मेट्रो में मिली लड़की की चूत
भाग 1: वो शर्मिंदा करने वाला दिन
मैं हर दिन मेट्रो से नोएडा से द्वारका जाता था। सुबह 8:30 बजे की भीड़, लोगों की धक्का-मुक्की, और वही रूटीन। लेकिन एक दिन कुछ अलग हुआ। मेट्रो में मिली लड़की की चूत
राजीव चौक स्टेशन पर मैंने उन्हें पहली बार देखा। चार लड़कियाँ मेट्रो की सीट पर बैठी थीं। एक लड़का खड़ा था, जो किसी लड़की से बात कर रहा था।
वो लड़की सिया थी। नीली कुर्ती में, बाल खुले, चेहरे पर हल्का मेकअप। उसका फिगर औसत था, लेकिन चेहरे का कट बहुत खूबसूरत था – गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें, होंठ जो हमेशा मुस्कुराते हुए लगते थे।
लेकिन उस दिन वो मुस्कुरा नहीं रही थी।
उसका बॉयफ्रेंड, एक लंबा लड़का जिसने काली शर्ट पहनी थी, उसके सामने खड़ा था। और वो उसे कुछ कह रहा था जिससे वो शर्मिंदा हो रही थी।
“देखो इसे,” बॉयफ्रेंड ने ज़ोर से कहा, अपने दोस्तों की तरफ इशारा करते हुए, “कितनी सादी लगती है ना? मैंने कहा था ना कुछ अच्छा पहनो, लेकिन यह तो बिल्कुल गाँव की लग रही है।”
उसके दोस्त हंसने लगे। सिया का चेहरा लाल हो गया, आँखें नीचे कर लीं। वो सीट पर बैठी थी, और उसके बगल में तीन और लड़कियाँ थीं।
एक लड़की, जिसने गुलाबी टॉप पहना था, बोली, “अरे छोड़ ना, क्यों परेशान कर रहा है उसे?”
“तू मत बोल,” बॉयफ्रेंड ने कहा, “तुम लोगों ने ही इसे बिगाड़ा है। देखो, कितनी बोरिंग लग रही है।”
मुझे बहुत बुरा लगा। मैं पास में ही खड़ा था, पोल पकड़े हुए। मन किया कुछ कहूँ, लेकिन मैं अजनबी था। मैंने बस सिया की तरफ देखा और एक हल्की सी मुस्कान दी – जैसे कह रहा हूँ, “कोई बात नहीं, तुम ठीक हो।”
तभी मैंने देखा कि एक लड़की मुझे घूर रही थी। वो मिश्ती थी – गुलाबी टॉप वाली, जो सिया के बगल में बैठी थी। उसके बाल कंधे तक थे, आँखें बड़ी-बड़ी, और एक अजीब सी चमक थी उनमें।
मैंने नज़रें हटा लीं।
मुझे नोएडा से द्वारका जाना था, लेकिन उनको पहले उतरना था। जब वो उतरी, मैंने देखा मिश्ती मुझे फिर से देख रही थी। और इस बार उसने मुस्कुराया भी।
भाग 2: अक्सर मुलाकातें
अगले कुछ हफ्तों में मैं उन्हें अक्सर देखने लगा। कभी-कभी सिया अकेली होती, कभी मिश्ती के साथ, कभी और दोस्तों के साथ। वो बॉयफ्रेंड अब नहीं दिखता था।
मैं मिश्ती को देखता, वो भी मुझे देखती। लेकिन बात नहीं हो पाती थी। मैं सोचता, “कैसे शुरू करूँ? क्या कहूँ?”
मिश्ती अक्सर मुस्कुराती। शायद उसे पता था कि मैं उसे पसंद करता हूँ।
मैंने पता लगाया – जिस लड़की का बॉयफ्रेंड था उसका नाम सिया था। और जो मुझे घूरती थी, उसका नाम मिश्ती था। और जो दो और लड़कियाँ थीं, उनके नाम प्रीति और नेहा थे।
भाग 3: पैर पर पैर – शुरुआत
फिर वो दिन आया। मेट्रो में भीड़ थी, जैसे हमेशा होती है। मैं खड़ा था, और मिश्ती मेरे पास ही थी, पोल पकड़े हुए।
अचानक मेट्रो वालों ने बहुत तेज़ ब्रेक मारी। मैं आगे की तरफ गिरा, और मेरा पैर सीधा मिश्ती के पैर पर पड़ा।
“ओह! सॉरी, सॉरी!” मैंने तुरंत कहा, पैर हटाते हुए।
मिश्ती ने दर्द से अपना पैर उठाया, लेकिन फिर मुस्कुराई, “कोई बात नहीं, गलती से हो गया।”
“नहीं, माफ़ कीजिए, बहुत ज़ोर से लगा,” मैंने कहा।
“सच में कोई बात नहीं,” उसने कहा, और फिर शरमाते हुए, “आप… आप मुझे देखते हैं ना रोज़?”
मैं चौंक गया। “मैं… मतलब…”
“मैंने नोटिस किया है,” उसने कहा, “आप मुझे देखते हैं। और मैं भी…”
मेरी धड़कन तेज़ हो गई। “मैं… मैं अर्जुन हूँ,” मैंने अपना नाम बताया।
“मिश्ती,” उसने कहा।
“मुझे पता है,” मैंने कहा, फिर रुक गया। “मतलब… मैंने सुना था किसी को आपका नाम लेते हुए।”
“और मुझे पता है आपका नाम,” मिश्ती ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने आपको कई बार देखा है। और वो दिन… जब आपने सिया को मुस्कुराया थी…”
मैंने उसे देखा। “आपने नोटिस किया था?”
“हाँ,” मिश्ती ने कहा, “मुझे लगा था कि आप कुछ कहेंगे। लेकिन आपने सिर्फ मुस्कुराया। और मुझे वो पसंद आया।”
मेट्रो रुकी। मिश्ती को जाना था। “मैं उतर रही हूँ,” उसने कहा।
“क्या… क्या हम फिर मिल सकते हैं?” मैंने पूछा।
“रोज़ ही तो मिलते हैं,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, और उतर गई।
भाग 4: राजीव चौक पर कॉफी
अगले दिन। राजीव चौक स्टेशन पर मैंने हिम्मत की।
मिश्ती अकेली थी। सिया और दोस्तें नहीं थीं।
“मिश्ती,” मैंने कहा, “क्या… क्या आप कॉफी पीना चाहेंगी? यहीं पास में एक अच्छा कैफे है।”
उसने मेरी तरफ देखा। फिर मुस्कुराई। “ठीक है।”
हम कैफे में बैठे। पहली बातचीत। अजीब सी, हिचकिचाहट भरी।
“वो दिन…” मैंने शुरू किया।
“कौन सा दिन?” मिश्ती ने पूछा।
“जब सिया का… जब वो उसे…”
“अच्छा, वो,” मिश्ती का चेहरा उतर गया, “सिया का बॉयफ्रेंड बहुत बुरा है। उसे हमेशा शर्मिंदा करता है।”
“मुझे बुरा लगा था,” मैंने कहा, “जब वो उसे…”
“आपने मुस्कुराई थी,” मिश्ती ने कहा, “मुझे याद है। उसी दिन मुझे लगा कि कोई तो है जो…”
हम दोनों चुप हो गए।
“क्या आप सिंगल हैं?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने कहा, “आप?”
“मैं भी।”
कॉफी आई। हम बातें करते रहे। दो घंटे। फिर उसे जाना था।
“कल फिर मिलें?” मैंने पूछा।
“मेट्रो में?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।
“नहीं, यहीं। जानबूझकर।”
“ठीक है,” उसने कहा।
भाग 5: धीरे-धीरे करीब
अगले महीने। हम अक्सर मिलने लगे थे। राजीव चौक, कनॉट प्लेस, हौज़ खास। घूमना, बातें करना, एक-दूसरे को जानना।
एक दिन शाम को। हम हौज़ खास गए थे। झील के पास बैठे थे।
“अर्जुन,” मिश्ती ने कहा, “मैं… मैं कुछ कहना चाहती हूँ।”
“क्या?”
“मुझे लगता है… मुझे आप से…”
मैंने इंतज़ार नहीं किया। मैंने आगे बढ़कर उसके होंठों पर चुंबन कर दिया।
हल्का, पहला, शर्मीला। फिर वो भी जवाब देने लगी।
“उम्म्ह…” उसने हल्की सी आवाज़ निकाली।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “बस… बहुत अच्छा लग रहा है।”
भाग 6: पहली बार – मेरे अपार्टमेंट में
दो हफ्ते बाद। मिश्ती मेरे अपार्टमेंट में आई थी। मैं अकेला रहता था, नोएडा सेक्टर 62 में।
वो पीली ड्रेस में थी। मैंने उसके लिए खाना बनाया था।
खाने के बाद, सोफे पर बैठे। फिल्म चल रही थी, लेकिन हम एक-दूसरे को देख रहे थे।
“मिश्ती,” मैंने कहा।
“हाँ?”
“मैं… मैं आपको छू सकता हूँ?”
उसने जवाब नहीं दिया। बस अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया।
मैंने उसे अपनी ओर खींचा। वो मेरी गोद में आ गई। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और चुंबन किया। इस बार गहरा, लंबा।
“आह…” उसने सांस छोड़ी।
मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर फेरे। पीली ड्रेस के ऊपर से। फिर नीचे सरके।
“मैं… मैं इसे उतारू?” मैंने पूछा।
“हाँ,” उसने शरमाते हुए कहा।
मैंने उसकी ड्रेस के कंधे से पट्टी नीचे की। एक, फिर दूसरा। ड्रेस नीचे सरकी। वो अपने हाथ ऊपर उठाई। ड्रेस उतर गई।
अब वो सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी। सफेद रंग की।
“आप… आप बहुत सुंदर हैं,” मैंने कहा।
“आप भी…” उसने कहा।
मैंने उसे उठाया और बेडरूम में ले गया।
भाग 7: कपड़े उतरते हैं
बेडरूम में। मैंने लाइट डिम की। पीली रोशनी भर गई कमरे में।
मिश्ती खड़ी थी। मैं उसके पीछे गया। उसकी ब्रा के पीछे हाथ ले गया। हुक खोला। एक, दो, तीन हुक। ब्रा खुली।
मिश्ती ने आगे झुककर ब्रा निकाली। उसके स्तन बाहर आए – गोल, भरे हुए, निप्पल गुलाबी और कड़े हो चुके थे।
“ओह माय गॉड…” मैंने कहा, “कितने सुंदर हैं…”
मैंने अपने हाथ आगे बढ़ाए। एक स्तन को छुआ। नरम, गोल, भारी।
“आह…” मिश्ती ने हल्की सी आवाज़ निकाली।
“क्या दर्द हुआ?”
“नहीं… बस… ऐसे ही…”
मैंने दोनों हाथों से उसके स्तनों को पकड़ा। धीरे-धीरे मसला। वो सिर पीछे किया, आँखें बंद कर लीं।
“उम्म्ह… हाँ… ऐसे ही…” उसने कहा।
मैंने झुककर एक निप्पल को मुंह में लिया। चूसा, जीभ से चाटा।
“ओह्ह… आह…” मिश्ती ने कहा, “और… और तेज़…”
मैंने दूसरे स्तन को भी मुंह में लिया। बारी-बारी से चूसता रहा। मिश्ती की सांसें तेज़ हो गईं।
“अब… अब मेरी पैंटी…” मिश्ती ने कहा।
मैंने नीचे हाथ बढ़ाया। उसकी सफेद पैंटी के ऊपर से उसकी योनी को छुआ। गीली थी, बहुत गीली।
“आप… आप पहले से ही…” मैंने कहा।
“हाँ,” मिश्ती ने शरमाते हुए कहा, “मैं बहुत उत्तेजित हूँ…”
मैंने उसकी पैंटी नीचे की। धीरे-धीरे, उसकी जांघों से नीचे सरकाई। मिश्ती ने एक पैर उठाया, फिर दूसरा। पैंटी उतर गई।
उसकी योनी सामने आई – थोड़ी घनी झांटें ऊपर, गुलाबी, गीली, चमक रही थी।
“खूबसूरत…” मैंने कहा।
अब मैंने अपनी शर्ट उतारी। एक-एक बटन खोला। फिर जींस। अब मैं भी सिर्फ अंडरवियर में था। मेरा लिंड पहले से ही कठोर हो चुका था, अंडरवियर में एक बड़ा सा उभार।
“वाह…” मिश्ती ने नीचे देखा, “कितना… कितना बड़ा है…”
मैंने अपना अंडरवियर नीचे किया। मेरा लिंड बाहर आया – लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ, टॉप से पहले से ही तरल बूंद निकल रही थी।
“ओह माय गॉड…” मिश्ती ने कहा, “इतना बड़ा…”
भाग 8: पहली चुदाई
मैंने मिश्ती को बिस्तर पर लिटाया। वो पैर फैलाकर लेट गई, एक तकिया अपने सिर के नीचे रखा।
मैं उसके बीच में आया। उसके पैरों के बीच बैठा। अपने लिंड को हाथ में लिया और उसकी योनी पर रखा। गीला, गर्म।
“धीरे से…” मिश्ती ने कहा, सांसें फूलते हुए।
मैंने धीरे से दबाया। लिंड का टॉप अंदर गया।
“उह्ह…” हम दोनों ने एक साथ आवाज़ निकाली।
थोड़ा और… और अंदर… मिश्ती की योनी बहुत तंग थी, गर्म थी, चिपचिपी थी।
“आह… बड़ा है…” मिश्ती ने कहा, “रुकिए… थोड़ा…”
मैं रुका। उसने सांस ली, अपने हाथ बिस्तर की चादर पर पकड़े। फिर धीरे से कहा, “अब… और अंदर… धीरे-धीरे…”
मैंने थोड़ा और दबाया। आधा अंदर था। मिश्ती की सांसें तेज़ हो रही थीं। मेट्रो में मिली लड़की की चूत
“और… और…” उसने कहा।
मैंने एक ज़ोरदार लेकिन धीरे झटके में पूरा लिंड अंदर डाल दिया।
“आह्ह्ह…” मिश्ती ने चीखते हुए कहा, “भर गई… पूरी… आपका… पूरा अंदर…”
“क्या… क्या दर्द हो रहा है?” मैंने पूछा।
“थोड़ा…” मिश्ती ने कहा, “लेकिन अच्छा… बहुत अच्छा… रुकिए… थोड़ा ऐसे ही…”
मैं रुका, पूरा अंदर, उसकी योनी ने मेरे लिंड को कसकर पकड़ा हुआ था।
कुछ सेकंड बाद मिश्ती ने कहा, “अब… अब धीरे-धीरे हिलिए…”
मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। पहले बहुत धीरे, फिर थोड़ा तेज़।
“आह… हाँ… ऐसे ही…” मिश्ती ने कहा, अपनी कमर हिलाते हुए, “और… और तेज़…”
“आप… आप इतनी तंग हैं…” मैंने कहा, “इतनी गर्म…”
“आपका… आपका लिंड… बहुत अच्छा है…” मिश्ती ने कहा, “बहुत मोटा… बहुत लंबा…”
मेरी गति बढ़ गई। मैं अब तेज़ी से धक्के लगा रहा था। बिस्तर की चरपराहट, हमारी सांसें, और मिश्ती की आवाज़ें कमरे में गूंज रही थीं।
“उई… आह… ओह माय गॉड…” मिश्ती ने कहा, “और तेज़… और तेज़…”
“फक मी… तेज़ फक मी…” मिश्ती ने कहा, “मेरी चूत… मेरी चूत को फाड़ दो… उई… आह…”
मैंने पूरी ताकत लगा दी। मैं जानवरों की तरह उसे चोद रहा था। मिश्ती के स्तन हिल रहे थे, मैंने एक हाथ से उन्हें पकड़ा, मसला।
“ओह माय गॉड… ओह्ह… मैं… मैं झड़ने वाली हूँ…” मिश्ती ने कहा, अपनी कमर हवा में उठाते हुए। मेट्रो में मिली लड़की की चूत
“मैं भी…” मैंने कहा, “मैं भी झड़ने वाला हूँ…”
“अंदर… अंदर ही… प्लीज़… मुझे अपना सब कुछ दीजिए…”
कुछ और ज़ोरदार धक्के और मिश्ती का शरीर अकड़ गया। उसकी योनी ने मेरे लिंड को कसकर पकड़ा, अंदर-बाहर होने लगी। और फिर एक गर्म धार, मेरी तरल उसकी योनी में भर गई। मेट्रो में मिली लड़की की चूत
“आह्ह्ह…” मिश्ती ने चीखते हुए कहा, “भर दी… अंदर भर दी…”
मैं उसके ऊपर गिर गया। दोनों सांसें फूलते हुए, पसीने में लथपथ, एक-दूसरे की बाहों में।
भाग 9: दूसरा दौर – मिश्ती की गांड
कुछ देर बाद। हम एक-दूसरे में लिपटे हुए थे। मैंने उसके बालों को सहलाया।
“अर्जुन,” मिश्ती ने कहा।
“हाँ?”
“मैं… मैं कुछ और चाहती हूँ,” उसने शरमाते हुए कहा, अपना चेहरा मेरी छाती में छुपाते हुए।
“क्या?”
“मैंने कभी… पीछे से नहीं किया,” उसने कहा, “लेकिन आपके साथ… मैं चाहती हूँ… मैं चाहती हूँ कि आप मेरी गांड मारें…”
मैंने उसे देखा। “क्या… क्या यह दर्द नहीं देगा?”
“थोड़ा… लेकिन आप धीरे से करिएगा… प्लीज़…”
मिश्ती ने पेट के बल लेट गई। एक तकिया अपने पेट के नीचे रखा, ताकि उसकी गांड ऊपर उठी रहे।
मैंने उसकी गांड देखी। गोल, मुलायम, सफेद। मैंने अपनी उंगली पर थूक लगाया और उसकी गांड के छेद पर लगाया। फिर धीरे से अंदर डाली।
“उह्ह…” मिश्ती ने कहा।
“दर्द?”
“नहीं… बस… अजीब सा…”
मैंने उंगली अंदर-बाहर की। फिर दूसरी उंगली डाली। मिश्ती की गांड धीरे-धीरे ढीली होने लगी।
“अब…” मिश्ती ने कहा, “अब डालिए…”
मैंने अपने लिंड पर बहुत सारा तेल लगाया। फिर टॉप को उसकी गांड के छेद पर रखा।
“धीरे…” मिश्ती ने कहा, अपने हाथ बिस्तर की चादर पर पकड़े।
मैंने धीरे से दबाया। लिंड का टॉप अंदर गया।
“आह्ह… बड़ा है… बहुत बड़ा है…” मिश्ती ने कहा।
थोड़ा-थोड़ा करके, मैंने पूरा लिंड अंदर डाल दिया। अब मेरा पूरा लिंड उसकी गांड में समा चुका था।
“भर गई…” मिश्ती ने कहा, “पूरी… आपका… पूरा अंदर…”
मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। पहले बहुत धीरे, फिर थोड़ा तेज़।
“ओह्ह… यह… यह अलग है…” मिश्ती ने कहा, “बहुत तंग… बहुत गर्म…”
“क्या… क्या अच्छा लग रहा है?”
“हाँ… बहुत… और तेज़… मेरी गांड मारो… तेज़…”
मैंने गति बढ़ा दी। मैं ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगा रहा था। मिश्ती की गांड से आवाज़ें आ रही थीं – त्वचा की थपथपाहट।
“उई… आह… ओह माय गॉड… और तेज़… फक मी… मेरी गांड फाड़ दो…” मिश्ती ने कहा, “उई… आह… ओह्ह…”
“मैं… मैं झड़ने वाला हूँ…” मेट्रो में मिली लड़की की चूत
“अंदर… मेरी गांड में ही… भर दीजिए… अपना सब कुछ…”
मैंने एक ज़ोरदार धक्का लगाया और झड़ गया। मेरी गर्म तरल मिश्ती की गांड में भर गई।
“आह्ह्ह…” मिश्ती ने चीखते हुए कहा।
मैं उसके ऊपर गिर गया। दोनों थकी हुई, संतुष्ट, खुश।
आज भी, जब मैं मेट्रो में जाता हूँ, मुझे वो दिन याद आता है। वो पैर पर पैर, वो माफ़ी, वो पहली मुस्कान।
अब मिश्ती और मैं एक साथ रहते हैं। जब हम एक-दूसरे में लिपटे सोते हैं, मुझे लगता है कि वो मेट्रो की गलती सबसे अच्छी गलती थी।
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