मेरा नाम अर्जुन है, उम्र 24 साल। मैं दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार में रहता हूँ। हमारे घर के ठीक बगल में एक छोटा सा घर है जहाँ रहती हैं सविता भाभी। विधवा पड़ोसन भाभी की चुदाई
सविता भाभी की उम्र करीब 34 साल होगी। उनके पति की दो साल पहले एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनके कोई बच्चा नहीं था, इसलिए वो अकेली ही रहती थीं।
मैं उन्हें हमेशा से ही देखता आया था, लेकिन कभी बात नहीं हुई थी। वो एक संस्कारी, शर्मीली महिला लगती थीं। साड़ी में रहतीं, माथे पर बड़ा सा बिंदी, गले में मंगलसूत्र – एकदम पारंपरिक भारतीय सुहागन का रूप।
एक रविवार की शाम थी। मैं अपने घर के बाहर बैठा था। भाभी कुछ सब्जियाँ लेकर आ रही थीं। अचानक उनका एक थैला फट गया और आलू-प्याज सड़क पर बिखर गए।
मैं दौड़कर गया और उनकी मदद करने लगा।
“धन्यवाद बेटा,” उन्होंने कहा।
“कोई बात नहीं भाभी, पड़ोसी ही तो हैं,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“अर्जुन।”
“हाँ, मैंने सुना है। मैं सविता… मतलब सविता भाभी बुला लो,” वो शर्माते हुए बोलीं।
उस दिन के बाद हमारी बातचीत शुरू हुई। शुरू में सिर्फ नमस्ते-सलाम होता था। फिर धीरे-धीरे बातें बढ़ने लगीं।
कुछ हफ्तों बाद एक दिन बारिश हो रही थी। मैंने देखा कि भाभी छत पर कपड़े सुखा रही हैं और अचानक बारिश तेज हो गई। मैं तुरंत छत पर गया और उनकी मदद की।
“अर्जुन, तुम भीग जाओगे!” वो चिंता से बोलीं।
“कोई बात नहीं भाभी, आपके कपड़े गीले हो जाएँगे,” मैंने कहा।
हम दोनों भीग गए। जब कपड़े उतारकर हम नीचे आए, तो भाभी ने कहा, “आओ, मैं तुम्हें कुछ गर्म करके देती हूँ, नहीं तो सर्दी हो जाएगी।”
मैं उनके घर गया। वो चाय बना रही थीं। भीगी हुई साड़ी उनके शरीर से चिपकी हुई थी। उनके कर्व्स साफ़ दिख रहे थे। मेरा ध्यान बार-बार उनकी गीली साड़ी पर जा रहा था।
“लो, पीलो,” उन्होंने चाय दी।
“धन्यवाद भाभी। वैसे आप अकेली रहती हैं, कभी डर नहीं लगता?” मैंने सवाल किया।
“लगता तो है… रात को खासकर। लेकिन क्या करूँ, भगवान की मर्जी,” वो उदास हो गईं।
“आप मुझे बुला लिया करें अगर कभी कुछ काम हो। मैं हमेशा तैयार हूँ,” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ देखा। उनकी आंखों में कुछ अलग सा भाव था। “तुम बहुत अच्छे हो अर्जुन।”
उस दिन के बाद हमारी दोस्ती गहरी होने लगी। मैं अक्सर उनके घर जाता, उनका कोई काम कर देता। वो भी मेरे लिए खाना बनातीं, कभी-कभी मिठाई लातीं।
एक महीने बाद की बात है। मैं उनके घर बैठा था, हम टीवी देख रहे थे। एक रोमांटिक सीन आया। अचानक कमरे में अजीब सी खामोशी छा गई।
“भाभी, आपको कभी अकेलेपन का एहसास नहीं होता?” मैंने पूछा।
वो चुप रहीं। फिर धीरे से बोलीं, “हर रात होता है अर्जुन। जब मैं अकेले बिस्तर पर लेटती हूँ… पता नहीं क्यों, लेकिन मन बहुत उदास हो जाता है।”
“आप अभी भी बहुत जवान हैं भाभी… आपके लिए कोई अच्छा रिश्ता आ सकता है,” मैंने कहा।
“नहीं!” वो तेज आवाज में बोलीं, फिर शांत होकर, “मैंने कसम खाई है। मैं दूसरी शादी नहीं करूँगी।”
“लेकिन खुशी तो जरूरी है ना?”
“खुशी?” वो मेरी तरफ देखीं, “कहाँ है खुशी मेरी जिंदगी में?”
मैंने हिम्मत करके उनका हाथ पकड़ लिया। “मैं हूँ ना भाभी।”
उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। बल्कि कसकर पकड़ लिया। उनकी आंखें नम हो गईं।
“तुम इतने अच्छे क्यों हो अर्जुन?” वो फुसफुसाईं।
“क्योंकि आप मेरी पड़ोसन नहीं, मेरी… खास हैं,” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ देखा। हमारी आंखें मिलीं। वो पल कुछ अलग था। मैंने धीरे से उनका हाथ अपने होंठों पर रखा और चूम लिया।
“अर्जुन… यह सही नहीं है,” वो कांपती हुई आवाज में बोलीं।
“क्या गलत है भाभी? मैं आपको खुश देखना चाहता हूँ। आपको प्यार करना चाहता हूँ,” मैंने कहा।
“मैं विधवा हूँ… समाज क्या कहेगा?”
“समाज तो हमेशा कुछ न कुछ कहता है। लेकिन यह हमारी जिंदगी है।”
वो उठकर चली गईं कमरे में। मुझे लगा शायद मैंने गलती की। लेकिन पांच मिनट बाद वो आईं। उनकी आंखें लाल थीं, शायद रोई थीं।
“अर्जुन… क्या तुम सच में मुझे पसंद करते हो?” उन्होंने पूछा।
“बहुत ज्यादा भाभी।”
“तो फिर… कल शाम को आना। घर पर कोई नहीं होगा। हम बात करेंगे,” वो बोलीं।
मैं समझ गया कि यह सिर्फ बात करने का नहीं, कुछ और ही निमंत्रण था।
अगले दिन मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था। शाम के 6 बजे मैं उनके घर पहुँचा। उन्होंने दरवाजा खोला तो मैं देखता ही रह गया।
वो एक हल्की गुलाबी साड़ी में थीं, हल्का मेकअप, खुले बाल। वो पहली बार इतनी सजी-धजी लग रही थीं।
“आओ,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
अंदर जाकर मैंने देखा कि कमरे में मदहोश करने वाली खुशबू थी। मोमबत्तियाँ जल रही थीं। यह कोई आम मुलाकात नहीं थी, यह एक रोमांटिक डेट थी।
“यह सब…?” मैंने पूछा।
“मैंने सोचा… अगर हम यह कदम उठा ही रहे हैं, तो यादगार होना चाहिए,” वो शर्माते हुए बोलीं।
हम सोफे पर बैठे। मैंने उनका हाथ पकड़ा। “आज आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं भाभी।”
“सिर्फ आज?” वो मुस्कुराईं।
“नहीं, हमेशा। लेकिन आज कुछ अलग है।”
“क्या अलग है?”
“आज आप मेरी हैं,” मैंने कहा।
वो मेरे करीब आईं। मैंने धीरे से उनका चेहरा अपने हाथों में लिया। उनकी आंखों में देखा। वहाँ प्यार था, लालसा थी, और एक गहरी तड़प थी।
मैंने धीरे से अपने होंठ उनके होंठों पर रखे। पहले तो हल्का सा चूमना था, फिर धीरे-धीरे गहरा होता गया। उनके होंठ रसीले थे, नरम थे। मैंने अपनी जीभ उनके मुँह में डाली। उन्होंने भी जवाब दिया।
“ऊह… अर्जुन…” वो सिसकीं।
मैंने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। उनकी साड़ी की गंदी खुशबू मेरे सिर चढ़ रही थी। मैंने उनकी पीठ पर हाथ फेरना शुरू किया, फिर धीरे से नीचे की तरफ बढ़ा। उनकी गांड को मैंने कसकर पकड़ लिया।
“आह… क्या कर रहे हो?” वो कांपीं।
“जो दो साल से नहीं हुआ,” मैंने कान में फुसफुसाया।
मैंने उन्हें उठाया और बेडरूम में ले गया। बेड पर लिटाया। उनके पैरों के पास बैठकर मैंने उनके पैरों को चूमना शुरू किया। फिर धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा – पिंडलियाँ, घुटने, जांघें…
“अर्जुन… प्लीज…” वो बेसुध हो रही थीं।
मैंने उनकी साड़ी का पल्लू हटाया। वो एक क्रीम रंग का ब्लाउज पहने हुए थीं। मैंने ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके सभी बटन खुले। अंदर एक गुलाबी ब्रा थी जो उनके मस्त दूधों को संभाले हुए थी।
मैंने ब्रा के ऊपर से ही उनके स्तनों को सहलाना शुरू किया। वो आंखें बंद करके मुँह से आवाजें निकाल रही थीं। मैंने ब्रा का हुक खोला और उनके स्तन आजाद हो गए।
क्या नजारा था! गोल, भरे हुए, गुलाबी निपल्स वाले मस्त स्तन। मैंने एक स्तन को हाथ में लिया और दूसरे को मुँह में ले लिया।
“आह… हाँ… और जोर से…” वो बिस्तर पर तड़पने लगीं।
मैं निपल्स को काटने लगा, चूसने लगा। मेरा एक हाथ उनकी पेटीकोट के अंदर जा चुका था। मैंने उनकी पैंटी के ऊपर से ही उनकी चूत को सहलाना शुरू किया।
“ऊई माँ… वहाँ… हाँ…” वो पागल हो रही थीं।
मैंने उनकी पैंटी उतारी। उनकी चूत देखकर मैं हैरान रह गया। हल्के बाल, गुलाबी फांके, और पूरी तरह से गीली। मैंने अपनी उंगली उनकी चूत पर रखी।
“कितनी गीली हो भाभी,” मैंने कहा।
“तुम्हारी वजह से…” वो शर्मा गईं।
मैंने एक उंगली अंदर डाली। वो कसकर गर्म और तंग थी। मैंने उंगली अंदर-बाहर करनी शुरू की।
“फच… फच… फच…” की आवाजें आ रही थीं।
“और तेज… हाँ… मर गई…” वो चिल्लाने लगीं।
मैंने उनकी चूत चाटनी शुरू कर दी। जीभ से क्लिटोरिस को सहलाया, फिर अंदर डाली। वो मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाने लगीं।
“चूसो… और गहरा… आह… रुकना मत…” वो बेकाबू हो रही थीं।
अचानक उनका शरीर कांपने लगा। उन्होंने मेरे बालों को कसकर पकड़ लिया और एक लंबी सिसकी के साथ झड़ गईं। उनका पानी मेरे मुँह में आ गया। मैंने पी लिया।
भाभी पूरी तरह से नंगी लेटी थीं। मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा 7 इंच का लंड देखकर उनकी आंखें चौड़ी हो गईं।
“यह… यह तो बहुत बड़ा है,” वो डरते हुए बोलीं।
“डरो मत भाभी, आराम से ले लेना,” मैंने कहा।
मैंने अपना लंड उनके मुँह के पास लाया। उन्होंने शर्माते हुए अपनी जीभ निकाली और सुपाड़े पर चाटना शुरू किया। फिर धीरे से पूरा लंड मुँह में ले लिया।
“ऊह… भाभी… क्या मजा है…” मैं आनंद से कांप गया।
वो पूरे जोश से चूसने लगीं। कभी सुपाड़े को जीभ से चाटती, कभी पूरा अंदर लेतीं। उनका एक हाथ मेरे अंडकोषों को सहला रहा था।
“बस… रुक जाओ… नहीं तो निकल जाएगा,” मैंने कहा।
वो रुक गईं। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। उनके पैर फैलाए। मैंने अपने लंड का सुपाड़ा उनकी गीली चूत पर रखा।
“तैयार हो?” मैंने पूछा।
“हाँ… धीरे से डालना… बहुत दिनों से नहीं हुआ,” वो कांपती हुई बोलीं।
मैंने एक धक्का लगाया। सुपाड़ा अंदर चला गया। वो कसी थी, बहुत तंग थी।
“दर्द हो रहा है?” मैंने पूछा।
“थोड़ा… लेकिन चलो… और डालो,” वो कहने लगीं।
मैंने दूसरा धक्का मारा। आधा लंड अंदर चला गया। वो चीख पड़ीं।
“आह… धीरे… बहुत मोटा है…”
मैं रुक गया। उनके स्तनों को सहलाने लगा, चूमने लगा। कुछ देर बाद वो शांत हुईं। फिर मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया।
“कैसा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“अच्छा… बहुत अच्छा… और तेज करो,” वो कहने लगीं।
मैंने गति बढ़ाई। अब पूरा लंड अंदर-बाहर हो रहा था। चूत से “फच… फच… फच…” की आवाजें आ रही थीं।
“चोदो मुझे… हाँ… और जोर से… विधवा की चूत फाड़ दो…” वो गंदी बातें करने लगीं।
मैंने उनके पैर अपने कंधों पर रखे और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। बिस्तर हिल रहा था। उनके स्तन उछल-उछल कर मुझे न्योता दे रहे थे।
“आह… मैं फिर से झड़ने वाली हूँ… और तेज… मर गई…” वो चीखीं।
उनकी चूत ने मेरे लंड को कसकर पकड़ लिया। वो झड़ गईं। लेकिन मैं रुका नहीं। मैंने उन्हें घोड़ी बनने के लिए कहा।
वो उठकर अपने हाथ-घुटने आ गईं। मैंने पीछे से उनकी गांड को पकड़ा और लंड एक ही धक्के में पूरा अंदर डाल दिया।
“ऊई माँ… इतना गहरा…” वो चिल्लाईं।
मैंने उनकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से चोदना शुरू किया। उनकी गांड की थपकी से “थप… थप… थप…” की आवाजें गूंज रही थीं।
“चोदो… और चोदो… हरामी… बहुत दिनों से तड़प रही थी…” वो पागलों की तरह बोल रही थीं।
मुझे भी झड़ने का एहसास होने लगा। मैंने गति तेज कर दी।
“भाभी… मैं निकालने वाला हूँ…”
“अंदर ही डाल दो… आज मेरी सेफ दिन हैं… पूरा अपना पानी मेरी चूत में छोड़ दो…”
मैंने एक आखिरी जोरदार धक्का मारा और अपना लंड पूरी तरह से अंदर डाल दिया। मेरा गर्म वीर्य उनकी चूत में फूटने लगा। मैं कांपता रहा, झड़ता रहा।
कुछ देर बाद मैंने लंड बाहर निकाला। वो बिस्तर पर लेट गईं। उनकी चूत से मेरा वीर्य बह रहा था। मैंने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया।
“कैसा लगा?” मैंने पूछा।
“जन्नत… बस इतना कहूँगी कि यह रिश्ता कभी मत तोड़ना,” उन्होंने कहा।
“कभी नहीं भाभी। आप मेरी हैं, हमेशा रहेंगी,” मैंने कहा।
उस रात हमने तीन बार और चुदाई की। हर तरह से – मिशनरी, डॉगी, और भाभी ने मुझ पर बैठकर भी चुदवाया।
पहले राउंड के बाद हम दोनों थककर बिस्तर पर लेटे हुए थे। भाभी का सिर मेरे सीने पर था, मैं उनके बालों में उंगलियाँ फेर रहा था। करीब आधे घंटे बाद मेरा लंड फिर से तनने लगा। भाभी ने यह महसूस कर लिया।
“अरे वाह… फिर से तैयार हो गए?” उन्होंने शरारती अंदाज़ में पूछा।
“आपके साथ तो कभी थकान नहीं होती भाभी,” मैंने कहा।
इस बार मैंने उन्हें पीठ के बल लिटाया। उनके पैर फैलाए और खुद उनके बीच में आ गया। उनके चेहरे पर मैंने अपने होंठ रखे और एक लंबा चुम्बन लिया। फिर धीरे-धीरे नीचे बढ़ता गया – गर्दन, कंधे, स्तनों पर रुका।
मैंने उनके दोनों स्तनों को अपने हाथों में भर लिया। निपल्स को मुँह में लेकर चूसने लगा। वो फिर से गर्म होने लगीं। एक हाथ से मैंने अपना लंड पकड़ा और उनकी चूत के मुँह पर रगड़ने लगा।
“प्लीज… अब डालो… तड़पा मत…” वो बिलबिलाने लगीं।
मैंने एक ही धक्के में पूरा लंड अंदर डाल दिया। इस बार वो ज्यादा गीली थीं, इसलिए आसानी से चला गया।
“ऊह… हाँ… यही चाहिए था…” वो आंखें बंद करके बोलीं।
मैंने उनके पैर अपने कंधों पर रखे और धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के के साथ उनकी साँसें तेज हो रही थीं। मैं उनके चेहरे को देख रहा था – आंखें बंद, होंठ कसे हुए, माथे पर पसीने की बूंदें।
“कैसा लग रहा है भाभी?” मैंने पूछा।
“बहुत मजा आ रहा है… और तेज… मेरी जान…” वो बोलीं।
मैंने गति तेज कर दी। बिस्तर की स्प्रिंगें चरमराने लगीं। उनके स्तन उछल-उछल कर मुझे उकसा रहे थे। मैंने एक हाथ से उनकी कमर पकड़ी और दूसरे हाथ से उनके स्तनों को दबाना शुरू किया।
“आह… मैं फिर से झड़ने वाली हूँ… साथ में आना…” वो चीखीं।
मैंने भी अपनी गति बढ़ा दी। कुछ ही पलों में हम दोनों एक साथ झड़ गए। मेरा गर्म वीर्य उनकी चूत की गहराइयों में भर गया।
दो बार झड़ने के बाद भी हम दोनों का मन नहीं भरा था। भाभी उठी और बाथरूम गईं। वापस आईं तो पूरा नंगे बदन आईं। पानी की बूंदें उनके शरीर पर चमक रही थीं।
“अब क्या चाहिए तुम्हें?” उन्होंने पूछा।
“आपकी गांड देखनी है ठीक से,” मैंने कहा।
“कमीने…” वो शरमा गईं।
मैंने उन्हें बिस्तर के किनारे खड़ा किया और खुद बिस्तर पर बैठ गया। उनकी गांड मेरे सामने थी। मैंने दोनों हाथों से उनकी गांड के गोल गालों को फैलाया। गुलाबी छेद देखकर मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया।
“क्या करोगे?” वो पूछने लगीं।
“अभी बताता हूँ,” कहते हुए मैंने अपनी जीभ उनकी गांड के छेद पर रखी।
“ऊई माँ… यह क्या कर रहे हो… गंदी जगह है…” वो शर्मा रही थीं।
“कोई बात नहीं भाभी, आप तो मेरी हो,” मैंने कहा और जीभ से चाटना शुरू कर दिया।
कुछ देर बाद मैंने उन्हें घोड़ी बनने के लिए कहा। वो अपने हाथ और घुटनों पर आ गईं। उनकी गांड हवा में थी, चूत नीचे से दिख रही थी। मैंने पीछे से अपना लंड पकड़ा और एक ही जोरदार धक्के में पूरा अंदर घुसा दिया।
“आह… इतना जोर से…” वो चिल्लाईं।
मैंने उनकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से धक्के मारने शुरू कर दिए। “थप… थप… थप…” की आवाजें कमरे में गूंज रही थीं। उनकी गांड के गाल हर धक्के के साथ हिल रहे थे।
“चोदो… और जोर से… बहुत मजा आ रहा है…” वो पागलों की तरह चिल्ला रही थीं।
मैंने एक हाथ आगे बढ़ाया और उनके स्तनों को पकड़ लिया। नीचे से धक्के मार रहा था, ऊपर से स्तनों को मसल रहा था। वो पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थीं।
“मैं झड़ने वाली हूँ… रुकना मत… बस ऐसे ही…” वो चीखीं।
मैंने अपनी गति और तेज कर दी। उनकी चूत ने मेरे लंड को कसकर पकड़ लिया और वो झड़ गईं। मैंने भी अपना वीर्य उनकी चूत में ही छोड़ दिया।
अब भाभी का मन कुछ और करने का हुआ। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लेटने के लिए कहा। मैं समझ गया कि वो क्या चाहती हैं।
“आज मैं चलाऊँगी,” उन्होंने शरारती मुस्कान देते हुए कहा।
वो मेरे ऊपर आईं। एक पैर मेरे एक तरफ, दूसरा दूसरी तरफ। फिर धीरे-धीरे नीचे बैठीं और अपने हाथ से मेरा लंड पकड़कर अपनी चूत के मुँह पर रखा।
“तैयार हो मेरे शेर?” उन्होंने पूछा।
“हाँ भाभी,” मैंने कहा।
वो धीरे-धीरे नीचे बैठीं। मेरा लंड उनकी गीली चूत में धँसता चला गया। जब पूरा अंदर चला गया तो वो रुक गईं और अपने होंठों पर जीभ फेरने लगीं।
“क्या मोटा है तुम्हारा… मजा आ गया…” वो बोलीं।
फिर वो ऊपर-नीचे होने लगीं। धीरे-धीरे पहले, फिर गति बढ़ाती गईं। उनके स्तन मेरे सामने उछल रहे थे। मैंने हाथ बढ़ाकर उन्हें पकड़ लिया।
“दबाओ… मजा आएगा…” वो कहने लगीं।
मैंने उनके स्तनों को जोर से दबाना शुरू कर दिया। वो और तेज ऊपर-नीचे होने लगीं। उनकी चूत मेरे लंड को कसकर चूस रही थी।
“भाभी… आप तो एक्सपर्ट निकलीं…” मैंने कहा।
“पति के साथ यही पोजिशन सबसे ज्यादा करती थी…” वो बोलीं।
यह सुनकर मैं और उत्तेजित हो गया। मैंने उनकी कमर पकड़ी और नीचे से धक्के मारने शुरू कर दिए।
“आह… यह तो चीटिंग है… मैं चला रही हूँ…” वो हँसने लगीं।
“आप चलाइए, मैं भी तो साथ दूँगा…” मैंने कहा।
अब हम दोनों एक साथ गति कर रहे थे। वो ऊपर-नीचे हो रही थीं, मैं नीचे से धक्के मार रहा था। हमारी आवाजें कमरे में मिलकर एक अजीब सी सिम्फनी बना रही थीं।
“मैं झड़ने वाली हूँ… तुम भी आ जाओ…” वो चीखीं।
हम दोनों ने एक साथ अपनी गति तेज कर दी। कुछ ही सेकंड में हम एक साथ झड़ गए। भाभी मेरे ऊपर ही गिर पड़ीं। उनका पसीने से तर शरीर मेरे शरीर से चिपक गया।
“आज की रात यादगार है…” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया।
“हमेशा यादगार रहेगी भाभी…” मैंने कहा।
उस रात के बाद से हमारा रिश्ता और भी गहरा हो गया। अब हर हफ्ते हम मिलते हैं और उस रात को दोहराते हैं
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