मेरा नाम अनुप है। मेरे पिता ने मुझे दिल्ली के एक अच्छे इलाके में तीन कमरों का एक आलीशान फ्लैट दिया था। मैं एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत था। नौकरानी के साथ सेक्स -1 |
मेरी उम्र 28 साल थी और मैंने अभी तक शादी नहीं की थी। कैरियर बनाने में इतना व्यस्त हो गया था कि प्यार-व्यार के लिए समय ही नहीं मिला।
मेरी मां को मेरी चिंता रहती थी। उन्होंने कहा, “बेटा, घर तो बड़ा है, लेकिन इसकी देखभाल कौन करेगा? कामवाली तो चाहिए ही।”
मैंने हामी भर दी। अगले ही दिन, मेरी मां ने अपनी एक परिचिति से बात की जो घरेलू कामकाजी महिलाओं को काम पर लगाती थी।
“अनुप, कल एक लड़की आएगी। नाम है कृति… मतलब कृतिका। बहुत सीधी-सादी है, काम भी अच्छा करती है,” मां ने फोन पर बताया।
मैंने बस इतना कहा, “ठीक है मां।”
उस रात मैंने सोचा भी नहीं था कि मेरी जिंदगी में एक तूफान आने वाला है।
अगली सुबह, मैं ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था। दरवाजे की घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला।
सामने एक औरत खड़ी थी। नहीं… औरत नहीं, कोई अप्सरा उतर आई थी धरती पर। उसने साधारण सूती साड़ी पहनी हुई थी – हल्की नीले रंग की, कोई गहना नहीं, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। फिर भी उसकी सुंदरता ऐसी थी कि मेरी सांसें थम सी गईं।
“साहब… मैं कृतिका हूं। आपकी मां ने भेजा है,” उसने शर्माते हुए कहा। उसकी आवाज इतनी मधुर थी, जैसे कोई शहनाई बज रही हो।
मैं उसे देखता रह गया। उसके बाल कंधे तक थे, हल्के भूरे रंग के। उसकी आंखें… ओह उसकी आंखें! बड़ी-बड़ी, काली-काली, जैसे दो काजल से लिखी कविताएं हों। उसकी त्वचा गेहुआं रंग की, दूध से भी मुलायम लग रही थी।
“साहब?” उसने फिर पुकारा।
“हां… हां… आइए,” मैंने होश संभालते हुए कहा और साइड होकर उसे अंदर आने का रास्ता दिया।
जैसे ही वो अंदर आई, मैंने उसकी चाल देखी। वो जादू था। उसके कदम इतने हल्के थे, जैसे फूलों पर चल रही हो। उसकी साड़ी की प्लीट्स हवा में लहरा रही थीं। मेरी नजरें उस पर टिकी रहीं।
“मैं कहां से शुरू करूं साहब?” उसने पूछा।
“वो… किचन से शुरू कर दीजिए,” मैंने कहा, अपनी नजरें उससे हटाने की कोशिश करते हुए।
मैं ऑफिस चला गया, लेकिन पूरे दिन मुझे वो ही नजर आती रही। उसकी मुस्कान, उसकी शर्माती हुई आंखें, उसकी वो सादगी… सब कुछ मेरे दिमाग पर छाया रहा।
शाम को जब मैं लौटा, तो घर चमक रहा था। कृतिका जा चुकी थी, लेकिन उसकी महक बची हुई थी। मेरी मां ने फोन किया, “कैसी लगी लड़की?”
“अच्छी है मां,” मैंने संजीदगी से कहा, लेकिन दिल धड़क रहा था।
रात भर मैं सो नहीं पाया। उसकी तस्वीर मेरी आंखों के सामने घूमती रही।
अगले दिन से कृतिका रोज आने लगी। वो सुबह 9 बजे आती और शाम 5 बजे तक काम करती। धीरे-धीरे, मैं उससे बातचीत करने लगा।
“कृतिका, तुम कहां रहती हो?” मैंने एक दिन पूछा।
“पास में ही साहब, एक झुग्गी-झोपड़ी में। मेरे पति हैं… वो…” उसने कहना छोड़ दिया।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं साहब,” उसने सिर झुका लिया।
धीरे-धीरे मुझे पता चला। उसका पति रमेश एक शराबी था। रोज शाम को आता और उसे पीटता। कृतिका यह काम इसलिए करती थी ताकि घर का खर्च चल सके। उसके पति की कोई कमाई नहीं थी।
मैं उसकी हालत सुनकर दुखी हो जाता। लेकिन साथ ही, मेरे मन में उसके लिए एक अजीब सी तड़प भी पैदा हो रही थी। मैं उसे देखना चाहता था, उसके पास रहना चाहता था।
एक दिन, मैं घर पर ही था – छुट्टी थी। कृतिका पोछा लगा रही थी। वो झुकी हुई थी, और मैं सोफे पर बैठा उसे देख रहा था।
उसकी पीठ मेरी तरफ थी। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक गया था। उसकी पीठ का वो हिस्सा दिख रहा था जो आमतौर पर ढका रहता है। मेरी सांसें तेज हो गईं।
जब वो झुककर पोछा लगा रही थी, तो मैंने उसकी फिगर का अंदाजा लगाया। उसकी कमर इतनी पतली, इतनी सुडौल… और वो हिप्स… ओह माई गॉड! मैंने मन ही मन उसे मापा – लगभग 34-28-34 का फिगर। आदर्श फिगर।
वो खड़ी हुई और पलटी। मेरी नजरें उससे टकराईं। शायद उसे पता चल गया था कि मैं उसे देख रहा था। उसने शर्माते हुए अपना पल्लू ठीक किया और किचन में चली गई।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं उठकर अपने कमरे में चला गया।
दिन बीतते गए। मैं और कृतिका एक-दूसरे से घुलने-मिलने लगे। वो मेरे लिए चाय बनाती, खाना बनाती। मैं उससे बातें करता, उसकी परेशानियां सुनता।
एक दिन वो रोते हुए आई। उसके चेहरे पर हाथ का निशान था।
“क्या हुआ कृतिका?” मैंने चिंता से पूछा।
“वो… रमेश आए थे… पैसे मांग रहे थे… मना किया तो…” वो फूट-फूट कर रोने लगी ।इसलिए मैं नौकरानी हूँ।
मेरा खून खौल उठा। मैंने उसे ढांढस बंधाया। मेरे हाथ उसके कंधों पर थे। उसकी गर्माहट महसूस हो रही थी। वो मेरे इतने करीब थी कि उसकी सांसें मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थीं। मैंने नहीं सोचा था कि मुझे मेरी नौकरानी की चुदाई करने को मिलेगी ।
“मत रो कृतिका… तुम यहां सुरक्षित हो,” मैंने कहा।
उसने अपनी आंखें मेरी तरफ उठाईं। हमारी आंखें मिलीं। एक अजीब सा जादू सा हुआ। समय जैसे थम सा गया।
“धन्यवाद साहब… आप बहुत अच्छे हैं,” उसने धीरे से कहा और पीछे हट गई।
मैं उस दिन उसे अपने दिल की बात कहने से रोक नहीं पाया।
“कृतिका… मैं… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं,” मैंने हिम्मत जुटाई।
“जी साहब?”
“नहीं… अभी नहीं… बाद में,” मैंने कहा और चला गया।
मैं डर रहा था। डर रहा था कि कहीं वो नाराज न हो जाए, कहीं यह नौकरी न छोड़ दे। लेकिन मेरा दिल उसके लिए धड़क रहा था।
जुलाई का महीना था। बारिश का मौसम। एक रात मैं देर से ऑफिस से लौटा। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
घर पहुंचा तो देखा कृतिका अभी भी वहीं है। उसे इंतजार था कि बारिश थमेगी तो वो जाएगी।
“कृतिका! अभी तक यहीं हो?”
“जी साहब… बारिश…”
“अरे पागल… इतनी रात को, इतनी बारिश में कैसे जाओगी? आज यहीं रुको। तीसरे कमरे में सो जाना,” मैंने कहा।
“लेकिन साहब…”
“कोई लेकिन-वेकिन नहीं। मैं कह रहा हूं,” मैंने आदेश दिया।
रात के 11 बजे थे। मैंने उसे चाय बनाने को कहा। हम दोनों बैठकर चाय पी रहे थे। बिजली चमकी, गरजी। कृतिका डरकर मेरे पास सरक आई।
“डर लग रहा है?” मैंने पूछा।
“थोड़ा…” उसने कहा।
मैंने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। वो कांपी, लेकिन हाथ नहीं हटाया।
“कृतिका… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं… बहुत दिनों से,” मैंने धीरे से कहा।
उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में अजीब सी चमक थी।
“मैं… मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं… नहीं, प्यार करने लगा हूं,” मैंने कह दिया।
वो चौंकी। उसका चेहरा लाल हो गया।
“साहब… आप… आप यह क्या कह रहे हैं? मैं तो… मैं तो शादीशुदा हूं… और आप…” वो घबरा गई।
“मुझे पता है। लेकिन मैं अपनी भावनाएं नहीं रोक सका। तुम्हारे बिना मैं सांस भी नहीं ले पाता। तुम्हारी हर अदा, तुम्हारी हर मुस्कान… सब कुछ मुझे दीवाना बना रही है,” मैंने अपने दिल की बात कही।
वो खड़ी होने लगी, लेकिन मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
“प्लीज… एक बार सुन तो लो,” मैंने विनती की।
“साहब… छोड़िए मेरा हाथ… यह ठीक नहीं है,” उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।
“मैं जानता हूं तुम्हारी शादी ठीक नहीं चल रही। रमेश तुम्हें प्यार नहीं करता, वो तो सिर्फ तुम्हें इस्तेमाल करता है। मैं तुम्हें खुश रखूंगा… तुम्हें वो सब दूंगा जो तुम्हें हक है,” मैंने कहा।
वो रोने लगी। “साहब… मेरी किस्मत में यह सब नहीं लिखा… मैं एक गरीब घर की औरत हूं… आप मुझे क्यों अपना बना रहे हैं?”
“क्योंकि मैं तुम्हें चाहता हूं… दिल से, जान से,” मैंने कहा और उसे अपनी बाहों में भर लिया।
रात को, मैंने कृतिका को अपने कमरे में बुलाया।
“साहब, आपने बुलाया?” वो आई, अपनी नाइटी में। उसने मेरे लिए खाना बनाया था और अब सोने जा रही थी।
“हां, आओ पास बैठो,” मैंने पलंग पर जगह दिखाई।
वो शर्माते हुए आई। मैंने उसका हाथ पकड़ा। वो कांपी।
“साहब… यह…”
“चुप… मैं जानता हूं तुम्हें पैसों की जरूरत है। तुम्हारा पति शराबी है, तुम्हें पीटता है। मैं तुम्हें वो सब दूंगा जो तुम चाहती हो… बदले में बस थोड़ा प्यार,” मैंने उसके हाथ सहलाते हुए कहा।
“लेकिन साहब… मैं शादीशुदा हूं… यह गलत है…”
“और मैं तुम्हारा मालिक हूं,” मैंने कहा और उसे अपनी ओर खींच लिया।
वो मेरे सीने से लग गई। मैंने उसके बालों को सहलाया, फिर उसके गालों को छुआ। वो कांप रही थी, लेकिन विरोध नहीं कर रही थी। उसे लगा कि यह उसकी नौकरी बचाने का एकमात्र तरीका है।
मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो पहले तो स्तब्ध रही, फिर वो भी मेरा साथ देने लगी। उसके होंठ इतने नरम थे… मीठे… मैंने उसे कसकर गले लगाया और उसके होंठों को चूसने लगा।
“उम्म्म… साहब… धीरे…” वो सिसकी।
मैंने धीरे-धीरे उसकी नाइटी उतारनी शुरू की। वो कांप रही थी। “डरो मत… मैं तुम्हें दर्द नहीं दूंगा… सिर्फ खुशी दूंगा,” मैंने कहा।
जब वो मेरे सामने थी, बस ब्रा और पैंटी में… मेरी सांसें रुक गईं। उसकी वो फिगर… 34-28-34… उसके बूब्स ब्रा से भी बाहर निकलने को बेकरार थे, उसकी कमर इतनी पतली, और वो गांड… ओह! मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके ऊपर चढ़ गया।
उसकी ब्रा खोली तो वो दो गोल-गोल पहाड़ निकले, गुलाबी निप्पल्स के साथ। मैं उन्हें चूसने लगा, काटने लगा। “आह… साहब… धीरे…” वो कराही।
मैंने उसकी पैंटी उतारी। वो पूरी तरह नंगी थी, मेरे सामने। उसकी चूत बिल्कुल साफ थी, गुलाबी। मैंने उसे चूमना शुरू किया… गर्दन से लेकर नाभि तक… फिर नीचे…
“ओह… साहब… यह क्या…” वो चिल्लाई जब मैंने उसकी चूत पर जीभ लगाई।
मैं उसकी चूत चाटने लगा… उसकी क्लिटoris को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा। वो पागल होने लगी, अपनी कमर हिलाने लगी। “साहब… प्लीज… अब और नहीं…” वो भीख मांगी।
मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा था – 7 इंच का, मोटा। उसने डरते हुए देखा। “डरो मत… मजा आएगा,” मैंने कहा और उसकी टांगें फैला दीं।
धीरे से मैंने अपने लंड का सुपाड़ा उसकी चूत पर रखा। वो गीली थी, लेकिन बहुत टाइट। मैंने एक धक्का दिया।
“आह… दर्द… साहब… धीरे…” वो चीखी।
मैंने रुककर उसके होंठ चूमे, फिर दूसरा धक्का दिया। मेरा आधा लंड अंदर चला गया। वो रो रही थी, लेकिन मैंने उसे पकड़ा रखा। फिर मैंने पूरा जोर से धक्का दिया। मेरा पूरा लंड उसकी चूत में समा गया।
“आह… मर गई… साहब…” वो चिल्लाई।
मैंने रुककर उसे किस किया। फिर धीरे-धीरे चोदना शुरू किया। धक्के देते-देते मैं उसके बूब्स भी दबा रहा था। धीरे-धीरे उसे भी मजा आने लगा। वो अपनी कमर उठा-उठाकर मेरा साथ देने लगी।
“हां… साहब… और जोर से… चोदो मुझे…” वो बोली।
मैंने स्पीड बढ़ाई। बिस्तर हिल रहा था। तक-तक-तक की आवाजें गूंज रही थीं। “कैसा लग रहा है मेरी रांड?” मैंने पूछा।
“बहुत अच्छा… और जोर से चोदो मुझे… मैं आपकी हूं…” वो चिल्लाई।
मैंने उसे कुत्ते की तरह बैठने को कहा। वो बेड पर घुटनों के बल आ गई, अपनी गांड मेरी तरफ उठाई। मैंने पीछे से उसकी चूत में लंड डाल दिया।
“आह… गहरा जा रहा है…” वो चिल्लाई।
मैंने उसकी गांड थपथपाई और जोर-जोर से चोदने लगा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपनी नौकरानी की गांड की चुदाई करने को मिलेगी ।
मैंने आखिरी जोर के धक्के दिए और अपना गर्म पानी उसकी चूत में छोड़ दिया। वो भी झड़ गई, मेरे नीचे कांपती हुई।
हम दोनों थककर सो गए। वो मेरी बाहों में थी, पूरी तरह नंगी। उसे लगा कि यह सिर्फ एक बार की बात है, कि मैं सिर्फ उसी से यह करता हूं। उसे नहीं पता था कि मेरे मन में और भी योजनाएं हैं।
छोटी बहन की आमद – धोखा और जबरदस्ती
कुछ दिनों बाद, कृतिका ने मुझे बताया कि उसकी छोटी बहन प्रिया कॉलेज की छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए आ रही है। वो 19 साल की थी, और कृतिका के माता-पिता के गुजर जाने के बाद वो अकेली रहती थी।
“साहब, क्या वो यहां रह सकती है? बस कुछ दिनों के लिए? वो बहुत मासूम है, बहुत सीधी है,” कृतिका ने पूछा।
मेरे मन में एक शैतानी ख्याल आया। छोटी बहन… 19 साल की… मासूम…
“हां, क्यों नहीं। यहां तीन कमरे हैं, वो रह सकती है,” मैंने कहा, एक योजना बनाते हुए।
कृतिका को लगा कि मैं बहुत अच्छा हूं। उसे नहीं पता था कि मैं उसकी बहन के बारे में क्या सोच रहा था। वो यह सोचकर खुश थी कि उसकी बहन सुरक्षित रहेगी, जबकि मैं तो उसी को अपना अगला शिकार बनाने की योजना बना रहा था।
अगले हफ्ते, प्रिया आ गई। वो दरवाजे पर खड़ी थी – जींस और टॉप में, एकदम कॉलेज की छात्रा। उसकी उम्र 19 साल, लेकिन वो दिखने में 16-17 की लग रही थी। उसकी चूचियां छोटी-छोटी लेकिन कसी हुई, पतली कमर, और वो मासूम चेहरा…
“दीदी!” वो कृतिका से लिपट गई।
कृतिका ने उसे मुझसे मिलवाया। “प्रिया, यह अनुप साहब हैं, मेरे मालिक। बहुत अच्छे हैं, इन्होंने हमें यहां रहने की जगह दी है।”
प्रिया ने शर्माते हुए नमस्ते की। “धन्यवाद साहब।”
मैंने उसे घूरते हुए देखा। वो इतनी मासूम थी, इतनी कच्ची… मेरा लंड खड़ा हो गया।
रात को, जब कृतिका सो रही थी, मैंने प्रिया के कमरे में चुपके से दरवाजा खोला। वो सो रही थी, नाइटी में।
मैंने उसे जगाया। “प्रिया… उठो…”
वो उठी और डर गई। “साहब! आप… आप यहां…”
“चुप… मैं तुमसे बात करना चाहता हूं,” मैंने कहा और उसके बिस्तर पर बैठ गया।
“साहब, यह ठीक नहीं है… मेरी दीदी…” वो कांप रही थी।
“तुम्हारी दीदी सो रही है। और मैं जो कहूंगा, वो करना होगा,” मैंने उसका हाथ पकड़ा।
“नहीं साहब… प्लीज… मैं… मैं कुछ नहीं जानती…” वो रोने लगी।
मैंने उसे अपनी ओर खींचा। “देखो, तुम्हें पैसे चाहिए ना… कॉलेज की फीस… मैं सब दूंगा… बस थोड़ा सा प्यार…”
“नहीं… मैं… मैं ऐसा नहीं करती…” वो रोते हुए बोली।
वो बैठी, कांप रही थी। मैंने उसका हाथ पकड़ा। वो चौंकी, लेकिन हाथ नहीं हटाया।
“डरो मत… मैं तुम्हें कुछ नहीं करूंगा… बस बात करना चाहता हूं,” मैंने कहा।
लेकिन मेरा हाथ उसके हाथ से होते हुए उसकी जींस पर चला गया। उसकी जांघ पर। वो कांपी।
“साहब… यह… यह ठीक नहीं है…” उसने धीरे से कहा।
“क्या ठीक नहीं है? मैं तो बस तुम्हारी केयर कर रहा हूं… तुम्हारी दीदी भी तो मेरी केयर करती है…” मैंने कहा और उसकी जांघ सहलाने लगा।
प्रिया उठकर जाने लगी, लेकिन मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
“कहां जा रही हो? अभी तो बात शुरू हुई है…” मैंने कहा।
“साहब… प्लीज… मेरी दीदी सो रही है… मुझे जाने दो…” वो रोने लगी।
“चुप… रो मत… मैं तुम्हें कुछ नहीं करूंगा… बस थोड़ा सा मजा…” मैंने कहा और उसे अपनी ओर खींच लिया।
वो मेरे सीने से लग गई। मैंने उसके बालों को सहलाया, फिर उसके गालों को छुआ। वो कांप रही थी, रो रही थी।
“साहब… प्लीज… मैं… मैं कुछ नहीं जानती… मुझे छोड़ दो…” वो भीख मांगी।
“तुम्हें सब कुछ सिखा दूंगा… आज तुम औरत बनोगी…” मैंने कहा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वो विरोध करने लगी, अपने हाथों से मुझे धक्का देने लगी, लेकिन मैंने उसे कसके पकड़ लिया। मैंने उसके होंठों को चूसना शुरू कर दिया, काटना शुरू कर दिया।
“उम्म्म… नहीं… छोड़ो मुझे…” वो चिल्लाई, लेकिन”साहब… प्लीज… मैं… मैं कुछ नहीं जानती… मुझे छोड़ दो…” वो भीख मांगी।
“तुम्हें सब कुछ सिखा दूंगा… आज तुम औरत बनोगी…” मैंने कहा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
वो विरोध करने लगी, अपने हाथों से मुझे धक्का देने लगी, लेकिन मैंने उसे कसके पकड़ लिया। मैंने उसके होंठों को चूसना शुरू कर दिया, काटना शुरू कर दिया।
“उम्म्म… नहीं… छोड़ो मुझे…” वो चिल्लाई, लेकिन मैंने उसके मुंह पर अपना हाथ रख दिया।
“चिल्लाओ मत… वरना तुम्हारी दीदी उठ जाएगी… और फिर दोनों को निकाल दूंगा…” मैंने धमकी दी।
वो डर गई। उसकी आंखों में आंसू थे। वो रो रही थी, लेकिन चुप हो गई।
मैंने उसे बिस्तर पर गिरा दिया। वो उठकर भागने की कोशिश की, लेकिन मैंने उसे पकड़ लिया। मैंने उसके ऊपर चढ़ गया।
“साहब… प्लीज… मैं… मैं कुंवारी हूं… मैंने कभी यह सब नहीं किया… मेरी शादी नहीं हुई…” वो रोते हुए बोली।
“और मैं तुम्हें औरत बनाने जा रहा हूं… तुम्हारी दीदी भी मेरी है… अब तुम भी मेरी हो…” मैंने कहा और उसकी टी-शर्ट उतारनी शुरू कर दी।
वो रोते हुए विरोध करती रही, लेकिन मैंने एक-एक करके उसके कपड़े उतार दिए। पहले टी-शर्ट, फिर जींस।
अब वो बस ब्रा और पैंटी में थी। उसकी छोटी-छोटी चूचियां ब्रा से बाहर निकलने को बेकरार थीं। उसकी पतली कमर, उसकी कसी हुई जांघें…
मैंने उसे देखा… पूरे जुनून से, पूरे प्यास से।
मैंने उसकी ब्रा खोली। वो दो छोटी-छोटी, कसी हुई चूचियां बाहर आ गईं। गुलाबी निप्पल्स, छोटे-छोटे, कड़े हुए।
“नहीं… साहब… मत देखो… शर्म आ रही है…” वो अपने हाथों से अपने बूब्स छुपाने की कोशिश की।
मैंने उसके हाथ हटाए और उसके बूब्स पकड़ लिए। वो इतने नरम थे, इतने कसे हुए… मैं उन्हें दबाने लगा, चूसने लगा।
“आह… दर्द हो रहा है… साहब… धीरे…” वो कराही।
मैंने उसके निप्पल्स काटे, चूसे। वो दर्द से कराह रही थी, लेकिन मैं रुका नहीं।
फिर मैंने उसकी पैंटी उतारी। वो अपनी टांगें बंद करने की कोशिश की, लेकिन मैंने उसकी टांगें फैला दीं।
वो पूरी तरह नंगी थी, मेरे सामने। उसकी चूत बिल्कुल साफ थी, एक भी बाल नहीं। गुलाबी, कसी हुई, कच्ची। वो कांप रही थी, रो रही थी, अपने हाथों से अपनी चूत छुपाने की कोशिश कर रही थी।
“साहब… प्लीज… मत देखो… मैं… मैं शर्मा रही हूं…” वो रोते हुए बोली।
“आज तुम्हें शर्म छोड़नी होगी… आज तुम औरत बनोगी…” मैंने कहा और उसके हाथ हटा दिए।
मैंने उसकी चूत को देखा… इतनी सुंदर, इतनी कसी हुई… मेरा लंड पागल हो रहा था।
मैंने उसकी चूत पर हाथ लगाया। वो कांपी, चीखी।
“ठंडा है… मत लगाओ…” वो बोली।
“अभी गर्म हो जाएगा…” मैंने कहा और उसकी चूत पर उंगली करने लगा।
वो रो रही थी, लेकिन उसकी चूत गीली होने लगी थी। मैंने उंगली अंदर डाली। वो चीखी।
“आह… दर्द… बाहर निकालो…”
“अभी तो और अंदर जाएगा…” मैंने कहा और अपने कपड़े उतारने शुरू किए।
पहली चुदाई – दर्द और आंसू
मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा था – 7 इंच का, मोटा, लाल। उसने डरकर देखा, रोते हुए।
“साहब… यह… यह तो बहुत बड़ा है… मेरी चूत में नहीं जाएगा… प्लीज… मत करो…” वो भीख मांगी।
“जाएगा… और पूरा अंदर जाएगा… थोड़ा दर्द होगा, फिर मजा आएगा…” मैंने कहा और उसकी टांगें और फैला दीं।
मैंने उसके ऊपर लेट गया। उसकी चूत पर अपने लंड का सुपाड़ा रखा। वो कांप रही थी, रो रही थी, अपने हाथों से मुझे धक्का दे रही थी।
“तुम्हारी दीदी को कुछ नहीं पता चलेगा… और अगर उसे पता चला, तो मैं तुम दोनों को निकाल दूंगा… समझी?” मैंने धमकी दी।
वो डरकर चुप हो गई।
“तुम्हारी दीदी को कुछ नहीं पता चलेगा… और अगर उसे पता चला, तो मैं तुम दोनों को निकाल दूंगा… समझी?” मैंने धमकी दी।
वो डरकर चुप हो गई।
जब मैंने उसे छोड़ा, तो वो रोते हुए बिस्तर पर पड़ी रही। “साहब… आपने मेरे साथ… मेरी दीदी को पता चलेगा तो…”
“तुम्हारी दीदी को कुछ नहीं पता चलेगा… और अगर उसे पता चला, तो मैं तुम दोनों को निकाल दूंगा… समझी?” मैंने धमकी दी।
वो डरकर चुप हो गई। अगले दिन, जब कृतिका ने उसे देखा, तो पूछा, “क्या हुआ प्रिया? तुम इतनी उदास क्यों हो?”
“कुछ नहीं दीदी… बस… बस थकान है…” प्रिया ने झूठ बोला, आंसू पीते हुए।
कृतिका को शक हुआ, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वो नहीं जानती थी कि उसकी मासूम बहन के साथ रात में क्या हुआ था।
कुछ दिनों बाद, कृतिका की मां सुनीता शहर आई। वो अपनी बेटियों से मिलने आई थी। जब उसने देखा कि दोनों बेटियां एक ही घर में रह रही हैं, और वो भी एक अकेले मर्द के साथ, तो उसे शक हुआ।
“कृतिका, यह क्या है? तुम दोनों यहां क्या कर रही हो? यह मर्द कौन है?” सुनीता ने पूछा।
“मां, यह अनुप साहब हैं… मेरे मालिक… उन्होंने हमें यहां रहने दिया है…” कृतिका ने कहा।
सुनीता ने प्रिया को देखा। प्रिया उदास थी, उसकी आंखें सूजी हुई थीं।
“प्रिया, क्या हुआ बेटी? कुछ बता रही हो या नहीं?” सुनीता ने पूछा।
प्रिया रोने लगी। “मां… मां… यह… यह साहब…” वो रोते हुए बोली।
“क्या किया इसने?” सुनीता ने पूछा।
प्रिया ने सब कुछ बता दिया। कैसे मैंने रात में उसके कमरे में आकर उसे जबरदस्ती चोदा, कैसे मैंने धमकी दी।
सुनीता का खून खौल उठा। “यह क्या… यह क्या किया तुमने मेरी बेटी के साथ… मैं पुलिस में शिकायत करूंगी…”
वो मुझे गाली देने लगी। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई… मेरी मासूम बेटी को… मैं तुम्हें जेल भिजवा दूंगी…”
मैंने कहा, “अंटी, शांत हो जाओ… यह सब झूठ है… प्रिया जूठ बोल रही है…”
“जूठ! मेरी बेटी रो रही है… और तुम कह रहे हो जूठ… मैं अभी पुलिस को फोन करती हूं…” सुनीता ने कहा और अपना फोन निकाला।
मैंने उसका हाथ पकड़ा। “अंटी… रुको… बात करते हैं…”
“क्या बात करूं तुमसे… छोड़ो मुझे…” उसने मुझे धक्का दिया और दरवाजे की तरफ भागी।
वो निकलना चाहती थी पर मैंने मना लिया। मैंने कृतिका और प्रिया को देखा। कृतिका रो रही थी, उसे समझ आ रहा था कि मैंने उसकी बहन के साथ क्या किया था।
“साहब… आपने… आपने मेरी बहन के साथ… और मुझे पता भी नहीं…” कृतिका रोते हुए बोली।
“चुप… अगर तुमने कुछ किया, तो तुम्हारी मां और बहन दोनों को बरबाद कर दूंगा…” मैंने धमकी दी।
वो डरकर चुप हो गई।
सुनीता डर गई। वो रोते हुए वापस आई। उसने देखा कि मैं उसकी दोनों बेटियों के साथ खड़ा था।
“हां… अब तुम्हारी बेटियां मेरी हैं… और तुम भी…” मैंने कहा और उसे अपनी ओर खींच लिया।
“नहीं… मैं… मैं तुम्हारी उम्र की हूं… यह गलत है…” वो विरोध करने लगी।
“और मैं तुम्हें चोदने वाला हूं…” मैंने कहा और उसे कमरे में खींच लिया।
उसकी माँ को चोदने का किस्सा अगले भाग में बताउगा
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