अंजलि और राजीव एक ही सोसाइटी में रहते हैं, लेकिन कभी बात नहीं हुई। आरव वर्क-फ्रॉम-होम कर रहा है और शोर से परेशान है। पहली रात वो शिकायत करने पंडाल जाता है, लेकिन मेधा को अकेले पूरा मैनेजमेंट संभालते देख चुपचाप मदद करने लगता है। 9 दिनों में बिना किसी बड़े प्रपोजल के, काम बांटते-बांटते दोनों के बीच एक सहज समझ और कम्फर्ट बनने लगा। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
नवरात्रि का नवां दिन था। सोसाइटी के कंपाउंड में पंडाल लगा हुआ था, और डीजे की आवाज़ें दीवारों से टकरा कर आरव के फ्लैट की खिड़कियों तक पहुँच रही थीं। आरव लैपटॉप पर बैठा था, क्लाइंट की डेडलाइन सर पर थी, और नीचे से “आजा रे आजा” की धुन उसके दिमाग की नसों को खींच रही थी।
“बस… अब तो हद हो गई,” उसने हेडफोन उतार दिया और घड़ी देखी — रात के ग्यारह बज रहे थे।
वो उठा, चप्पल पहनी, और सीधे नीचे पंडाल की तरफ बढ़ा। मन में सोच रहा था — जो भी हो, एक बार अच्छे से शिकायत कर दूँगा। पंडाल के बाहर भीड़ थी, लेकिन अंदर वॉलंटियर्स की टीम कुछ मैनेज कर रही थी। और उनके बीच, एक लड़की।
मेधा।
उसने सिर पर दुपट्टा लपेटा हुआ था, हाथों में क्लिपबोर्ड, और चेहरे पर वो थकान थी जो शिकायत नहीं करती — बस काम करती है। वो एक साथ तीन लोगों को इंस्ट्रक्शन दे रही थी, प्रसाद का हिसाब देख रही थी, और साउंड वाले को इशारा कर रही थी कि वॉल्यूम थोड़ा कम करे।
आरव वहीं खड़ा रह गया। शिकायत करना भूल गया।
“कुछ चाहिए?” — मेधा ने पलटकर देखा, आवाज़ में थकान थी लेकिन तीखापन नहीं।
“अरे वो… शोर…” आरव हड़बड़ा गया।
“हाँ, मालूम है। ऊपर वाले फ्लैट में हो न आप? नाइन-बी?” उसने पूछा।
“हाँ… पर तुम्हें कैसे—”
“शिकायतें तो रोज़ आती हैं। पर अभी बंद नहीं कर सकती, आरती का टाइम है।” फिर वो मुस्कुराई, और वो मुस्कान… थकी हुई थी, पर सच्ची। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
आरव ने कुछ सोचा, फिर कहा — “तो मैं चुपचाप कुछ कर सकता हूँ? हाथ बटा दूँ?”
मेधा ने एक पल उसे देखा। फिर क्लिपबोर्ड से एक पर्ची निकाली और उसकी तरफ बढ़ा दी।
“प्रसाद की लाइन यहाँ है। गिनती लिखते जाओ। और हाँ — पानी की बोतलें भी आ रही हैं, उन्हें गिनना।”
आरव ने सिर हिलाया और वहीं खड़ा हो गया।
भाग 2 — नौ दिन, बिना प्रपोजल, बिना शब्द
पहली रात — दोनों ने बस काम किया। बात कम, नज़रें ज़्यादा।
दूसरी रात — आरव समय से पहले आ गया। मेधा ने पूछा, “इतनी जल्दी?”
“अच्छा लग रहा है,” आरव ने कहा, और दोनों हँस पड़े।
तीसरी रात — मेधा ने आरव को चाय बनाकर दी। आरव ने कहा, “तुम बहुत कुछ अकेले संभाल रही हो।”
“और तुम कुछ कहे बिना संभाल रहे हो,” मेधा ने जवाब दिया। दोनों के बीच एक खामोशी आई, पर वो खामोशी भरी हुई थी।
चौथी, पाँचवीं, छठी रात — काम बंटता गया। मेधा प्रसाद संभालती, आरव लाइट और साउंड का ध्यान रखता। मेधा भूल जाती कि वो अकेली है, आरव भूल जाता कि उसे शोर से परेशान होना था।
सातवीं रात — मेधा ने थकान से सिर दीवार पर टिकाया। आरव ने चुपचाप अपना दुपट्टा नहीं, अपनी शर्ट की आस्तीन उतारकर उसे हवा की तरफ कर दी। मेधा ने देखा, और मुस्कुरा दी।
आठवीं रात — दोनों देर तक बैठे रहे, बातें कीं — कॉलेज, परिवार, नौकरी, और वो सपने जो अब भी अधूरे हैं।
नौवीं रात — आखिरी रात। पंडाल खाली हो रहा था, डेकोरेशन उतर रहा था। और दोनों के बीच वो समझ बन चुकी थी जिसे शब्द नहीं चाहिए।
“कल से शोर नहीं होगा,” मेधा ने कहा।
“तो कल से क्या मिलने आऊँ?” आरव ने पूछा।
मेधा ने उसकी आँखों में देखा और कहा — “आ जाओ।”
भाग 3 — वो रात, जब सब कुछ बदल गया
आरव उस रात साढ़े दस बजे पहुँचा। मेधा का फ्लैट छोटा था, लेकिन साफ-सुथरा। दीवार पर एक छोटा-सा स्ट्रिंग लाइट था, जिसकी रोशनी बहुत धीमी थी। बाहर से पंडाल की आखिरी आवाज़ भी आ रही थी।
“बैठो,” मेधा ने कहा। दोनों बैठे।
बातें चलीं। फिर चाय आई। फिर चाय खत्म हुई। और फिर… खामोशी।
मेधा ने घड़ी देखी — रात के बारह बजने वाले थे।
“बहुत देर हो गई,” उसने कहा।
“हाँ,” आरव ने कहा, पर उठा नहीं।
मेधा ने उसे देखा — सीधे, बिना पलक झपकाए। और आरव ने भी। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
बस उसी पल, बिना किसी सवाल के, दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। और फिर… दोनों के लबों ने एक लंबा, गहरा, बेहिसाब चुंबन लिया।
पहले तो बस होंठ छुए — नरम, गीले, कांपते हुए। जैसे दोनों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये हो रहा है। मेधा की साँस आरव के होंठों पर टकरा रही थी, और आरव की उंगलियाँ हवा में तैर रही थीं — कहाँ रखें, कहाँ छुएँ, समझ नहीं आ रहा था।
फिर आरव ने हिम्मत की। अपनी उंगलियाँ मेधा की गर्दन पर रखीं। ठंडी थीं उसकी उंगलियाँ, और मेधा की गर्दन गर्म। उस स्पर्श से मेधा की रीढ़ तक कंपन दौड़ गई — एक झटका सा, जो सिर से पैरों तक उतर गया।
मेधा ने आँखें बंद कर लीं। और आरव ने भी।
चुंबन गहरा होता गया। अब बस होंठ नहीं थे — अब जबड़े खुल रहे थे, जीभें टकरा रही थीं, और दोनों की साँसें एक-दूसरे में घुल रही थीं। मेधा की उंगलियाँ आरव के बालों में फँस गईं, और आरव की उंगलियाँ उसकी कमर पर।
“म्म्म्म…” — मेधा के होंठों से आवाज़ निकली, दबी हुई, गले के अंदर से।
आरव ने चुंबन तोड़ा, बस एक पल के लिए, और उसकी आँखों में देखा। मेधा की आँखें भीगी हुई थीं। दोनों हाँफ रहे थे।
“क्या हुआ?” मेधा ने फुसफुसाया।
“कुछ नहीं… बस देखना था,” आरव ने कहा।
मेधा मुस्कुरा दी। और फिर खुद आगे बढ़कर उसने आरव को चूमा — इस बार और गहरा, और ज़्यादा बेसब्र।
भाग 4 — कपड़े उतरना शुरू हुए
आरव ने मेधा की कमर पर रखी उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर सरकाईं। कुर्ते के नीचे से उसकी पीठ तक पहुँचीं — नरम, सपाट, गर्म पीठ। मेधा ने एक गहरी साँस ली, और उसकी पीठ पर रोंगटे खड़े हो गए।
आरव ने कुर्ते का किनारा पकड़ा और धीरे से ऊपर की तरफ खींचा। मेधा ने अपनी बाँहें ऊपर कर दीं, और कुर्ता उसके सिर से पार होकर ज़मीन पर गिर गया।
अब सामने थी — बस एक काली स्पोर्ट्स ब्रा में। कंधे नंगे, गले से लेकर सीने तक की लकीर साफ दिख रही थी, और साँसों की हलचल ब्रा के कपड़े पर साफ महसूस हो रही थी।
आरव की आँखें वहीं टिक गईं।
“क्या देख रहे हो?” मेधा ने शरारत से पूछा।
“तुम्हें,” आरव ने सीधा जवाब दिया।
मेधा ने आरव की शर्ट का बटन खोलना शुरू किया — एक-एक करके, बिना जल्दी किए। हर बटन खुलने पर उसकी उंगलियाँ आरव की छाती को छूतीं, और आरव की साँसें भारी होती जातीं। जब आखिरी बटन खुला, तो मेधा ने दोनों हाथों से शर्ट खोल दी और आरव की छाती पर अपना होंठ रख दिया — बिल्कुल बीचों-बीच। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
“ओह… मेधा…” — आरव की आवाज़ लड़खड़ा गई।
मेधा ने उसकी छाती पर हल्के-हल्के चुंबन दिए — एक, दो, तीन… और नीचे पेट की तरफ बढ़ने लगी। आरव ने शर्ट उतार फेंकी और मेधा को अपनी बाँहों में भर लिया। दोनों के नंगे शरीर एक-दूसरे से टकराए — गर्म, पसीने से भीगे, और कांपते हुए।
भाग 5 — ब्रा उतरी
आरव ने मेधा के कंधे पर हाथ रखा और उसे पलट दिया। अब मेधा की पीठ उसकी तरफ थी। ब्रा का हुक ठीक सामने था।
आरव की उंगलियाँ कांप रही थीं। उसने हुक पकड़ा, एक झटके में खोल दिया। ब्रा ढीली पड़ी और मेधा ने उसे सामने से पकड़कर हटा दिया।
अब मेधा बिल्कुल नंगी थी — ऊपर से।
आरव ने उसे पलटा। और देखा।
दो गोल, भरे हुए, थोड़े झुके हुए स्तन। उनके बीच में गुलाबी-भूरे निप्पल, जो ठंडक और उत्तेजना से सख्त हो चुके थे। मेधा ने शर्म से बाँहें ऊपर कर लीं, पर आरव ने धीरे से उन्हें नीचे किया।
“मत छुपाओ,” उसने कहा।
और फिर झुककर उसने मेधा के बाएँ स्तन को मुँह में ले लिया।
मेधा की पूरी देह एक झटके में काँप उठी। उसका सिर पीछे झुक गया, और गले से एक लंबी आवाज़ निकली — “आआआह्ह्ह्ह्ह…”
आरव ने जीभ से उसके निप्पल को घुमाया, चूसा, दाँतों से हल्के-हल्के दबाया। और मेधा… मेधा बस हाँफ रही थी। एक हाथ से उसने आरव का सिर पकड़ रखा था, जैसे छोड़ना नहीं चाहती।
“उफ़्फ़… आरव… धीरे… पर और…” — मेधा की आवाज़ मदहोश थी।
आरव ने दूसरे स्तन पर जा पहुँचा। इस बार और बेसब्री से, और भूख से। उसने पूरा निप्पल मुँह में भर लिया, जीभ से दबाया, और तेज़-तेज़ चूसने लगा। मेधा की देह ने एक और झटका लिया। उसने आरव का सिर दोनों हाथों से पकड़कर अपने सीने की तरफ दबा दिया — जैसे और भीतर तक चाहिए।
“आआआह्ह्ह्ह… हाय्य्ए… आरव, तेरा मुँह… ओह्ह्ह्ह…” — मेधा के होंठ काँप रहे थे, आवाज़ गले में अटक रही थी।
आरव ने चूसना जारी रखा — बाएँ, दाएँ, फिर बाएँ। हर बार निप्पल छोड़ते ही वो चिकना, गीला और और सख्त हो जाता था। मेधा की पीठ धीरे-धीरे झुकती जा रही थी, और वो आरव की गोद में ही पस्त होने लगी थी।
आरव ने चूसना छोड़ा और जीभ नीचे की तरफ सरकाई — स्तन के नीचे, फिर पेट पर। उसकी जीभ नाभि तक पहुँची और वहीं रुक गई। मेधा ने गहरी साँस ली, पेट अंदर खींच लिया, और आँखें बंद कर लीं। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
“आगे बढ़ो…” — मेधा ने फुसफुसाया।
आरव के हाथ अब उसकी कमर पर थे। उसने मेधा की लेगिंग के इलास्टिक को पकड़ा और धीरे-धीरे नीचे की तरफ खींचना शुरू किया। मेधा ने कूल्हे उठा दिए, और लेगिंग घुटनों से सरककर पैरों तक आ गई। फिर आरव ने उसे पूरी तरह उतार फेंका।
अब मेधा सिर्फ एक चड्डी में थी। और वो चड्डी भी… भीगी हुई।
आरव ने देखा — कपड़े पर एक गहरा धब्बा बन चुका था। उसने धीरे से चड्डी के ऊपर से उंगली फेरी, और मेधा की साँस एक बार फिर लड़खड़ा गई।
“उफ़्फ़्फ़…” — वो कराही।
“इतनी गीली हो?” आरव ने पूछा, आवाज़ में मुस्कान।
“तेरे से ही तो…” मेधा ने आँखें बंद किए हुए जवाब दिया।
आरव ने चड्डी की दोनों तरफ उंगलियाँ डालीं और नीचे खींच दिया। मेधा ने पैरों से उसे पूरी तरह निकाल दिया। और अब… अब वो पूरी तरह नंगी थी।
भाग 7 — चूत पहली बार देखी
आरव ने पीछे हटकर देखा।
मेधा की जाँघों के बीच, बालों के नीचे, वो चीज़ थी जिसके लिए पूरी रात तैयारी चल रही थी। होंठ भरे हुए, गुलाबी, गीले — और बीच की दरार से रस धीरे-धीरे बह रहा था। मेधा ने शर्म से जाँघें थोड़ी सिकोड़ लीं।
“खोलो,” आरव ने कहा।
मेधा ने धीरे से जाँघें खोल दीं। और आरव ने उसे पूरा देखा — बिना पलक झपकाए, बिना जल्दी किए।
“क्या देख रहे हो इतना?” मेधा ने हँसते हुए पूछा।
“तुझे। पूरी तरह।”
और फिर आरव झुक गया। अपना चेहरा उसकी जाँघों के बीच ले गया। पहले उसने बाहर के होंठों पर अपना होंठ रखा — बस एक हल्का चुंबन। मेधा की पूरी देह में करंट दौड़ गया।
“ओह्ह्ह्ह… आरव…” — उसकी आवाज़ चीख बन गई।
आरव ने जीभ बाहर निकाली और नीचे से ऊपर की तरफ एक लंबी लकीर खींच दी। मेधा की पीठ चारपाई से उठ गई। उसने अपनी उंगलियाँ आरव के बालों में घुसा दीं और कसकर पकड़ लिया। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
“आआआह्ह्ह्ह… हाय्य्ए… ओह्ह्ह्ह माय गॉड…” — मेधा ने चिल्ला दिया।
आरव ने जीभ को उसके भीगे होंठों के बीच फिसलाया। वहाँ गर्मी थी, नमी थी, और एक मीठी-सी महक भी। वो धीरे-धीरे चाटने लगा — नीचे से ऊपर, फिर ऊपर से नीचे। और मेधा… मेधा बस काँप रही थी।
“उफ़्फ़्फ़… और… और कर…” — वो कराह रही थी।
आरव ने ऊपर की तरफ एक छोटा, गोल, उभरा हुआ दाना ढूँढ निकाला। जैसे ही जीभ उस पर टिकी, मेधा की पूरी कमर उठ गई — जैसे बिजली का झटका।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह फक… यही… यहीं रुक जा…” — मेधा की आवाज़ टूट गई।
आरव ने उस दाने को जीभ से घुमाया, फिर हल्के-हल्के चूसा। हर चूस के साथ मेधा के पेट की मांसपेशियाँ खिंचतीं और ढीली पड़ जातीं। उसका हाथ आरव के सिर पर दबाव डाल रहा था, जैसे और गहरा चाहिए।
“रुक नहीं सकती… रुक नहीं सकती…” — मेधा ने बुदबुदाया।
आरव ने दो उंगलियाँ नीचे की तरफ सरकाईं और उसके अंदर डाल दीं। पहली उंगली — धीरे से। मेधा ने एक लंबी, गहरी साँस ली और उसकी आँखें भर आईं।
“आआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह ये… ये अच्छा है…” — उसने कराहते हुए कहा।
आरव ने उंगलियाँ अंदर-बाहर करना शुरू किया — धीमा,
aur aage
Venice
भाग 8 — उंगलियों की खेल
आरव ने उंगलियाँ अंदर-बाहर करना शुरू किया — धीमा, गहरा, और पूरी तरह लय में। हर बार अंदर जाते हुए वो दीवारों को छूतीं, और मेधा की कमर एक-एक इंच ऊपर उठती। भीतर का रस अब बहकर उसकी जाँघों तक आ चुका था, और उंगलियों की हर हलचल पर एक चटपटी-सी आवाज़ बन रही थी।
“चच्च… चप… चप…” — वो आवाज़ मेधा को और पागल कर रही थी।
“आरव… ओह्ह्ह्ह… तेरी उंगलियाँ… हाय्य्ए…” — मेधा की आवाज़ दबी हुई थी, जैसे गला भर आया हो।
आरव ने अब दो उंगलियाँ डाल दीं। भीतर की दीवारें गीली और गर्म थीं, और उनमें एक लयबद्ध कसाव था — हर बार जब उंगलियाँ अंदर जातीं, वो दीवारें उन्हें जकड़ लेतीं। आरव की साँस भी भारी हो चुकी थी। उसने जीभ से ऊपर वाला दाना चूसते हुए उंगलियों की गति तेज़ कर दी।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह माय गॉड… आरव… ये… ये तो…” — मेधा की पूरी देह अब काँप रही थी। उसने आँखें बंद कर लीं, और उसके होंठ बिना आवाज़ के खुलते-बंद हो रहे थे।
आरव ने उंगलियों को ऊपर की तरफ मोड़कर भीतर एक खास जगह छूई — वो छोटा-सा उभरा हुआ टुकड़ा। मेधा ने एक झटके से आँखें खोल दीं और आरव की तरफ देखा।
“वो क्या था?” — उसकी आवाज़ हकलाई।
“पता है,” आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, और फिर उसी जगह पर उंगलियों से हल्का-हल्का दबाव डालना शुरू किया — रुक-रुक कर, हर बार थोड़ा और।
मेधा की साँस अब और तेज़ हो चुकी थी। उसके पेट की मांसपेशियाँ खिंचने लगीं, पैरों की उंगलियाँ मुड़ने लगीं, और गले से लगातार आवाज़ें निकल रही थीं — “उफ़्फ़्फ़… हाय्य्ए… ओह्ह्ह्ह… आरव… आरव… रुक जा वरना…”
“वरना क्या?” आरव ने पूछा, और उंगलियों की गति और तेज़ कर दी।
“वरना… आआआह्ह्ह्ह… हो जाएगा… ओह्ह्ह्ह माय गॉड… हो जाएगा…” — मेधा की आवाज़ अब चीख बन गई।
और फिर हो गया।
मेधा की पूरी देह एक झटके से ऊपर उठी — कमर, पीठ, गर्दन — सब एक तरफ मुड़ गए। उसने आरव का सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया और अपनी जाँघों में कस लिया। उसके अंदर की दीवारें लगातार सिकुड़ने लगीं — एक, दो, तीन… और मेधा ने लंबी, टूटी हुई आवाज़ में चीखा —
“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह्ह्ह माय गॉड… हाय्य्य्ए… उफ़्फ़्फ़्फ़… आरव… आरव… आआआआह्ह्ह्ह्ह…”
आरव ने उंगलियाँ अंदर ही रखी और जीभ से दाने को चूसते रहा, जब तक मेधा की देह का आखिरी कंपन खत्म नहीं हो गया। मेधा की साँस फूली हुई थी। उसने आरव का सिर धीरे से छोड़ा, और पीछे लेट गई।
कुछ पल दोनों खामोश रहे। सिर्फ साँसों की आवाज़ थी।
“ये पहली बार…” मेधा ने धीरे से कहा, “…पहली बार ऐसा लगा कि देह मेरी है, और पूरी तरह मेरी है।”
आरव उठा, उसके पास लेट गया, और उसके माथे पर एक चुंबन रख दिया। मेधा ने आँखें बंद कर लीं, और उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान आ गई।
पर रात अभी खत्म नहीं हुई थी।
भाग 9 — आरव का लंड बाहर निकला
मेधा ने पलटकर आरव को देखा। उसकी पैंट अब भी पहनी हुई थी — और उसमें एक साफ उभार दिख रहा था, जो अब तक सिर्फ बढ़ता जा रहा था।
“तूने अभी तक उतारी भी नहीं?” मेधा ने हैरानी से पूछा।
“तू इतनी मस्त थी कि याद ही नहीं रहा,” आरव ने हँसते हुए कहा।
मेधा ने खुद आगे बढ़कर आरव की बेल्ट खोलनी शुरू की। उंगलियाँ थोड़ी काँप रही थीं — उसने भी ये पहली बार किसी के लिए कर रही थी, ऐसे, इस तरह से। बेल्ट खुली, बटन खुला, और ज़िप धीरे से नीचे सरका। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
आरव ने पैंट और चड्डी दोनों एक साथ नीचे खींच ली।
और फिर… मेधा की आँखें थोड़ी बड़ी हो गईं।
आरव का लंड बाहर आया — सीधा खड़ा, ऊपर की तरफ तना हुआ, गर्म, और सिरे पर चमकदार। मेधा ने पहली बार उसे देखा और एक गहरी साँस ली।
“इतना…” — वो बुदबुदाई।
“इतना क्या?” आरव ने पूछा।
“मतलब… पहली बार देख रही हूँ इतने करीब से,” मेधा ने शर्माते हुए कहा।
आरव ने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया। मेधा की हथेली ठंडी थी, और वो चीज़ उसके नीचे गर्म, सख्त और धड़कती हुई।
भाग 10 — पहला स्पर्श, पहली धड़कन
आरव ने उसका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया। मेधा की हथेली ठंडी थी, और वो चीज़ उसके नीचे गर्म, सख्त और धड़कती हुई। मेधा ने धीरे से उंगलियाँ भींचकर उसे जकड़ा — और जैसे ही जकड़ा, आरव की साँस एक झटके में अटक गई।
“उफ़्फ़्फ़…” — आरव के होंठों से निकला।
मेधा ने देखा — आरव की आँखें आधी बंद हो गई थीं, और उसका चेहरा कस गया था। ये देखकर मेधा को एक अजीब-सी ताकत महसूस हुई — कि वो भी कुछ कर सकती है, कि वो भी उस पर असर डाल सकती है।
उसने धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करना शुरू किया। पहले धीमा, फिर थोड़ा तेज़। अंगूठे से सिरे पर हल्का-सा फेरा, और आरव की कमर एक झटके में उठ गई।
“ओह्ह्ह्ह… मेधा… ये तू कहाँ से सीखी?” — आरव ने हाँफते हुए पूछा।
“पता नहीं… बस हो रहा है,” मेधा ने कहा, और खुद भी हैरान थी।
कुछ पल ऐसे ही चला। फिर आरव ने उसका हाथ रोक दिया।
“बस… वरना जल्दी हो जाएगी,” उसने कहा।
मेधा ने उसे देखा — आँखों में सवाल था।
“अब अंदर जाना है,” आरव ने कहा।
मेधा के पेट में एक गहरी हलचल हुई। वो पीछे लेट गई और अपनी जाँघें धीरे से खोल दीं।
भाग 11 — पहला प्रवेश
आरव उसके ऊपर आ गया। एक हाथ से खुद को सँभाला, दूसरे से मेधा के बालों को उसके चेहरे से हटाया। मेधा की आँखों में वो चमक थी जो पहली बार देखने पर होती है — थोड़ा डर, थोड़ा इंतज़ार, और बहुत ज़्यादा भूख।
“तैयार है?” आरव ने पूछा।
“हाँ,” मेधा ने फुसफुसाया।
आरव ने सिरा उसके गीले होंठों के बीच रखा। वहाँ पहले से ही इतनी नमी थी कि सिरा फिसलकर अंदर चला गया — आधा। मेधा ने एक गहरी साँस ली और आँखें बंद कर लीं।
“आआआह्ह्ह्ह…” — वो धीरे से कराही।
आरव ने धीरे-धीरे और अंदर धकेला। मेधा की दीवारें उसके चारों तरफ फैलने लगीं — गर्म, चिपचिपी, और कसी हुई। आरव ने पूरी ताकत लगाई और आखिरी हिस्सा भी अंदर चला गया।
मेधा की पीठ चारपाई से चिपक गई। उसने दोनों हाथों से आरव की पीठ पकड़ ली और नाखून अंदर गड़ा दिए।
“ओह्ह्ह्ह… आरव… ये… ये बहुत है…” — मेधा की आवाज़ दबी हुई थी।
“दर्द हो रहा है?” आरव ने पूछा, बिना हिले।
“थोड़ा… पर अच्छा है… रुक मत,” मेधा ने कहा, और अपनी कमर हल्की-सी उठा दी।
आरव को इशारा मिल गया। उसने धीरे-धीरे पीछे खींचना शुरू किया — बाहर तक लगभग — और फिर एक झटके में वापस अंदर। मेधा की देह में एक लहर दौड़ी।
“आआआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह माय गॉड…” — वो चीख पड़ी।
फिर वो लय बन गई। बाहर… अंदर… बाहर… अंदर… धीमा, गहरा, और पूरा।
भाग 12 — वो आवाज़ें जो भूल नहीं पाएगा
पहले कुछ धक्के धीमे थे। फिर आरव की गति बढ़ने लगी। हर धक्के के साथ मेधा के गले से एक नई आवाज़ निकलती।
“उफ़्फ़्फ़…”
“आआआह्ह्ह्ह…”
“हाय्य्ए… आरव… यही… यहीं…”
“ओह्ह्ह्ह माय गॉड… ओह्ह्ह्ह माय गॉड…”
“उफ़्फ़्फ़्फ़… और… और ज़ोर से…”
आरव ने उसकी टाँगें अपनी कमर पर लपेट दीं और गति और तेज़ कर दी। अब धक्के गहरे और लंबे थे। दोनों के शरीर एक-दूसरे से टकरा रहे थे, और पसीने की बूँदें दोनों के शरीरों पर चमक रही थीं।
“चप… चप… चप…” — शरीर की आवाज़ अब कमरे में गूँज रही थी।
मेधा ने आरव की गर्दन पर अपना मुँह रखा और हल्के-हल्के काटने लगी। आरव ने भी झुककर उसके कान पर अपना होंठ रखा और फुसफुसाया —
“कितनी अच्छी लग रही है तू…”
मेधा की आँखें भर आईं। उसने अपनी सारी ताकत लगाकर आरव को अपने अंदर और गहरा खींचा।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह फक… आरव… ये पल… ये पल रुक जाए तो…” — उसकी आवाज़ टूट गई।
“रुकेगा नहीं… और भी है,” आरव ने कहा, और उसकी कमर ऊपर उठा दी।
अब मेधा का पूरा शरीर आरव के नीचे एक धनुष की तरह मुड़ा हुआ था। आरव हर धक्के के साथ उसके भीतर सबसे गहरी जगह छू रहा था, और हर बार वहीं रुक जाता था — एक पल के लिए — जिससे मेधा की साँस टूट जाती।
“उफ़्फ़्फ़्फ़… हाय्य्ए… आरव… और… और गहरा…” — मेधा ने चीख
भाग 13 — दीवार पर
आरव ने मेधा को अचानक उठा लिया। मेधा ने अपनी टाँगें उसकी कमर पर कसकर लपेट लीं और हाथ उसकी गर्दन के पीछे डाल दिए। आरव उसे उठाकर दीवार की तरफ ले गया और मेधा की पीठ ठंडी दीवार से टिका दी।
मेधा की पूरी देह में एक झटका दौड़ा — पीछे ठंडी दीवार, आगे आरव का गर्म शरीर, और बीच में… वो अभी भी अंदर था।
“आआआह्ह्ह्ह… ये… ये तो और भी…” — मेधा की आवाज़ काँप गई।
आरव ने उसे दीवार पर टिकाकर अपनी कमर आगे-पीछे करना शुरू किया। अब गुरुत्वाकर्षण उसके साथ था — हर धक्का और गहरा, और हर बार मेधा का पूरा वजन आरव के लंड पर टिकता। मेधा को लगा जैसे वो हवा में तैर रही हो, और अंदर कुछ ऐसा टकरा रहा हो जो अब तक अनछुआ था। डांडिया नाइट में चुदाई की वो रात
“उफ़्फ़्फ़्फ़… हाय्य्य्ए… ओह्ह्ह्ह आरव… तू मुझे तोड़ देगा…” — मेधा ने कराहते हुए कहा।
“तोड़ दूँ?” आरव ने पूछा और गति बढ़ा दी।
“हाँ… तोड़ दे… आआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह माय गॉड…”
दीवार पर मेधा की पीठ रगड़ खा रही थी, और उसकी एड़ियाँ आरव की पीठ पर लगातार टकरा रही थीं। पसीना दोनों के शरीरों से बह रहा था, और मेधा के स्तन आरव की छाती से रगड़ खा रहे थे — हर धक्के के साथ।
आरव ने झुककर उसके होंठ चूम लिए। मेधा ने भूखे होकर जवाब दिया। दोनों की साँसें एक-दूसरे में घुल गईं।
भाग 14 — बिस्तर पर वापस
कुछ देर बाद आरव की बाँहें थकने लगीं। उसने मेधा को उठाकर वापस बिस्तर की तरफ ले जाना चाहा, पर मेधा ने रोक दिया।
“नहीं… निकल मत,” उसने फुसफुसाया।
आरव मुस्कुराया और मेधा को उठाए-उठाए ही बिस्तर तक ले गया, और उसे नीचे लिटा दिया — बिना बाहर निकले। अब मेधा के नीचे गद्दा था, और आरव ऊपर। मेधा ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा और उसकी कमर को अपनी तरफ खींचा।
“अब तू… धीरे कर,” मेधा ने कहा।
आरव ने सिर हिलाया और धीमी, लंबी गति शुरू की। अब धक्के तेज़ नहीं थे, पर गहरे थे — इतने गहरे कि मेधा को हर बार लगता कि वो उसके पेट तक पहुँच रहा है। उसने आँखें बंद कर लीं और आरव की गर्दन पर अपना चेहरा छुपा दिया।
“आरव…” — वो फुसफुसाई।
“हम्म?”
“पहले कभी ऐसा नहीं लगा… कभी नहीं।”
आरव रुक गया। मेधा ने आँखें खोलीं।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
“कुछ नहीं… बस अच्छा लगा सुनकर,” आरव ने कहा, और उसके माथे पर चुंबन रख दिया।
फिर उसने गति फिर से शुरू की। और इस बार मेधा भी साथ-साथ कमर हिलाने लगी। दोनों की लय मिल गई — जैसे दो शरीर एक हो गए हों। कमरे में सिर्फ साँसों की आवाज़, चिपचिपी टकराहट की आवाज़, और मेधा की लगातार निकलती कराहें थीं।
“आआआह्ह्ह्ह… उफ़्फ़्फ़्फ़… ओह्ह्ह्ह… हाय्य्य्ए…”
“ओह्ह्ह्ह माय गॉड… आरव… ऐसे ही… ऐसे ही…”
“उफ़्फ़्फ़्फ़… और… और…”
मेधा की देह फिर काँपने लगी। पेट की मांसपेशियाँ खिंचने लगीं, टाँगें कसने लगीं, और उसकी साँस फूलने लगी।
“आरव… मैं फिर… फिर से…” — उसकी आवाज़ चीख बन गई।
“हाँ… आ जा,” आरव ने कहा, और गति तेज़ कर दी।
भाग 15 — दूसरा चरम
मेधा की पूरी देह एक झटके में चरम पर पहुँची। इस बार उसने आरव को और कसकर जकड़ लिया — हाथ, टाँगें, सब। और उसके अंदर की दीवारें लगातार सिकुड़ने लगीं — धक-धक-धक — एक के बाद एक।
“आआआआह्ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह माय गॉड… आरव… आरव… हाय्य्य्ए… उफ़्फ़्फ़्फ़… आआआआह्ह्ह्ह्ह…” — मेधा की आवाज़ दीवारों से टकरा कर लौट आई।
उसका पूरा शरीर काँप रहा था — सिर से पैर तक। उसने आरव की पीठ पर नाखून चला दिए, और एक लंबी, टूटी हुई साँस के साथ वो बिस्तर पर पस्त हो गई।
आरव भी अब और नहीं रुक सकता था। मेधा का सिकुड़ता हुआ अंदर उसे खींच रहा था। उसने आखिरी कुछ धक्के और तेज़ किए — गहरे, लंबे, और टूटे हुए।
“मेधा… मैं भी…” — उसने हाँफते हुए कहा।
“अंदर… अंदर ही…” — मेधा ने कहा।
आरव की पूरी देह एक झटके में कस गई। उसने एक लंबी कराह के साथ खुद को छोड़ दिया — गर्म, बहता हुआ, और मेधा के अंदर। उसकी कमर काँप रही थी, भाग 15 (जारी) — आरव का चरम
आरव की पूरी देह एक झटके में कस गई। उसने एक लंबी कराह के साथ खुद को छोड़ दिया — गर्म, बहता हुआ, और मेधा के अंदर। उसकी कमर काँप रही थी, और उसकी बाँहें मेधा के चारों तरफ कसी हुई थीं।
“आआआआह्ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह मेधा…” — आरव की आवाज़ गले से फूटी।
उसने आँखें बंद कर लीं और अपना सिर मेधा के कंधे पर रख दिया। साँसें फूली हुई थीं, और पूरी देह पसीने से भीगी हुई। वो कुछ पल वहीं पड़ा रहा — अंदर ही, बिना हिले।
मेधा ने अपनी उंगलियाँ उसके बालों में फिराईं और धीरे-धीरे सहलाने लगी।
“ठीक है?” उसने फुसफुसाया।
“हम्म,” आरव ने बिना सिर उठाए कहा।
दोनों कुछ देर ऐसे ही पड़े रहे। कमरे में सिर्फ साँसों की आवाज़ थी और बाहर से कभी-कभार आती पंडाल की आखिरी धुन। धीरे-धीरे आरव की साँसें सामान्य हुईं, और उसने सिर उठाकर मेधा को देखा।
मेधा की आँखें भीगी हुई थीं।
“रो रही है?” आरव ने पूछा, थोड़ा घबराकर।
“नहीं… बस… ऐसा लग रहा है जैसे कुछ टूट गया और कुछ बन गया,” मेधा ने मुस्कुराते हुए कहा।
आरव हँस पड़ा। फिर उसने धीरे से खुद को बाहर निकाला। दोनों ने एक साथ गहरी साँस ली — वो पल भी किसी चीज़ जैसा था।
आरव मेधा के बगल में लेट गया। मेधा ने उसकी छाती पर सिर रख दिया, और उसकी उंगलियाँ आरव के पेट पर धीरे-धीरे चलने लगीं।
“ये नौ दिन…” मेधा ने धीरे से कहा, “…कभी नहीं लगा कि इतने छोटे थे।”
“अभी खत्म नहीं हुए,” आरव ने कहा।
“मतलब?”
आरव ने उसके माथे को चूमा और बोला — “मतलब, अभी बहुत कुछ बाकी है।”
भाग 16 — दूसरी बार
कुछ मिनटों के आराम के बाद मेधा उठी। वो पानी लेने रसोई की तरफ गई — बिल्कुल नंगी, बिना कुछ पहने। आरव बिस्तर पर लेटा हुआ उसे देखता रहा। उसकी चाल में एक नई-सी झिझक थी, और कूल्हों में एक नया-सा लचक।
मेधा ने पानी की बोतल उठाई, दो घूँट पिए, और पलटकर देखा — आरव की नज़रें उस पर टिकी हुई थीं।
“क्या देख रहे हो?” उसने पूछा।
“तुझे,” आरव ने फिर वही जवाब दिया।
मेधा मुस्कुराई, बोतल लेकर बिस्तर पर लौट आई, और आरव के ऊपर आकर बैठ गई — उसकी कमर के ऊपर, टाँगें दोनों तरफ। आरव ने उसकी कमर पर हाथ रखे और उसे ऊपर-नीचे देखा।
“अब तेरी बारी,” मेधा ने कहा।
उसने झुककर आरव के होंठ चूमे — धीमा, गहरा, और लंबा। उसकी जीभ आरव के मुँह में गई, और उसकी उंगलियाँ आरव की छाती पर घूमने लगीं। धीरे-धीरे उसने नीचे की तरफ बढ़ना शुरू किया — गर्दन, छाती, पेट… और फिर वहीं रुक गई जहाँ आरव का लंड फिर से हल्का-सा उठने लगा था।
मेधा ने झुककर उसे हाथ में लिया। अब वो पहले से ज़्यादा गीला था — उनके ही रस से चिपचिपा। मेधा ने उसे अपनी चूत के होंठों पर रखा और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे रगड़ने लगी।
“आआआह्ह्ह्ह…” — दोनों ने एक साथ साँस ली।
मेधा ने खुद को थोड़ा ऊपर उठाया और सिरे को अंदर रखकर धीरे-धीरे बैठने लगी। एक-एक इंच अंदर जाते हुए मेधा की आँखें बंद हो गईं और होंठ खुल गए।
“उफ़्फ़्फ़्फ़… ओह्ह्ह्ह…” — वो धीरे से कराही।
जब पूरा अंदर आ गया, मेधा ने एक गहरी साँस ली और दोनों हाथ आरव की छाती पर रखकर टिक गई।
“अब मैं चलाऊँगी,” उसने कहा।
भाग 17 — मेधा ऊपर
मेधा ने धीरे-धीरे कूल्हे ऊपर-नीचे करना शुरू किया। पहले धीमा, फिर थोड़ा तेज़। उसकी आँखें बंद थीं और सिर पीछे झुका हुआ था। उसके स्तन हर हलचल के साथ हल्के-हल्के उछल रहे थे, और आरव उन्हें देखता रह गया।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह ये…” — मेधा की आवाज़ गले से निकल रही थी।
आरव ने हाथ बढ़ाकर उसके स्तनों को पकड़ा और धीरे-धीरे मसलने लगा। अंगूठे से निप्पलों को सहलाया, और मेधा की गति एक झटके में तेज़ हो गई।
“उफ़्फ़्फ़्फ़… हाय्य्य्ए… आरव… तेरे हाथ… ओह्ह्ह्ह…”
मेधा अब और तेज़ हो चुकी थी। उसने आरव के हाथों को अपने स्तनों पर कसकर दबा दिया और खुद को ऊपर-नीचे पटकने लगी।
उसने आरव के हाथों को अपने स्तनों पर कसकर दबा दिया और खुद को ऊपर-नीचे पटकने लगी। हर बार नीचे आते हुए उसकी चूत आरव के लंड पर पूरी तरह बैठ जाती, और हर बार ऊपर जाते हुए वो लगभग बाहर तक निकल आती — बस सिरा अंदर रह जाता।
“उफ़्फ़्फ़्फ़… आरव… देख… देख मुझे…” — मेधा ने आँखें खोलकर कहा।
आरव ने उसे देखा — मेधा का चेहरा पसीने से चमक रहा था, होंठ लाल और सूजे हुए, आँखें आधी बंद और मदहोश। उसके बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे, और उसकी साँसें लगातार टूट रही थीं।
“कितनी सुंदर लग रही है…” — आरव ने हाँफते हुए कहा।
“बस… बस देखता रह… और कुछ मत कर…” — मेधा ने कहा और गति और बढ़ा दी।
अब वो पूरी ताकत से खुद को पटक रही थी। उसकी जाँघें आरव के कूल्हों से टकरा रही थीं और एक लगातार ताली जैसी आवाज़ बन रही थी — “चप… चप… चप… चप…”। पसीना दोनों के शरीरों से बहकर बिस्तर पर गिर रहा था।
“आआआह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह माय गॉड… हाय्य्य्ए… उफ़्फ़्फ़्फ़… आरव… आरव…” — मेधा की आवाज़ लगातार ऊँची हो रही थी।
आरव ने उसकी कमर पकड़कर उसकी गति में साथ देना शुरू किया। जब मेधा ऊपर जाती, आरव नीचे से धक्का देता — और मेधा की साँस और टूट जाती।
“आआआह्ह्ह्ह… नहीं… ऐसे मत कर… टूट जाऊँगी…” — मेधा चीखी।
“टूट जा,” आरव ने कहा, और धक्के और तेज़ कर दिए।
भाग 18 — तीसरा चरम
मेधा की देह अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। उसकी टाँगें काँपने लगीं, पेट कसने लगा, और गले से एक लंबी, टूटी हुई चीख निकली —
“आआआआह्ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह्ह्ह्ह माय गॉड… आरव… आरव… आआआआह्ह्ह्ह्ह… हाय्य्य्य्ए… उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़… ओह्ह्ह्ह फक…”
वो आरव के ऊपर ही ढह गई। उसका पूरा वजन आरव पर आ गया, और उसके अंदर की दीवारें लगातार सिकुड़ने लगीं — पहले धीमा, फिर तेज़, और फिर एक के बाद एक। मेधा ने आरव की गर्दन पकड़ ली और उसके कंधे पर अपना मुँह दबा दिया — जैसे चीख को रोकना चाहती हो, पर रुक नहीं पा रही हो।
“म्म्म्म्फ़्फ़्फ़… आआआह्ह्ह्ह…” — आवाज़ दबी हुई निकली।
आरव ने उसे कसकर पकड़ लिया और नीचे से अपनी कमर ऊपर-नीचे करता रहा, जब तक मेधा का आखिरी कंपन खत्म नहीं हो गया। फिर मेधा पूरी तरह पस्त हो गई — आरव की छाती पर गिरी हुई, साँसें फूली हुई, और पूरा शरीर पसीने से लथपथ।
कुछ देर दोनों ऐसे ही पड़े रहे। मेधा की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हुईं। आरव ने उसके बाल पीछे हटाए और उसके गाल पर एक हल्का चुंबन रखा।
“तीन बार,” आरव ने धीरे से कहा।
“हम्म?” मेधा ने बिना सिर उठाए पूछा।
“तीन बार आई तू,” आरव ने मुस्कुराते हुए कहा।
“तेरी वजह से,” मेधा ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया, और उसके गाल पर अपना होंठ रख दिया।
भाग 19 — नए-नए तरीके
अब मेधा आरव के बगल में लेट गई। दोनों थके हुए थे, पर दोनों की आँखों में अभी भी कुछ बाकी था। आरव ने मेधा को करवट दिलाई — उसकी पीठ आरव की तरफ, और उसकी गर्दन आरव के होंठों के नीचे।
आरव ने उसकी गर्दन पर चुंबन देना शुरू किया — धीमा, गीला, और लंबा। मेधा ने आँखें बंद कर लीं और गहरी साँस ली।
“अभी भी?” उसने पूछा।
“अभी तो शुरुआत है,” आरव ने कहा।
उसने मेधा की टाँगों के बीच अपना हाथ सरकाया और उंगलियों से उसकी चूत को फिर से छुआ। अब वो और गीली थी — उनके ही रस से भरी हुई। मेधा ने कराह दी।
“उफ़्फ़्फ़्फ़… अभी भी… ओह्ह्ह्ह…”
आरव ने उंगलियों से दो-तीन बार अंदर-बाहर किया, और फिर अपने लंड को उसके भीगे होंठों पर रखा। इस बार वो पीछे से अंदर जाना चाहता था।
“तैयार है?” उसने पूछा।
“हाँ… कर,” मेधा ने फुसफुसाया।
आरव ने धीरे से अंदर धकेला। पीछे से आने वाली इस पोज़िशन में लंड और गहरा लग रहा था — जैसे अंदर किसी और ही जगह टकरा रहा हो। मेधा ने एक लंबी साँस ली और अपनी कमर पीछे की तरफ उठा दी।
हाँ… कर।
आरव ने धीरे-धीरे अंदर धकेला। पीछे से आने वाली इस पोज़िशन में उसका लंड और गहरा लग रहा था। मेधा की कमर उसने अपने हाथों से पकड़ ली और एक लंबी, धीमी साँस के साथ पूरा अंदर चला गया।
“उफ़्फ़्फ़… आरव…” मेधा की आवाज़ दबी हुई निकली। उसने अपना सिर तकिये में दबा लिया और कमर और पीछे की ओर धकेल दी।
आरव ने धीरे-धीरे गति शुरू की। पहले तो कोमल, फिर थोड़ी तेज़। हर धक्के के साथ मेधा की साँस टूट रही थी। उसका शरीर अब पूरी तरह पिघल चुका था। आरव ने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसकी छाती को सहलाया, निप्पल्स को हल्के से मसला, फिर वही हाथ नीचे सरकाकर उसकी चूत पर रख दिया। उँगली से क्लिटोरिस को धीरे-धीरे घुमाते हुए वह पीछे से धक्के देता रहा।
“आह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही…” मेधा कराह उठी।
गति बढ़ती गई। बिस्तर फिर से चरमराया। पसीने से दोनों के शरीर चमक रहे थे। आरव ने मेधा के बाल पकड़कर उसके सिर को हल्के से पीछे खींचा और उसकी गर्दन पर दाँत गड़ा दिए। मेधा की चीख दबी हुई निकल पड़ी।
“आरव… मैं… फिर से…” उसने हाँफते हुए कहा।
“आ जा,” आरव ने उसकी कमर और कसकर पकड़ी और धक्के तेज़ कर दिए। “मेरे साथ।”
मेधा की टाँगें काँपने लगीं। पेट के अंदर एक गर्म लहर उठी और उसने फिर से चरम लिया — इस बार चुपचाप, शरीर सिकुड़ता हुआ, आँखें बंद, मुँह खुला। आरव ने भी खुद को और नहीं रोका। कुछ और तेज़ धक्कों के बाद वह गहराई में रुक गया और गर्म तरल छोड़ दिया। दोनों एक साथ काँपते हुए रुके।
कुछ पल तक सिर्फ साँसें सुनाई दीं।
आरव धीरे से बाहर निकला और मेधा को अपनी तरफ घुमा लिया। मेधा की आँखें अभी भी आधी बंद थीं। आरव ने उसके माथे पर, फिर आँखों पर, फिर होंठों पर हल्के चुंबन रखे।
मेधा ने मुस्कुराते हुए आँखें खोलीं।
“अब… खत्म?” उसने धीरे से पूछा।
आरव ने उसके बाल पीछे किए और मुस्कुराया।
“आज के लिए हाँ।” उसने उसके गाल पर एक और चुंबन रखा। “पर कहानी अभी बाकी है।”
मेधा हल्के से हँसी और उसकी छाती पर सिर रखकर आँखें बंद कर लीं। दोनों थके, संतुष्ट, और एक-दूसरे से चिपके हुए बिस्तर पर लेटे रहे। कमरे में सिर्फ उनकी धीमी साँसें गूँज रही थीं।
और अगर आप चाहें, तो मैं इसका दूसरा भाग भी लिख सकता हूँ— लेकिन मुझे इसके लिए भरपूर प्यार मिले।
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