गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी। शाम के छह बज रहे थे। सेक्टर-117 की उस बहुमंजिला सोसायटी का सेंट्रल पार्क आज किसी उत्सव की नगरी में तब्दील हो चुका था। हवा में गेंदे के ताज़े फूलों, अगरबत्ती के धुएँ और बन रहे शुद्ध देसी घी के मोदकों की सोंधी खुशबू घुली हुई थी। लाउडस्पीकर पर धीमी आवाज़ में अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में आरती बज रही थी, और बच्चों का एक झुंड पंडाल के चारों तरफ़ रंग-बिरंगी लाइटों के पीछे भाग रहा था। गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
रिया अपने फ़्लैट के शीशे के सामने खड़ी थी। उसने गहरे पीले (मस्टर्ड) रंग का चंदेरी सिल्क का सूट पहना हुआ था, जिस पर बारीक गोटा-पत्ती का काम था। कानों में झुमके पहनते वक्त उसके हाथ हल्के से काँप रहे थे। यह सिर्फ़ बप्पा के आगमन की शाम नहीं थी, यह उस इंसान से मिलने का बहाना भी थी, जिसने पिछले दो महीनों से उसके दिल के किसी अनछुए कोने में हलचल मचा रखी थी।
कबीर।
कबीर तीन महीने पहले ही इस सोसायटी के बी-ब्लॉक के 402 नंबर फ़्लैट में शिफ़्ट हुआ था। एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर ग्राफ़िक डिज़ाइनर। शांत, थोड़ी उलझी हुई दाढ़ी, चेहरे पर हमेशा एक सहज सी मुस्कान और आँखों में एक अजीब सी गहराई। रिया और कबीर की पहली मुलाक़ात लिफ़्ट के ख़राब होने पर हुई थी, जहाँ दोनों ने पाँच मंज़िल सीढ़ियाँ साथ चढ़ते हुए सिर्फ़ ‘हाय’ और ‘हेलो’ कहा था। लेकिन उसके बाद, शाम को बाल्कनी से एक-दूसरे को देखना, सोसायटी के मदर डेयरी बूथ पर दूध लेते वक्त नज़रें मिलना और फिर एक-दूसरे को देखकर हल्की सी मुस्कान दे देना—यह सिलसिला धीरे-धीरे गहरा होता गया था।
“रिया! बेटा, पूजा की थाली तैयार है, जल्दी नीचे जाओ। आरती का समय हो रहा है,” मम्मी ने किचन से आवाज़ दी।
“हाँ मम्मी, बस आ रही हूँ!” रिया ने अपने बालों की एक लट को कान के पीछे समेटा, हल्का सा इत्र अपनी कलाई और गर्दन पर लगाया, और हाथ में पीतल की सजी हुई थाली थामकर बाहर निकल गई।
सीढ़ियों से उतरते वक्त उसके दिल की धड़कन तेज़ थी। जैसे ही वह पंडाल के मुख्य द्वार पर पहुँची, लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी। ढोल-ताशे वाले अपने वाद्ययंत्रों को कस रहे थे। रिया ने उत्सुकता से चारों तरफ़ अपनी नज़रें दौड़ाईं।
वह वहीं खड़ा था।
नेवी ब्लू रंग के सूती कुर्ते में, जिसकी आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं। वह पंडाल के एक तरफ़ लगे साउंड सिस्टम को ठीक करने में किसी अंकल की मदद कर रहा था। उसके माथे पर पसीने की कुछ बूंदें चमक रही थीं। तभी कबीर ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी नज़रें सीधे रिया पर जाकर टिक गईं।
कुछ सेकंड के लिए दोनों के बीच का सारा शोर, सारे लोग, सब बेमायने हो गए। कबीर के होठों पर एक हल्की, गहरी मुस्कान उभर आई। उसने नज़रों ही नज़रों में रिया के पहनावे की तारीफ़ की, जिससे रिया का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया।
“गणपति बप्पा… मोरया!” पंडित जी ने माइक पर जयकारा लगाया और महाआरती शुरू हो गई।
ढोल की तेज़ धमक, शंख की गूँज और सैकड़ों लोगों की एक साथ गाई जा रही आरती से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठा। रिया पंडाल के दाहिनी ओर खड़ी होकर थाली से आरती उतार रही थी। कबीर भीड़ को थोड़ा चीरता हुआ धीरे-धीरे उसके ठीक पीछे आ खड़ा हुआ।
आरती के दीयों की रोशनी में रिया का चेहरा दमक रहा था। कबीर की साँसें रिया के कंधे के पास महसूस हो रही थीं। भीड़ के हलके से धक्के के कारण कबीर का शरीर रिया से थोड़ा सट गया। रिया ने पीछे मुड़कर देखा, दोनों की आँखें मिलीं। कबीर ने धीरे से उसके हाथ से आरती की थाली का एक किनारा पकड़ लिया। गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
“साथ में करते हैं,” कबीर ने रिया के कान के पास झुककर बहुत धीमी आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ की गर्माहट रिया की रीढ़ की हड्डी में एक मीठी सिहरन पैदा कर गई।
लगभग पंद्रह मिनट तक चली आरती के दौरान दोनों की उंगलियाँ उस पीतल की थाली पर एक-दूसरे को छूती रहीं। वह कोई वासना से भरा स्पर्श नहीं था, बल्कि एक-दूसरे की मौजूदगी को पूरी तरह स्वीकार करने का एक शांत, खूबसूरत अहसास था।
आरती समाप्त हुई। पंडित जी ने सबको चरणामृत और मोदक का प्रसाद देना शुरू किया। लोग धीरे-धीरे पंडाल के बीच से हटकर आपस में बातचीत करने लगे।
“प्रसाद लोगी?” कबीर ने दो दोने हाथ में लिए रिया की तरफ़ बढ़ाया।
“शुक्रिया,” रिया ने मोदक का एक छोटा सा टुकड़ा उठाया। “वैसे, तुमने कुर्ता अच्छा पहना है। तुम पर नेवी ब्लू रंग जंचता है।”
कबीर ने मुस्कुराते हुए अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, “और तुम… तुम आज इस पीले सूट में किसी पूजा की मूरत जैसी लग रही हो। सच में।”
रिया ने अपनी आँखें झुका लीं। उसके गालों की लाली छिप नहीं पा रही थी।
“यहाँ बहुत शोर है,” कबीर ने चारों तरफ़ देखते हुए कहा। सोसायटी के लोग आपस में गुफ्तगू कर रहे थे और बच्चे पटाखों के लिए ज़िद कर रहे थे। “क्लब हाउस के पीछे वाले गज़ेबो (Gazebo) की तरफ़ चलोगी? वहाँ थोड़ा सुकून है।” गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
रिया ने एक पल के लिए सोचा। सोसायटी में रात के आठ बजे किसी के साथ पीछे जाना थोड़ा जोखिम भरा हो सकता था, लेकिन कबीर की आँखों में जो मासूमियत और सच्चाई थी, उस पर वह इनकार नहीं कर सकी। उसने धीरे से सिर हिला दिया।
दोनों भीड़ से बचते हुए क्लब हाउस के पीछे बने छोटे से पार्क की तरफ़ बढ़ गए। यहाँ महोगनी और नीम के बड़े-बड़े पेड़ थे। पंडाल की रोशनी यहाँ पेड़ों के पत्तों से छनकर आ रही थी, जिससे ज़मीन पर रोशनी और साए का एक खूबसूरत ताना-बाना बुन गया था। यहाँ सिर्फ़ हवा की सरसराहट और दूर से आती ढोल की हल्की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
गज़ेबो के लकड़ी के बेंच पर दोनों जाकर बैठ गए। बीच में कुछ इंच का फ़ासला था, लेकिन हवा में दोनों के दिलों की तेज़ धड़कनें साफ़ महसूस की जा सकती थीं।
“तुम हमेशा इतनी शांत रहती हो?” कबीर ने बात की शुरुआत की।
“नहीं, सिर्फ़ उन लोगों के सामने जिन्हें मैं पूरी तरह नहीं जानती,” रिया ने हंसते हुए कहा। “और तुम? तुम हमेशा इतने बेफ़िक्र रहते हो?”
“बेफ़िक्र?” कबीर थोड़ा सा मुस्कुराया और रिया की तरफ़ घूम गया। “आज शाम से पहले तक था। लेकिन जब से तुम्हें उस पीली पोशाक में देखा है, मेरा ध्यान कहीं टिक ही नहीं रहा।”
रिया का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। “कबीर…”
“रिया, मैं कोई शेक्सपियर नहीं हूँ जो बड़ी-बड़ी बातें करूँ,” कबीर ने अपनी आवाज़ को और धीमा कर लिया। वह बेंच पर थोड़ा और करीब खिसक आया। “लेकिन पिछले तीन महीनों में, हर सुबह लिफ़्ट के पास तुम्हारा इंतज़ार करना, तुम्हारे मुस्कुराने पर पूरे दिन का अच्छा जाना… यह सब मेरे लिए बहुत खास हो गया है।”
कबीर ने अपना हाथ धीरे से आगे बढ़ाया और रिया की ठंडी पड़ती उंगलियों को अपनी गर्म हथेली में थाम लिया। रिया ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। उसने अपनी उंगलियों को कबीर की उंगलियों में पिरो दिया।
“मुझे भी… तुम्हारा इंतज़ार रहता था,” रिया ने स्वीकार किया। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
कबीर ने रिया की आँखों में देखा। उन आँखों में सिर्फ़ भरोसा था। कबीर का दूसरा हाथ धीरे से रिया के गाल पर गया। उसकी उंगलियों का स्पर्श इतना कोमल था जैसे वो रेशम को छू रहा हो। रिया ने अनजाने में ही अपनी आँखें मूँद लीं।
कबीर थोड़ा आगे झुका। उसके होठों ने रिया के दाएँ गाल को बहुत आहिस्ता से छुआ। एक बहुत ही नर्म, ठहरा हुआ ‘किस’। रिया के साँसों की गति तेज़ हो गई। उसके हाथ कबीर के नेवी ब्लू कुर्ते के कपड़े को कसकर पकड़ चुके थे। गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
कबीर रुका नहीं। वह थोड़ा सा नीचे की ओर खिसका। उसकी साँसों की गर्म हवा रिया की गर्दन की त्वचा पर पड़ रही थी। रिया का सिर थोड़ा सा पीछे की तरफ़ झुक गया, जिससे उसकी सुराहीदार गर्दन पूरी तरह उजागर हो गई। कबीर ने अपने होठों को रिया की गर्दन के मुलायम हिस्से पर रख दिया।
यह कोई जल्दबाज़ी में किया गया काम नहीं था। कबीर ने बहुत ही नफ़ासत और चाहत से उसकी गर्दन पर एक लंबा, गहरा किस अंकित किया। रिया के मुँह से एक हल्की सी, अधूरी सीसकी निकली—”कबीर…”—जो हवा के साथ विलीन हो गई। उसके शरीर में एक मीठी लहर दौड़ गई।
कबीर ने अपना दायाँ हाथ रिया की पतली कमर पर रखा। चंदेरी सिल्क के पारदर्शी कपड़े के ऊपर से कबीर की हथेली की तपन सीधे रिया की त्वचा तक पहुँच रही थी। कबीर ने अपनी पकड़ को कमर पर थोड़ा सा कसा, जिससे रिया पूरी तरह उसके करीब आ गई। दोनों के सीने एक-दूसरे से सटे हुए थे।
“रिया, आँखें खोलो,” कबीर ने बहुत प्यार से फुसफुसाया।
रिया ने भारी होती पलकों को उठाया। कबीर का चेहरा उसके इतने करीब था कि वह उसकी आँखों में अपनी ही परछाईं देख सकती थी। दोनों के बीच की दूरी अब ख़त्म हो चुकी थी।
कबीर ने रिया की ठोड़ी को अपनी उंगलियों से थोड़ा सा ऊपर उठाया। दोनों की साँसें एक-दूसरे में उलझ रही थीं। फिर, बहुत ही सहजता और असीम प्रेम के साथ, कबीर के होठ रिया के पंखुड़ी जैसे होठों से मिल गए।
वह किस बहुत ही वास्तविक, धीमी और जज़्बातों से भरी थी। इसमें किसी तरह की हड़बड़ी नहीं थी, बल्कि दो तरसते हुए दिलों का इक़रार था। रिया ने कबीर के गले में अपनी बांहें डाल दीं, और कबीर ने उसकी कमर पर अपनी पकड़ को और गहरा कर लिया। उस एक पल में, वक्त जैसे ठहर सा गया। पंडाल का शोर, दुनिया की फ़िक्र, सब कुछ गायब हो गया। सिर्फ़ वे दोनों थे, और रात की वो ख़ामोशी।
जब दोनों के होंठ अलग हुए, तो दोनों की साँसें फूली हुई थीं। रिया का चेहरा पूरी तरह से लाल हो चुका था और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। कबीर ने मुस्कुराते हुए रिया के माथे पर अपने होंठ टिका दिए और उसे अपने सीने से लगा लिया। गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
रिया ने कबीर के सीने पर अपना सिर रख दिया। कबीर के दिल की तेज़ धड़कन उसके कान में साफ़ सुनाई दे रही थी।
“बप्पा ने आज हमारी सुन ली,” कबीर ने रिया के बालों को सहलाते हुए कहा।
“तुम्हें क्या लगा था, वो सिर्फ़ मोदक से खुश होते हैं?” रिया ने कबीर के सीने में मुँह छिपाकर शरमाते हुए कहा।
कुछ देर दोनों ऐसे ही एक-दूसरे की बाहों में चुपचाप बैठे रहे। गज़ेबो के आसपास रात की रानी के फूलों की महक फैलने लगी थी।
तभी दूर से रिया की मम्मी की आवाज़ सुनाई दी, जो किसी से पूछ रही थीं कि रिया कहाँ गई।
रिया चौंककर कबीर की बाहों से अलग हुई। उसने जल्दी से अपना सूट ठीक किया, बालों को सँभाला और अपने गालों को हाथों से छुआ जो अभी भी गर्म थे।
“मुझे जाना होगा,” रिया ने मुस्कुराते हुए कहा।
“कल सुबह की आरती?” कबीर ने उसका हाथ पकड़कर पूछा।
“कल सुबह आठ बजे… और हाँ, इस बार लेट मत होना,” रिया ने कबीर के गाल पर एक छोटा सा किस किया और तेज़ी से मुड़कर पंडाल की तरफ़ भाग गई।
कबीर वहीं खड़ा रहा, अपने गाल को छूते हुए और उस लड़की को दूर जाते हुए देखता रहा जिसने गणेश चतुर्थी की इस पावन रात को उसकी ज़िंदगी की सबसे हसीन रात बना दिया था।
गणपति बप्पा की मूरत पर जलती हुई आरती की लौ दूर से चमक रही थी, मानो वे भी इस नए-नए पनपे सच्चे प्यार को अपना मौन आशीर्वाद दे रहे हों।
रिया जब अपनी माँ की आवाज़ सुनकर कबीर की बाहों से अलग हुई, तो कबीर ने उसका हाथ पकड़कर धीरे से कहा, “मत जाओ… अभी नहीं। रात को… जब सब सो जाएँ, तो मेरे फ्लैट आ जाना। बी-402। मैं अकेला रहता हूँ, कोई नहीं होगा।”
रिया ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ सिर्फ़ वासना नहीं, बल्कि सच्चा प्यार भी था। उसने धीरे से सिर हिला दिया, “ग्यारह बजे… जब मम्मी-पापा सो जाएँगे।”
रात के ग्यारह बज चुके थे। सोसायटी में शांति छा गई थी। पंडाल की लाइटें भी बुझ चुकी थीं, सिर्फ़ सुरक्षा की एक टॉर्च रोशनी हर कुछ देर में घूम रही थी। रिया ने एक हल्की सी नाइटी पहनी जो उसके घुटनों के ऊपर तक आती थी, और चुपचाप से अपने फ्लैट से बाहर निकली।
लिफ़्ट आई। रिया ने बी-ब्लॉक के लिए बटन दबाया। उसका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि वह खुद उसकी आवाज़ सुन सकती थी। लिफ़्ट का दरवाज़ा खुला और वह चौथी मंज़िल पर पहुँची। 402 नंबर का फ्लैट। उसने धीरे से दरवाज़े पर हाथ रखा और बिना दस्तक दिए ही कुंडी दबाई। दरवाज़ा खुला था।
अंदर अँधेरा था, लेकिन बालकनी से आती चाँद की रोशनी में कबीर सोफ़े पर बैठा दिखा। उसने नेवी ब्लू कुर्ता उतार दिया था और सिर्फ़ एक लूज़ पैंट पहनी हुई थी। उसका बदन चाँद की रोशनी में कांपता हुआ सा लग रहा था, शायद वह भी घबरा रहा था। गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
“तुम आ गईं,” कबीर ने उठकर कहा और दरवाज़ा बंद करके चेन लगा दी।
रिया अपनी जगह पर खड़ी थी। उसके हाथ पसीने से तर थे। कबीर उसके पास आया और उसके हाथ पकड़े, “डर रही हो?”
“थोड़ा,” रिया ने कहा, “पहली बार… किसी के साथ… और यहाँ…”
“मैं हूँ ना,” कबीर ने कहा और उसे अपनी बाहों में भर लिया।
उसने धीरे से रिया का चेहरा ऊपर उठाया और उसके होठों पर एक लंबा, गहरा किस किया। यह किस उनके गज़ेबो वाले किस से बिल्कुल अलग था। इसमें अब कोई जल्दी नहीं थी, कोई डर नहीं था कि कोई आ जाएगा। यह सिर्फ़ वे दोनों थे, और यह रात।
कबीर ने किस करते-करते रिया को सोफ़े की ओर ले जाना शुरू किया। रिया पीछे-पीछे चलती रही, उसकी पीठ सोफ़े से टकरा गई। कबीर ने उसे वहीं खड़ा किया और धीरे से अपने हाथ उसकी नाइटी के नीचे डाले। उसने रिया की जाँघों को छुआ, फिर ऊपर की ओर बढ़ता हुआ उसकी पैंटी के ऊपर आया।
“उम्म्म…” रिया ने मुँह बंद करके एक हल्की सी आवाज़ निकाली।
“क्या हुआ?” कबीर ने कान में पूछा।
“कुछ नहीं… बस… बस ठीक है,” रिया ने कहा।
कबीर ने उसकी नाइटी को धीरे से ऊपर उठाना शुरू किया। रिया ने अपने हाथ ऊपर उठाए और कबीर ने वह नाइटी उसके सिर के ऊपर से निकालकर फेंक दी। अब रिया सिर्फ़ अपने ब्रा और पैंटी में खड़ी थी। कबीर ने पीछे हटकर उसे देखा। चाँद की रोशनी बालकनी से आकर रिया के गोरे बदन पर पड़ रही थी। उसकी चिकनी त्वचा, उभरे हुए स्तन, और वो कमर… कबीर का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
“तुम… तुम बहुत खूबसूरत हो,” कबीर ने कहा और अपने हाथ उसके कंधों पर रखे।
उसने धीरे से रिया को घुमाया ताकि वह पीछे की ओर झुक सके। फिर उसने उसकी ब्रा की हुक खोलनी शुरू की। रिया ने अपने हाथ आगे की ओर सोफ़े पर टिका दिए, उसकी पीठ कबीर की ओर थी। कबीर ने ब्रा की हुक खोल दी और धीरे से उसे उतार दिया। रिया के स्तन आज़ाद हो गए, लटकते हुए, गोल, पूर्ण।
कबीर ने पीछे से आकर उसके स्तनों को अपने हाथों में भर लिया। रिया ने अपना सिर पीछे की ओर झुकाया और कबीर के कंधे पर रख दिया। कबीर ने उसके स्तनों को दबाना, मसलना, सहलाना शुरू किया। उसके अंगूठे उसके निप्पलों को कुरेद रहे थे।
“आह्ह्ह… कबीर… धीरे…” रिया ने सिसकते हुए कहा।
कबीर ने उसे घुमाया और अब सामने से उसके स्तनों को देखने लगा। वह झुका और एक स्तन को अपने मुँह में ले लिया। उसने निप्पल को चूसना, काटना, चाटना शुरू किया। रिया ने उसके सिर को अपने स्तन पर दबा दिया, “और ज़ोर से… चूसो…”
कबीर ने दूसरे स्तन पर भी वही किया, दोनों को बारी-बारी से चूसा, काटा। रिया की साँसें तेज़ हो गईं थीं। उसकी चूत में एक अजीब सी खुजली हो रही थी, वह अपने पैरों को बार-बार सटा रही थी।
कबीर ने नीचे घुटनों के बल बैठकर रिया की पैंटी को पकड़ा। उसने धीरे से उसे नीचे खींचा। रिया ने एक पैर उठाया, फिर दूसरा, और कबीर ने वह पैंटी उतार दी। अब रिया पूरी तरह से नंगी थी, और कबीर अभी भी पैंट पहने हुए था।
कबीर ने रिया के पैरों के बीच में आकर उसकी चूत को देखा। वह बिल्कुल गीली थी, गुलाबी होठ चमक रहे थे। कबीर ने अपनी जीभ निकाली और धीरे से उसकी चूत के ऊपर चाटा।
“ओह्ह्ह माय गॉड… कबीर… यह… यह…” रिया चौंक गई।
कबीर ने उसकी जाँघों को फैलाया और उसकी चूत को चाटना शुरू कर दिया। उसने जीभ को अंदर डाला, फिर ऊपर की ओर क्लिटोरिस पर घुमाया। रिया पागल हो रही थी। उसने सोफ़े के पिछले हिस्से को कसकर पकड़ लिया और अपने कूल्हों को कबीर के मुँह की ओर धकेलना शुरू कर दिया।
“आह्ह्ह… उह्ह्ह… हाय्य्य… बहुत मज़ा आ रहा है… और करो… जीभ अंदर डालो…” रिया चिल्ला रही थी।
कबीर ने उसकी चूत में अपनी जीभ को पूरी तरह से डाल दिया और अंदर-बाहर करने लगा। रिया की चूत से पानी निकल रहा था जो कबीर के चेहरे पर लग रहा था। कबीर ने अपनी नाक को उसके क्लिटोरिस पर रगड़ना शुरू कर दिया, और दो उंगलियों से उसकी चूत को चोदने लगा। गणेश चतुर्थी की रात को रिया की पहली चुदाई
“उफ्फ्फ्फ… मैं… मैं झड़ने वाली हूँ… कबीर… प्लीज़… रुको… नहीं… अब मत रुको…” रिया बड़बड़ा रही थी।
कबीर ने रुकना नहीं चाहा। उसने और तेज़ी से उसकी चूत चाटी, और तभी रिया झड़ गई। उसकी पूरी बदन कांप उठी, उसकी चूत ने कसकर कबीर की जीभ और उंगलियों को पकड़ लिया, और एक गर्म तरल पानी निकलकर कबीर के मुँह में भर गया। कबीर ने उसे चूसकर पी लिया।
रिया थककर सोफ़े पर गिर गई। कबीर ने उठकर अपनी पैंट उतारी। उसका लिंड पूरी तरह से खड़ा था, लाल, मोटा, और कड़ा। रिया ने उसे देखा और थोड़ा डर गई, “कबीर… यह… यह मुझमें समाएगा?”
“समाएगा… धीरे-धीरे,” कबीर ने कहा और उसके पास आकर बैठा।
उसने रिया को सोफ़े पर लिटा दिया और उसके पैरों को फैलाया। रिया लेट गई, उसके स्तन एक तरफ़ को गिरे हुए थे, और उसकी चूत अभी भी गीली थी। कबीर ने अपने लिंड को पकड़ा और उसकी चूत के मुँह पर रगड़ना शुरू किया।
“तैयार हो?” कबीर ने पूछा।
“हाँ… लेकिन धीरे से… पहली बार है मेरा,” रिया ने कहा।
कबीर ने धीरे से आगे बढ़ाया। उसके लिंड का सुपारा अंदर घुस गया। रिया ने दर्द से अपनी आँखें बंद कर लीं, “आह्ह्ह… धीरे…”
कबीर ने रुककर उसके स्तनों को सहलाया, “रिलैक्स करो… अपने आप को ढीला छोड़ो।”
थोड़ी देर बाद जब रिया शांत हुई, कबीर ने एक और धक्का लगाया। आधा लिंड अंदर घुस गया। रिया की चीख निकली, “उह्ह्ह… बहुत बड़ा है… दर्द हो रहा है…”
“बस थोड़ी देर और,” कबीर ने कहा और झुककर उसके होठों पर किस किया।
एक और ज़ोरदार धक्के के साथ कबीर का पूरा लिंड अंदर समा गया। रिया की आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन साथ ही उसे एक अजीब सा आनंद भी महसूस हो रहा था। कबीर ने कुछ देर रुककर उसे किस किया, फिर धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया।
“अब कैसा लग रहा है?” कबीर ने पूछा।
“अच्छा… अब अच्छा लग रहा है… तुम चोदो मुझे… चोदो…” रिया ने कहा।
कबीर ने अपनी गति बढ़ा दी। वह अब तेज़ी से रिया की चूत में अपना लिंड पेल रहा था। धप्प… धप्प… धप्प… की आवाज़ें कमरे में गूँज रही थीं। रिया के स्तन कबीर के हर धक्के के साथ उपर-नीचे हो रहे थे।
“आह्ह्ह… उह्ह्ह… हाय्य्य… ओह्ह्ह… कबीर… और तेज़… मुझे पूरी तरह से चोदो… मैं तुम्हारी हूँ… आह्ह्ह…” रिया चिल्ला रही थी।
कबीर ने उसके पैरों को अपने कंधों पर रख दिया और और गहरे धक्के लगाने शुरू कर दिए। उसका लिंड रिया की चूत के सबसे गहरे हिस्से तक जा रहा था, उसके गर्भाशय को छू रहा था।
“कबीर… मैं फिर से झड़ने वाली हूँ… इस बार तुम भी मेरे साथ आ जाना… प्लीज़… अंदर ही निकाल देना…” रिया ने कहा।
“हाँ… मैं भी आ रहा हूँ…” कबीर ने कहा।
कबीर ने कुछ और ज़ोरदार धक्के लगाए और फिर अपना लिंड रिया की चूत के अंदर ही छोड़ दिया। गर्म वीर्य की धार रिया की चूत में भर गई। इसी के साथ रिया भी झड़ गई, उसकी चूत ने कबीर के लिंड को कसकर पकड़ लिया और उसकी उंगलियों ने कबीर की पीठ पर नाखून गाड़ दिए।
दोनों थककर एक-दूसरे में पड़े रहे। कबीर ने अपना लिंड बाहर निकाला और रिया के बगल में लेट गया। रिया उसकी बाहों में थी, दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं।
कुछ देर बाद रिया ने पूछा, “कैसा लगा मुझे चोदकर?”
कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा, “जन्नत जैसा… लेकिन अभी तो रात बाकी है। अब तुम्हारी गांड मारनी है।”
रिया ने शरमाते हुए कहा, “गांड? वहाँ… वहाँ तो बहुत दर्द होगा।”
“पहले थोड़ा दर्द होगा, फिर बहुत मज़ा आएगा,” कबीर ने कहा और उसे फिर से किस करने लगा।
इस तरह वह रात भर एक-दूसरे के शरीरों का आनंद लेते रहे, और गणेश चतुर्थी की वह रात उनके लिए यादगार बन गई।
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