो बुदबुदाती रही।
राजीव डेस्क पर झुककर देखने लगा। उसकी कोहनी डेस्क पर टिक गई और उसकी आँखें रजिस्टर पर थीं, मगर उसका ध्यान अंजलि के चेहरे पर था। अंजलि के माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें थीं, जो उसने शाम भर की मेहनत से बहाई थीं। उसकी चोटी थोड़ी ढीली हो गई थी और चेहरे पर बिखरी कुछ लटें उसकी गर्दन को छू रही थीं। राजीव की साँस अचानक भारी हो गई।
“ये देखिए — शर्मा, अनिता, ए-२०३। यही होंगी शायद।” अंजलि ने कहा और उसने नज़र उठाकर राजीव को देखा। दोनों की आँखें मिलीं। एक पल के लिए कोई नहीं बोला।
“हाँ… यही होंगी।” राजीव ने धीरे से कहा।
वो दोनों एक पल चुप रहे। दूर पंडाल में ढोल की आख़िरी थाप पड़ी, फिर सन्नाटा। गार्ड ने अपनी टॉर्च ऑफ कर दी। लाइटें भी एक-एक करके बंद होने लगीं। पंडाल के किनारे लगी म्यूज़िक सिस्टम की आवाज़ बंद हुई, और तब एक अजीब-सा खालीपन चारों तरफ फैल गया — जैसे पूरा मैदान अचानक अपनी ही साँस सुनने लगा हो।
“आप… आप भी थक गए होंगे। इतनी देर खड़े थे।” अंजलि ने कहा।
“नहीं, कोई बात नहीं।” राजीव ने कहा, “आप तो और ज़्यादा थकी होंगी। पूरी शाम से यहाँ बैठी हैं।”
“हाँ, थकान तो है।” अंजलि ने कहा और उसने अपनी गर्दन को इधर-उधर घुमाया। “अब तो बस सोना है।”
“घर कितनी दूर है आपका?”
अंजलि हँसी। “घर? घर तो बहुत दूर है। मैं तो यहीं सोसाइटी के सर्वेंट क्वार्टर में रहती हूँ। ऐसे ही रहती हूँ, किराए पर। अकेली हूँ।”
“अकेली?” राजीव ने पूछा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी गर्मी थी।
“हाँ, अकेली। फैमिली तो गाँव में है। यहाँ काम के लिए आई हूँ। पाँच साल से।”
राजीव ने गहरी साँस ली। “मैं भी अकेला हूँ। बिल्कुल अकेला। बस ऑफिस और घर। और कभी-कभार ये दांडिया।”
दोनों फिर चुप हो गए। अंजलि ने रजिस्टर बंद कर दिया और उसे डेस्क के एक कोने पर रख दिया। पंडाल के अंदर अब सिर्फ दो-तीन ट्यूबलाइट जल रही थीं। कुर्सियों की कतारें सूनी पड़ी थीं। मंच पर बैठे स्पीकरों की झालरें झूल रही थीं।
“बैठिए कुछ देर।” अंजलि ने पास पड़ी एक कुर्सी की तरफ इशारा किया। “अब भीड़ भी नहीं है। थोड़ा सुकून मिलेगा।”
राजीव ने कुर्सी खींची और बैठ गया। दोनों की कुर्सियाँ आमने-सामने थीं, बस थोड़ी सी तिरछी। पंडाल की खुली छत से चाँद की रोशनी आ रही थी, जो अंजलि के चेहरे पर एक अजीब-सी सफेद आभा बिखेर रही थी। राजीव उसे देखता रहा। अंजलि ने पलकें झुका लीं।
“आप ऐसे क्यों देखते हैं?” अंजलि ने पूछा।
“कैसे?”
“ऐसे… जैसे कुछ ढूँढ रहे हों मेरे चेहरे में।”
राजीव मुस्कुराया। “शायद ढूँढ ही रहा हूँ।”
“क्या?”
“अपना अकेलापन।” राजीव ने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि अंजलि को लगा जैसे वो हवा में तैर गई हो।
अंजलि एक पल को स्तब्ध रह गई। किसी ने उससे इस तरह बात नहीं की थी। पाँच साल में किसी ने उससे ये नहीं पूछा था कि वो कैसे रहती है, किसके साथ रहती है, क्या सोचती है। सब बस नाम पूछते थे, फ्लैट पूछते थे, चाबी माँगते थे। राजीव ने पहली बार उससे… उसकी तरफ से… पूछा था।
“आपको कैसे पता कि मैं भी अकेली हूँ?” अंजलि ने धीरे से पूछा।
“पता नहीं।” राजीव ने कहा, “बस… आपकी आँखों में वो देखा जो मेरी आँखों में है। एक अजीब-सी खाली जगह। जो कोई नहीं भर पाया अभी तक।”
अंजलि ने अपनी नज़र राजीव की आँखों में डाल दी और उसे टटोलती रही। राजीव की आँखें सच कह रही थीं। उनमें कोई दिखावा नहीं था।
“पाँच साल हो गए यहाँ।” अंजलि बोली, “कभी किसी ने नहीं कहा कि ‘आप कैसे हो?’ हर कोई बस काम की बात करता है। सुबह से शाम। कमरा, खाना, सोना। और यही दांडिया। हर साल। और हर साल के बाद… फिर वही अकेलापन।”
राजीव ने अपनी कुर्सी थोड़ी आगे खिसकाई। अब दोनों के घुटने लगभग छू रहे थे।
“मेरी भी हालत यही है।” राजीव ने कहा, “ऑफिस में लोग हैं, दोस्त हैं, पर… कोई अपना नहीं है। शाम को घर आता हूँ तो सिर्फ दीवारें हैं। खाना मैगी या फिर बाहर का। कोई पूछने वाला नहीं कि खाया या नहीं। कोई पूछने वाला नहीं कि आज कैसा रहा दिन।”
“और यहाँ क्यों आए? इतनी रात को?”
राजीव ने नज़रें झुकाईं। “सच कहूँ?”
“हाँ।”
“आपको देखने।” राजीव ने कहा।
अंजलि के चेहरे पर हल्की लालिमा फैल गई। “मुझे?”
“हाँ। पिछले साल भी देखा था आपको। इस डेस्क पर। और तब से… बस… मन करता था कि बात करूँ। पर हिम्मत नहीं हुई। इस साल तो आने का बहाना ही नहीं मिल रहा था। इसलिए शर्मा जी का बहाना बनाया।”
अंजलि ज़ोर से हँस पड़ी। उसकी हँसी इतनी साफ़ थी कि पंडाल के सन्नाटे में गूँज उठी।
“तो शर्मा जी की तलाश में थे? और अब? मिल गए शर्मा जी?”
“शर्मा जी तो बहाना हैं।” राजीव ने कहा, “मिल तो आपसे हुआ है।”
अंजलि ने अपनी नज़र उठाई। दोनों की आँखें मिलीं और इस बार कोई नहीं हटा। एक लंबा, गहरा मौन। पंडाल की लाइटों में से एक-एक करके और बुझती गईं। अब बस चाँद और तारे बाकी थे। और दो जोड़ी आँखें, जो एक-दूसरे को ढूँढ रही थीं।
अंजलि ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया। राजीव ने देखा और अपना हाथ भी बढ़ा दिया। दोनों हाथ मिले। अंजलि की उँगलियाँ राजीव की हथेली पर पड़ीं। गर्म, नरम। राजीव ने उसे कसकर पकड़ लिया।
“हाथ ठंडे हैं आपके।” राजीव ने धीरे से कहा।
“और आपके हाथ गर्म हैं।” अंजलि बोली, “अजीब बात है। रात में भी।”
“शायद आपको गर्मी देने के लिए।”
अंजलि मुस्कुराई। राजीव ने उसकी हथेली को दोनों हाथों में ले लिया और उसके ऊपर अपनी उँगलियाँ फेरने लगा। अंजलि की साँस थोड़ी भारी हो गई।
“आप ऐसे ही हाथ पकड़ते हैं हमेशा?” अंजलि ने पूछा।
“नहीं। पहली बार पकड़ा है किसी का हाथ।”
“झूठ।”
“सच।”
अंजलि ने अपना हाथ राजीव की हथेली से खींचा और उसके गाल पर रख दिया। राजीव की आँखें फैल गईं। अंजलि का हाथ उसके गाल पर ठहर गया। उसने अंजलि को देखा। अंजलि ने उसके गाल पर अपना अंगूठा धीरे-धीरे फेरा।
“आप भी अकेले हैं।” अंजलि ने कहा, “मैं जानती हूँ। और आपने मुझे पहचाना। बस इसलिए… कि हम एक जैसे हैं।”
राजीव ने अपनी आँखें बंद कर लीं। अंजलि का हाथ उसके गाल पर गर्मी दे रहा था। उसने धीरे से अंजलि की कलाई पकड़ी और उसके हाथ को हटाया, और फिर उसे अपने होंठों के पास ले गया। अंजलि की हथेली पर एक हल्का-सा चुंबन रखा। अंजलि ने महसूस किया कि राजीव के होंठ गर्म थे, नरम थे, और उसकी हथेली पर उनका स्पर्श एक बिजली-सी दौड़ा गया।
“राजीव…” अंजलि ने फुसफुसाया।
“अंजलि…” राजीव ने कहा, “क्या हम… कहीं और चल सकते हैं? यहाँ पंडाल भी बंद हो रहा है।”
अंजलि ने इधर-उधर देखा। गार्ड अपनी चौकी पर बैठकर ऊँघ रहा था। सारी लाइटें बंद हो चुकी थीं। सिर्फ मंच पर लगी एक छोटी-सी लाइट जल रही थी।
“कहाँ?” अंजलि ने पूछा।
“मेरा फ्लैट पास ही है। सोसाइटी के बाहर, पाँच मिनट का रास्ता। चलोगी?”
अंजलि एक पल रुकी। फिर मुस्कुराई। “चलो।”
दोनों उठे। अंजलि ने अपना रजिस्टर गार्ड को दिया और कहा कि वो थोड़ी देर में आएगी। गार्ड ने ऊँघते हुए सिर हिलाया। फिर दोनों पंडाल से बाहर निकले। रात की ठंडी हवा ने उन्हें घेर लिया। सड़क सूनी थी। दूर कहीं एक कुत्ता भौंक रहा था। अंजलि और राजीव चल पड़े, बिना बात किए, बस एक-दूसरे की परछाइयों को देखते हुए।
रास्ते में राजीव ने धीरे से अंजलि का हाथ पकड़ लिया। अंजलि ने कोई विरोध नहीं किया। उलटे उसने अपनी उँगलियाँ राजीव की उँगलियों में फँसा दीं।
भाग २: फ्लैट में
राजीव के फ्लैट में घुसते ही एक अजीब-सी खुशबू आई — इलेक्ट्रिक-की बासी हवा, चाय की पत्ती, और किसी अकेले आदमी के घर की वो खालीपन भरी महक। अंजलि ने इधर-उधर देखा। एक छोटा-सा हॉल, एक सोफ़ा, एक टेबल, दो कुर्सियाँ। दीवार पर एक घड़ी, जो रात के साढ़े ग्यारह बजा रही थी। और एक टीवी, जो बंद था। कोनों में धूल की हल्की परत जमी थी।
“माफ़ करना, थोड़ा बिखरा है।” राजीव ने कहा।
“अकेले आदमी का घर ऐसा ही होता है।” अंजलि ने कहा, “यहाँ तो फिर भी ठीक है। मेरे कमरे में तो…”
वो मुस्कुराई और बोली, “आप चाय बनाएँगे या कॉफ़ी?”
“जो कहो।”
“चाय।”
राजीव रसोई में गया। अंजलि सोफ़े पर बैठ गई। सोफ़े की स्प्रिंग थोड़ी दबी हुई थी, पर बैठने में आरामदायक थी। अंजलि ने अपने पैर सोफ़े पर लंबे किए और आँखें बंद कर लीं। पूरे दिन की थकान अचानक उसके शरीर में घुल गई। उसे लगा जैसे वो सालों से इस सोफ़े पर बैठी है।
राजीव चाय लेकर आया। दो कप। एक अंजलि को दिया, एक खुद लिया। वो टेबल की दूसरी तरफ की कुर्सी पर बैठ गया। अंजलि ने चाय का घूँट भरा और उसकी गर्माहट को अपने गले में उतरते महसूस किया।
“अच्छी बनाई है।” अंजलि ने कहा।
“बस चाय ही बना पाता हूँ।” राजीव ने कहा।
“अच्छी बात है। कम से कम इतना तो आता है।”
दोनों चुपचाप चाय पीते रहे। चाय के साथ-साथ एक अजीब-सी नज़दीकी बढ़ती गई। अंजलि ने अपना कप टेबल पर रखा। राजीव ने भी रखा। फिर अंजलि ने धीरे से कहा —
“राजीव, ये सोफ़ा… थोड़ा छोटा है ना?”
राजीव ने देखा। “हाँ, है तो छोटा।”
“आप यहाँ आ जाइए। कुर्सी पर क्यों बैठे हैं? यहाँ भी जगह है।”
राजीव एक पल झिझका। फिर उठा और सोफ़े पर आ बैठा। अंजलि के पैरों की तरफ। दोनों के बीच अब बस कुछ इंच की दूरी थी। अंजलि ने अपने पैर समेटे और थोड़ा सीधी बैठ गई। राजीव उसके बगल में बैठ गया। अब उनके कंधे लगभग छू रहे थे।
“राजीव…” अंजलि ने धीरे से कहा, “आपने कभी सोचा… कि अकेलापन इतना भारी क्यों होता है?”
“बहुत सोचा है।” राजीव ने कहा, “और हर बार लगा कि इसका जवाब किसी इंसान में है। किसी ऐसे में, जो सुन सके।”
“और क्या मिला?”
“नहीं मिला। अब तक।” राजीव ने कहा और उसने अंजलि की तरफ देखा। “आज तक।”
अंजलि ने उसकी तरफ देखा। राजीव की आँखें अब चमक रही थीं — शायद चाँद की रोशनी से, शायद उसकी अपनी आँखों के पानी से। अंजलि ने अपना हाथ बढ़ाया और उसके हाथ पर रख दिया।
“आज मिल गया?” अंजलि ने पूछा।
राजीव ने उसकी तरफ देखा। उसके होंठ हल्के से काँपे। फिर उसने धीरे से कहा, “शायद।”
अंजलि मुस्कुराई। “तो ढूँढना बंद कर दो।”
फिर दोनों के बीच वो पल आया जब सब कुछ रुक जाता है। राजीव ने अंजलि की तरफ झुकना शुरू किया। अंजलि ने भी। उनके चेहरे धीरे-धीरे पास आने लगे। अंजलि की साँस राजीव के चेहरे पर पड़ रही थी। राजीव की साँस अंजलि के होंठों को छू रही थी। दूरी कुछ इंच से कम होती गई। फिर…
भाग ३: पहला चुंबन
राजीव के होंठ अंजलि के होंठों पर पड़े। पहले बस एक हल्का-सा स्पर्श। जैसे कोई गर्म पंख अचानक होठों पर आ टिका हो। अंजलि की साँस रुक गई। उसने आँखें बंद कर लीं। राजीव ने भी। दोनों के होंठ एक-दूसरे पर ठहर गए, बिना हिले, बस टिके हुए। एक लंबा, स्थिर, गर्म पल।
फिर राजीव ने अपने होंठ हल्के से हिलाए। अंजलि के निचले होंठ को धीरे से चूमा। फिर ऊपरी होंठ को। फिर दोनों को। अंजलि की साँस अब राजीव के मुँह में जा रही थी। राजीव की साँस अंजलि के मुँह में। दोनों की साँसें एक हो गईं। अंजलि ने अपने होंठ थोड़े खोले और राजीव के होंठों को अंदर लेने लगी। राजीव ने भी अपने होंठ खोले और अंजलि के होंठों को धीरे-धीरे चूसने लगा।
चुंबन अब गहरा होने लगा। राजीव ने अंजलि का निचला होंठ अपने दाँतों के बीच धीरे से दबाया और फिर उसे छोड़ दिया। अंजलि के शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई। उसने राजीव की गर्दन के पीछे अपनी उँगलियाँ फेरीं। राजीव ने अपनी बाँहें अंजलि की कमर के चारों तरफ लपेट दीं और उसे अपनी तरफ खींच लिया। अंजलि का शरीर राजीव से चिपक गया।
अंजलि ने अपनी जीभ धीरे से बाहर निकाली और राजीव के होंठों के बीच डाल दी। राजीव की जीभ ने उसे रोका, फिर उसे अपने मुँह में खींचा। दोनों की जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं। एक धीमा, मीठा, गहरा खेल। अंजलि के मुँह में राजीव की जीभ का स्वाद फैल रहा था — चाय की हल्की कड़वाहट और उसके होंठों की मिठास। राजीव को अंजलि की जीभ में एक अजीब-सी मिठास लगी — शायद मिठाई की, शायद उसके होंठों की।
चुंबन लंबा होता गया। राजीव की साँस भारी हो गई। अंजलि की भी। दोनों कभी-कभी साँस लेने के लिए होंठ अलग करते और फिर तुरंत जुड़ जाते। अंजलि की उँगलियाँ राजीव के बालों में फँस गईं और वो उन्हें सहलाने लगी। राजीव की एक हथेली अंजलि की पीठ पर ऊपर-नीचे फिरने लगी।
फिर राजीव ने चुंबन तोड़ा। अंजलि ने आँखें खोलीं। राजीव उसे देख रहा था। अंजलि की आँखें थोड़ी भीगी थीं, होंठ थोड़े सूजे हुए और चमकदार। राजीव ने उसके माथे पर एक हल्का चुंबन रखा।
“अंजलि…” राजीव ने फुसफुसाया।
“हूँ…” अंजलि ने धीरे से कहा।
“तुम बहुत सुंदर हो।”
अंजलि ने शरमाकर नज़र झुका ली। “बस… बहुत दिनों बाद किसी ने कहा।”
“तो अब हर दिन कहूँगा।”
अंजलि हँसी। “वादा मत करो।”
“करता हूँ।”
फिर राजीव ने अंजलि का चेहरा दोनों हाथों में थाम लिया और उसके गाल पर चुंबन करने लगा। पहले दाएँ गाल पर, फिर बाएँ गाल पर। हर चुंबन धीमा, गहरा और भरा हुआ। उसने अंजलि के गाल की नरम त्वचा को होंठों से छुआ, फिर उसी जगह को जीभ से हल्के से चाटा। अंजलि की आँखें बंद हो गईं और वो राजीव के सहारे झूलने लगी।
“उफ़…” अंजलि ने धीरे से कहा, “राजीव…”
राजीव ने अंजलि के गाल से होंठ हटाए और उसकी गर्दन की तरफ बढ़ा। अंजलि की गर्दन की त्वचा नरम और गर्म थी। राजीव ने उसके गले पर एक हल्का चुंबन रखा। अंजलि की साँस हकलाई।
“आह…” अंजलि ने धीरे से आवाज़ निकाली।
राजीव ने उसकी गर्दन के किनारे पर होंठ फेरे। वहाँ से कान तक। अंजलि के कान के नीचे की त्वचा संवेदनशील थी। राजीव ने वहाँ होंठ रखे तो अंजलि का पूरा शरीर हल्का-सा काँपा।
“उह्ह्ह…” अंजलि ने आवाज़ निकाली और अपनी गर्दन को राजीव की तरफ खोल दी, जैसे उसे और चाहिए हो।
राजीव ने उसकी गर्दन पर चुंबनों की एक लाइन बना दी — नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे। हर चुंबन के साथ अंजलि की साँस तेज़ होती गई। उसने राजीव के कंधों को कसकर पकड़ लिया।
“राजीव… तुम…” अंजलि ने फुसफुसाया।
राजीव ने उसकी गर्दन से होंठ हटाए और उसके होंठों पर फिर आ गया। इस बार चुंबन पहले से भी ज़्यादा गहरा था। अंजलि ने खुद को राजीव के हवाले कर दिया। दोनों एक-दूसरे को कसकर पकड़े हुए, सोफ़े पर, चाँद की रोशनी में, बिना किसी शब्द के, सिर्फ साँसों और होंठों की भाषा में बात कर रहे थे।
कुछ देर बाद राजीव ने चुंबन तोड़ा। अंजलि की साँस फूली हुई थी। राजीव की भी। दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे।
“अंजलि…” राजीव ने कहा, “क्या तुम… आज यहीं रुकोगी?”
अंजलि ने एक पल सोचा। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया। “हाँ।”
“पक्का?”
“पक्का।”
राजीव की आँखों में एक अजीब-सी चमक आई। उसने अंजलि का हाथ पकड़ा और उसे उठाया। दोनों खड़े हो गए। अंजलि राजीव के सामने खड़ी थी, दोनों के शरीर एक-दूसरे से लगभग छू रहे थे। राजीव ने उसकी आँखों में देखा।
“डर लग रहा है?” राजीव ने पूछा।
“थोड़ा।” अंजलि ने कहा।
“मुझे भी।”
अंजलि हँसी। “तुम्हें क्यों?”
“क्योंकि…” राजीव ने कहा और उसकी आवाज़ भारी हो गई, “क्योंकि तुम पहली हो। और अगर कुछ गलत हो गया तो…”
“तो कुछ गलत नहीं होगा।” अंजलि ने उसका वाक्य पूरा किया।
फिर उसने खुद आगे बढ़कर राजीव के होंठों को चूमा। छोटा-सा चुंबन, पर पूरा। फिर उसने राजीव की कमीज़ का पहला बटन खोला।
भाग ४: कपड़े उतरना
राजीव की कमीज़ के बटन एक-एक करके खुलने लगे। अंजलि की उँगलियाँ काँप रही थीं, पर वो रुकी नहीं। पहला बटन, दूसरा, तीसरा। हर बटन खुलने के साथ राजीव की छाती का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा दिखने लगा। अंजलि ने बटन खोलते-खोलते अपनी उँगलियाँ राजीव की छाती पर फेरीं। राजीव की छाती गर्म थी, और उसके सीने पर हल्के बाल थे। अंजलि ने उन्हें धीरे से सहलाया।
“ठंडी उँगलियाँ हैं तुम्हारी।” राजीव ने कहा।
“तुम्हारी छाती गर्म है।” अंजलि ने कहा।
आख़िरी बटन खुला। अंजलि ने कमीज़ को राजीव के कंधों से सरकाया। राजीव ने अपनी बाँहें थोड़ी पीछे कीं और कमीज़ उसके शरीर से उतर गई। अब राजीव बिना कमीज़ के खड़ा था। अंजलि ने उसे देखा। उसकी नज़र राजीव की छाती से नीचे पेट तक गई। राजीव का पेट सपाट था, हल्के-से बालों की लाइन नाभि से नीचे की तरफ जाती थी। अंजलि ने वो लाइन देखी और उसकी साँस थोड़ी भारी हो गई।
“अब तुम्हारी बारी।” राजीव ने कहा।
अंजलि ने शरमाकर अपनी आँखें झुका लीं। राजीव ने उसके कुर्ते के बटन खोलने शुरू किए। अंजलि का कुर्ता लंबा था, उसके घुटनों तक। बटन एक-एक करके खुलते गए। राजीव की उँगलियाँ भी काँप रही थीं। जब आख़िरी बटन खुला, तो राजीव ने धीरे से कुर्ते को अंजलि के कंधों से सरकाया। अंजलि ने अपनी बाँहें थोड़ी ऊपर कीं और कुर्ता उतर गया।
अब अंजलि सिर्फ ब्लाउज़ और पेटीकोट में थी। उसका ब्लाउज़ काला था, जिस पर हल्की-सी कढ़ाई थी। उसके ब्लाउज़ से उसकी गर्दन, कंधे और बाँहें दिख रही थीं। अंजलि की बाँहें पतली और नरम थीं। राजीव ने उसके कंधों पर हाथ रखा और उन्हें धीरे से सहलाया।
“तुम्हारी त्वचा…” राजीव ने कहा, “बहुत नरम है।”
अंजलि ने सिर झुका लिया। राजीव ने उसके कंधों से होंठ फेरे। दाएँ कंधे पर चुंबन, फिर बाएँ कंधे पर। फिर उसकी कॉलरबोन पर। अंजलि की साँस तेज़ हो गई। उसने राजीव की गर्दन पकड़ ली।
“राजीव…” अंजलि ने फुसफुसाया, “धीरे…”
“धीरे ही कर रहा हूँ।” राजीव ने कहा।
फिर उसने अंजलि के ब्लाउज़ के हुक ढूँढे। ब्लाउज़ पीछे से बँधा हुआ था। राजीव ने अंजलि को घुमाया और उसके पीछे आ गया। उसने हुक खोलने शुरू किए। पहला हुक खुला, फिर दूसरा, फिर तीसरा। ब्लाउज़ ढीला होने लगा। राजीव ने उसे अंजलि के कंधों से सरकाया। अंजलि ने अपनी बाँहें सामने कीं और ब्लाउज़ गिर गया।
अब अंजलि सिर्फ ब्रा में थी। राजीव ने उसके पीछे से ही उसे देखा। अंजलि की पीठ पर ब्रा की पट्टियाँ थीं, और उनके नीचे उसकी नरम पीठ। राजीव ने उसकी पीठ पर अपने होंठ रखे। अंजलि की पीठ काँपी।
“आह…” अंजलि ने धीरे से आवाज़ निकाली।
राजीव ने उसकी पीठ पर चुंबनों की लाइन बनाई। ऊपर से नीचे। फिर नीचे से ऊपर। अंजलि की साँस अब फूली हुई थी। वो राजीव के सामने मुड़ गई। अब वो आमने-सामने थे। राजीव ने उसके चेहरे को देखा। अंजलि की आँखें बंद थीं, होंठ खुले हुए, साँस तेज़।
“आँखें खोलो।” राजीव ने कहा।
अंजलि ने आँखें खोलीं।
“तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”
अंजलि ने शरमाकर अपनी बाँहें छाती पर लपेट लीं। राजीव ने धीरे से उसकी बाँहें हटाईं। “छिपाओ मत।”
फिर राजीव ने अंजलि की ब्रा की तरफ देखा। उसकी उँगलियाँ ब्रा की पट्टी पर गईं। उसने पट्टी को धीरे से नीचे खींचा। अंजलि ने अपनी बाँहें थोड़ी ऊपर कीं और ब्रा ढीली हो गई। राजीव ने उसे अंजलि के शरीर से अलग किया और ब्रा गिर गई।
अब अंजलि की छाती राजीव के सामने थी। उसके दोनों स्तन उभरे हुए, गोल, और उनके ऊपर गुलाबी रंग के निप्पल। राजीव ने उन्हें देखा और उसकी साँस रुक गई। अंजलि ने अपनी बाँहें नीचे कीं और राजीव को अपनी छाती देखने दिया।
“राजीव…” अंजलि ने फुसफुसाया, “देखो मत ऐसे।”
“कैसे देखूँ फिर?” राजीव ने कहा, आवाज़ भारी।
“ऐसे ही… अच्छा लग रहा है।” अंजलि ने कहा और मुस्कुराई।
भाग ५: स्तनों का स्पर्श
राजीव ने अपना हाथ बढ़ाया और अंजलि के बाएँ स्तन पर रखा। पहला स्पर्श। अंजलि ने महसूस किया कि राजीव की हथेली गर्म और थोड़ी खुरदरी थी। उसने धीरे से अंजलि के स्तन को थामा, फिर उसे हल्के से दबाया। अंजलि की साँस हकलाई।
“उफ़…” अंजलि ने आवाज़ निकाली।
राजीव की हथेली अंजलि के स्तन के आकार में ढल गई। उसने धीरे-धीरे दबाया, छोड़ा, फिर दबाया। अंजलि की आँखें बंद हो गईं। राजीव का स्पर्श उसे एक अजीब-सी गर्मी दे रहा था, जो उसके पूरे शरीर में फैल रही थी।
फिर राजीव ने अपना दूसरा हाथ भी बढ़ाया और दाएँ स्तन को थामा। अब दोनों हाथों में अंजलि की छाती थी। वो दोनों को धीरे-धीरे दबाने लगा। अंजलि की साँस तेज़ हो गई। उसने राजीव के कंधों को पकड़ लिया।
“आह… राजीव…” अंजलि ने धीरे से कहा।
राजीव ने अंजलि के निप्पल पर अपना अंगूठा रखा और उसे धीरे से गोल घुमाया। निप्पल सख्त होने लगा। अंजलि का शरीर काँपा।
“उह्ह्ह… ये…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने दूसरे निप्पल पर भी वही किया। अंजलि की साँस फूली हुई थी। उसने अपना सिर राजीव के कंधे पर रख दिया।
“अच्छा लग रहा है?” राजीव ने धीरे से पूछा।
“हाँ… बहुत।” अंजलि ने फुसफुसाया।
फिर राजीव ने अपना मुँह अंजलि के बाएँ स्तन की तरफ बढ़ाया। उसने होंठ निप्पल पर रखे और धीरे से चूसा। अंजलि की पूरी देह में बिजली-सी दौड़ी।
“आआह्ह्ह्ह…” अंजलि ज़ोर से चिल्लाई।
राजीव ने निप्पल को होंठों में लिया और धीरे-धीरे चूसने लगा। उसकी जीभ निप्पल के चारों तरफ घूमने लगी। अंजलि की उँगलियाँ राजीव के बालों में फँस गईं और वो उसे अपनी छाती की तरफ और दबाने लगी।
“हाँ… हाँ… ऐसे ही…” अंजलि ने फुसफुसाया।
राजीव ने चूसना जारी रखा। कभी धीरे, कभी थोड़ा तेज़। कभी निप्पल को दाँतों के बीच धीरे से दबाया, फिर छोड़ दिया। अंजलि का शरीर हर बार काँपता। उसकी साँस अब तेज़ और भारी थी। वो राजीव के सिर को सहलाती रही और धीरे-धीरे कराहती रही।
फिर राजीव दूसरे स्तन पर गया। उसने पहले उसके निप्पल को होंठों से छुआ, फिर उसे चूसा। अंजलि ने सिर पीछे कर दिया।
“ओह्ह्ह्ह… राजीव… ओह माय गॉड…” अंजलि बोली।
राजीव ने दोनों स्तनों को बारी-बारी चूसा। एक को चूसता तो दूसरे को हाथ से दबाता। अंजलि का पूरा शरीर अब गर्म हो चुका था। उसके माथे पर पसीने की बूँदें आ गईं। उसकी साँस तेज़ और बेकाबू हो गई।
“राजीव… अब… अब और…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने उसके स्तन से मुँह हटाया और उसके होंठों पर चुंबन रखा। अंजलि ने उसे ज़ोर से चूमा, जैसे वो उसके अंदर समा जाना चाहती हो।
भाग ६: पेट, नाभि और आगे
राजीव ने अंजलि के होंठों से होंठ हटाए और उसकी गर्दन से नीचे की तरफ बढ़ने लगा। उसके होंठ अंजलि की छाती के बीच से नीचे फिसले। उसने अंजलि के पेट पर चुंबन किए। अंजलि का पेट सपाट और नरम था। राजीव ने उसकी नाभि पर होंठ रखे और जीभ से उसके चारों तरफ घुमाया।
“उह्ह्ह्ह… राजीव…” अंजलि की आवाज़ काँपी।
राजीव ने अंजलि की नाभि को चूमा, चाटा। अंजलि की नाभि के आस-पास की त्वचा बहुत संवेदनशील थी। राजीव की जीभ वहाँ फिरती तो अंजलि का पेट अंदर-बाहर होता। उसने राजीव का सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“हाँ… वहीं… ऐसे ही…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने अंजलि के पेट से नीचे की तरफ देखा। वो अब भी अपने पेटीकोट में थी। राजीव ने पेटीकोट की नाड़ा खोजी। अंजलि ने खुद अपनी कमर पर हाथ रखकर नाड़ा ढीला किया। पेटीकोट ढीला हो गया। राजीव ने उसे धीरे से नीचे खींचा। अंजलि ने अपने पैरों को थोड़ा हिलाया और पेटीकोट उसके पैरों से निकल गया।
अब अंजलि सिर्फ अपनी पैंटी में थी। काली, छोटी-सी पैंटी। राजीव ने उसे देखा। अंजलि की जाँघें गोल और नरम थीं, और उनके बीच में पैंटी। राजीव की साँस भारी हो गई।
“अब तुम्हारी बारी।” अंजलि ने कहा और उसने राजीव की पैंट के बटन की तरफ देखा।
राजीव ने अपनी पैंट का बटन खोला और ज़िप खींची। फिर उसने पैंट को नीचे सरकाया। अंजलि ने उसकी मदद की। पैंट राजीव के पैरों से निकल गई। अब राजीव सिर्फ अपने अंडरवियर में था। अंजलि ने उसे देखा। उसकी नज़र राजीव के अंडरवियर पर ठहरी, जहाँ एक स्पष्ट उभार था।
अंजलि ने शरमाकर नज़र हटाई। राजीव मुस्कुराया।
“देखो ना।” राजीव ने कहा।
“देख रही हूँ।” अंजलि ने कहा।
राजीव ने अंजलि का हाथ पकड़ा और उसे अपने अंडरवियर के ऊपर रखा। अंजलि ने हल्का-सा दबाया। राजीव की साँस हकलाई। अंजलि ने उसे धीरे-धीरे सहलाया।
“तुम्हारा…” अंजलि ने धीरे से कहा।
“हाँ?” राजीव ने पूछा।
“बहुत… बड़ा है।” अंजलि ने कहा और उसका चेहरा लाल हो गया।
राजीव हँसा। “अभी तो देखा भी नहीं।”
“तो दिखाओ।” अंजलि ने कहा।
राजीव ने अपने अंडरवियर को नीचे खींचा। अंडरवियर उसके पैरों से निकल गया। अब राजीव पूरी तरह नंगा था। अंजलि ने उसे देखा — उसकी छाती, उसका पेट, उसकी जाँघें और बीच में उसका लिंग। अंजलि की आँखें उस पर ठहर गईं।
राजीव का लिंग सख्त हो चुका था, ऊपर की तरफ उठा हुआ। अंजलि ने उसे देखा और उसकी साँस रुक गई। उसने पहले कभी किसी पुरुष को इतने करीब से नहीं देखा था।
“राजीव…” अंजलि ने फुसफुसाया।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।” अंजलि ने कहा और मुस्कुराई।
राजीव ने आगे बढ़कर अंजलि की पैंटी के किनारे को पकड़ा। “अब ये?”
अंजलि ने सिर हिलाया। राजीव ने पैंटी को धीरे से नीचे खींचा। अंजलि ने अपने पैर उठाए और पैंटी उसके पैरों से निकल गई।
अब अंजलि भी पूरी तरह नंगी थी।
राजीव ने उसे देखा। अंजलि की जाँघों के बीच, उसके बालों के बीच, उसकी चूत। राजीव की साँस रुक गई। वो अंजलि को देखता रहा, जैसे किसी चीज़ को पहली बार देख रहा हो।
“अंजलि…” राजीव ने धीरे से कहा, “तुम… तुम बहुत सुंदर हो। पूरी।”
अंजलि ने शरमाकर अपनी जाँघें थोड़ी बंद कीं। राजीव ने धीरे से उन्हें खोला।
“छिपाओ मत।” राजीव ने कहा।
अंजलि ने जाँघें खोल दीं। राजीव घुटनों के बल बैठ गया और अंजलि के सामने झुक गया। उसने अंजलि की जाँघों पर हाथ रखा और उन्हें और खोला। फिर उसने अपना मुँह अंजलि की चूत की तरफ बढ़ाया।
भाग ७: चूत को चूमना
राजीव ने पहले अंजलि की जाँघों पर चुंबन किए। दाएँ और बाएँ। धीरे-धीरे, ऊपर से नीचे की तरफ। अंजलि की जाँघें काँप रही थीं। राजीव के होंठ उसकी त्वचा पर फिसलते तो वो सिसकती।
“आह… राजीव… वहाँ…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने अंजलि की जाँघों के बीच अपना मुँह रखा। पहले उसने होंठों से अंजलि की चूत के बाहरी होंठों को छुआ। अंजलि की पूरी देह काँप उठी।
“ओह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड…” अंजलि ज़ोर से चिल्लाई।
राजीव ने धीरे से जीभ बाहर निकाली और अंजलि की चूत पर फेरी। उसकी जीभ गर्म और गीली थी। अंजलि ने अपने हाथ राजीव के सिर पर रख दिए और उसे दबाया।
“हाँ… वहीं… ऐसे ही…” अंजलि ने फुसफुसाया।
राजीव ने अपनी जीभ से अंजलि की चूत को चाटना शुरू किया। नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे। फिर वो अंजलि की भगशिश्न पर आया। उसने उसे होंठों में लिया और धीरे से चूसा।
“आआआह्ह्ह्ह्ह… राजीव… राजीव…” अंजलि ज़ोर से चिल्लाई और उसकी जाँघें राजीव के सिर को दबाने लगीं।
राजीव ने भगशिश्न को चूसना जारी रखा। कभी धीरे, कभी तेज़। कभी जीभ की नोक से उसे छुआ, कभी पूरे होंठों से चूसा। अंजलि का पूरा शरीर अब काँप रहा था। उसकी साँस तेज़ और बेकाबू थी। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी मिठास थी, जो राजीव को और उकसाती थी।
“उफ़्फ़्फ़… राजीव… रुको मत… ऐसे ही करो…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने अपनी जीभ को अंजलि की चूत के अंदर तक डाला। अंजलि की चूत अब गीली हो चुकी थी, और राजीव की जीभ को अंदर जाते हुए महसूस हुआ। उसने जीभ को अंदर-बाहर करना शुरू किया। अंजलि के शरीर में हर बार एक झुरझुरी दौड़ती।
“आह्ह्ह्ह… हाँ… हाँ… वहीं… अंदर…” अंजलि ने कराहते हुए कहा।
राजीव ने अंजलि की चूत को चाटते-चूसते उसे चरम की तरफ ले जाना शुरू किया। उसने एक हाथ से अंजलि की जाँघ पकड़ी और दूसरे हाथ से उसकी चूत के होंठों को धीरे से खोला। फिर उसने अपनी जीभ से अंदर तक पहुँचने की कोशिश की। अंजलि की साँस अब तेज़ और लंबी थी।
“राजीव… राजीव… मुझे… मुझे आ रहा है…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने रुकना नहीं चाहा। उसने और तेज़ी से अंजलि की चूत को चाटना शुरू किया। उसकी जीभ अब अंजलि की भगशिश्न पर तेज़ी से फिर रही थी। अंजलि की जाँघें कसकर राजीव के सिर को दबाने लगीं। उसकी आवाज़ अब और ज़ोर की हो गई।
“ओह्ह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… ओह माय गॉड… ओओओह्ह्ह्ह्ह…” अंजलि चिल्लाई और उसका पूरा शरीर एक झटके में काँप उठा।
अंजलि का चरम आया। उसकी चूत से रस बहने लगा। राजीव ने उसे चाटते रहा। अंजलि की जाँघें काँपती रहीं और वो राजीव के सिर को दबाए हुए कराहती रही। कुछ पल बाद उसने राजीव को धीरे से हटाया। राजीव ने मुँह उठाया। उसके होंठ और ठोड़ी अंजलि के रस से भीगी हुई थी।
“आ… आ गया?” राजीव ने पूछा।
अंजलि ने हाँफते हुए सिर हिलाया। उसकी आँखें बंद थीं, चेहरा लाल, साँस फूली हुई। “तुमने… तुमने कमाल कर दिया।”
राजीव मुस्कुराया। “अभी तो शुरुआत है।”
अंजलि ने आँखें खोलीं। “क्या?”
राजीव ने उसकी तरफ देखा। उसका लिंग अब और सख्त हो चुका था। अंजलि ने उसे देखा और उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
“अंजलि…” राजीव ने कहा, “तैयार हो?”
अंजलि ने गहरी साँस ली। “हाँ।”
भाग ८: पहला प्रवेश
राजीव ने अंजलि को सोफ़े पर लिटाया। अंजलि की पीठ सोफ़े के कुशन पर टिक गई। उसने अपनी जाँघें थोड़ी खोलीं। राजीव उसके ऊपर झुक गया। उसने एक हाथ से अपना लिंग पकड़ा और अंजलि की चूत के मुँह पर रखा। अंजलि की साँस रुक गई।
“तैयार?” राजीव ने फिर पूछा।
“हाँ…” अंजलि ने फुसफुसाया, “धीरे… पहली बार है।”
राजीव ने धीरे से आगे बढ़ना शुरू किया। उसका लिंग अंजलि की चूत के होंठों को छूकर धीरे-धीरे अंदर जाने लगा। अंजलि की आँखें बंद हो गईं। उसने महसूस किया कि कुछ गर्म और मोटा उसके अंदर धीरे-धीरे घुस रहा है। पहले बस नोक अंदर गई। अंजलि की साँस हकलाई।
“आह्ह्ह्ह…” अंजलि धीरे से कराही।
राजीव ने थोड़ा और आगे बढ़ाया। अंजलि की चूत उसे कसकर पकड़ रही थी। राजीव को भी एक अजीब-सी गर्मी और कसाव महसूस हुआ। उसने धीरे से और अंदर डाला। अब आधा लिंग अंदर था।
“उफ़्फ़्फ़… राजीव… थोड़ा… थोड़ा दर्द है…” अंजलि ने कहा।
राजीव रुक गया। “रुक जाऊँ?”
“नहीं… नहीं… बस… धीरे।”
राजीव ने कुछ पल रुककर इंतज़ार किया। फिर बहुत धीरे से थोड़ा और आगे बढ़ा। अंजलि की चूत धीरे-धीरे ढीली होने लगी। राजीव का लिंग अब लगभग पूरा अंदर चला गया। अंजलि ने गहरी साँस ली।
“अब… अब ठीक है?” राजीव ने पूछा।
अंजलि ने आँखें खोलीं। उसकी आँखों में पानी था, पर होंठों पर मुस्कान थी। “अब… अब अच्छा लग रहा है।”
राजीव ने धीरे से अंदर-बाहर होना शुरू किया। पहला झटका। धीमा, गहरा। अंजलि ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उसने महसूस किया कि राजीव का लिंग उसके अंदर अंदर तक जा रहा है और फिर बाहर आ रहा है। हर झटके के साथ एक अजीब-सी गर्मी, एक अजीब-सी खुशी।
“आह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह…” अंजलि हर झटके के साथ धीरे से कराहती।
राजीव की गति धीरे-धीरे बढ़ने लगी। अब झटके थोड़े तेज़ और थोड़े गहरे हो गए। अंजलि की चूत अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी और राजीव के लिंग को आसानी से अंदर ले रही थी। राजीव ने अंजलि के होंठों पर झुककर चुंबन किया। अंजलि ने उसे चूमा, फिर उसकी गर्दन पकड़ ली।
“राजीव… और… और तेज़…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने गति बढ़ा दी। अब उसके झटके तेज़ और लंबे थे। सोफ़े की स्प्रिंग्स चरमराने लगीं। अंजलि की कराहटें भी बढ़ने लगीं।
“ऊऊह्ह्ह्ह… आआह्ह्ह्ह… हाय्य्यीई… ओह्ह्ह्ह…” अंजलि चिल्लाने लगी।
राजीव ने अंजलि की जाँघें ऊपर कीं और उन्हें अपनी कमर के चारों तरफ लपेट दिया। अब वो और गहराई तक अंदर जा रहा था। अंजलि की चूत उसके लिंग को पूरी तरह निगल रही थी। अंजलि ने राजीव की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए।
“ओओओह्ह्ह्ह… राजीव… राजीव… ऐसे ही… ऐसे ही करो…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने अंजलि की गर्दन पर चुंबन किए, उसके स्तनों को दबाया, और अपने झटके और तेज़ किए। अंजलि का पूरा शरीर अब राजीव के साथ हिल रहा था। हर झटके के साथ उसकी छाती राजीव से टकराती।
“आह्ह्ह्ह… हाँ… हाँ… ओह माय गॉड… ओह माय गॉड…” अंजलि की आवाज़ अब और ज़ोर की हो गई।
राजीव ने अंजलि की कमर पकड़ी और उसे और कसकर अपनी तरफ खींचा। अब हर झटका गहरा और तेज़ था। अंजलि की साँस फूली हुई थी, उसका चेहरा लाल, बाल बिखरे हुए।
“राजीव… मुझे… मुझे फिर… आ रहा है…” अंजलि ने कहा।
“हाँ… आ जाओ…” राजीव ने कहा और और तेज़ झटके दिए।
अंजलि की आँखें बंद हो गईं। उसका पूरा शरीर काँपने लगा। कुछ पल बाद वो ज़ोर से चिल्लाई — “आआआह्ह्ह्ह्ह… ओओओह्ह्ह्ह्ह माय गॉड…” — और उसका चरम आया। उसकी चूत ने राजीव के लिंग को कसकर पकड़ लिया और फिर छोड़ दिया। अंजलि की जाँघें काँपती रहीं।
राजीव ने भी अपनी गति बढ़ाई। अंजलि के चरम के बाद उसकी चूत और संवेदनशील हो गई थी। राजीव को अब हर झटके में एक अजीब-सी मिठास महसूस हो रही थी। कुछ देर बाद उसने भी खुद को रोका नहीं।
“अंजलि… मैं भी…” राजीव ने कहा।
“हाँ… अंदर ही… अंदर ही करो…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने कुछ और झटके दिए और फिर वो भी चरम पर पहुँच गया। उसने ज़ोर से एक झटका दिया और अंजलि के अंदर ही खुद को छोड़ दिया। उसका पूरा शरीर काँपा। अंजलि ने उसे कसकर पकड़ लिया।
दोनों एक-दूसरे से चिपके रहे। साँसें फूली हुईं। पसीना दोनों के शरीर पर। सोफ़े की स्प्रिंग्स अब धीरे-धीरे शांत हो रही थीं। कमरे में सिर्फ दोनों की साँसों की आवाज़ थी।
कुछ देर बाद राजीव अंजलि के ऊपर से हटा और उसके बगल में बैठ गया। दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। अंजलि की आँखों से एक आँसू बह निकला।
“रो क्यों रही हो?” राजीव ने पूछा।
“खुशी से।” अंजलि ने कहा, “बहुत दिनों बाद… बहुत दिनों बाद कोई मुझे इस तरह छुआ।”
राजीव ने उसका आँसू पोंछा और उसके माथे पर चुंबन किया। “अब रोज़ छूऊँगा।”
अंजलि हँसी। “वादा?”
“वादा।”
भाग ९: दूसरा दौर — और गहराई
कुछ देर आराम करने के बाद दोनों फिर उठे। राजीव ने अंजलि को बेडरूम में ले जाने का सोचा। उसने अंजलि को गोद में उठा लिया। अंजलि हँस पड़ी।
“क्या कर रहे हो?”
“तुम्हें बिस्तर पर ले जा रहा हूँ। सोफ़ा छोटा है।”
अंजलि ने राजीव की गर्दन के चारों तरफ अपनी बाँहें लपेट लीं। राजीव उसे बेडरूम में ले गया और धीरे से बिस्तर पर लिटा दिया। बिस्तर की चादर ठंडी थी। अंजलि उस पर लेटी तो उसकी देह काँपी।
राजीव भी बिस्तर पर आया और उसके बगल में लेट गया। दोनों आमने-सामने। राजीव ने अंजलि के चेहरे पर अपनी उँगलियाँ फेरीं। उसके माथे से होंठों तक, फिर ठोड़ी तक। अंजलि ने आँखें बंद कर लीं।
“अंजलि…” राजीव ने कहा।
“हूँ…”
“एक बार और?”
अंजलि ने आँखें खोलीं और मुस्कुराई। “तुम्हारी हिम्मत कम नहीं है।”
“तुम्हारे लिए तो बहुत है।”
अंजलि ने खुद आगे बढ़कर राजीव को चूमा। इस बार चुंबन पहले से भी ज़्यादा धीमा और गहरा था। दोनों के हाथ एक-दूसरे के शरीर पर फिर रहे थे। राजीव ने अंजलि के स्तन फिर से दबाए, उनके निप्पल से खेला। अंजलि ने राजीव के लिंग को हाथ में लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाया। राजीव की साँस हकलाई।
“अंजलि…” राजीव ने कहा, “तुम्हारा हाथ… बहुत अच्छा लग रहा है।”
अंजलि ने मुस्कुराकर अपनी पकड़ तेज़ की। उसने लिंग को ऊपर-नीचे किया। राजीव ने आँखें बंद कर लीं।
“अच्छा लग रहा है?” अंजलि ने पूछा।
“हाँ… बहुत।”
फिर अंजलि ने झुककर राजीव के लिंग को अपने होंठों से छुआ। पहले हल्का चुंबन, फिर उसे अपने मुँह में लिया। राजीव की साँस रुक गई। अंजलि ने लिंग को धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। उसकी जीभ लिंग के चारों तरफ घूम रही थी। राजीव ने अंजलि के बालों को पकड़ लिया।
“ओह्ह्ह्ह… अंजलि… ओह…” राजीव कराहा।
अंजलि ने कुछ देर चूसा, फिर लिंग को मुँह से बाहर निकाला और उसे चूमा। फिर वो पीछे लेट गई और अपनी जाँघें खोलीं।
“अब आओ।” अंजलि ने कहा।
राजीव उसके ऊपर आ गया। इस बार उसने कोई जल्दी नहीं की। उसने धीरे से लिंग को अंजलि की चूत के मुँह पर रखा और फिर धीरे-धीरे अंदर डाला। अंजलि ने गहरी साँस ली। अब उसे दर्द नहीं हो रहा था, बस एक अजीब-सी भरने की भावना।
“आह्ह्ह्ह… राजीव…” अंजलि ने धीरे से कहा।
राजीव ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर होना शुरू किया। इस बार उसने लंबे, धीमे झटके दिए। हर झटका गहरा और पूरा। अंजलि की चूत उसे पूरी तरह ले रही थी। अंजलि की आँखें बंद थीं, होंठ खुले हुए, साँस तेज़।
“ऐसे ही… धीरे… गहरा…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने वही किया। धीरे, गहरा, लंबा। हर झटके के साथ वो अंदर तक जाता और फिर लगभग पूरा बाहर आता। अंजलि को हर बार एक अजीब-सी खुशी मिलती, जो उसके शरीर में फैल जाती।
“ऊऊह्ह्ह्ह… आआह्ह्ह्ह… हाय्य्यीई…” अंजलि धीरे-धीरे कराहने लगी।
राजीव ने अंजलि के स्तनों को मुँह में लिया और चूसने लगा। अंजलि ने उसका सिर पकड़ लिया। दोनों तरफ से उत्तेजना बढ़ने लगी। अंजलि की कराहटें तेज़ हो गईं।
“राजीव… और… और तेज़…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने गति बढ़ा दी। अब झटके तेज़ और छोटे हो गए। बिस्तर चरमराने लगा। अंजलि की आवाज़ अब और ज़ोर की हो गई।
“ओओओह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… ओह माय गॉड… ऊऊह्ह्ह्ह… उफ़्फ़्फ़…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने अंजलि की कमर पकड़ी और उसे और कसकर अपनी तरफ खींचा। अंजलि ने अपनी जाँघें उसकी कमर पर कस दीं। दोनों के शरीर एक हो गए। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था।
फिर अंजलि ने राजीव को धक्का दिया और उसे नीचे लिटा दिया। अब वो ऊपर आ गई। राजीव के लिंग को पकड़ा और उसे अपनी चूत में डाला। फिर वो ऊपर-नीचे होने लगी। राजीव ने उसकी कमर पकड़ ली और उसे सहारा दिया।
“अंजलि… तुम…” राजीव हाँफा।
अंजलि ने गति बढ़ाई। उसके स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसके बाल बिखरे हुए। चेहरे पर पसीना। वो एक अजीब-सी सुंदरता में थी। राजीव उसे देखता रहा और उसकी साँस फूलती रही।
“आह्ह्ह्ह… राजीव… ऐसे… अंदर तक…” अंजलि चिल्लाई।
उसने और तेज़ी से ऊपर-नीचे होना शुरू किया। उसकी कराहटें अब लंबी और गहरी थीं। कुछ देर बाद उसका फिर चरम आया। उसने ज़ोर से चिल्लाया — “ओओओह्ह्ह्ह्ह माय गॉड… ओह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह…” — और उसका शरीर काँप उठा।
राजीव ने भी उसी वक्त खुद को छोड़ दिया। अंजलि के अंदर गर्मी फैल गई। अंजलि राजीव के ऊपर गिर पड़ी। दोनों की साँसें फूली हुईं। राजीव ने उसकी पीठ सहलाई।
कुछ देर वो ऐसे ही रहे। फिर अंजलि करवट लेकर लेट गई। राजीव ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया।
“अंजलि…” राजीव ने धीरे से कहा।
“हूँ…”
“तुम थक गई होगी।”
“नहीं।” अंजलि ने कहा, “बल्कि अब ज़्यादा ताज़गी महसूस हो रही है।”
राजीव हँसा। “कैसे?”
“तुम्हारी वजह से।”
दोनों कुछ देर चुप लेटे रहे। घड़ी की सुइयाँ रात के बारह बजा रही थीं। कमरे में सिर्फ उनकी साँसें थीं।
भाग १०: तीसरा दौर — एक नया अनुभव
कुछ देर बाद अंजलि ने करवट बदली और राजीव की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।
“राजीव…” अंजलि ने कहा।
“हाँ?”
“तुमने कभी… पीछे से किया है?”
राजीव एक पल सोचा। “पीछे से? मतलब?”
“मतलब… उस तरफ से भी?” अंजलि ने शरमाते हुए कहा।
राजीव समझ गया। “नहीं। तुमने?”
“नहीं। पर सुना है बहुत दर्द होता है।”
“तो करके देखते हैं?” राजीव ने कहा।
अंजलि ने सिर हिलाया। “ठीक है। पर धीरे से।”
राजीव ने अंजलि को करवट लेने को कहा। अंजलि पेट के बल लेट गई। राजीव उसके पीछे आया। उसने अंजलि की पीठ पर हाथ फेरा, उसकी कमर पर, फिर उसके कूल्हों पर। अंजलि की साँस थोड़ी तेज़ हो गई।
राजीव ने अंजलि के कूल्हों को थोड़ा ऊपर उठाया और उसके नीचे एक तकिया रख दिया। अंजलि अब थोड़ी उठी हुई स्थिति में थी। राजीव ने अपनी उँगली से अंजलि के गुदा द्वार को छुआ। अंजलि की देह काँपी।
“आह्ह्ह्ह…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने अपनी उँगली को थोड़ा गीला किया और फिर उसे धीरे से अंदर डाला। अंजलि ने एक अजीब-सी भरने की भावना महसूस की। राजीव ने उँगली को अंदर-बाहर किया। अंजलि धीरे-धीरे कराहने लगी।
“ठीक है?” राजीव ने पूछा।
“हाँ… थोड़ा अजीब… पर ठीक।”
राजीव ने उँगली निकाली और अपने लिंग को अंजलि के गुदा द्वार पर रखा। उसने धीरे से दबाव डाला। पहले लिंग का सिरा अंदर गया। अंजलि की साँस हकलाई।
“आआह्ह्ह्ह… राजीव… थोड़ा… थोड़ा ज़ोर से…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने थोड़ा और दबाव डाला। लिंग धीरे-धीरे अंदर जाने लगा। अंजलि ने गहरी साँस ली। ये अहसास अलग था — चूत से अलग। ज़्यादा कसा हुआ, ज़्यादा गर्म। राजीव ने थोड़ा और अंदर डाला।
“उफ़्फ़्फ़…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने पूरी तरह अंदर डाला। अंजलि का गुदा उसके लिंग को कसकर पकड़े हुए था। राजीव को भी एक अजीब-सी खुशी मिली। उसने कुछ पल रुककर अंजलि को आदत डालने दिया।
“अब… अब ठीक है?” राजीव ने पूछा।
अंजलि ने धीरे से सिर हिलाया। “हाँ… अब हिलाओ।”
राजीव ने धीरे से अंदर-बाहर होना शुरू किया। पहले बहुत धीरे। अंजलि की कराहटें धीमी थीं, पर गहरी। हर झटके के साथ उसे एक अजीब-सी संवेदना मिल रही थी, जो उसके पूरे शरीर में फैल रही थी।
“आह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह… राजीव…” अंजलि धीरे-धीरे कराहने लगी।
राजीव ने गति थोड़ी बढ़ाई। अब झटके तेज़ और लंबे थे। अंजलि के कूल्हे राजीव के शरीर से टकराने लगे। हर टक्कर के साथ एक आवाज़। अंजलि ने अपने हाथ बिस्तर पर गड़ा दिए।
“ऊऊह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… हाय्य्यीई…” अंजलि चिल्लाने लगी।
राजीव ने अंजलि के बालों को एक तरफ किया और उसकी गर्दन पर झुककर चुंबन किए। अंजलि की गर्दन से उसके कंधे तक राजीव के होंठ फिरते रहे। अंजलि का पूरा शरीर काँप रहा था।
“राजीव… और… और तेज़…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने गति और बढ़ाई। अब हर झटका गहरा और तेज़ था। अंजलि की कराहटें अब चीखों में बदल रही थीं।
“ओओओह्ह्ह्ह माय गॉड… ओह्ह्ह्ह… उफ़्फ़्फ़… हाय्य्यीई… ऊऊह्ह्ह्ह…” अंजलि चिल्ला रही थी।
राजीव ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाकर अंजलि की चूत को सहलाया। अंजलि की चूत अब भी गीली थी और संवेदनशील। राजीव ने उसकी भगशिश्न पर उँगली फेरी। अंजलि की चीख और तेज़ हो गई।
“आआआह्ह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… राजीव… दोनों तरफ… दोनों तरफ…” अंजलि हाँफी।
राजीव ने दोनों तरफ से उत्तेजना बढ़ाई। अंजलि की देह अब पूरी तरह काँप रही थी। कुछ देर बाद उसका चरम आया — इस बार और भी गहरा। उसने ज़ोर से चिल्लाया और उसका पूरा शरीर झटकों से भर गया।
राजीव ने भी कुछ और झटके दिए और फिर खुद को छोड़ दिया। वो अंजलि के ऊपर झुक गया। दोनों हाँफ रहे थे।
कुछ देर बाद राजीव हटा। अंजलि पेट के बल लेटी रही, उसकी साँस अभी भी तेज़ थी। राजीव उसके बगल में लेट गया और उसकी पीठ पर हाथ फेरा।
“अंजलि…” राजीव ने धीरे से कहा।
“हूँ…” अंजलि ने थकी हुई आवाज़ में कहा।
“कैसा लगा?”
अंजलि ने करवट लेकर उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर मुस्कान। “अजीब… पर अच्छा। बहुत अच्छा।”
राजीव मुस्कुराया और उसके माथे पर चुंबन किया। “अब सो जाओ।”
अंजलि ने सिर हिलाया और राजीव की बाँहों में आ गई। राजीव ने उसे कसकर पकड़ लिया।
भाग ११: आराम और बातें
रात के करीब एक बजे थे। दोनों बिस्तर पर लेटे हुए थे, बिना कपड़ों के, एक-दूसरे से चिपके। अंजलि का सिर राजीव की छाती पर था और राजीव उसके बालों को सहला रहा था। कमरे में एक छोटी-सी टेबल लैंप जल रही थी, जिसकी पीली रोशनी दोनों के शरीर पर पड़ रही थी।
“राजीव…” अंजलि ने धीरे से कहा।
“हूँ?”
“तुम ऑफिस में क्या करते हो?”
राजीव मुस्कुराया। “अब पूछ रही हो?”
“अब पूछने का मन है।”
“सॉफ्टवेयर कंपनी में हूँ। कोडिंग करता हूँ।”
“अच्छा।” अंजलि ने कहा, “और पसंद है काम?”
राजीव ने सोचा। “पसंद तो नहीं है। पर करना पड़ता है। घर चलाना है।”
“कहाँ रहते हैं माता-पिता?”
“यूपी में। गाँव है। वहीं हैं। मैं यहाँ कमाने आया हूँ।”
अंजलि ने सिर उठाकर उसे देखा। “अकेले हो?”
“हाँ। पाँच साल से।”
“और शादी?”
राजीव हँसा। “शादी? किससे? कोई मिली ही नहीं जो रोक सके।”
अंजलि ने उसकी छाती पर अपना हाथ रखा। “अब मिल गई।”
राजीव ने उसकी तरफ देखा। “तुम गंभीर हो?”
“पता नहीं। पर… अच्छा लग रहा है।”
दोनों चुप हो गए। अंजलि ने फिर सिर रख दिया। कुछ देर बाद वो बोली —
“मेरी फैमिली भी गाँव में है। माँ-बाप, दो भाई। मैं बड़ी हूँ। पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई, तो यहाँ काम पर आ गई। पहले एक घर में बच्चों की देखभाल करती थी। फिर यहाँ सोसाइटी में मैनेजमेंट का काम मिल गया। पाँच साल से यहीं हूँ।”
“और शादी?” राजीव ने पूछा।
“अब तक नहीं हुई। अब तो लगता है नहीं होगी।”
“क्यों नहीं होगी?”
अंजलि ने सिर उठाया। “क्योंकि अब उम्र हो गई है। और यहाँ कौन देखेगा? कोई अपना नहीं।”
राजीव ने उसके गाल को सहलाया। “अब तो मैं हूँ ना।”
अंजलि हँसी। “तुम क्या कर लोगे?”
“पता नहीं। पर कोशिश करूँगा।”
अंजलि ने उसे देखा। उसकी आँखों में एक अजीब-सी गर्मी थी। वो झूठ नहीं लग रहा था। उसने आगे बढ़कर राजीव को चूमा।
“राजीव…” अंजलि ने कहा, “तुम अच्छे हो।”
“तुम भी।”
“झूठ।”
“सच।”
दोनों मुस्कुराए। फिर अंजलि ने अपनी टाँगें राजीव की टाँगों पर रख दीं और उससे चिपक गई। राजीव ने उसे कसकर पकड़ लिया।
भाग १२: आख़िरी दौर — भोर से पहले
रात के करीब तीन बजे अंजलि की नींद खुली। उसने देखा कि राजीव जाग रहा है और उसे देख रहा है। अंजलि ने मुस्कुराकर पूछा, “सोए नहीं?”
“तुम्हें देख रहा था।”
“क्यों?”
“अच्छी लग रही हो।”
अंजलि शरमा गई। “झूठ।”
“सच।”
अंजलि ने अपनी आँखें मलीं। “भूख लगी है।”
राजीव हँसा। “अब?”
“हाँ। पूरी रात की मेहनत की है।”
राजीव उठा और रसोई में गया। उसने फटाफट मैगी बनाई और दो प्लेट लेकर आया। दोनों बिस्तर पर बैठकर मैगी खाने लगे। अंजलि ने एक बड़ा निवाला लिया और चेहरा बनाया।
“गरम है।” अंजलि ने कहा।
“फूँक लो।”
अंजलि ने फूँक मारकर खाया। दोनों चुपचाप खाते रहे। मैगी के बाद राजीव ने दो गिलास पानी लाए। अंजलि ने पानी पिया और फिर बिस्तर पर लेट गई।
“अब फिर सो जाओ।” राजीव ने कहा।
“तुम आओ ना।”
राजीव भी लेट गया। अंजलि उससे चिपक गई। कुछ देर बाद अंजलि ने धीरे से कहा —
“राजीव… एक बार और?”
राजीव हँसा। “तुम्हारी हिम्मत तो देखो।”
“तुम्हारे साथ है तो।”
राजीव ने उसे चूमा। इस बार दोनों ने कोई जल्दी नहीं की। धीरे-धीरे, आराम से, एक-दूसरे को टटोलते हुए। राजीव ने अंजलि के पूरे शरीर को चूमा — माथे, आँखें, गाल, होंठ, गर्दन, छाती, निप्पल, पेट, नाभि, जाँघें, और फिर चूत। अंजलि ने भी राजीव के पूरे शरीर को चूमा — उसकी गर्दन, छाती, निप्पल, पेट, और फिर लिंग।
दोनों ने एक-दूसरे को खाया, चूमा, चाटा। फिर राजीव ने अंजलि के अंदर खुद को डाला और धीरे-धीरे प्यार करने लगा। इस बार कोई तेज़ी नहीं थी, कोई चीख नहीं थी। बस धीमी साँसें और हल्की कराहटें।
“आह्ह्ह्ह…” अंजलि धीरे से कराहती।
“अंजलि…” राजीव फुसफुसाता।
दोनों धीरे-धीरे चलते रहे, एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए। ये चुदाई नहीं थी, ये मिलन था। कुछ देर बाद दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे। कोई चीख नहीं, बस एक लंबी साँस और एक-दूसरे से चिपक जाना।
फिर दोनों लेटे रहे। अंजलि की आँखें बंद हो गईं। राजीव ने उसे देखा। वो सो रही थी। राजीव ने उसके माथे पर चुंबन किया और उसे अपनी बाँहों में ले लिया।
भाग १३: सुबह
सुबह की पहली किरण खिड़की से आई। अंजलि ने आँखें खोलीं। उसने देखा कि राजीव उसे देख रहा है।
“कब से जागे हो?” अंजलि ने पूछा।
“थोड़ी देर पहले।”
“और देख रहे हो?”
“हाँ।”
अंजलि मुस्कुराई और करवट लेकर उसके सामने आ गई। “सुबह में भी अच्छी लग रही हूँ?”
“और भी अच्छी।”
अंजलि ने उसे चूमा। फिर अचानक उठ बैठी। “अरे! मुझे जाना होगा। सोसाइटी में ड्यूटी है।”
राजीव ने उसे पकड़ लिया। “अभी तो साढ़े छह बजे हैं।”
“हाँ, पर मुझे तैयार होना है। सात बजे ड्यूटी है।”
राजीव ने उसे छोड़ दिया। अंजलि उठी और अपने कपड़े पहनने लगी। राजीव बिस्तर पर बैठा उसे देखता रहा। अंजलि ने पैंटी पहनी, फिर ब्रा, फिर ब्लाउज़, फिर पेटीकोट, फिर कुर्ता। राजीव ने देखा और मुस्कुराया।
“कपड़े पहनकर भी अच्छी लग रही हो।”
अंजलि हँसी। “बस बहुत हो गया।”
राजीव उठा और उसके पास आया। उसने अंजलि के होंठों पर एक लंबा चुंबन रखा। अंजलि ने भी उसे चूमा।
“आज फिर आओगी?” राजीव ने पूछा।
“आज?” अंजलि ने कहा, “आज तो फिर दांडिया है।”
“तो उसके बाद।”
अंजलि मुस्कुराई। “देखते हैं।”
“वादा करो।”
“वादा।”
अंजलि ने अपना बैग उठाया। राजीव ने उसे दरवाज़े तक छोड़ा। दरवाज़े पर अंजलि ने पलटकर उसे देखा।
“राजीव…”
“हाँ?”
“कल रात… बहुत अच्छी थी।”
राजीव ने उसका हाथ पकड़ा। “बहुत अच्छी थी। और आगे भी अच्छी होगी।”
अंजलि ने हाथ छुड़ाया और सीढ़ियों से नीचे उतर गई। राजीव दरवाज़े पर खड़ा रहा, उसे जाते हुए देखता रहा। अंजलि ने नीचे जाकर पलटकर ऊपर देखा। दोनों की आँखें फिर मिलीं। अंजलि ने हाथ हिलाया। राजीव ने भी।
फिर अंजलि मुड़ी और सोसाइटी की तरफ चल पड़ी। राजीव दरवाज़े पर खड़ा रहा। उसे लगा कि उसका घर अब पहले जैसा खाली नहीं रहा। कुछ तो बदल गया था। कुछ अंदर आ गया था।
भाग १४: रात के बाद के दिन
उस दिन के बाद से राजीव और अंजलि का मिलना नियमित हो गया। हर रात, दांडिया के बाद, दोनों मिलते। कभी राजीव के फ्लैट में, कभी सोसाइटी के बाहर, कभी पंडाल की सूनी कुर्सियों पर बैठकर बातें करते।
अंजलि को अब राजीव के साथ रहने में एक अजीब-सी सुरक्षा मिलती थी। जो अकेलापन उसने पाँच साल से भोगा था, वो अब हल्का होने लगा था। राजीव भी अब खुश रहने लगा था। उसकी आँखों से वो उदासी गायब हो गई थी, जो पहले हमेशा रहती थी।
भाग १५: वो रात, फिर से
दोनों ने फिर से उसी फ्लैट में बिताई, जहाँ सब शुरू हुआ था। वही सोफ़ा, वही बेडरूम, वही चाँद। अंजलि ने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा —
“याद है? यहीं से शुरू हुआ था।”
राजीव ने उसे अंदर खींच लिया। “याद है। और आज वहीं से आगे बढ़ाएँगे।”
दोनों फिर एक-दूसरे के होंठों पर टिक गए। वही लंबा, गहरा, भरा हुआ चुंबन। जैसे पहली बार। अंजलि ने राजीव के बटन खोले, राजीव ने अंजलि के। कपड़े एक-एक करके उतरते गए। ब्रा उतरी, पैंटी उतरी, अंडरवियर उतरा।
दोनों नंगे होकर एक-दूसरे से चिपक गए। अंजलि ने राजीव के कान में फुसफुसाया, “आज कुछ नहीं रोकना।”
राजीव ने उसे गोद में उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। उसने अंजलि के पूरे शरीर को चूमा। माथे से लेकर पैरों की उँगलियों तक। अंजलि ने अपनी आँखें बंद कर लीं और हर स्पर्श को महसूस किया।
राजीव ने उसके गालों पर चुंबन किए, होंठों पर, गर्दन पर, कंधों पर, छाती पर। उसने अंजलि के स्तनों को चूसा, उनके निप्पलों को जीभ से सहलाया। अंजलि कराह उठी।
“आआह्ह्ह्ह… राजीव…” अंजलि ने कहा।
राजीव नीचे गया। उसने अंजलि के पेट पर चुंबन किए, नाभि पर, फिर जाँघों पर। अंजलि की जाँघें काँपीं। राजीव ने उसकी चूत को चूमा, चाटा, चूसा। अंजलि की चीखें गूँज उठीं।
“ओओओह्ह्ह्ह माय गॉड… ओह्ह्ह्ह… उफ़्फ़्फ़… हाय्य्यीई…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने उसे चरम तक पहुँचाया। अंजलि का शरीर झटकों से भर गया। फिर राजीव ऊपर आया और अंजलि के अंदर खुद को डाला। दोनों एक हो गए।
इस रात उन्होंने हर पोज़ीशन आज़माई। अंजलि ऊपर, राजीव ऊपर, करवट से, पीछे से, बैठकर, खड़े होकर। हर बार एक नया अहसास, एक नई आवाज़, एक नई मिठास।
अंजलि ने चिल्लाया — “आआआह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… राजीव… राजीव… ऐसे ही… ऐसे ही… मत रुको…”
राजीव ने कराहा — “अंजलि… तुम… तुम कमाल हो…”
दोनों कई बार चरम पर पहुँचे। हर बार एक-दूसरे को और करीब महसूस किया। पसीने से भीगे, थके, पर खुश। आख़िर में दोनों बिस्तर पर गिर पड़े। साँसें फूली हुईं। चादर बिखरी हुई।
अंजलि ने राजीव की छाती पर सिर रखा। “राजीव…”
“हूँ…”
“कल से हम एक हो जाएँगे।”
“हाँ।”
“डर लग रहा है?”
“नहीं।” राजीव ने कहा, “तुम्हारे साथ हूँ तो नहीं।”
अंजलि ने आँखें बंद कर लीं। उसे लगा कि उसका अकेलापन अब खत्म हो गया। पाँच साल की तन्हाई, पाँच साल का इंतज़ार, अब पूरा हो रहा था।
राजीव ने उसके बालों को सहलाया। “सो जाओ।”
“तुम भी।”
दोनों एक-दूसरे से चिपके सो गए। खिड़की से चाँद अब भी देख रहा था। जैसे वो भी गवाह बन गया हो उस प्यार का, जो अकेलेपन से शुरू हुआ था और अब कभी खत्म नहीं होने वाला था।
भाग १६: एक और रात — हर पल का हिसाब
(यहाँ से कहानी और गहराई में जाती है — हर पल, हर स्पर्श, हर आवाज़)
अगली रात दोनों फिर मिले। इस बार अंजलि ने खुद पहल की। दरवाज़ा खुलते ही उसने राजीव को दीवार से लगा दिया और उसके होंठों पर टूट पड़ी। राजीव हँसा।
“आज क्या हुआ?”
“बस मन कर रहा था।” अंजलि ने कहा और उसने राजीव की कमीज़ के बटन तोड़ने की कोशिश की।
“अरे, बटन तोड़ दोगी।”
“तोड़ दो।”
राजीव ने खुद बटन खोले। अंजलि ने उसकी छाती पर होंठ रख दिए। उसने राजीव के निप्पल को जीभ से छुआ। राजीव की साँस हकलाई।
“ओह्ह्ह्ह… अंजलि…” राजीव ने कहा।
अंजलि ने उसे सोफ़े की तरफ धकेला और उसके ऊपर बैठ गई। उसने राजीव की पैंट खोली, ज़िप खींची, और उसे नीचे खींचा। फिर उसने राजीव के अंडरवियर के ऊपर हाथ रखा और दबाया। राजीव ने आँखें बंद कर लीं।
“तुम्हारा…” अंजलि ने कहा, “अब और बड़ा लग रहा है।”
“तुम्हारी वजह से।” राजीव हाँफा।
अंजलि ने अंडरवियर नीचे खींचा और राजीव के लिंग को हाथ में लिया। उसने उसे धीरे-धीरे सहलाया, फिर झुककर उसे चूमा, फिर मुँह में लिया। राजीव की साँस फूल गई।
“आआह्ह्ह्ह… अंजलि… ऐसे ही…” राजीव ने कहा।
अंजलि ने लिंग को चूसा, चाटा, और ऊपर-नीचे किया। उसकी जीभ लिंग के चारों तरफ घूमती रही। राजीव ने उसके बाल पकड़ लिए। कुछ देर बाद अंजलि ने लिंग को मुँह से बाहर निकाला और राजीव की गोद में बैठ गई।
उसने अपनी पैंटी खुद खोली और उसे एक तरफ फेंक दिया। फिर उसने राजीव के लिंग को पकड़ा और अपनी चूत के मुँह पर रखा। धीरे-धीरे नीचे बैठने लगी। लिंग धीरे-धीरे उसके अंदर गया। अंजलि ने गहरी साँस ली।
“आआह्ह्ह्ह… हाँ… अंदर…” अंजलि ने कहा।
वो पूरी तरह नीचे बैठ गई। राजीव का लिंग पूरा अंदर चला गया। अंजलि कुछ पल रुकी, फिर ऊपर-नीचे होने लगी। धीरे से, फिर तेज़। उसके स्तन राजीव के चेहरे के सामने झूल रहे थे। राजीव ने उन्हें मुँह में लिया और चूसने लगा।
“ओओओह्ह्ह्ह… राजीव… ऐसे ही…” अंजलि चिल्लाई।
वो और तेज़ हो गई। सोफ़े की स्प्रिंग्स चरमराने लगीं। राजीव ने उसकी कमर पकड़ी और उसे सहारा दिया। अंजलि की कराहटें बढ़ गईं।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… ओह माय गॉड… हाय्य्यीई… ऊऊह्ह्ह्ह…” अंजलि चिल्ला रही थी।
कुछ देर बाद राजीव ने उसे उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और खुद ऊपर आ गया। उसने अंजलि की जाँघें खोलीं और फिर उसके अंदर खुद को डाला। इस बार उसने तेज़ झटके दिए। अंजलि की चीखें कमरे में गूँज उठीं।
“आआआह्ह्ह्ह… राजीव… और… और तेज़…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने और तेज़ किया। हर झटके के साथ बिस्तर चरमराता। अंजलि ने उसकी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। कुछ देर बाद दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे। राजीव अंजलि के ऊपर गिर पड़ा। दोनों हाँफ रहे थे।
कुछ देर बाद अंजलि ने कहा, “राजीव… तुमने आज कुछ नहीं छोड़ा।”
राजीव हँसा। “तुमने भी।”
“अब तो रोज़ ऐसे ही करेंगे।”
“रोज़?” राजीव ने पूछा।
“हाँ। रोज़।” अंजलि ने कहा और उसे चूम लिया।
भाग १९: एक और पूरी रात का हिसाब — हर पल
कुछ महीने बाद की बात है। उस रात अंजलि ने सोचा कि वो राजीव के लिए कुछ खास करेगी। उसने पूरा घर सजाया, मोमबत्तियाँ जलाईं, और अपने लिए एक नई ड्रेस पहनी — काली, जिसमें वो और भी सुंदर लग रही थी।
राजीव जब घर आया, तो वो देखकर रुक गया। “अंजलि… ये सब?”
“तुम्हारे लिए।”
राजीव ने उसे देखा। उसकी आँखें नहीं हट रही थीं। “तुम… बहुत सुंदर हो।”
“पता है।” अंजलि ने कहा और मुस्कुराई।
राजीव ने उसे पकड़कर अपनी तरफ खींचा और चूम लिया। अंजलि ने भी उसे चूमा। दोनों बेडरूम में गए।
राजीव ने धीरे-धीरे अंजलि की ड्रेस की ज़िप खोली। ड्रेस उतर गई। अंजलि ने ब्रा पहनी हुई थी, जो राजीव की पसंदीदा थी। राजीव ने उसे देखा और उसकी साँस भारी हो गई।
“अंजलि…” राजीव ने कहा।
अंजलि ने उसके होंठों पर उँगली रखी। “श्श्श… आज बोलो मत। बस करो।”
राजीव ने सिर हिलाया और उसके कंधों पर चुंबन किए। उसने ब्रा की पट्टी खोली। ब्रा गिर गई। अंजलि की छाती सामने थी। राजीव ने उसके स्तनों को हाथों में लिया और उन्हें धीरे-धीरे दबाया। फिर उनके निप्पलों को जीभ से छुआ।
अंजलि की साँस हकलाई। “आह्ह्ह्ह…” वो धीरे से कराही।
राजीव ने उसे बिस्तर पर लिटाया। उसने अंजलि की पैंटी उतारी। अंजलि अब नंगी थी। राजीव ने उसके पूरे शरीर को देखा। फिर उसने अपने कपड़े उतारे। वो भी नंगा हो गया।
वो अंजलि के ऊपर आया और उसके होंठों को चूमा। फिर उसके गालों को, गर्दन को, कंधों को। उसने अंजलि के स्तनों को चूसा — पहले बाएँ, फिर दाएँ। अंजलि कराहती रही।
“आआह्ह्ह्ह… हाँ… वहीं…” अंजलि ने कहा।
राजीव नीचे गया। उसने अंजलि के पेट को चूमा, नाभि को चाटा। अंजलि की देह काँपी। फिर राजीव ने उसकी जाँघों पर चुंबन किए। अंजलि ने अपनी जाँघें खोल दीं।
राजीव ने उसकी चूत को चूमा। पहले हल्के से, फिर गहरा। उसकी जीभ अंजलि की चूत पर फिरने लगी। अंजलि की चीखें गूँज उठीं।
“ओओओह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… राजीव…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने उसकी भगशिश्न को होंठों में लिया और चूसा। अंजलि की जाँघें काँपीं। उसने अपने हाथ राजीव के सिर पर रख दिए और उसे दबाया।
“हाँ… हाँ… ऐसे ही… और…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने अपनी जीभ अंदर तक डाली। अंजलि की चूत अब गीली हो चुकी थी। राजीव ने उसे चाटा, चूसा, और अंदर-बाहर किया। अंजलि कुछ ही देर में चरम पर पहुँच गई।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… ओओओह्ह्ह्ह…” अंजलि चिल्लाई और उसका शरीर काँप उठा।
राजीव ने उसे चाटते रहा जब तक अंजलि ने उसे हटाया नहीं। फिर वो ऊपर आया और उसने अपने लिंग को अंजलि की चूत पर रखा।
“तैयार?” राजीव ने पूछा।
“हाँ… डालो…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने धीरे से अंदर डाला। अंजलि ने गहरी साँस ली। फिर राजीव ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर होना शुरू किया। अंजलि की चूत उसे कसकर पकड़ रही थी।
“आह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह… राजीव…” अंजलि कराही।
राजीव ने गति बढ़ाई। अब झटके तेज़ थे। अंजलि के स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। राजीव ने उन्हें पकड़ लिया और दबाया।
“ऊऊह्ह्ह्ह… हाय्य्यीई… ओह्ह्ह्ह…” अंजलि चिल्लाने लगी।
राजीव ने उसकी कमर पकड़ी और उसे और कसकर अपनी तरफ खींचा। अंजलि ने अपनी जाँघें उसकी कमर पर लपेट दीं। अब हर झटका गहरा था। अंजलि की चीखें तेज़ हो गईं।
“आआआह्ह्ह्ह… राजीव… और… और तेज़… मत रुको…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने और तेज़ किया। बिस्तर चरमराने लगा। अंजलि ने राजीव की पीठ पर नाखून गड़ाए। कुछ देर बाद वो फिर चरम पर पहुँची। उसका शरीर झटकों से भर गया।
राजीव ने भी कुछ और झटके दिए और फिर खुद को छोड़ दिया। वो अंजलि के ऊपर गिर पड़ा।
कुछ देर दोनों हाँफते रहे। फिर राजीव ने करवट ली और अंजलि को अपनी बाँहों में लिया।
“अंजलि… आज तुमने कमाल कर दिया।” राजीव ने कहा।
“तुमने भी।” अंजलि ने कहा और मुस्कुराई।
“थक गई?”
“थोड़ी। पर अच्छी थकान है।”
राजीव ने उसके माथे पर चुंबन किया। “सो जाओ।”
अंजलि ने आँखें बंद कर लीं। राजीव उसे देखता रहा। उसे लगा कि वो दुनिया का सबसे खुशनसीब आदमी है।
भाग २०: एक और रात — नए अनुभव
कुछ दिन बाद अंजलि ने राजीव से कहा, “राजीव, आज कुछ नया करते हैं।”
“क्या?”
“तुम बताओ।”
राजीव ने सोचा। “ठीक है।”
उस रात राजीव ने कुछ अलग किया। उसने अंजलि की आँखों पर पट्टी बाँध दी। अंजलि हँसी।
“क्यों?”
“ताकि तुम सिर्फ महसूस करो। देखो मत।”
अंजलि ने सिर हिलाया। राजीव ने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके कपड़े धीरे-धीरे उतारे। अंजलि को अंधेरे में हर स्पर्श और तेज़ महसूस हो रहा था। राजीव की उँगलियाँ उसकी त्वचा पर फिरतीं तो वो काँपती।
“आह्ह्ह्ह…” अंजलि धीरे से कराही।
राजीव ने उसके पूरे शरीर को धीरे-धीरे छुआ। कभी हल्के से, कभी थोड़ा ज़ोर से। अंजलि को पता नहीं था कि अगला स्पर्श कहाँ होगा। हर स्पर्श एक नया अहसास था।
राजीव ने उसके होंठों को चूमा। फिर उसके गाल, गर्दन, कंधे। फिर उसके स्तन। अंजलि की साँस तेज़ हो गई।
“राजीव…” अंजलि ने फुसफुसाया।
“बोलो मत।” राजीव ने कहा।
राजीव ने उसके निप्पलों को जीभ से छुआ, फिर चूसा। अंजलि की देह काँपी। फिर राजीव नीचे गया और उसकी चूत को चूमा। अंधेरे में अंजलि को ये स्पर्श और भी गहरा लगा। वो ज़ोर से कराह उठी।
“ओओओह्ह्ह्ह… राजीव… ओह माय गॉड…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने उसे चाटा, चूसा। अंजलि कुछ ही देर में चरम पर पहुँच गई। उसका शरीर झटकों से भर गया। राजीव ने उसे रुकने नहीं दिया।
फिर उसने अंजलि की पट्टी खोली। अंजलि ने आँखें खोलीं। सामने राजीव था। अंजलि ने उसे देखा और मुस्कुराई।
“अच्छा था।” अंजलि ने कहा।
“अभी और है।” राजीव ने कहा।
उसने अंजलि को करवट दिलाई और उसके पीछे से खुद को डाला। अंजलि ने गहरी साँस ली। ये अहसास अलग था। गहरा, कसा हुआ। राजीव ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर होना शुरू किया। अंजलि की कराहटें गहरी थीं।
“आआह्ह्ह्ह… राजीव… ऐसे ही…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने उसके स्तनों को पीछे से पकड़ लिया और दबाया। अंजलि की साँस और तेज़ हो गई। राजीव ने गति बढ़ाई। अब झटके तेज़ थे। अंजलि के कूल्हे उससे टकराने लगे।
“ऊऊह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह… हाय्य्यीई…” अंजलि चिल्लाने लगी।
राजीव ने और तेज़ किया। अंजलि ने अपना हाथ नीचे ले जाकर अपनी चूत को सहलाया। दोनों तरफ से उत्तेजना। कुछ देर बाद अंजलि फिर चरम पर पहुँची।
राजीव ने भी खुद को छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से चिपके रहे।
“राजीव… आज तो तुमने कमाल कर दिया।” अंजलि ने हाँफते हुए कहा।
“तुमने भी।” राजीव ने कहा।
दोनों बिस्तर पर लेट गए। अंजलि ने राजीव की छाती पर सिर रखा। “अब हर रात कुछ नया करेंगे।”
“हाँ।” राजीव ने कहा।
भाग २१: अंत या शुरुआत
समय बीतता गया। अंजलि और राजीव की ज़िंदगी सामान्य हो गई। सुबह ऑफिस, शाम घर, रात एक-दूसरे के साथ। पर हर रात में कुछ न कुछ नया था। कभी कोई नया पोज़ीशन, कभी कोई नया स्पर्श, कभी कोई नई बात।
अंजलि ने एक दिन राजीव से कहा, “राजीव, तुम्हें पता है… जब हम पहली बार मिले थे, तो मुझे लगा था कि तुम बस एक और आदमी हो। जो नाम ढूँढने आया है।”
“और अब?” राजीव ने पूछा।
“अब लगता है कि तुम मेरी पूरी दुनिया हो।”
राजीव ने उसे गले लगा लिया। “तुम भी।”
अंजलि ने आँखें बंद कर लीं। उसे लगा कि उसका अकेलापन अब हमेशा के लिए खत्म हो गया। जो रात उस पंडाल की कुर्सियों पर शुरू हुई थी, वो अब एक ज़िंदगी बन गई थी।
और हर रात, जब दोनों एक-दूसरे से चिपके सोते, तो उन्हें लगता कि वो पहली रात ही है। वही चुंबन, वही स्पर्श, वही मिठास। बस अब हर रात वो पहली रात नहीं थी, बल्कि हर रात एक नई शुरुआत थी।
वो चेकिंग डेस्क
अगले साल फिर दांडिया आया। उसी सोसाइटी में, उसी पंडाल में। अंजलि फिर चेकिंग डेस्क पर थी। और राजीव फिर उसके सामने खड़ा था।
“नाम?” अंजलि ने पूछा, जैसे किसी अजनबी से।
“राजीव।” राजीव ने कहा।
“फ्लैट नंबर?”
“वही जो पिछले साल था। जहाँ तुम आई थी।”
अंजलि मुस्कुराई। “अच्छा। और आज किसको ढूँढना है?”
राजीव ने डेस्क पर झुककर उसके कान में फुसफुसाया, “आज कुछ नहीं ढूँढना। आज तुम्हें ले जाना है।”
अंजलि हँसी। “तो शर्मा जी का बहाना?”
“आज भी बना लेंगे।”
दोनों हँसे। पंडाल में ढोल बज रहा था। लोग झूम रहे थे। लाइटें चमक रही थीं। और इन दोनों के बीच, भीड़ के बीच, वो पल फिर आया जब सब कुछ रुक जाता है। दोनों की आँखें मिलीं। और फिर…
राजीव ने अंजलि का हाथ पकड़ लिया। अंजलि ने उसे कसकर थाम लिया। कोई नहीं बोला। बस हाथों में हाथ। और दिलों में वो बात, जो शब्दों से बड़ी थी।
भीड़ छँटने लगी। लाइटें बुझने लगीं। और दोनों चल पड़े उसी रास्ते पर, जो एक साल पहले शुरू हुआ था। उस फ्लैट की तरफ। जहाँ सब शुरू हुआ था। जहाँ हर रात एक नई कहानी बनती थी।
रास्ते में अंजलि ने कहा, “राजीव, आज कुछ खास करेंगे?”
“हाँ।” राजीव ने कहा, “आज वो सब करेंगे जो पिछले साल की पहली रात में किया था।”
अंजलि ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। “ठीक है। पर आज रुकेंगे नहीं।”
“नहीं रुकेंगे।”
दोनों हँसे और चलते रहे। रात गहरी थी। चाँद ऊपर था। और दोनों की परछाइयाँ सड़क पर एक हो गई थीं।
अंतिम भाग: वो रात, हर पल
फ्लैट में घुसते ही राजीव ने अंजलि को दीवार से लगाकर चूम लिया। अंजलि ने भी उसे चूमा। दोनों के हाथ एक-दूसरे के कपड़ों पर फिरने लगे।
राजीव ने अंजलि की कुर्ती के बटन तोड़ दिए। अंजलि ने राजीव की कमीज़ खींच ली। दोनों जल्दी में थे, फिर भी धीरे।
“धीरे… राजीव… धीरे…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने धीमा किया। दोनों ने एक-दूसरे के कपड़े धीरे-धीरे उतारे। ब्रा उतरी, पैंटी उतरी, अंडरवियर उतरा। दोनों नंगे हो गए।
राजीव ने अंजलि को गोद में उठाया और बेडरूम में ले गया। उसने उसे बिस्तर पर लिटाया। फिर उसने उसके पूरे शरीर को चूमा — माथे से पैरों तक।
अंजलि ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने हर स्पर्श को महसूस किया। राजीव के होंठ उसके गालों पर, गर्दन पर, छाती पर, पेट पर, जाँघों पर फिर रहे थे। हर चुंबन एक अलग अहसास।
“आह्ह्ह्ह…” अंजलि धीरे से कराही।
राजीव ने उसकी चूत को चूमा। पहले हल्के से, फिर गहरा। उसकी जीभ अंदर तक गई। अंजलि की देह काँपी।
“ओओओह्ह्ह्ह… राजीव…” अंजलि चिल्लाई।
राजीव ने उसे चाटा, चूसा। अंजलि कुछ ही देर में चरम पर पहुँच गई। उसका शरीर झटकों से भर गया।
फिर राजीव ऊपर आया। उसने अपना लिंग अंजलि की चूत पर रखा। “तैयार?”
“हाँ… डालो… पूरा डालो…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने धीरे से पूरा अंदर डाला। अंजलि ने गहरी साँस ली। फिर राजीव ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर होना शुरू किया। अंजलि की चूत उसे पूरी तरह ले रही थी।
“आआह्ह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही…” अंजलि ने कहा।
राजीव ने गति बढ़ाई। अब झटके तेज़ थे। अंजलि की चीखें गूँज उठीं।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… ओह माय गॉड… ऊऊह्ह्ह्ह… हाय्य्यीई… उफ़्फ़्फ़…” अंजलि चिल्ला रही थी।
राजीव ने उसकी कमर पकड़ी और और तेज़ किया। अंजलि ने अपनी जाँघें उसकी कमर पर लपेट दीं। अब हर झटका गहरा था। अंजलि की चीखें और तेज़ हो गईं।
कुछ देर बाद अंजलि ऊपर आ गई। वो राजीव पर बैठ गई और ऊपर-नीचे होने लगी। उसके स्तन झूल रहे थे। राजीव ने उन्हें पकड़ लिया।
“ओओओह्ह्ह्ह… राजीव… ऐसे… अंदर तक…” अंजलि चिल्लाई।
वो और तेज़ हो गई। कुछ देर बाद दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे। अंजलि राजीव के ऊपर गिर पड़ी।
फिर दोनों ने करवट से किया। फिर पीछे से। हर बार एक नया अहसास। हर बार एक नई आवाज़। अंजलि ने चिल्लाया — “आआआह्ह्ह्ह… ओह माय गॉड… राजीव… मत रुको…” राजीव ने कराहा — “अंजलि… तुम… तुम कमाल हो…”
आख़िर में दोनों बिस्तर पर गिर पड़े। साँसें फूली हुईं। पसीने से भीगे। पर खुश।
अंजलि ने राजीव की छाती पर सिर रखा। “राजीव…”
“हूँ…”
“ये रात भी पहली रात जैसी थी।”
राजीव ने उसके बालों को सहलाया। “हर रात पहली रात जैसी है।”
अंजलि ने आँखें बंद कर लीं। “अब कभी अलग नहीं होंगे।”
“कभी नहीं।”
दोनों एक-दूसरे से चिपके सो गए। खिड़की से चाँद देख रहा था। पंडाल की लाइटें अब बुझ चुकी थीं। पर इन दोनों के अंदर एक रोशनी जल रही थी, जो कभी नहीं बुझेगी।
ये कहानी उस अकेलेपन की है, जो हर इंसान के अंदर होता है। और उस प्यार की, जो किसी को ढूँढने से नहीं मिलता, बल्कि अपने आप मिल जाता है — किसी दांडिया की रात में, किसी चेकिंग डेस्क पर, किसी शर्मा जी के बहाने से।
अंजलि और राजीव की कहानी एक चुदाई से नहीं। ये कहानी दो अकेले लोगों की मुलाकात से शुरू हुई, जो एक-दूसरे के अकेलेपन को पहचान गए। और फिर जो हुआ — वो हर पल, हर स्पर्श, हर चुंबन, हर कराहट — वो उस पहचान का ही नतीजा था।
New Sex Story :- करवाचौथ की रात पड़ोसन के साथ
New Sex Story :- Metro Sex Story: नोएडा से द्वारका तक की चुदाई