मेरा नाम आरव मेहता है। उम्र छब्बीस साल, कद पाँच फुट ग्यारह इंच, बदन जिम में पिसा हुआ, चेहरा ऐसा कि सोसाइटी की आंटियाँ भी एक बार ज़रूर देख लें। मैं अहमदाबाद के एक पॉश सोसाइटी में अपने चाचा के फ्लैट में रहता हूँ। चाचा दुबई में बस गए हैं, फ्लैट मेरे नाम पर छोड़ गए, और मैं यहाँ अकेला राज करता हूँ। नवरात्रि: नौ रातें, नौ रंग, और बेशुमार वासना
“रत्नदीप हाइट्स” — नाम सुनकर ही अंदाज़ा लगा लो कि किस किस्म की सोसाइटी है। हॉर्टिकल्चर से सजे बगीचे, ऊँची-ऊँची इमारतें, फव्वारे, क्लबहाउस, जिम, स्विमिंग पूल — सब कुछ। और यहाँ के लोग? अमीर, पढ़े-लिखे, और सबसे बड़ी बात — बेझिझक। जहाँ पैसा होता है और शहर का दबाव न हो, वहाँ शर्म नाम की चीज़ पतली हो जाती है। यहाँ की औरतें जितनी खूबसूरत थीं, उतनी ही बेपरवाह भी। अपने हिसाब से कपड़े पहनना, अपने हिसाब से जीना, किसी के तानों की परवाह न करना।
मैं यहाँ दो साल से रह रहा था। इस दौरान दो भाभियों और एक-आध कॉल गर्ल से मज़ा ले चुका था। लेकिन जो नवरात्रि का सीज़न आने वाला था, उससे मेरी आँतें पहले ही गरम होने लगी थीं। नवरात्रि मतलब नौ रातें गरबे का धमाल, मतलब ढोल की थाप पर कमर हिलाती लड़कियाँ, मतलब चनिया चोली में लिपटी ऐसी औरतें जिनकी नाभि दिखाने में भी एक अलग ही नशा होता है।
गुजरात में नवरात्रि सिर्फ़ त्योहार नहीं, महापर्व है। नौ दिन, नौ रंग, नौ रातें — और हर रात ढोल, डैंडिया, गरबा और नए-नए चेहरे। शहर के हर बड़े मैदान पर गरबा का आयोजन होता है, और हमारी सोसाइटी का क्लबहाउस तो जैसे इसी के लिए बना है। पिछले साल भी यहाँ धूम रही थी, पर उस साल मैं सिर्फ़ देखने तक रह गया था। इस बार इरादा पक्का था — जो आए, उसे छोड़ना नहीं।
सोसाइटी की व्हाट्सएप ग्रुप में तारीख़ आ गई थी। एक अक्टूबर से गरबा शुरू। नौ दिन का शेड्यूल, हर रात साढ़े सात बजे से देर रात तक। डीजे, ढोल, लाइव गायक — सब।
और मैं? मैंने शॉपिंग कर ली थी। दो नए कुर्ते, एक चमकदार चूड़ीदार के साथ मैचिंग, एक महँगा इत्र, और जूते। आइने के सामने खड़े होकर जब तैयार होता तो खुद को देखता और हँसता — “आरव, इस बार सोसाइटी की हर गरम औरत तेरी है।”
यही सोचते-सोचते नवरात्रि के पहले दिन की शाम आ गई।
रात एक — नारंगी: दो औरतें, एक लड़का, और व्हिस्की
पहले दिन का रंग था नारंगी। क्लबहाउस में लगभग पाँच सौ लोग जमा थे। डीजे पर एक के बाद एक गरबा का धमाका बज रहा था, और सारा मैदान गोल घूमते-नाचते लोगों से भरा था। औरतें चनिया चोली में, लड़कियाँ ढोल के साथ, लड़के कुर्ता-पजामे में। चारों तरफ़ चमक, म्यूज़िक, और गर्मी।
मैं नया-नया पहुँचा ही था कि आँखें अपने आप घूमने लगीं। कहीं ऐसी कमर, कहीं ऐसी गर्दन, कहीं ऐसी छाती जो ब्लाउज़ से बाहर झाँक रही हो। डैंडिया की लय पर जब कोई औरत झुकती, तो उसका घाघरा हवा में उड़ता और उसके नीचे का पूरा शरीर एक झलक में दिख जाता। मैं अकेला झूम रहा था, कभी इधर कभी उधर, नज़रें औरतों की कमर पर।
तभी मेरी नज़र एक औरत पर पड़ी। अकेली नाच रही थी, पर उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे कोई साथी ढूँढ रही हो। नारंगी रंग की उसकी चनिया चोली, गले में झुमके, कलाई भर चूड़ियाँ, और कमर पर एक पतली चमकदार बेल्ट जो उसकी बलखाती कमर को और उभार रही थी। उम्र कोई अट्ठाईस-तीस। साँवली, पर ऐसी साँवली जो सोने जैसी लगे। चेहरा चाँद जैसा, और बदन वैसा जिस पर हर आदमी की नज़र अपने आप रुक जाए।
वह नाचते-नाचते मुझे देख रही थी। मैं भी उसे देख रहा था। धीरे-धीरे हम दोनों एक-दूसरे की तरफ़ बढ़ने लगे, और आख़िर वह मेरे ठीक सामने आ खड़ी हुई।
“तुम अकेले हो?” उसने पूछा, आवाज़ में एक अजीब-सी बेपरवाही।
“हाँ,” मैंने कहा, “अकेला ही हूँ। चाचा का फ्लैट है, वे दुबई में हैं। मैं यहीं ब्लॉक में रहता हूँ, 1201 में।”
“अच्छा। तो अकेले ही मज़े लेते हो?” उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
“जितना मिल जाए,” मैंने कहा।
“मैं भी अकेली हूँ,” उसने कहा। “पति बिज़नेस के काम से बाहर गए हैं। वरना हमेशा उन्हीं के साथ नाचती हूँ।”
तभी एक और औरत हमारे पास आई — इससे भी ज़्यादा खूबसूरत, दुबली-पतली पर छाती भरी हुई, नीली चनिया चोली में, लंबे बाल खुले हुए। पहली औरत ने परिचय कराया, “ये मेरी सहेली है, मेरे पति के दोस्त की बीवी है। इसका पति भी बाहर गया है, दोनों एक ही कंपनी में हैं, साथ ही गए हैं।”
“तो आज तुम दोनों अकेली हो?” मैंने पूछा।
“हाँ। बच्चे भी नहीं हैं अभी,” दूसरी औरत हँसी। “अभी जवान हैं, ज़िंदगी के मज़े लेते हैं। एक बार बच्चा हो गया, फिर तो बस।”
पहली औरत का नाम रिया था, दूसरी का सोनल। दोनों ने बताया कि वे यहाँ दस दिन पहले ही गृह-प्रवेश कर के आई हैं, किसी से जान-पहचान नहीं है।
तभी डीजे पर एक ऐसा गाना बजा जिस पर सब दीवाने हो गए। हम तीनों साथ नाचने लगे। रिया और सोनल दोनों के बीच मैं, और हमारी कमरें एक-दूसरे से टकराती रहीं। रिया की चूड़ियाँ मेरी बाँहों से छनकती, सोनल के बाल मेरे चेहरे पर हवा में फैल जाते। धीरे-धीरे हम और करीब आने लगे, और नाच में शरीर की दूरी खत्म होने लगी।
रात के बारह बज चुके थे जब रिया ने कहा, “चलो, मेरे फ्लैट चलो। कोल्ड ड्रिंक पी कर जाओगे।”
मुझे क्या आपत्ति होती। तीनों ने सोसाइटी के अंदर ही रिया के फ्लैट की तरफ़ चल दिया। रास्ते में दोनों हँसती-बतियाती रहीं, मेरे कंधे पर हाथ रखती रहीं। मेरी छाती में ढोल बज रहा था — कुछ होने वाला था, यह साफ़ पता चल रहा था।
फ्लैट में घुसे। रिया ने कोल्ड ड्रिंक की जगह व्हिस्की निकाली, तीन पैग बनाए, और हम सोफ़े पर बैठ गए। नशा जैसे-जैसे बढ़ता, वैसे-वैसे हमारे बीच की दूरी घटती गई।
पहला ग्लास खत्म हुआ, तो सोनल ने अपना पैर मेरे पैर से छुआ दिया। दूसरे ग्लास तक आते-आते रिया मेरे कंधे पर सिर रख चुकी थी। तीसरे ग्लास के बाद तो जैसे कोई बाँध टूट गया।
रिया ने पहल की। उसने मेरा चेहरा पकड़ा और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। शुरू में धीमा, फिर गहरा, फिर ऐसा जैसे प्यास बरसों की हो। उसका जीभ मेरे मुँह में घूमने लगी, और उसकी साँसें गरम-गरम मेरे गालों से टकराने लगीं। नवरात्रि: नौ रातें, नौ रंग, और बेशुमार वासना
सोनल पीछे नहीं रही। उसने मेरा कुर्ता ऊपर से खींचा और मेरी छाती पर हाथ रख दिया। फिर उसने मेरा कुर्ता उतार दिया, और मेरी पैंट के बटन खोलने लगी।
“तुम्हारे कपड़े पहले,” सोनल ने हँसते हुए कहा, और दोनों मिलकर मुझे पूरा नंगा कर दिया।
मेरा लंड, जो अब तक पैंट में कैद था, बाहर निकला — मोटा, सख़्त, खड़ा। रिया ने उसे देखा और आँखें फैला लीं। “बाप रे,” वह फुसफुसाई।
दोनों औरतें घुटनों के बल बैठ गईं और बारी-बारी से उसे चूसने लगीं। कभी रिया, कभी सोनल। एक चूसती तो दूसरी उसकी गर्दन चूमती। एक नीचे ले जाती तो दूसरी अंडकोष को जीभ से सहलाती। मैं आँखें बंद किए बस महसूस करता रहा — दो जीभें, दो गरम मुँह, और ढेर सारा पानी।
“अब तुम्हारी बारी,” रिया ने कहा, और दोनों खड़ी होकर अपने कपड़े उतारने लगीं।
रिया ने पीछे से ब्लाउज़ की डोरी खोली, फिर ब्रा का हुक। सोनल ने अपनी चोली खुद खोली। दोनों के भरे हुए स्तन बाहर आ गए — रिया के गोल और भारी, सोनल के टाइट और ऊपर उठे हुए, निप्पल सख़्त। फिर घाघरा, फिर पेटीकोट, फिर पैंटी — और दोनों पूरी नंगी मेरे सामने खड़ी हो गईं।
भगवान, क्या बदन थे। रिया की कमर ऐसी जैसे कोई शिल्पकार तराश कर बनाई हो। उसकी गांड चौड़ी, गोल, और ऐसी कसी हुई कि हाथ रखने पर लगे हीरा है। सोनल की चूत पर पतले बालों की एक लकीर, और जाँघें इतनी मज़बूत कि बीच में फँस जाओ तो निकलना मुश्किल।
मैंने दोनों को सोफ़े पर बिठाया। दो हाथ, दो स्तन — एक हाथ से रिया की छाती दबाई तो दूसरे से सोनल की। मुँह से रिया के निप्पल को दाँतों से पकड़कर खींचा, तो सोनल ने मेरी गर्दन पर अपने होंठ रगड़ दिए। दोनों कराहने लगीं।
फिर रिया पीछे लेट गई और अपनी टाँगें फैला दीं। उसकी चूत गीली हो चुकी थी, भीतर का गुलाबी मांस चमक रहा था। मैंने जीभ नीचे लगाई और ऊपर से नीचे तक चाटने लगा। जब क्लिट पर जीभ रखी तो रिया का पूरा शरीर झटके से उठा और उसने मेरे बाल पकड़ लिए।
“आह्ह्ह… आरव… वहीं… वहीं करो…” वह कराही।
उसकी चूत से इतना पानी निकल रहा था कि मेरी पूरी ठुड्डी भीग गई। सोनल पीछे से आई और मेरे लंड को हाथ में लेकर सहलाने लगी, बीच-बीच में उसे अपने होंठों से चूमती।
“बस करो, अब अंदर डालो,” रिया ने हाँफते हुए कहा।
सोनल ने मेरा लंड पकड़ा, रिया की चूत के मुँह पर रखा, और मैंने एक धक्का दिया। पूरा अंदर। रिया चीख पड़ी — दर्द और आनंद की मिली-जुली चीख। उसकी चूत इतनी कसी हुई थी कि मुझे लगा जैसे मेरा लंड निचोड़ लिया जाएगा। नवरात्रि: नौ रातें, नौ रंग, और बेशुमार वासना
मैं धक्के देने लगा — धीरे, फिर तेज़, फिर पूरी ताक़त से। रिया के स्तन हर धक्के पर हिलते, उसकी चूड़ियाँ खटखटातीं, और उसकी कराहें बढ़ती जातीं। सोनल पास बैठकर खुद अपनी चूत सहला रही थी, और मेरे और रिया को देखकर पागल हो रही थी।
“अब मेरी बारी,” सोनल ने जल्दी मचाई।
रिया से निकाला, सोनल ने मुझे पीछे से पकड़कर अपनी चूत पर बिठा लिया। वह ऊपर से धक्के देने लगी, और रिया नीचे लेटकर मेरे अंडकोष को जीभ से सहलाने लगी। यह नज़ारा — एक औरत मेरे ऊपर उठ-बैठ कर रही, दूसरी नीचे मेरे अंडों को चूस रही — इसने मुझे पागल कर दिया।
फिर रिया घोड़ी बनकर चारों हाथ-पैर पर आ गई, और उसकी चौड़ी गांड हवा में उठी। मैंने पीछे से उसमें लंड डाला और ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगा। सोनल सामने से रिया के झूलते स्तन चूस रही थी, और कभी मेरे होंठ चूम लेती। तीनों एक-दूसरे में उलझे हुए, पसीने से लथपथ।
इसी तरह बारी-बारी से, करवट बदल-बदल कर, दो घंटे तक चला। दोनों औरतें कमाल की चुदक्कड़ निकलीं। मैं दो बार झड़ चुका था — पहली बार सोनल की चूत में, दूसरी बार रिया की गांड पर।
आख़िर में तीनों सोफ़े पर ढेर हो गए, हाँफते हुए, पसीने में डूबे। रिया ने मेरा चेहरा चूमा, सोनल ने मेरी छाती पर सिर रखा।
“आज का डांडिया कभी नहीं भूलूँगा,” मैंने कहा।
“और हम?” रिया हँसी।
फिर जब मैं कपड़े पहनकर जाने लगा, तो रिया ने एक बात कही जो मेरे दिल में तीर की तरह लगी —
“सुनो, आरव। आज की रात यहीं खत्म। कल से तुम कौन हो, हम कौन हैं, कोई नहीं जानता। रास्ते में मिल जाएँ तो कोई हेलो-हाय नहीं, कोई मुस्कुराना नहीं। नवरात्रि खत्म, बात खत्म। पर याद रखना — किसी को कुछ बताना नहीं।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि जो घर में नहीं मिलता, वो बाहर मिल जाए तो बड़ा मज़ा है,” सोनल ने आँख मारी।
मैं हँसता हुआ बाहर निकला। रात दो बजे की थी। सोसाइटी सूनी थी। हवा में अब भी ढोल की थाप गूँज रही थी, और मेरे शरीर पर दो औरतों की महक।
यह तो बस पहली रात थी।
रात दो — लाल: अकेली रिया और छत का नज़ारा
दूसरे दिन का रंग लाल था। और जैसा रिया ने कहा था, गरबा मैदान में हम तीनों ने एक-दूसरे को देखकर भी अनजान बनने की कोशिश की — पर ज़्यादा देर नहीं टिक पाए।
इस रात सोनल को अपनी मायके से फ़ोन आया था, किसी शादी में जाना था, तो वह जल्दी घर चली गई। मैं और रिया गरबा खेलते रहे। आज वह लाल चनिया चोली में थी — और लाल रंग उस पर ऐसा जँचा था जैसे खून में आग लगा दे।
आज हम दोनों बहुत करीब नाच रहे थे। मेरा हाथ बार-बार उसकी कमर पर रखा जाता, और वह कोई एतराज़ नहीं करती। जब भीड़ में कोई धक्का लगता, तो वह मेरे सीने से चिपक जाती और मुस्कुरा देती।
गरबा खत्म हुआ, तो रिया ने कहा, “आज सोनल नहीं है। तो आज… सिर्फ़ हम दोनों।”
“तो?” मैंने पूछा।
“तो चलो, इस बार मेरी छत पर। ऊपर से पूरे शहर का नज़ारा दिखता है। और आज रात वहाँ कोई नहीं आएगा।”
रिया के ब्लॉक की छत। वहाँ पहुँचे तो सच में पूरा शहर जगमग कर रहा था। दूर-दूर तक रोशनी, गरबे की आवाज़ें, और ऊपर खुला आसमान। छत पर एक पुराना सोफ़ा, कुछ गमले, और एक टेबल। रिया एक शॉल लाई और सोफ़े पर बिछा दी।
आज कोई व्हिस्की नहीं थी, कोई नशा नहीं — सिर्फ़ हम दोनों और एक खुला आसमान। और यही चीज़ इसे और ख़ास बना रही थी।
रिया ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, “आज कुछ पूछना है?”
“पूछो,” मैंने कहा।
“तुमने पहली रात के बाद सोचा क्या? कि ये औरत आख़िर है कौन?”
“सोचा,” मैंने सच कहा। “सोचा कि ये औरत इतनी सुंदर है और इतनी आज़ाद भी।”
रिया हँसी। फिर उसने अपनी कहानी बताई। उसकी शादी चार साल पहले हुई थी। पति ठीक था, पर उसमें वह आग नहीं थी जो रिया में थी। महीने में दो-चार बार, वो भी दस मिनट का काम। और रिया की आग तो बुझने का नाम ही नहीं लेती थी। उसने कई बार कहा, समझाया, पर पति को फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। फिर धीरे-धीरे रिया ने खुद को संभालना शुरू किया।
“और तुम्हें पता है सबसे बड़ी बात क्या है?” उसने कहा। “ये सोसाइटी। यहाँ अगर तुम्हारे अंदर आग है और तुम ठीक से कपड़े पहनती हो, तो लोग देखते हैं। और देखा जाना… अच्छा लगता है। इसमें कोई बुराई नहीं।”
“तो तुमने पहले भी…?” मैंने पूछा।
“इस नवरात्रि से पहले, सिर्फ़ एक बार,” उसने कहा। “पर अब तो जैसे प्यास जाग गई है।”
इतना कहकर उसने खुद मेरे होंठों पर होंठ रख दिए।
इस बार चुंबन पहली रात से भी गहरा था। रिया ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा और ऐसे चूसा जैसे पूरी ज़िंदगी की भूख हो। हम दोनों खड़े ही थे, छत की ज़मीन पर, और उसका शरीर मुझसे चिपका हुआ था। मैंने उसके ब्लाउज़ के हुक खोलने शुरू किए और वह बीच में रुककर हँसी, “जल्दी मत करो, आज रात बहुत बड़ी है।”
धीरे-धीरे, एक-एक करके, उसने अपने कपड़े उतारे। ब्लाउज़, ब्रा, घाघरा, पेटीकोट, पैंटी। फिर वह पूरी नंगी, छत पर, तारों के नीचे खड़ी हो गई। ठंडी हवा उसके निप्पलों को सख़्त कर रही थी, और उसकी त्वचा पर कँपकँपी दौड़ रही थी। नवरात्रि: नौ रातें, नौ रंग, और बेशुमार वासना
“अब तुम,” उसने कहा, और मुझे भी नंगा कर दिया।
वह घुटनों पर बैठी और मेरे लंड को मुँह में ले लिया। इस बार वह जल्दी में नहीं थी। धीरे-धीरे, गहराई तक, हर बार पूरा अंदर। उसकी जीभ मेरे लंड की लंबाई पर सरकती, और उसकी आँखें उठकर मेरी तरफ़ देखती रहीं। मैंने उसके बाल पकड़े और उसके सिर को सहलाया।
“अच्छा लगता है?” उसने बीच में पूछा।
“बहुत,” मैंने हाँफते हुए कहा।
फिर वह सोफ़े पर लेट गई, टाँगें चौड़ी करके, और बोली, “आज धीरे से। पूरा मज़ा लेते हैं।”
मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे अंदर सरकाया। आज वह पहले से भी गीली थी। मैंने पूरा अंदर जाने दिया और वहीं रुक गया, महसूस करते हुए। फिर धीमे-धीमे, लंबे धक्के देने लगा।
“हाँ… ऐसे ही…” रिया ने आँखें बंद करके कहा। “पूरा… पूरा डालो…”
हम दोनों की लय मिल गई थी। हर धक्के पर वह अपनी कमर ऊपर उठाती, और मैं उससे मिलने के लिए नीचे जाता। तारे हमारे ऊपर, शहर हमारे नीचे, और हम दोनों एक-दूसरे में खोए। मैंने उसके स्तन चूसे, उसकी गर्दन पर चुंबन किए, उसके कान में धीमे-धीमे बातें कहीं। वह कराहती रही, मेरी पीठ नाखूनों से नोचती रही।
फिर उसने मुझे पलट दिया और खुद ऊपर आ गई। वह मेरे ऊपर बैठी, और अपनी कमर ऐसी हिलाई जैसे कोई रक़्स कर रही हो। उसकी चूड़ियाँ छनकती, उसके स्तन झूलते, और उसकी कराहें आसमान तक जातीं।
“आज तुम्हें थकाना है,” वह फुसफुसाई, “इतना कि कल याद रहे।”
हमने कई बार करवटें बदलीं। कभी वह झुककर मेरे चेहरे को चूमती, कभी पीछे से लेती, कभी मेरी गोद में बैठकर। रिया की हर मुद्रा में एक अलग ही नशा था। और जब आख़िर में मैं झड़ने वाला था, तो उसने खुद को नीचे ले जाकर मेरा लंड मुँह में लिया और पूरा माल अपने मुँह में लिया, फिर निगल गई।
“अब बताओ,” वह सोफ़े पर पसरते हुए बोली, “पहली रात से ये रात कैसी रही?”
“बहुत अलग,” मैंने कहा। “और बहुत बेहतर।”
“अच्छा,” वह मुस्कुराई। “तो समझ लो, नवरात्रि के नौ दिन हैं। हर रात का एक अलग मज़ा है। और हर रंग का अपना असर।”
“मतलब?” मैंने पूछा।
“मतलब, हर रात हम तुम्हें कुछ नया सिखाएँगे,” वह हँसी। “पर याद रखना, सोनल को जलाना नहीं।”
और हम छत पर ही देर तक लेटे रहे, तारे गिनते हुए, शहर की आवाज़ें सुनते हुए।
नीचे गरबा अब भी चल रहा था।
रात तीन — नीला: सोनल और बारिश वाली रात
तीसरे दिन का रंग नीला था, और मौसम ने भी साथ दिया — शाम से ही बादल घिर आए थे। गरबा खेलते-खेलते हल्की बारिश शुरू हो गई, और लोग भागने लगे। पर कुछ पागल — हम जैसे — बारिश में भी नाचते रहे।
आज सोनल अकेली आई थी। रिया को आज उसके ससुराल से कोई मेहमान आ गए थे। सोनल नीली चनिया चोली में थी, और भीगे बालों के साथ वह और भी हसीन लग रही थी।
“आज तुम्हारे साथ सिर्फ़ मैं,” उसने मेरे कान में कहा। “पर एक शर्त है।”
“क्या शर्त?”
“आज तुम मेरे घर नहीं, मैं तुम्हारे घर आऊँगी। तुम्हारे फ्लैट में। तुम्हारे बिस्तर पर।”
मैं हँस पड़ा। “क्यों?”
“क्योंकि रिया की रात हो चुकी, अब मेरी बारी। और मुझे अपनी जगह चाहिए,” वह हँसी। “तुम्हारा फ्लैट, तुम्हारा बिस्तर। वहाँ तुम पर और मेरा राज चलेगा।”
हम भीगते हुए मेरे फ्लैट तक आए। दरवाज़ा खोला, अंदर घुसे, और सोनल ने झट से दरवाज़ा बंद कर दिया। अंदर आते ही उसने अपने भीगे बाल पीछे किए, और फिर बिना कुछ कहे, मुझे दीवार से लगा दिया और चूमने लगी।
यह चुंबन अलग था — बारिश की गंध, भीगे कपड़े, और ठंडी-गरम त्वचा। सोनल की जीभ मेरे होंठों पर, दाँतों पर, मेरी गर्दन पर। वह किसी जानवर की तरह भीगी हुई मुझ पर टूट पड़ी थी।
“नहाने की ज़रूरत नहीं,” उसने हाँफते हुए कहा, “बारिश ही नहला गई।” नवरात्रि: नौ रातें, नौ रंग, और बेशुमार वासना
भीगे कपड़े उतारना सबसे मुश्किल काम था, और सबसे मज़ेदार भी। नीली चोली शरीर से चिपकी हुई थी, और जब सोनल ने उसे उतारा, तो उसके स्तनों से पानी की बूँदें टपक रहीं थीं। मैंने उन बूँदों को जीभ से चाटा। सोनल ने आँखें बंद कर लीं।
हम दोनों भीगे हुए बिस्तर पर गिरे। सोनल का बदन तराशा हुआ था — दुबला, पर मज़बूत। उसकी छाती छोटी, पर निप्पल बड़े और संवेदनशील। जैसे ही मैंने उन्हें मुँह में लिया, वह पूरी झटके से उठी और कराही।
“तुम्हें पता है,” उसने कहा, “रिया तुम्हें लंबी चुदाई देती है। पर मुझे… तेज़ और गहरी पसंद है। बर्दाश्त कर पाओगे?”
“देख लेंगे,” मैंने कहा।
सोनल ने मुझे पलट दिया और खुद ऊपर आ गई। उसने मेरा लंड पकड़ा और सीधे अपनी चूत में उतार लिया, एक ही धक्के में, पूरा। वह चीखी, पर रुकी नहीं। उसने तेज़, छोटे, गहरे धक्के देने शुरू किए — ऐसे धक्के जो हर बार मेरे पूरे शरीर को हिला देते।
“आह… ऐसे ही… और तेज़…” वह बुदबुदाती।
वह पागलों की तरह ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके पसीने की बूँदें मेरे सीने पर गिर रहीं थीं। मैंने उसकी कमर पकड़ी और खुद भी नीचे से धक्के देने लगा, जिससे लय और तेज़ हो गई। सोनल आँखें बंद किए, होंठ काटे, बस झूलती रही।
फिर उसने मेरे हाथ पकड़कर सिरहाने से बाँधने की कोशिश की — जैसे मुझे कैद करना हो। मैंने उसे अपनी बाँहों में जकड़ लिया और करवट लेकर उसे नीचे लिटा दिया। अब मैं ऊपर था, और उसकी टाँगें मेरी कमर पर लिपटी हुई थीं।
मैंने पूरी ताक़त से धक्के देने शुरू किए। सोनल की कराहें कमरे में गूँजने लगीं। उसने मेरी पीठ नोची, मेरे कंधे पर दाँत गड़ाए, और मेरे कान में गंदी-गंदी बातें कहने लगी जो उसकी शराफ़त के नीचे छिपी आग दिखा रही थीं।
“तुम्हारा लंड… बहुत अच्छा है… और मत रुकना…” वह बोली।
हमने कई बार मुद्राएँ बदलीं। कभी उसे बिस्तर के किनारे झुकाया और पीछे से लिया, कभी खड़ा करके दीवार से लगाया, कभी कुर्सी पर बिठाया। सोनल हर मुद्रा में पूरी देती रही। उसकी चूत से इतना पानी निकला कि मेरी जाँघें भीग गईं।
आख़िर में उसने मुझे पीछे से जकड़ा और फुसफुसाई, “अंदर ही डालो। आज गरम है।”
मैंने आख़िरी तेज़ धक्के दिए और अंदर ही झड़ गया। सोनल का पूरा शरीर काँपा, फिर ढीला पड़ गया। हम दोनों हाँफते हुए बिस्तर पर गिर पड़े, पसीने और बारिश के पानी से लथपथ।
“ये रात याद रखूँगी,” सोनल ने कुछ देर बाद कहा।
“कल कौन?” मैंने पूछा।
“कल पीला है,” वह हँसी। “और पीला मतलब… नया मेहमान। तुम्हारे लिए नहीं, हमारे लिए।”
“क्या मतलब?”
“कल तुम्हें पता चलेगा,” वह रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोली, और मेरी छाती पर सिर रखकर सो गई।
बाहर बारिश अब भी हो रही थी।
रात चार — पीला: गरबा मैदान की अनजान आंटी
चौथे दिन का रंग पीला था। और उस रात रिया-सोनल दोनों ने मुझे बताया कि आज वे दोनों किसी पारिवारिक फंक्शन में हैं, तो मैं अकेला गरबा मैदान चला गया — पर इस बार सोसाइटी के बजाय शहर के बड़े मैदान पर।
वहाँ भीड़ हज़ारों की थी। यहाँ माहौल और बड़ा, और आज़ाद था। ढोल की आवाज़ दूर तक, और लाइटों का समंदर।
मैं नाच रहा था, पर आज किसी की तलाश में नहीं — बस माहौल का मज़ा ले रहा था। तभी मेरी नज़र एक औरत पर पड़ी जो मेरी उम्र की लड़कियों की लाइन में नाच रही थी। उम्र कोई अड़तीस-चालीस। पर बदन ऐसा कि उम्र झूठ लगे। पीली चनिया चोली, बालों में गजरा, और हाथों में रची मेहंदी।
उसे देखकर मुझे रुकना पड़ा। इतनी सुंदर औरत इतनी भीड़ में अकेली, और वह भी जवान लड़कियों की लाइन में। ज़रूर कोई बात है।
मैं उसकी लाइन में जाकर उसके पास नाचने लगा। शुरू में उसने ध्यान नहीं दिया, पर जब मैं कुछ देर वहीं रहा, तो उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा और हल्की मुस्कान दी। बस इतना काफ़ी था।
इंटरवल में हम दोनों एक ही पानी के स्टॉल पर पहुँचे। उसने पानी माँगा, मैंने भी माँगा। पानी पीते हुए हमारी नज़रें मिलीं।
“आप अकेली हैं?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा, “पति-बच्चे सब घर पर। मैं तो बस नाचने आती हूँ। इस उम्र में भी ये लोग जवान लड़कियों के साथ नचवाते हैं।”
“आप जवान लड़कियों को भी मात देती हैं,” मैंने सच कहा।
वह हँसी। “चापलूसी।”
“नाम?” मैंने पूछा।
“जागृति,” उसने कहा। “और तुम?”
“आरव।”
उसके बाद हम फिर नाचने लगे, और इस बार साथ। उसकी कमर के झूलने में एक अलग ही तजुर्बा था — वयस्क, समझदार, और अपने बदन की पूरी जानकारी रखने वाली औरत का। जब भी वह झुकती, तो उसकी चोली से उसकी छाती की गोलाई दिख जाती, और मेरी नज़र अपने आप वहीं जाती।
गरबा खत्म हुआ, और जागृति अपनी एक्टिवा निकालने लगी। मैं भी अपनी बाइक की तरफ़ बढ़ा, पर जान-बूझकर धीरे चला।
रास्ते में उसने लेफ्ट टर्न लिया, मैंने भी। उसने देखा, मुस्कुराई। मैं कुछ दूर पीछे-पीछे चलता रहा। फिर एक जगह वह रुकी और पीछे मुड़कर बोली, “तुम मेरा पीछा क्यों कर रहे हो?”
“क्योंकि आपको देखकर लगा कि आपसे बात करनी चाहिए,” मैंने कहा।
“बात? या कुछ और?” उसने शरारत से पूछा।
“दोनों,” मैंने कहा।
वह हँसी। “मैं तुम्हारी माँ जैसी हूँ।”
“माँ जैसी हो, माँ तो नहीं। और उम्र से क्या होता है?” मैंने कहा।
वह कुछ देर मुझे देखती रही। फिर बोली, “इतनी सारी जवान लड़कियाँ नाच रही थीं। तुम उनके पीछे क्यों नहीं गए?”
“क्योंकि उनमें वो बात नहीं जो आपमें है,” मैंने कहा।
जागृति दो मिनट तक चुप रही। फिर उसने कहा, “चलो, कहीं शांत जगह चलते हैं। यहाँ सड़क पर खड़े होकर बात करना ठीक नहीं।”
वह अपनी एक्टिवा लेकर चली, मैं अपनी बाइक पर उसके पीछे। शहर के बाहर एक सुनसान जगह पर पहुँचकर हम रुके। वहाँ कोई नहीं था, बस अंधेरा और दूर शहर की रोशनी।
हम बाइक के पास खड़े थे। मैंने उसकी तरफ़ देखा और कहा, “जागृति… सच कहूँ?”
“कहो।”
“आज पहली बार मैंने किसी औरत को देखकर सोचा कि उसके बिना घर नहीं जाना।”
वह हँसी। “पागल हो गए हो।”
“हो गया हूँ,” मैंने कहा, और उसे गले लगा लिया।
शुरू में वह अकड़ी रही, पर फिर उसने भी मुझे पकड़ लिया। मैंने उसके होंठ चूमे। वह शुरू में हिचकिचाई — जैसे इतने साल बाद कोई चूम रहा हो और उसे याद न आ रहा हो कि कैसे करते हैं। फिर उसने भी जवाब दिया, और पहला चुंबन दस मिनट तक चला। जब हम अलग हुए, वह पूरी पागल हो चुकी थी।
“ऐसी किस तो मैंने ज़िंदगी में नहीं की,” उसने हाँफते हुए कहा।
मैंने उसके स्तनों पर हाथ रखा और दबाया। वह कराही और मेरे लंड पर हाथ रख दिया। फिर मैंने उसकी चोली खोल दी, और उसके स्तन बाहर आ गए — भरे हुए, थोड़े ढीले, पर औरत के बदन का पूरा नशा लिए हुए। मैंने उन्हें मुँह में लेकर चूसा। वह मेरे बाल पकड़कर कराहने लगी।
फिर मैंने उसे बाइक से उतारा, उसका घाघरा खींचा, और नीचे झुककर उसकी पैंटी खींच दी। वह पूरी नंगी खड़ी थी। मैंने उसकी चूत चाटी, और वह पागल हो गई। उसके चूत से पानी रिस रहा था।
“अब अंदर डालो,” वह हाँफी। “और जल्दी, ये रात लंबी नहीं है।”
मैंने उसे बाइक पर बिठाया, उसकी टाँगें फैलाईं, और अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखकर एक धक्के में अंदर डाल दिया। वह चीख पड़ी। इतने सालों की सूखी चूत में लंड जाते ही उसका पूरा शरीर झटके से उठ गया।
मैं धक्के देने लगा। वह मेरी बाँहों में लटक गई, और उसने मुझे जकड़ लिया। उसने मेरी छाती पर हाथ रखा और बोली, “तुम्हारी छाती के बाल… मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। जब तुम मुझे जकड़ते हो तो वो रगड़ते हैं… आह…”
हम वहीं, बाइक पर, खुले आसमान के नीचे, दस मिनट तक चुदे। फिर मैं झड़ गया — उसकी चूत में ही। पर उसका पानी नहीं निकला था।
“अभी नहीं,” उसने कहा, “अभी तो मैं शुरू हुई हूँ।”
उसने बाइक से उतरकर मेरा लंड साफ़ किया, और मुँह में लेकर चूसने लगी। पाँच मिनट में मैं फिर तैयार हो गया। इस बार उसने अपना घाघरा ज़मीन पर बिछाया, और उस पर लेट गई। मैंने उसके ऊपर आकर अपना लंड डाला और चोदने लग अब वह भी ज़ोर-ज़ोर से देने लगी। उसने अपनी टाँगें मेरी कमर पर लपेट लीं और मुझे अंदर खींचने लगी। दोनों एक साथ चरम की तरफ़ बढ़ने लगे। जब वह झड़ी, तो उसका पूरा शरीर काँपा और उसने मुझे अपनी बाँहों में कसकर दबा दिया। दो मिनट तक वह मुझे पकड़े रही, फिर ढीली पड़ गई।
इस बार मैंने भी उसके साथ ही झड़ दिया।
पाँच मिनट तक हम एक-दूसरे पर पड़े रहे। फिर वह उठी और बोली, “पाँच साल बाद आज पहली बार मेरा पानी निकला। घर में तो वो बस काम चलाते हैं — जैसे ही वो झड़ते हैं, सो जाते हैं। मेरी तरफ़ देखते भी नहीं।”
हमने कपड़े पहने, और फिर गरबा मैदान की तरफ़ लौटे। वहाँ पहुँचते-पहुँचते गरबा खत्म होने वाला था। जागृति ने अपनी एक्टिवा निकाली, और मैं उसके घर तक पीछे-पीछे गया। घर के गेट पर वह रुकी, मुड़ी, और बोली —
“आरव, ये नवरात्रि खत्म होने तक चलेगा ना?”
“चलेगा,” मैंने कहा।
वह मुस्कुराई और अंदर चली गई।
रात पाँच — हरा: चचेरी बहन निशी की एंट्री
पाँचवें दिन का रंग हरा था। और इस दिन मेरे फ्लैट में एक नई एंट्री हुई — मेरी चचेरी बहन निशी।
निशी मेरी मौसी की बेटी थी। उम्र इक्कीस, मुंबई में पढ़ती थी। मौसी का फ़ोन आया कि निशी नवरात्रि के लिए अहमदाबाद आ रही है, कुछ दिन रहेगी, और मेरे फ्लैट में ही ठहरेगी। मुझे कोई एतराज़ नहीं था — फ्लैट बड़ा था, दो बेडरूम।
पर निशी को देखकर मेरी आँखें फटी रह गईं। वह बचपन में जो पतली-दुबली चिड़िया थी, अब एक पूरी औरत बन चुकी थी। फिगर 34-26-32, कमर पतली, छाती भरी, गांड गोल। चेहरे पर बिंदासपन, और आँखों में शरारत। जींस और टाइट टॉप में वह अपने ही चचेरे भाई को घूरने पर मजबूर कर दे।
“क्या देख रहे हो, भैया?” उसने पहले ही दिन पूछा।
“कुछ नहीं,” मैंने कहा।
“झूठ,” वह हँसी। “सब यही देखते हैं।”
वह बिंदास थी। दिन में उसने मुझे बताया कि उसका एक बॉयफ्रेंड है, पर वो “बोरिंग” है। और मुंबई में उसने ट्रेन में एक अजनबी के साथ भी चुदाई की थी, जिसका उसे ब्लैकमेल भी करता था। यह सब उसने बड़े मज़े से, बिना शर्माए, बताया।
“तो तुम तो पूरी चुदक्कड़ निकलीं,” मैंने कहा।
“और तुम?” उसने पलटकर पूछा। “इतने बड़े फ्लैट में अकेले। कितनी औरतें चोद चुके हो?”
“गिनती छूट गई,” मैं हँसा।
उस रात हम दोनों गरबा खेलने गए। निशी हरे रंग की चनिया चोली में थी, और भीड़ में सबसे अलग चमक रही थी। हम साथ नाचे। भाई-बहन के नाते, पर नाचते-नाचते दूरी खत्म होने लगी। उसकी कमर मेरे हाथों में आती, और वह मुस्कुरा देती।
घर लौटे तो रात ग्यारह बजे थी। हमने चाय बनाई, और सोफ़े पर बैठ गए। बातों-बातों में निशी ने पूछा, “भैया, सच बताओ, इस सोसाइटी में किसी से…?”
“हाँ,” मैंने कहा।
“कौन है?” उसने जिज्ञासा से पूछा।
“दो भाभियाँ हैं,” मैंने कहा। “दोनों के पति बाहर गए हैं।”
“वाह,” निशी हँसी। “तो भैया तो निकले चालू।”
तभी उसने अपनी चाय रखी और मेरी तरफ़ देखा। उसकी नज़र में कुछ था। “भैया,” वह धीरे से बोली, “आज रात किसी के पास नहीं जाना। मेरे साथ रुकना।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि मैं अकेली हूँ, और नई जगह है,” उसने कहा। “और… तुमसे कुछ बात करनी है।”
हम बातें करते-करते और करीब आ गए। निशी का हाथ मेरे कंधे पर आ गया। मैंने उसकी तरफ़ देखा, और उसने बिना कुछ कहे मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
भाई-बहन का चुंबन। पर इसमें भी एक अलग ही बात थी। निशी पूरी तरह से खुल गई — उसने मेरी गर्दन, मेरे कान, मेरे गले पर चुंबन किए, और फिर मेरी शर्ट के बटन खोलने लगी।
“भैया, पता है,” उसने बीच में कहा, “जब से तुम्हें देखा, सोच रही हूँ कि आज रात तुम्हारे ही बिस्तर पर सोऊँगी।”
“और बॉयफ्रेंड?” मैंने पूछा।
“वो मुंबई में है,” वह हँसी। “यहाँ तो तुम हो।”
हम बेडरूम में चले गए। निशी ने अपने कपड़े एक-एक करके उतारे, बड़े नाटकीय अंदाज़ में, जैसे कोई स्ट्रिपटीज़ कर रही हो। पहले टॉप, फिर ब्रा, फिर जींस, फिर पैंटी। और जब वह पूरी नंगी खड़ी हुई, तो मुझे लगा कि यह लड़की अपने भाई को भी पागल कर देगी।
उसका बदन सख़्त था, जवान, बिना किसी झोल के। उसकी छाती गोल और टाइट, निप्पल सख़्त गुलाबी। उसकी कमर पर एक छोटा टैटू था। और उसकी चूत पर बाल इतने कम कि लगे कल का ही बनाया हो।
“अब तुम्हारी बारी,” उसने कहा, और मुझे बिस्तर पर धक्का देकर खुद मेरे ऊपर चढ़ गई।
उसने मेरी पैंट खोली, और मेरा लंड देखकर आँखें बड़ी कर लीं। “वाह भैया,” वह बोली, “अब समझी कि भाभियाँ तुम्हारे पीछे क्यों पड़ी हैं।”
उसने झट से लंड मुँह में ले लिया और बड़े मज़े से चूसने लगी। निशी की चूसने की शैली अलग थी — वह जल्दी करती, तेज़, बीच-बीच में लंड को थपथपाती, और ऊपर देखकर मुस्कुराती। उसने मेरे अंडों को भी मुँह में लिया और चूसा।
“बहुत हो गया,” मैंने कहा, “अब अंदर लेते हैं।”
“नहीं,” वह बोली। “पहले मेरी चूत चाटो। मुझे पसंद है।”
वह मेरे मुँह पर चढ़ बैठी। उसकी चूत मेरे होंठों पर। मैंने जीभ नीचे लगाई और चाटने लगा। निशी ऊपर से धक्के देने लगी, और मेरी नाक उसकी चूत में धँसने लगी। उसका पानी मेरे पूरे चेहरे पर फैल गया। वह कराहती रही, और मेरे बाल पकड़कर अपनी तरफ़ खींचती रही।
“आह… भैया… वहीं… वहीं…” वह चीखी, और फिर झड़ गई।
फिर वह मेरे नीचे लेटी और टाँगें फैलाईं। मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा। वह गीली थी, तैयार थी। मैंने धीरे-धीरे अंदर डाला, और वह कराही।
“पूरा डालो, भैया,” उसने कहा, “दर्द नहीं होगा।”
मैंने पूरा अंदर डाल दिया। उसकी चूत कसी हुई थी, पर फिसलन इतनी थी कि लंड आराम से अंदर चला गया। मैं धक्के देने लगा। निशी ने अपनी टाँगें मेरी कमर पर लपेट लीं और मुझे अंदर खींचने लगी।
“तेज़, भैया… और तेज़…” वह बोली।
मैंने तेज़ कर दिया। बिस्तर चरमराने लगा। निशी की कराहें कमरे में गूँजने लगीं। हमने कई मुद्राएँ आज़माईं। पहले मिशनरी, फिर पीछे से, फिर वह ऊपर, फिर मेरी गोद में बैठकर। निशी की हर मुद्रा में एक अलग ही उन्माद था। वह अपनी कमर ऐसे हिलाती जैसे गरबा में।
“भैया, तुम बहुत अच्छा चोदते हो,” उसने बीच में हाँफते हुए कहा। “बॉयफ्रेंड को भूल जाऊँगी।”
आधे घंटे बाद मैं झड़ने वाला था। उसने कहा, “अंदर मत करना। मुँह में दो।”
वह नीचे उतरी, मेरा लंड मुँह में लिया, और मैंने उसके गरम मुँह में झड़ दिया। निशी ने सब कुछ निगल लिया, और फिर मुस्कुराकर बोली, “स्वादिष्ट।”
हम एक-दूसरे के आगोश में लेट गए। थके हुए, पर खुश।
“भैया,” निशी ने कुछ देर बाद कहा, “इस बार नवरात्रि में मुझे भी कुछ करना है।”
“क्या?” मैंने पूछा।
“तुम्हें पता है, मेरे दोस्त लोग यहाँ हैं। वे सब मिलकर प्लान बना रहे हैं। कल रात…” वह रुकी।
“कल रात क्या?” मैंने पूछा।
“कल पता चलेगा,” वह हँसी, और मेरी छाती पर सिर रखकर सो गई।
रात छह — ग्रे: निशी की गैंगबैंग वाली रात
छठे दिन का रंग ग्रे था। और इस रात जो हुआ, वह अलग ही किस्म का था।
निशी ने दिन में मुझे बताया कि उसके दोस्त लोग एक फार्महाउस पर प्लान बना रहे हैं। उसमें एक चचेरा भाई संजू भी था — निशी की ही उम्र का, और उसके दो दोस्त। और निशी ने मुझे भी आमंत्रित किया, पर एक शर्त के साथ —
“भैया, तुम सिर्फ़ देखोगे नहीं। तुम भी शामिल होगे,” उसने कहा।
“मतलब?”
“मतलब, रात को वहाँ चार लड़के होंगे, और एक लड़की — मैं,” वह हँसी। “पर तुम्हें भी आना है। तो पाँच।”
“तो क्या, तुम पाँचों से…?” मैंने पूछा।
“देखते हैं,” वह बिंदास हँसी।
शाम को हम दोनों तैयार होकर फार्महाउस पहुँचे। एक बड़ा बंगला, बाहर लॉन, अंदर बड़ा बेडरूम। वहाँ संजू और उसके दोस्त — विशाल और करण — मौजूद थे। संजू निशी को देखकर झटका खा गया।
“साली कमाल की लड़की है,” संजू ने मुझसे कहा, “काश ये मेरी गर्लफ्रेंड होती।”
“तो तुम क्यों नहीं पटाते?” मैंने पूछा।
“क्योंकि ये भैया-भैया करके पटा लेती है,” संजू हँसा।
निशी ने सबसे परिचय कराया। फिर उसने चारों लड़कों को देखा और बोली, “आज रात सबको बराबर हिस्सा मिलेगा। कोई झगड़ा नहीं।”
“और तुम्हारे भैया?” संजू ने पूछा।
“भैया तो पहले से मेरे हैं,” निशी ने आँख मारी।
हमने खाना खाया, थोड़ी शराब पी, और फिर बातें करने लगे। धीरे-धीरे माहौल गरम होने लगा। निशी ने शुरुआत की — उसने संजू को चूमना शुरू किया, और बाकी लोग देखते रहे।
फिर निशी ने अपने कपड़े उतारने शुरू किए। टॉप, ब्रा, जींस, पैंटी — और चारों लड़के साँस रोककर देखते रहे। निशी की जवान देह, उसका बिंदासपन, और चारों तरफ़ से घूरती नज़रें।
“अब तुम लोग,” उसने कहा।
चारों ने अपने कपड़े उतार दिए। चार लंड, अलग-अलग आकार के। और निशी बीच में खड़ी, पूरी नंगी, मुस्कुराती हुई।
फिर शुरू हुआ खेल। संजू ने निशी को चूमना शुरू किया, विशाल ने उसकी छाती दबाई, करण ने उसकी चूत सहलाई। और मैं पीछे से आकर उसकी गांड पकड़कर सहलाने लगा। चार जोड़ी हाथ, और एक निशी — वह पागल हो गई।
उसे बिस्तर पर लिटाया गया। संजू ने उसकी चूत चाटनी शुरू की, विशाल ने उसका मुँह लंड से भर दिया, और करण ने उसके स्तन चूसे। निशी की कराहें मुँह में लंड के कारण दबी-दबी निकल रहीं थीं।
फिर निशी ने संजू को अपने ऊपर चढ़ने दिया। संजू ने धक्के देने शुरू किए, और विशाल ने निशी के मुँह में लंड डाला। इस तरह निशी एक साथ दो जगह से लंड ले रही थी — ऊपर से और नीचे से।
“आह… हाँ… दोनों… दोनों…” वह बुदबुदाती।
दस मिनट बाद पोज़िशन बदली। अब करण ने निशी को पीछे से लिया, जबकि विशाल ने उसके मुँह में। संजू पास बैठकर निशी की छाती दबा रहा था।
फिर मेरी बारी आई। मैंने निशी को घोड़ी की तरह खड़ा किया, और उसकी चूत में लंड डाला। निशी चीख पड़ी — “भैया!” — और उसके बाद बस कराहती रही। संजू ने आगे से उसके स्तन चूसे, विशाल ने उसका हाथ पकड़कर अपना लंड सहलवाया।
निशी की हालत खराब हो चुकी थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। चारों लड़के बारी-बारी से उसे चोद रहे थे, और वह सब कुछ बर्दाश्त कर रही थी — उलटे मज़े ले रही थी।
करीब दो घंटे चला। चारों एक-एक बार झड़े। निशी को दो बार झड़वाया गया। आख़िर में वह बिस्तर पर पसर गई, पसीने से लथपथ, हाँफती हुई।
“बस,” वह हाँफी, “अब और नहीं।”
चारों लड़के उसके चारों तरफ़ लेट गए। एक उसका हाथ पकड़े हुए, एक उसके बाल सहलाते हुए, एक उसकी छाती पर हाथ रखे हुए, और मैं उसके पास।
“भैया,” निशी ने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा, “ये रात ज़िंदगी भर याद रहेगी।”
“मुझे भी,” मैंने कहा।
अगली सुबह जब हम उठे, तो चारों लड़के नंगे पड़े थे, और निशी बीच में सो रही थी। उसने आँखें खोलीं, चारों को देखा, और हँस पड़ी।
“ग्रे रंग सही था,” वह बोली, “न गोरा, न काला — बीच का। और बीच में हम सब।”
रात सात — बैंगनी: सोसाइटी की पार्टी और दिव्या-अंकल
सातवें दिन का रंग बैंगनी था। और इस दिन सोसाइटी के क्लबहाउस में एक बड़ी पार्टी थी — नवरात्रि का आधा हो चुका था, तो सोसाइटी वालों ने एक “मिलन समारोह” रखा। सबको आना था।
निशी तो मेरे साथ थी ही। रिया और सोनल भी आईं, दोनों अपने-अपने पति के साथ — जो अब लौट चुके थे। यह दिलचस्प था, क्योंकि मैदान में वे मेरे साथ नाच रही थीं, और अब पति के साथ। हमने एक-दूसरे को देखा, और सब कुछ आँखों ही आँखों में कह दिया।
जागृति भी आई थी, अपने पति और बच्चों के साथ। उसने मुझे दूर से देखा और हल्की मुस्कान दी।
पार्टी में एक नई चेहरा भी था — दिव्या। उम्र बीस, मेरे ही ब्लॉक के एक परिवार की बेटी। पतली, सुंदर, और पूरी बिंदास। वह मेरी तरफ़ देख-देखकर मुस्कुरा रही थी, और मैं भी।
पर दिव्या की कहानी अलग थी। उसके पिता का एक दोस्त था — महेश अंकल, उम्र छप्पन। दिव्या बचपन से उन्हें जानती थी। अंकल उसे गोद में बिठाते, तोहफ़े लाते, चूमते। और अब दिव्या जवान हो चुकी थी।
पार्टी में महेश अंकल भी आए थे। और मैंने देखा कि वे दिव्या को किस नज़र से देख रहे थे। नज़र सिर्फ़ पिता के दोस्त की नहीं थी।
निशी ने मुझसे कहा, “देखो भैया, वो अंकल दिव्या को कैसे देख रहे हैं।”
“हाँ,” मैंने कहा, “यही तो मज़ा है।”
पार्टी में नाच-गाना चलता रहा। दिव्या ने मुझे नाचने के लिए बुलाया, और हम नाचे। वह अच्छी नाचती थी, और उसका बदन जवान था — पर उसमें वह पक्कापन नहीं था जो रिया-सोनल में था। वह कच्ची थी, पर प्यारी।
“आरव भैया,” उसने कहा, “आप तो बहुत अच्छा नाचते हैं।”
“तुम भी,” मैंने कहा।
“पर अंकल कहते हैं कि मैं बिगड़ गई हूँ,” वह हँसी। “जब भी वे आते हैं, मुझे देखते रहते हैं।”
“तुम्हें पसंद है?” मैंने पूछा।
“पता नहीं,” वह शरमाई। “पर जब वे मुझे देखते हैं, तो अच्छा लगता है।”
पार्टी के बाद, देर रात, जब लोग जाने लगे, तो मैंने देखा कि महेश अंकल दिव्या को उनके घर छोड़ने जा रहे हैं। और दिव्या की माँ ने उनसे कहा, “भैया, आप दिव्या को घर छोड़ दीजिए, हम थोड़ी देर बाद आएँगे।”
बस, इतना काफ़ी था।
उस रात मैंने सोचा कि उस घर में क्या हुआ होगा। और मुझे बाद में दिव्या ने सब बताया —
अंकल दिव्या को उसके घर छोड़कर अंदर आए। चाय पी। और फिर, बातों-बातों में, दिव्या के पास बैठ गए। उन्होंने दिव्या का हाथ पकड़ा, और कहा, “बेटा, तुम बड़ी हो गई हो।”
दिव्या ने कहा, “हाँ अंकल।”
फिर अंकल ने उसे चूम लिया। और दिव्या, जो बचपन से उनके चुंबन की आदी थी, इस बार फ़र्क़ महसूस कर रही थी। यह चुंबन पिता के दोस्त का नहीं, एक आदमी का था।
फिर अंकल ने उसे गोद में बिठाया, और उसकी छाती पर हाथ रखा। दिव्या ने कोई विरोध नहीं किया। अंकल ने उसकी कमीज़ के बटन खोले, ब्रा खोली, और उसकी जवान छाती बाहर आई। उन्होंने उसे चूसा, और दिव्या कराहने लगी।
“अंकल,” वह फुसफुसाई।
“श्श्श,” अंकल ने कहा, “आज तुम्हें बड़ा करना है।”
उन्होंने दिव्या को पूरा नंगा किया, और खुद भी नंगे हो गए। उनका लंड नौ इंच का था — बड़ा, मोटा। दिव्या ने देखकर आँखें बंद कर लीं।
अंकल ने उसे बिस्तर पर लिटाया, और उसके पूरे शरीर को चूमा — गर्दन, छाती, पेट, जाँघें। फिर उसकी चूत को चूमा। दिव्या पहली बार इतनी चुद रही थी, तो वह पागल हो गई।
फिर अंकल ने अपना लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे अंदर डाला। दिव्या चीख पड़ी। इतना बड़ा लंड अंदर जाते ही उसे लगा कि वह फट जाएगी। पर अंकल ने धीरे-धीरे, प्यार से, अंदर डाला, और वहीं रुक गए, जब तक दिव्या को आदत नहीं हो गई।
फिर उन्होंने धीरे-धीरे धक्के देने शुरू किए। दिव्या की कराहें बढ़ने लगीं। उसने अपनी टाँगें अंकल की कमर पर लपेट लीं, और वह अंदर और गहरे जाने लगे।
अंकल ने उसे कई मुद्राओं में चोदा। और दिव्या, जो कल तक कुँवारी थी, आज एक पूरी औरत बन गई। उसने अंकल के साथ झड़ना भी सीखा।
अगले दिन दिव्या ने मुझे सब बताया, और आँखों में एक नई चमक थी।
“आरव भैया,” उसने कहा, “अब मुझे समझ आया कि औरत क्या होती है।”
“और अंकल?” मैंने पूछा।
“अंकल ने कहा, नवरात्रि में रोज़ आएँगे,” वह शरमाई।
रात आठ — मोरपंखी: प्रसाद और अनुजा का समझौता
आठवें दिन का रंग मोरपंखी था। और इस दिन मेरी मुलाक़ात एक ऐसे जोड़े से हुई जो पूरी तरह से अलग पटरी पर चल रहा था।
वे सोसाइटी में नए आए थे — प्रसाद और अनुजा। दोनों शहर से दूर एक नए फ्लैट में रहते थे, जहाँ कोई उन्हें नहीं जानता। प्रसाद की उम्र तीस, और अनुजा छब्बीस की। अनुजा आधुनिक लड़की थी — जींस, टी-शर्ट, खुले बाल। और उसका बदन ऐसा था कि जींस और टी-शर्ट में भी दिख जाए — गोल छाती, उभरी गांड।
उस रात हम एक गरबा में मिले, और जल्द ही बातें होने लगीं। प्रसाद बहुत खुला आदमी था, और अनुजा और भी खुली।
“आरव,” प्रसाद ने कहा, “एक राज़ बताता हूँ। हमने इस नवरात्रि में एक चैलेंज रखा है।”
“क्या चैलेंज?” मैंने पूछा।
“नौ दिन, नौ आदमी,” प्रसाद ने कहा। “अनुजा हर दिन एक नए आदमी से चुदती है, और रात को घर लौटकर मुझसे।”
मैं हैरान रह गया। “नौ दिन, नौ आदमी? और तुम्हें बुरा नहीं लगता?”
“लगता क्यों?” प्रसाद हँसा। “मुझे तो देखने में मज़ा आता है। और अनुजा को भी।”
अनुजा ने मुस्कुराकर कहा, “आरव, आज आठवाँ दिन है। और आज का आदमी… तुम हो सकते हो।”
“मैं?” मैं हक्का-बक्का।
“क्यों नहीं?” प्रसाद ने कहा। “तुम्हें देखकर लगता है कि तुम अनुजा को खुश कर सकते हो। और हमने तुम्हारे बारे में सुना भी है।”
मैंने हामी भर दी।
अगली शाम, उनके फ्लैट पर। अनुजा ने खुद तैयारी की थी। घर में सिर्फ़ वे दोनों और मैं। प्रसाद पहले बाहर रहा — उसने कहा, “पहले तुम और अनुजा अकेले। फिर मैं आऊँगा।”
अनुजा ने मुझे अंदर बुलाया। वह एक लाल रंग की साड़ी में थी, जिसमें उसकी कमर और छाती दोनों बाहर झाँक रहे थे। बाल खुले, होंठ लाल, और आँखों में एक अलग ही प्यास।
“प्रसाद ने सब बता दिया होगा,” उसने कहा।
“हाँ,” मैंने कहा। “तुम बहुत बहादुर हो।”
“बहादुर नहीं, प्यासी हूँ,” वह हँसी। “चलो, बातें बाद में।”
उसने साड़ी उतार दी। नीचे सिर्फ़ एक लाल ब्रा और लाल पैंटी। उसका बदन वैसा ही था जैसा मैंने सोचा था — तराशा हुआ, जवान, बिना किसी कमी के। उसने अपनी पैंटी खुद खींच दी, और उसकी चूत सामने आ गई — साफ़, सुंदर, थोड़े बालों के साथ।
“पहले तुम्हारी बारी,” उसने कहा, और मुझे बिस्तर पर धक्का दिया।
अनुजा ने मेरी पैंट खोली और लंड को मुँह में लिया। वह कुशल थी — बहुत कुशल। नौ दिन में उसे कई लंड चूसने का तजुर्बा हो चुका था, पर वह फिर भी हर बार पहली बार जैसा उत्साह दिखा रही थी। उसने मेरे लंड को गहराई तक लिया, गले तक, और फिर धीरे-धीरे ऊपर आई।
“अच्छा लंड है,” उसने कहा। “प्रसाद से बड़ा।”
उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और खुद ऊपर चढ़ गई। उसने अपनी चूत मेरे लंड पर रखी और धीरे-धीरे नीचे बैठ गई। पूरा अंदर। वह कराही, और फिर अपनी कमर हिलाने लगी।
अनुजा की चुदाई की शैली अलग थी — वह पूरी तरह से नियंत्रण में थी। वह ऊपर बैठकर, अपनी गति से, अपने मूड से, मेरा लंड ले रही थी। और वह जानती थी कि क्या करना है। कभी तेज़, कभी धीमा, कभी गोल घुमाना, कभी ऊपर-नीचे।
“तुम्हें पसंद है ना?” उसने पूछा, “जब औरत ऊपर हो?”
“बहुत,” मैंने कहा।
वह हँसी और और तेज़ हो गई। उसकी छाती झूल रही थी, और मैंने उसे पकड़कर दबाया। उसने आँखें बंद कर लीं और पूरी तरह छोड़ दिया।
फिर दरवाज़ा खुला और प्रसाद अंदर आया। उसने हमें देखा — अनुजा मेरे ऊपर, चुदती हुई — और मुस्कुरा दिया। वह पास आया, कुर्सी पर बैठा, और देखने लगा। अनुजा ने उसकी तरफ़ देखा और और ज़ोर से हिलने लगी, जैसे दिखाना चाह रही हो।
“देख रहे हो?” अनुजा ने प्रसाद से कहा। “कैसे चुद रही हूँ?”
“देख रहा हूँ,” प्रसाद ने कहा, “और तुम्हारा पति होने पर गर्व हो रहा है।”
फिर प्रसाद भी शामिल हुआ। उसने अपने कपड़े उतारे और अनुजा के पीछे आया। अब अनुजा एक साथ दो लंड ले रही थी — मेरा आगे, प्रसाद का पीछे। उसकी गांड और चूत दोनों भरी हुई थीं, और वह कराह-कराह के पागल हो रही थी।
हमने करीब एक घंटे तक तीनों मिलकर खेल किया। अनुजा को दो बार झड़वाया। प्रसाद झड़ा उसकी गांड पर, और मैं झड़ा उसकी चूत में। आख़िर में तीनों बिस्तर पर पसर गए।
“आरव,” अनुजा ने कहा, “तुम आज के दिन का आदमी थे, पर तुम और प्रसाद ने मिलकर मुझे दोगुना मज़ा दिया।”
“कल कौन?” मैंने पूछा।
“कल आख़िरी दिन है,” प्रसाद ने कहा। “और कल के लिए अनुजा ने कहा है कि कोई ख़ास चाहिए।”
“कौन?” मैंने पूछा।
“तुम,” अनुजा ने कहा। “कल नौवाँ दिन। और मैं चाहती हूँ कि आख़िरी दिन तुम हो।”
रात नौ — सफ़ेद: आख़िरी रात, और सबका मेला
नौवें दिन का रंग सफ़ेद था। और यह आख़िरी रात थी। नवरात्रि का समापन।
सोसाइटी में आख़िरी रात बड़ा आयोजन था — माँ दुर्गा की विदाई, और गरबे का अंतिम धमाका। हर कोई आया था। रिया, सोनल, जागृति, निशी, दिव्या, अनुजा — सब।
और आज मुझे लगा कि मुझे किसी एक को चुनना नहीं है। आज सबको बुलाना है। आज सबका मेला है।
दिन में मैंने सबको एक-एक करके मिलाया। सबसे पहले निशी को बताया कि आज रात मेरे फ्लैट पर सब आएँगी। निशी तो पहले से जानती थी कि मेरा “सोसाइटी वाला चक्कर” है। रिया और सोनल को बताया तो दोनों हँस पड़ीं। जागृति ने कहा, “मुझे तो पति से छुट्टी चाहिए।” दिव्या ने कहा, “अंकल को मना कर दूँगी।” अनुजा ने कहा, “प्रसाद को साथ लाऊँगी, वह देखना पसंद करता है।”
तो तय हुआ — आज रात मेरे फ्लैट पर।
रात ग्यारह बजे, गरबा खत्म होने के बाद, सब मेरे फ्लैट पर जमा हुईं। छह औरतें, एक मैं, और एक प्रसाद — जो सिर्फ़ देखने आया था, पर बाद में वह भी शामिल हो गया।
मेरा बड़ा ड्रॉइंग रूम था, और वहाँ सबको जगह मिल गई। शराब, स्नैक्स, और माहौल।
पहले सब शरमा रही थीं। पर फिर जब रिया ने पहल की और मुझे चूमना शुरू किया, तो बाक़ी सब खुलने लगीं।
फिर तो जैसे कोई ताला खुल गया। सोनल ने मेरा कुर्ता उतारा, जागृति ने मेरी पैंट खोली, और निशी, दिव्या, अनुजा — सबने मिलकर मुझे पूरा नंगा कर दिया। मेरा लंड खड़ा हो गया, और छह जोड़ी आँखें उसे देखने लगीं।
“बाप रे,” दिव्या ने कहा, जो अभी नई थी।
“तू अभी बच्ची है,” जागृति ने हँसते हुए कहा।
और फिर शुरू हुआ। औरतें अपने-अपने कपड़े उतारने लगीं। छह औरतें, छह बदन, छह तरह की सुंदरता। रिया की भरी छाती, सोनल का तराशा बदन, जागृति का पका हुआ हुस्न, निशी की जवानी, दिव्या की कच्ची मासूमियत, और अनुजा की कुशलता।
यह नज़ारा देखकर मुझे लगा कि स्वर्ग भी इसके आगे फीका है।
फिर शुरू हुआ खेल। पहले सब मेरे चारों तरफ़ बैठ गईं। एक मेरा लंड चूसने लगी, एक मेरे अंडे, एक मेरी गर्दन, एक मेरे होंठ, एक मेरी छाती — और एक मेरी जाँघें सहलाने लगी। छह जोड़ी होंठ, एक शरीर पर।
मैं पागल हो गया। दस मिनट में ही मेरा लंड ऐसा खड़ा था जैसे पहली बार हो।
फिर मैंने रिया को उठाया और उसे बिस्तर पर लिटाया। सब देखने लगीं। मैंने रिया की चूत में लंड डाला और चोदने लगा। बाक़ी औरतें पास बैठकर अपनी-अपनी चूत सहलाने लगीं।
जब रिया झड़ी, तो सोनल आई। फिर जागृति, फिर निशी, फिर दिव्या, फिर अनुजा। एक-एक को बारी-बारी से चोदा। हर औरत अलग थी, हर औरत का स्वाद अलग।
फिर मेला शुरू हुआ। औरतें भी एक-दूसरे के साथ खेलने लगीं। रिया और सोनल ने एक-दूसरे को चूमा। जागृति ने निशी की छाती चूसी। दिव्या और अनुजा एक-दूसरे की चूत चाटने लगीं। यह एक ऐसा दृश्य था जो मैंने सिर्फ़ कल्पना में देखा था।
प्रसाद भी अब रह नहीं पाया। उसने अपने कपड़े उतारे और जागृति के पीछे चला गया। अब जागृति एक साथ दो लंड ले रही थी।
धीरे-धीरे पूरा कमरा एक बड़ी चुदाई की अखाड़ा बन गया। कहीं दो जोड़े, कहीं तीन, कहीं अकेले। हर कोई हर किसी के साथ। कोई शर्म, कोई हिचक नहीं।
करीब तीन घंटे चला। औरतें कई बार झड़ीं। प्रसाद दो बार झड़ा। मैं तीन बार झड़ा — एक बार रिया की चूत में, एक बार निशी की गांड पर, और एक बार सबकी छाती पर।
आख़िर में सब थककर बिस्तर पर और फ़र्श पर पसर गईं। नग्न शरीर एक-दूसरे से लिपटे हुए। हँसी, बातें, और पसीने की महक।
“आरव,” रिया ने कहा, “तुमने ये नवरात्रि यादगार बना दी।”
“और तुम सबने,” मैंने कहा।
निशी मेरे एक तरफ़ लेटी थी, दिव्या दूसरी तरफ़। दोनों ने मुझे जकड़ लिया था।
“भैया,” निशी ने फुसफुसाया, “कल से फिर अनजान हो जाएँगे?”
“नहीं,” मैंने कहा, “इस बार नहीं।”
उपसंहार — नवरात्रि के बाद
नवरात्रि खत्म हो गई। सोसाइटी में रोशनी बुझ गई, गरबे की आवाज़ें थम गईं, और ज़िंदगी अपनी पटरी पर लौट आई। पर कुछ चीज़ें बदल गई थीं।
रिया और सोनल के पति लौट आए, पर अब वे हर हफ़्ते मुझसे मिलती रहीं। कभी छत पर, कभी मेरे फ्लैट पर, कभी उनके फ्लैट पर। और अब वे अनजान नहीं थीं।
जागृति अपने घर-परिवार में लौट गई, पर महीने में दो बार मुझसे मिलने आती रही। उसका कहना था कि अब वह घर में भी खुल गई है, और उसका पति भी हैरान है कि उसमें यह आग कहाँ से आई।
निशी मुंबई लौट गई, पर हम हर हफ़्ते बात करते रहे। और जब भी वह अहमदाबाद आती, वह मेरे ही फ्लैट में ठहरती।
दिव्या और महेश अंकल का सिलसिला चलता रहा। दिव्या अब एक पूरी औरत बन चुकी थी, और उसने मुझे बताया कि वह अंकल से हर हफ़्ते मिलती है। और मज़े की बात — वह अब मुझसे भी मिलती रही।
प्रसाद और अनुजा ने अपना चैलेंज खत्म होने के बाद भी यह सिलसिला जारी रखा। अनुजा का कहना था कि वह अब “चुदक्कड़” हो गई है, और उसे नए-नए लंड चाहिए। प्रसाद खुश था, और वह भी अपनी लड़कियाँ ढूँढने लगा।
और मैं? मैं उस नवरात्रि के बाद बदल गया। पहले मैं सिर्फ़ मज़े के लिए चोदता था। अब मुझे समझ आ गया था कि औरत को खुश करना क्या होता है — उसकी प्यास, उसकी खामोशी, उसकी बेपरवाही, और उसके भीतर की आग को समझना।
नवरात्रि के नौ रंग — नारंगी, लाल, नीला, पीला, हरा, ग्रे, बैंगनी, मोरपंखी, सफ़ेद। हर रंग में एक अलग औरत थी। हर रंग में एक अलग रात। और हर रात में एक अलग सबक़।
अब जब भी नवरात्रि आती है, तो मेरे कानों में ढोल की थाप गूँजने लगती है। और मुझे वे नौ रातें याद आती हैं — वे नौ रंग, वे नौ औरतें, और वह नौ दिन जिन्होंने मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
क्योंकि नवरात्रि सिर्फ़ त्योहार नहीं है। नवरात्रि मतलब — नौ रातें, नौ रंग, और बेशुमार वासना।
और मैं अगली नवरात्रि का इंतज़ार कर रहा हूँ।
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