दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2
मैं ये उम्मीद करता हूं आपकी कहानी का पहला भाग अच्छा लग होगा जिसका नाम दशहरा मेला में देसी लंड के दीदार – 1 हां है और इसी कहानी में दूसरी तरफ जो हुआ वो इस कहानी के दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2 में बताता हूं
उस भीड़ से बाहर, उस मैदान के किनारे, जहाँ एक पेड़ के नीचे झाड़ियों के सहारे खड़ी थी एक सफ़ेद फॉर्च्यूनर।
याद है, रुपाली की तबीयत मेले में खराब हो गई थी।
असल में खराब नहीं हुई थी। वो बस भीड़ में जाना नहीं चाहती थी — क्योंकि भीड़ में उस ड्रेस में उसे कोई चैन से देख ही नहीं पाता। चारों तरफ़ से आँखें। और उसे पता था कि उसका बदन उस ड्रेस में कैसा दिखता है।
तो उसने बहाना बनाया।
और फूफा जी? फूफा जी ने भी वही बहाना बनाया। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2
“तुम लोग जाओ,” उन्होंने कहा था। “रुपाली की तबीयत ठीक नहीं, मैं इसके साथ गाड़ी में रुकता हूँ। मुझे भी भीड़ पसंद नहीं।”
मौसी मान गईं। मामा मान गए। बाक़ी चार जने मेला देखने चले गए।
फूफा जी ने गाड़ी मैदान से दूर, एक पेड़ और झाड़ी के पीछे, कोने में पार्क की थी। जहाँ और गाड़ियाँ लगी थीं, वहाँ से भी थोड़ा हटकर। ऊपर से शीशों पर इतनी काली फ़िल्म कि अंदर से बाहर दिखे, बाहर से अंदर कुछ नहीं।
रुपाली पीछे की सीट पर आ गई।
“आ जाओ आप भी पीछे,” उसने कहा। “आगे बैठकर क्या करेंगे।”
फूफा जी आगे से उठे और पीछे आ गए। दोनों पीछे बैठे। बीच में थोड़ी जगह। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2
बाहर ढोल की आवाज़ आ रही थी, दूर कहीं फुलझड़ियाँ छूट रही थीं, और गाड़ी की छत पर पेड़ की पत्तियाँ हल्की-हल्की सरसरा रही थीं।
“तुम बहुत हॉट लग रही हो इस ड्रेस में,” फूफा जी ने कहा।
रुपाली मुस्कुराई। “ड्रेस तो बहुत हॉट है। और लोग मुझे घूर-घूर कर देखते हैं। साइड से थोड़ा दिखता है ना।”
वो जानबूझकर मुस्कुराई और बात का रुख़ मोड़ दिया, जैसे उसे फ़र्क़ ही न पड़ता हो।
फूफा जी ने कहा, “यही तो राज़ है सुंदरता का। जो चीज़ सुंदर है, उसे दिखाना भी ज़रूरी होता है। मम्मी-पापा को पसंद नहीं है तो कौन चाहता है कि उनकी बेटी हीरोइन बने?”
और फिर वो उसे देखने लगे। बार-बार। उसके चूचियों पर नज़र। ऐसी नज़र जो छिपाने की कोशिश कर रही हो, पर छिप न पा रही हो।
“फूफा जी,” रुपाली बोली। “आप क्यों देख रहे हो मुझे?”
“क्योंकि तुम आज बहुत हॉट और सेक्सी लग रही हो।” वो रुके। फिर बोले, “आज मैं चाहता हूँ तुम्हें एक बार गले लगा लूँ। अगर तुम कहो तो। कोई दिक़्क़त तो नहीं?”
“गले तो लगा लो,” रुपाली ने कहा। “कोई दिक़्क़त नहीं। पर हाँ, इसके अलावा और कुछ मत करना। क्योंकि आपकी नज़र कहीं और है।”
वो हँस पड़ी। उसे सब पता था। जवान लड़की थी, और आज तक उसकी सील नहीं टूटी थी — इसलिए थोड़ा भाव खाना उसका हक़ भी था। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2
फूफा जी ने उसे अपने करीब खींचा और गले से लगा लिया।
“रे, तेरी तो बहुत टाइट है,” उन्होंने कहा।
“क्या?”
उन्होंने बिना देर किए उसकी चूचियों को छू दिया। “ये।”
रुपाली ने खुद अपनी चूचियों पर हाथ रखा और मुस्कुराकर बोली, “हाँ, आप सही बोल रहे हो। मैं जवान हूँ, खूबसूरत हूँ, और आज तक किसी के साथ कुछ किया नहीं। इस वजह से टाइट है।”
“फिर तो तेरी नीचे वाला भी टाइट होगी।”
“नीचे वाला तो बिल्कुल टाइट है,” वो हँसी, “क्योंकि मैंने कभी उँगली भी अंदर नहीं डाली।”
और फूफा जी शॉक हो गए। उनका चेहरा देखने लायक था। इतनी सीधी बात किसी लड़की से उम्मीद नहीं की थी उन्होंने। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2
वो एक सेकंड रुके, फिर उसे कसकर अपनी बाहों में भर लिया, और उसकी चूचियों पर हाथ रखकर मसलने लगे।
अध्याय 12 — कार की हिलती छत
बाहर से कुछ नहीं दिखता था। लोग गाड़ी के पास से गुज़रते, पर अंदर झाँकने की कोशिश नहीं करते।
फूफा जी ने पहले सीट आगे खिसकाई, पीछे जगह बनाई, और रुपाली को पीछे ले गए।
फिर उन्होंने उसे चूमना शुरू किया। होंठों पर। पहले हल्का, फिर गहरा। उसकी जीभ अंदर आई और रुपाली की जीभ से लिपट गई। और उनके हाथ उसकी चूचियों को दबाने लगे।
रुपाली ने जो टॉप पहना था — वो बनियान जैसा था। फूफा जी ने उसे ऊपर सरका दिया। ब्रा भी ऊपर कर दी। दोनों चूचियाँ बाहर आ गईं — गोल, टाइट, निपल छोटे और सख़्त।
उन्होंने मुँह में ले लिया और चूसने लगे।
रुपाली ने पहली बार कोई मर्द का मुँह अपनी छाती पर महसूस किया। उसके पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
पर फूफा जी को लगा कि कहीं मम्मी-पापा, दादी आ न जाएँ। उन्होंने तुरंत फ़ोन निकाला और कॉल किया।
“आप लोग कितने देर में आएँगे?”
उधर से आवाज़ आई, “अभी तो दो घंटे लगेंगे कम से कम। आपको मन नहीं लग रहा तो आ जाओ।”
“नहीं नहीं, मुझे नहीं आना। रुपाली तो सो गई है। मैं मोबाइल पर मूवी देख रहा हूँ। आप आराम से आओ, कोई दिक़्क़त नहीं।”
“ठीक है।”
फ़ोन रखा, और फिर उन्होंने तुरंत रुपाली का ऊपर वाला कपड़ा उतार दिया। नीचे का स्कर्ट भी खोल दिया। और पैंटी निकाल दी।
अब रुपाली पीछे की सीट पर पूरी नंगी लेटी थी — और फूफा जी उसके ऊपर झुके हुए।
उन्होंने उसकी चूत को छूना शुरू किया।
पहले बालों के ऊपर हाथ फेरा, फिर नीचे उँगली सरकाई। जैसे ही उँगली छेद पर लगी, रुपाली की साँस अटक गई।
“दर्द हो रहा है?” फूफा जी ने पूछा।
“हल्का सा,” वो बोली। “पर रुकना नहीं।”
फिर उन्होंने उसके निपल्स को दाँतों से काटना शुरू किया — हल्के से। होंठ चूसे, जीभ चूसी, और नीचे उँगली हौले-हौले अंदर-बाहर करने लगे।
रुपाली पसीने-पसीने हो गई। उसने पहली बार कोई मर्द के साथ अपना जिस्म सौंपा था। अच्छा लग रहा था, पर डर भी — कि कहीं बहुत दर्द न हो जाए।
उन्होंने उसकी दोनों बगलें चाटीं। उसके हाथ ऊपर कर दिए। कान के छोटे-छोटे बाल जीभ से चाटे। हर जगह।
फिर उन्होंने अपनी जींस खोली और लंड निकाला। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2
रुपाली ने पहली बार किसी मर्द का लंड इतने करीब से देखा। मोटा, गहरे रंग का, खड़ा हुआ। उसने आँखें बड़ी कर लीं।
फूफा जी ने लंड उसकी चूत पर रगड़ा। जैसे ही टोपा छेद पर लगा, रुपाली के रोम-रोम खड़े हो गए। उसके होंठ सूखने लगे, गला सूखने लगा।
“तुम बहुत हॉट हो रूपाली,” उन्होंने कहा। “बहुत सेक्सी।”
“आप मेला देखने क्यों नहीं गए?” वो बोली।
“तुम क्यों नहीं गई?”
दोनों हँस पड़े। दोनों ही बहाना बना रहे थे — साथ रहने का।
फिर उन्होंने लंड छेद पर लगाया और हौले-हौले घुसाने लगे।
दर्द हुआ। बहुत हुआ। रुपाली कराहने लगी।
उन्होंने लंड पर थूक लगाया, और फिर एक ज़ोर का धक्का दिया।
आधा लंड अंदर चला गया — और चूत फट गई। खून की पतली लकीर निकल आई। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार -2
रुपाली के आँखों से पानी आ गया। “आह… फूफा जी…”
“हो गया बेटा,” वो धीरे से बोले। “हो गया। अब रुक नहीं।”
उन्होंने हौले-हौले अंदर-बाहर करना शुरू किया। पहले पाँच मिनट दर्द, फिर…
फिर रुपाली को अच्छा लगने लगा।
और पाँच मिनट के अंदर — ऐसा लगा कि उसकी कामवासना जाग गई। वो गांड घुमा-घुमाकर उनके लंड को अंदर लेने लगी। आप विश्वास नहीं करोगे, पर वो खुद नीचे से धक्के देने लगी।
फूफा जी दोनों हाथों से उसकी चूचियाँ मसलते हुए, होंठ चूसते हुए, उसकी चूत में लंड घुसाने लगे।
रुपाली को लगा जैसे वो वहाँ है ही नहीं। कोई दूसरी दुनिया। उसके अंदर एक अजीब-सी हरकत हो रही थी, पूरे शरीर में कुछ ऐसा जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया।
फूफा जी का पूरा लंड अंदर-बाहर, अंदर-बाहर, अंदर-बाहर।
इतने ज़ोर के धक्के कि गाड़ी हिलने लगी। पर फॉर्च्यूनर में दम था — बाहर पता ही नहीं चल रहा था। छोटी गाड़ी होती तो लोग समझ जाते कि अंदर क्या हो रहा है।
“तुम्हारी ये नई ड्रेस तो मुझे पागल कर गई,” फूफा जी हाँफते हुए बोले। “सुबह से तुम हॉट लग रही थी। क्या बताऊँ, ऐसा लग रहा था कि तेरे मम्मी-पापा के सामने ही तुझे चोद दूँ। पर यही बहाना सही लगा — कार में तुम्हें आज जो दूँगा, और वो लोग मेला देखेंगे।”
और उन्होंने और ज़ोर-ज़ोर से धक्के देने शुरू कर दिए।
रुपाली को भी जोश आ गया। वो उन्हें चूमने लगी, अपने नाखून उनकी पीठ में गड़ाने लगी।
तेज़-तेज़ धक्के। अंदर-बाहर। घुसाना, घुमाना।
और दोनों एक साथ झड़ गए।
उन्होंने तुरंत लंड बाहर निकाल लिया — क्योंकि कोई प्रोटेक्शन इस्तेमाल नहीं किया था, और वो रिस्क नहीं लेना चाहते थे। फिर अपने रुमाल से रुपाली की चूत साफ़ की, अपना लंड साफ़ किया।
रुपाली जल्दी-जल्दी कपड़े पहनने लगी। फिर आगे की सीट पर आकर बैठ गई, सीट पीछे खिसकाकर लेट गई।
उन्होंने गाड़ी चलाई तो उसे आराम लगने लगा।
पर उसकी कमर में, चूत में, और चूचियों में भयंकर दर्द था। मुँह सूख गया था। ऐसा लग रहा था कि उसके साथ कुछ बहुत बड़ा हो गया है।
“फूफा जी,” उसने कहा, “कभी किसी से ये बात कहना नहीं।”
“तुम मुझे पागल समझी हो क्या?” वो हँसे। “तुमसे ज़्यादा मेरी इज़्ज़त खराब होगी। इसलिए हम दोनों चुप रहेंगे।”
फिर उन्होंने उसे गले लगाया, होंठों पर चुम्मा दिया, और दोनों सीटें खोलकर आराम से लेट गए। मोबाइल पर गाने चलने लगे।
आधे घंटे बाद मम्मी-पापा आ गए।
मौसी ने रुपाली का चेहरा देखा और बोलीं, “मुँह कितना उतर गया है तेरा! तबीयत ठीक है कि नहीं?”
“अब आराम लग रहा है,” रुपाली बोली। “अब कोई दिक़्क़त नहीं।”
उन लोगों को क्या पता था कि उसकी सील टूट गई है। पूरे शरीर में दर्द है। पहली चुदाई क्या होती है — ये उसे आज पता चला था।
अध्याय 13 — वापसी, और मेरी बेचैनी
रात ग्यारह बजे हम घर लौटे।
मैंने वीर से मिलने के बाद जो हुआ था, वो किसी को नहीं बताया। पर जब गाड़ी से उतरा तो रुपाली की तरफ़ देखा — और उसके चेहरे पर वो शांत, भीतर तक तृप्त भाव देखकर मुझे लगा कि इस लड़की के साथ भी आज कुछ हुआ है।
और फूफा जी?
फूफा जी गाड़ी से उतरते वक़्त अपना बेल्ट ठीक कर रहे थे, और उनकी टी-शर्ट के नीचे की जींस पर एक हल्का सा गीला धब्बा था।
मैं मुस्कुराया। दोनों की तरफ़ देखा। कोई कुछ नहीं बोला। और यही इस देसी परिवार की सबसे बड़ी खूबी है — सब जानते हैं, कोई नहीं बोलता।
रात को खाना खाया। मौसी दशहरे की बातें करती रहीं, मामा ने रावण दहन का हाल सुनाया, और रुपाली चुपचाप खा रही थी। बस फूफा जी ने उसे एक बार देखा, और वो शरमाकर नज़र नीची कर ली।
मैं छत पर आया।
चाँद पूरा था। नीचे गली में एक कुत्ता भौंक रहा था और कहीं दूर किसी रेडियो पर पुराना गाना बज रहा था। मैंने जेब से मोबाइल निकाला और वीर का नंबर खोला।
टाइप किया, मिटाया। फिर टाइप किया:
“घर पहुँच गए?”
जवाब दो मिनट में आया।
“हाँ। अभी नहाया। तू?”
“छत पर हूँ।”
फिर तीन डॉट्स आए। फिर:
“कल सुबह अखाड़े आ जा। पाँच बजे। और हाँ — अंडरवियर पहनकर आ।”
मैं हँसा। फिर सोचा — अंडरवियर पहनकर आने का क्या मतलब? क्या वो अंदर तक जाने की बात कर रहा था?
मैं पूरी रात करवटें बदलता रहा।
भाग ३ — अगला दिन
अध्याय 14 — अखाड़े में सुबह
अगली सुबह साढ़े चार बजे उठा।
बाहर अंधेरा था। मौसी सो रही थी। मैं चुपचाप निकला, ट्रैक पैंट और एक टी-शर्ट पहनी, और पैदल अखाड़े की तरफ़ चल दिया। रास्ते में ठंडी हवा में गन्ने की महक थी और पैरों के नीचे कच्ची मिट्टी।
अखाड़े पहुँचा तो पाँच बज रहे थे।
वो वहीं था।
लंगोट में, मिट्टी में, दौड़ता हुआ। जब मुझे देखा तो रुका, और उसका पूरा चेहरा खुल गया।
“आ गया तू,” उसने कहा। “साला, अंडरवियर पहना है न?”
“पहना है,” मैंने कहा। “पर पहनकर क्यों आना था, ये अब बताओ।”
वो पास आया। पसीने से भीगा हुआ। मिट्टी उसके गोरे जिस्म पर लगी हुई। और वो महक — उस महक ने मुझे पिछली रात वाली खंडहर में वापस खींच लिया।
“क्योंकि,” वो मेरे कान में बोला, “आज तेरी चूत लूँगा। और अगर तेरे अंदर पैंट नहीं होगी, तो मिट्टी में ही लग जाएगी।”
मेरा दिमाग़ घूम गया।
“आज? यहीं?”
“यहीं क्या होगा,” वो हँसा। “उस्ताद आठ बजे आता है। तब तक ये अखाड़ा मेरा है।”
तो यही बात थी। वो चार बजे से यहाँ है, इसलिए सुबह उसकी अपनी है। और उसने मुझे बुलाया था।
हम अखाड़े के पीछे वाले हिस्से में गए, जहाँ दीवार और पेड़ के बीच छाया थी और बाहर से कोई नहीं दिखता। वहाँ मिट्टी सूखी और नरम थी, और उसने अपनी पहनी हुई मोटी चादर बिछा दी।
फिर वो सीधा मेरे पास आया, और मुझे बिना कुछ बोले चूम लिया।
पहली बार होंठों पर। पिछली रात सिर्फ़ मुँह और लंड का काम था। आज होंठ।
उसका चुंबन भारी था — दाँत, जीभ, और मूँछ के बाल। मूँछ की खुजली मेरे होंठों पर लग रही थी और वो भी मज़ा दे रही थी।
वो मुझे लिटा दिया। फिर ऊपर से आया।
“सुन,” उसने कहा। “मैंने आज तक लड़कों के साथ नहीं किया। तो तू बता, क्या करना है। पर बीच में मुझे मत रोकना।”
“तू कर,” मैंने कहा। “जो करना है कर। और अगर दर्द हो तो रुक जाना।”
वो हँसा। “दर्द? मैं दर्द से डरता हूँ?”
फिर उसने मेरी टी-शर्ट उतारी, ट्रैक पैंट खींची, और मुझे पूरा नंगा कर दिया।
और फिर वो मुझे देखने लगा। ऐसे, जैसे पहली बार किसी आदमी का जिस्म देख रहा हो। उसकी नज़र मेरे सीने पर, पेट पर, और फिर नीचे आई।
“तेरा भी बड़ा है यार,” उसने कहा।
“तेरे सामने क्या है,” मैंने कहा।
“हाँ, तेरे सामने तो मैं ही बड़ा हूँ।” और वो फिर हँसा, और उस हँसी में एक अजीब सी मर्दाना मिठास थी।
फिर वो नीचे झुका और उसने मेरा लंड मुँह में लिया।
पहली बार। बाईस साल का लौंडा, पहलवान, जिसने आज तक किसी लड़के को नहीं छुआ — और अब वो मेरा लंड चूस रहा था।
उसका चूसना अनाड़ी था। दाँत लगते थे, थूक ज़्यादा बहता था, लय नहीं थी। पर उसमें एक जोश था — जोश और हवस और जल्दी। जैसे वो एक ही बार में सब कर लेना चाहता हो।
उसने मेरा लंड इतना चूसा कि मैं आहें भरने लगा।
फिर वो ऊपर आया, मेरी टाँगें फैलाईं, और नीचे झुका।
“ये क्या करेगा?” उसने पूछा, उँगली लगाते हुए।
“लार लगा,” मैंने कहा। “और उँगली अंदर डाल।”
उसने अपनी उँगली थूक से भिगोई और अंदर डाली। पहले एक, फिर दो।
पहले अजीब लगा, फिर अच्छा। उसकी उँगलियाँ मोटी थीं और मेहनत वाली। जब वो अंदर-बाहर करता, तो मेरे पेट में एक गुदगुदी दौड़ती।
“और तेला?” वो बोला। “ये भी अंदर जाएगा?”
“हाँ। और धीरे-धीरे। और ऊपर से लार ज़्यादा लगा।”
वो उठा, अपना लंगोट खोला, और उसका लंड बाहर आ गया।
सुबह की ठंडी हवा में वो और भी भारी लग रहा था। गोरा, मोटा, सीधा, टोपा चमकदार।
उसने उस पर थूक लगाया, हाथ से फैलाया, और फिर मेरे ऊपर आ गया।
मेरी टाँगें उसने अपनी बाजुओं पर उठाईं। और फिर टोपा छेद पर लगाया।
दबाव। भारी दबाव।
फिर एक हल्का धक्का।
टोपा अंदर चला गया।
मैंने होंठ भींच लिए। वो रुक गया। “दर्द?”
“हल्का।” “जारी रख।”
उसने धक्का दिया। थोड़ा और। फिर थोड़ा और। धीरे-धीरे, हर बार थोड़ा सा। मेरे हाथ उसकी बाजुओं पर थे और मैं उसकी बाजुओं को कसकर पकड़े हुए था।
फिर एक बार ऐसा हुआ जब अचानक सब कुछ ढीला पड़ गया और वो पूरा अंदर चला गया।
मैंने एक लंबी साँस छोड़ी।
“हो गया,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में जीत थी।
“हो गया,” मैंने कहा। “अब धीरे-धीरे।”
और फिर वो चलने लगा।
अध्याय 15 — मिट्टी में
शुरू में हर धक्का अलग लगता था। भारी। भरा हुआ। जैसे कोई चीज़ अंदर तक चल रही हो।
फिर धीरे-धीरे शरीर ने हार मान ली और अंदर फैलने लगा। दर्द गुज़र गया और उसकी जगह एक अजीब, गहरी, भरी हुई खुशी आ गई।
वो मेरे ऊपर झुका था, बाजुओं पर पूरा वज़न, और उसकी पसीने से भीगी छाती मेरी छाती पर रगड़ रही थी। उसकी मूँछ मेरी गर्दन पर, उसकी साँस मेरे कान पर, और नीचे वो लय — धीमी, गहरी, पक्की।
“ठीक है?” उसने फुसफुसाया।
“और तेज़ कर।”
उसने गति बढ़ाई।
और फिर वो हुआ जो हमेशा होता है — जब आदमी को लगता है कि उसका शरीर उसका नहीं रहा। मेरी आँखें बंद हो गईं और हर धक्के के साथ मेरे अंदर से आवाज़ निकलने लगी।
वो भी आवाज़ करने लगा। “आह… आह जान… आह…”
उसका पसीना मेरे ऊपर टपक रहा था। मिट्टी के कण उसकी बाजू से मेरी छाती पर लग रहे थे। और वो महक — पसीना, मिट्टी, और जवानी।
मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर फेरे, उसके गड्ढों में उँगलियाँ डालीं, और उसकी गांड पर हाथ रखा। जो मिला, वो कसा हुआ और गोल था। मैंने उसे दबाया।
वो कराहा और उसकी लय और तेज़ हो गई।
अब वो मुझे पूरी ताक़त से चोद रहा था। मिट्टी वाली चादर सरक गई थी और मेरी पीठ ज़मीन से रगड़ खा रही थी। मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ा।
फिर उसने मेरी टाँगें ऊपर उठाईं, अपने कंधों पर रखीं, और उस पोज़िशन में झुककर चोदने लगा।
इस पोज़िशन में वो और गहरा जाता था। हर धक्का मेरी नाभि तक लगता था। मेरी आँखों से पानी आ गया — खुशी का।
“आह… वीर… रुक मत…”
“रुकूँगा नहीं,” वो हाँफा। “आज तेरी चूत फाड़ दूँगा।”
और उसने फिर तेज़ किया।
उसकी गेंदें हर धक्के में मेरे नीचे टकरातीं। उसकी छाती झुककर मेरे होंठों के पास आ जाती और मैं उसे चूम लेता। उसके निपल मेरे मुँह में। उसका पसीना मेरी जीभ पर।
मैं उस पल में वहीं मर जाना चाहता था।
फिर वो तेज़ हुआ — बहुत तेज़। उसकी साँस टूटने लगी। उसकी आवाज़ काँपने लगी।
“निकालूँ?” उसने पूछा।
“अंदर,” मैंने कहा।
“पक्का?”
“अंदर निकाल।”
और वो चिल्लाया — एक लंबी, भारी, मर्दाना चीख — और मेरे अंदर झड़ गया।
मुझे सब महसूस हुआ। हर झटका। हर धार। वो गर्मी जो अंदर भर गई।
वो मेरे ऊपर गिर पड़ा। भारी, पसीने से भीगा, हाँफता हुआ।
हम दोनों कुछ देर वैसे ही लेटे रहे। मिट्टी में। उसका पूरा वज़न मुझ पर। और मुझे वो वज़न अच्छा लग रहा था।
फिर वो उठा, बाहर निकला, और नीचे देखकर हँसा।
“साला, तेरी गांड से मेरा माल निकल रहा है।”
“और तेरा लंड लटक रहा है,” मैंने कहा।
दोनों हँस पड़े।
वो उठा, अखाड़े के कुएँ से पानी लाया, और अपनी चादर से हम दोनों को साफ़ किया। फिर अपनी लंगोट बाँधी और मुझे अपने साथ खींचकर कुएँ के पास ले गया।
वहाँ उसने मेरे सिर पर पानी डाला। ठंडा पानी। मैं काँप गया और वो हँसा।
“कल फिर आएगा?” उसने पूछा।
“कल भी?”
“रोज़ आ,” उसने कहा। “उस्ताद आठ बजे आता है। सात तक का टाइम मेरा है। और तू मेरा मेहमान है।”
और फिर उसने मेरी कलाई पकड़कर मुझे खींचा और मेरे होंठों पर एक कसा हुआ चुम्मा दिया — वो चुम्मा जिसमें कोई हड़बड़ी नहीं थी, बस अधिकार था।
अध्याय 16 — गन्ने का खेत
उस दिन दोपहर बाद रुपाली ने कहा, “भैया, चलो गन्ने के खेत में।”
“क्यों?”
“बस।”
हम निकले। दो किलोमीटर पैदल। गन्ने के खेत आते ही हवा ठंडी हो जाती है और शोर बंद हो जाता है। बीच में पगडंडी है, दोनों तरफ़ ऊँची-ऊँची गन्ने की क्यारियाँ।
रुपाली चलते-चलते बोली, “भैया, एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“आप मेला देखने गए थे ना?”
“हाँ।”
“तो वो…” वो रुकी। फिर बोली, “वो जो अखाड़े वाला लौंडा है ना, वीर। आप उसके साथ थे?”
मैं ठिठक गया। “कैसे पता?”
वो हँसी। “क्योंकि मैंने देखा। रावण जलते वक़्त आप उसके पास खड़े थे और बात कर रहे थे। और वो आपको ऐसे देख रहा था जैसे… पता नहीं।”
“जैसे क्या?”
“जैसे गाय अपनी बछिया को देखती है,” वो बोली, और दोनों हँस पड़े।
फिर वो गंभीर हो गई। “भैया, आप बताओ ना। मुझे किसी से बात करनी है।”
तो मैंने बताया। नाम लिए बिना, सब बताया। मेला, भीड़, खंडहर, अखाड़ा।
वो सुनती रही, आँखें बड़ी किए हुए।
“यानी आपका भी…” वो झिझकी।
“हाँ।”
“और मेरा भी,” उसने कहा, और फिर हाथ से मुँह ढककर हँसने लगी।
“कब?” मैंने पूछा।
“उसी शाम। कार में।”
“फूफा जी?”
वो सिर हिलाया। और दोनों एक साथ हँस पड़े — ऐसे हँसे जैसे साल भर का बोझ उतर गया हो।
फिर वो पगडंडी के किनारे बैठ गई और बोली, “भैया, और बताओ। दर्द होता है क्या?”
“होता है,” मैंने कहा। “पर उतना नहीं जितना डर होता है।”
“मुझे बहुत हुआ था,” वो बोली। “खून भी निकला। पर फिर अच्छा लगने लगा। और अब…” वो रुकी।
“अब?”
“अब फिर करने का मन कर रहा है,” उसने कहा, और अपनी गोदी में रखे हुए गन्ने के टुकड़े को नोचने लगी। “और वो मेले में आज तक घर वालों से बात नहीं कर रहे। बस देखते हैं। और मैं पागल हो रही हूँ।”
“तो उन्हें बुला ले,” मैंने कहा।
“कहती हूँ क्या?”
“आज शाम को कह दे कि मेरा मोबाइल खराब है, कुछ फ़ाइल भेजनी है। तू उनके कमरे में जाएगी। और बाक़ी वो सम्भालेंगे।”
वो मेरी तरफ़ देखकर हँसी। “आप बहुत चालाक हो भैया।”
“अनुभव है,” मैंने कहा।
और उसी रात, जब मैं छत पर लेटा था, मुझे नीचे से आहट आई — किसी दरवाज़े के बंद होने की, और फिर किसी बेड की चरमराहट की।
मैं मुस्कुराया और छत पर तारों को देखता रहा।
अध्याय 17 — तीन
दशहरे के तीसरे दिन सूरज आया।
सूरज यादव। पच्चीस साल का। ट्रक ड्राइवर का बेटा। दिखने में वीर जैसा नहीं — न गोरा, न साफ़-सुथरा। रंग साँवला, बदन चौड़ा, छाती पर बाल, और हाथ में एक टैटू जो बस आधा बना हुआ छूट गया था। आवाज़ भारी, बोली गँवार, और हँसी ऐसी जैसे किसी खेत से आ रही हो।
वो अखाड़े में आया था उस दिन — किसी काम से, किसी दोस्त से मिलने। और वीर ने उसे देखकर ही हाथ उठाकर बुला लिया।
“सूरज, इधर आ।”
वो आया। मुझे देखा। ऊपर से नीचे तक देखा। फिर वीर से बोला, “ये कौन?”
“मेरा… दोस्त,” वीर ने कहा, और उस “दोस्त” पर हल्का ज़ोर दिया।
सूरज ने मुझे देखा और मुस्कुराया। वो मुस्कान जिसमें सब पता होता है।
“अच्छा,” वो बोला। और फिर मुझसे, “शहर से आया है?”
“हाँ।”
“तो तेरे जैसे शहरी हमारे यहाँ क्यों आते हैं, ये अब समझ आया।” और वो ज़ोर से हँसा।
वीर शरमा गया। ये नया था — वीर का शरमाना।
उस दोपहर हम तीनों नदी घाट गए। वहाँ कोई नहीं था — दशहरे की वजह से सब मेले में थे। घाट पर सिर्फ़ पानी, पत्थर, और पेड़ की छाया।
सूरज ने पहले नहाया। और नहाते वक़्त वो बेशर्म था — पैंट उतारकर कच्छे में उतर गया, और उसका बदन देखकर मैं चुप हो गया। चौड़ी छाती, भरे हुए सीने, और नीचे भारी लटकता लंड जो सोया हुआ भी मोटा था।
वीर ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। “क्या हुआ?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा।
“साले, झूठ मत बोल। तेरी आँखें बोल रही हैं।”
फिर वो उठा, सूरज के पास गया, और उससे कुछ फुसफुसाया। सूरज हँसा और उसने मेरी तरफ़ देखा।
“ये कह रहा है कि तू आज दोनों से लेगा,” सूरज ने कहा।
“दोनों से?”
“हाँ।” सूरज पानी से निकला। “एक तो मेरे सामने ही तेरा सत्यानाश करेगा, और फिर मैं देखूँगा कि तेरी औक़ात कितनी है।”
वो घाट के पत्थर पर आया, वीर भी। और फिर वही हुआ जो सूरज ने कहा था।
वीर ने मुझे पत्थर पर लिटाया और पहले जैसे ही चोदा — पर इस बार सूरज सामने बैठा था, और देख रहा था। उसकी नज़र मेरे चेहरे पर थी, फिर नीचे जहाँ वीर का लंड अंदर-बाहर हो रहा था।
“साला,” सूरज बोला। “अच्छा चोदता है बे।”
वीर हँसा और तेज़ किया।
जब वीर झड़ा, तो सूरज उठा। उसने अपना कच्छा खोला और उसका लंड बाहर आया — मोटा, गहरा, और बेहद भारी। वो वीर से छोटा था पर मोटाई में ज़्यादा।
“अब मेरी बारी,” वो बोला।
उसने मुझे घुमाया, और इस बार मुझे चारों तरफ़ से घुटनों और हथेलियों पर लाया।
“अब तू देख,” वीर ने कहा।
सूरज ने मेरी गांड पर थूक लगाया और अपना लंड छेद पर रखा।
वो मोटा था — वीर से भी मोटा। और जब अंदर गया तो लगा कि पूरा फट जाएगा।
“आह!” मैं चिल्लाया।
“हो गया हो गया,” सूरज ने कहा, और बिना रुके चोदने लगा।
उसका तरीका अलग था — वो वीर जैसा प्यार से नहीं, बल्कि बेसब्री से चोदता था। तेज़, झटके वाले, गहरे। और उसकी पकड़ मेरी कमर पर थी, इतनी मज़बूत कि निकलने का सवाल ही नहीं।
वीर सामने आया, और उसने मेरा लंड हाथ में लिया, और फिर मेरे होंठों को चूमने लगा। मेरे मुँह में उसकी जीभ थी, मेरी गांड में सूरज का लंड, और मेरे लंड पर वीर का हाथ।
मैं तीन जगह से भरा हुआ था।
और फिर — फिर मैं खुद झड़ गया। वीर के हाथ में। बिना छुए।
वीर हँसा। “साला, ये तो जल्दी निकल गया।”
“तेरी वजह से,” मैंने हाँफते हुए कहा।
और सूरज पीछे से चोदता रहा, और आख़िर में उसने भी अंदर ही निकाला, बड़ी एक चीख के साथ।
फिर तीनों नदी में उतरे। ठंडा पानी। हमने एक-दूसरे पर पानी उछाला, हँसे, और वीर ने सूरज की गर्दन पकड़कर उसे पानी में डुबो दिया।
घाट पर बैठे-बैठे सूरज ने सिगरेट जलाई और मुझे भी दी। मैंने खींचा। धुआँ आसमान में गया।
“कल तू चला जाएगा?” उसने पूछा।
“परसों।”
“फिर आना,” उसने कहा। और फिर वीर की तरफ़ देखकर बोला, “और इस साले को भी लाना। साला इसने मुझे तुझसे पहले पकड़ लिया, वरना…”
वो हँसा और हँसी में एक हल्की सी जलन थी।
अध्याय 18 — विदा
आख़िरी दिन।
मौसी ने सुबह-सुबह पूड़ी-सब्ज़ी बनाई और बोली, “अब कब आएगा?”
“अगले साल दशहरे पर,” मैंने कहा।
“बहुत दूर है,” वो बोलीं।
“आता रहूँगा।”
रुपाली चुप थी। उसने सुबह मेरा बैग पैक कर दिया था और उसमें चुपचाप एक नई शर्ट रख दी थी।
“ये क्यों?” मैंने पूछा।
“आप पहन लो,” वो बोली। “और फिर अगली बार आओ तो वही पहनकर आना।”
फूफा जी ने मुझे स्टेशन तक छोड़ा। रास्ते में वो चुप थे। फिर अचानक बोले, “आदि।”
“जी।”
“तुम भी जानते हो न, रुपाली और…”
“जानता हूँ,” मैंने कहा।
वो रुके। फिर मुस्कुराकर बोले, “अच्छा है। अच्छा है कि तुम जानते हो।”
फिर बोले, “आदि, एक बात। शहर में लोग लड़कों-लड़कियों को लेकर बहुत बोलते हैं। पर गाँव में… गाँव में लोग बोलते ही नहीं। वो बस करते हैं और चुप रहते हैं। और यही सबसे बड़ा सुख है।”
“जी फूफा जी,” मैंने कहा।
“और,” उन्होंने गाड़ी रोकी, “तुम्हारा वो अखाड़े वाला लौंडा। अच्छा है।”
मैं चौंका। “आपको कैसे?”
“साले, गाँव में कुछ छिपता है क्या?” वो हँसे और मेरे कंधे पर हाथ रखा। “और वो रोहित बदनाम है, बता देता हूँ। पिछले पाँच साल से हर दशहरे पर अकेला रह जाता है मेला देखने।”
हम दोनों हँसे।
स्टेशन पर उतरते वक़्त मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मेरा सिर सहलाया और बोले, “आते रहना।”
गाड़ी चली गई।
ट्रेन में बैठकर मैंने मोबाइल निकाला। वीर के तीन मैसेज थे।
“चला गया?”
“साले, बताएगा भी नहीं?”
“और अगली बार आएगा तो बता देना। मैं अखाड़े में ही रहूँगा। उस्ताद को भी पता है अब।”
फिर चौथा मैसेज आया, जो शायद उसने लिखकर भेज दिया और फिर पछताया होगा:
“और सुन, तेरी गांड की याद आ रही है। साला।”
मैंने मोबाइल सीने पर रख लिया और खिड़की से बाहर देखने लगा। खेत, खंभे, गन्ने, और दूर कहीं कोई गाँव। सब पीछे छूट रहा था।
पर सब कुछ पीछे नहीं छूटा था।
महीने भर तक वो महक आती रही। पसीने और मिट्टी और जवानी की महक। और जब भी कोई जवान लौंडा सड़क पर काली शर्ट में निकलता, मेरा दिल एक बार ज़रूर धक्क से रह जाता।
अध्याय 19 — अगला दशहरा
साल बाद।
इस बार मैंने मौसी को फ़ोन नहीं किया। सीधे वीर को किया।
“आ रहा हूँ,” मैंने कहा।
“कब?”
“परसों।”
उधर से दो सेकंड का सन्नाटा। फिर उसकी आवाज़ आई, और उसमें वो ही भारीपन था:
“अखाड़े आ जा। सुबह पाँच बजे। और सुन — इस बार उस्ताद को भी बता दिया है। उस्ताद बोला कि शहर वाले को लेकर आ, मैं भी देखूँ कि कैसा है।”
मैं हँसा। “और सूरज?”
“सूरज का ट्रक अब दिल्ली चलाता है। पर दशहरे पर आएगा। कह रहा था कि इस बार वो पहले चोदेगा।”
“और तू?”
“मैं तो हर बार की तरह आख़िर में चोदूँगा। जब तू निढाल हो जाएगा, तब।”
मैंने फ़ोन रखा और देर तक मुस्कुराता रहा।
इस बार जो पैकिंग की, उसमें एक चीज़ ज़रूर थी — वो शर्ट जो रुपाली ने दी थी।
अध्याय 20 — और फिर वही मेला
परसों मैं उतरा, बरौंदा।
गली में वही कुत्ता भौंक रहा था। मौसी का बरामदा वैसा ही। रुपाली खंभे से टिकी खड़ी थी — पहले से और सुंदर, और इस बार उसके चेहरे पर वो शांति थी जो उसे पिछले साल मिली थी।
“भैया!” वो दौड़ी और गले लग गई।
मैंने उसकी शर्ट पहनी थी। वो देखकर मुस्कुराई और बोली, “आपने पहन ली।”
“तूने कहा था न।”
फूफा जी बरामदे में बैठे थे, चाय पीते हुए। उन्होंने मुझे देखा, नज़र ऊपर-नीचे दौड़ाई, और बोले, “आ गया।”
“जी।”
“अखाड़े जाएगा ना?” उन्होंने चाय का कप रखते हुए कहा, और उनकी मूँछ के नीचे एक छोटी सी मुस्कान थी।
“जी।”
“ठीक है।” फिर उन्होंने रुपाली की तरफ़ देखा। “और तू?”
रुपाली ने कंधे उचकाए और बोली, “मैं तो कार में रहूँगी। तबीयत ठीक नहीं लग रही।”
तीनों हँसे।
उस रात मेला था।
भीड़ वैसी ही, भीड़ ऐसी ही। रामलीला, ढोल, और मिट्टी की चबूतरी पर खड़ा रावण। और उस मेले में, काली शर्ट और नीली जींस में, किसी ऊँची जगह पर खड़ा था वीर सिंह।
उसने भी मुझे देख लिया था। दूर से। भीड़ में।
और उसकी नज़र कह रही थी — “इस बार भागेगा नहीं।”
मैंने रुपाली की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया, जैसे कह रही हो — “जाओ। मैं सम्भाल लूँगी।”
और मैं भीड़ में उसकी तरफ़ चल पड़ा।
पीछे से फूफा जी ने रुपाली से कहा, “तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है ना?”
“नहीं, ठीक नहीं है,” रुपाली बोली।
“तो गाड़ी में चलो। आराम करो।”
“जी,” वो बोली, और दोनों मुड़कर उस सफ़ेद फॉर्च्यूनर की तरफ़ चल दिए, जो पेड़ के नीचे, झाड़ियों के सहारे, खिड़कियों पर काली फ़िल्म चढ़ाए खड़ी थी।
और भीड़ के उस पार, मिट्टी की चबूतरी के नीचे, वीर ने अपनी काली शर्ट के बटन ऊपर से खोल दिए थे — बस दो — और उसकी गोरी छाती, रावण की आग की रोशनी में, चमक रही थी।
मैं उसके पास पहुँचा। और इस बार बिना किसी बहाने के, बिना किसी धक्के के, मैंने सीधे उसका हाथ पकड़ लिया।
उसने मुड़कर देखा। वही गड्ढों वाली मुस्कान।
“आ गया,” उसने कहा।
“आ गया,” मैंने कहा।
“खंडहर चलें?”
“खंडहर में कौन रुकता है,” मैंने कहा। “आज अखाड़ा चलें।”
वो हँसा। ज़ोर से। इतना ज़ोर से कि पास खड़े दो लौंडों ने मुड़कर देखा।
“अखाड़ा तो सुबह है,” उसने कहा।
“तो सुबह तक खंडहर,” मैंने कहा।
“फिर सुबह अखाड़ा। और शाम को सूरज आएगा। और रात को नदी घाट।”
“और परसों?”
“परसों,” उसने मेरी कलाई पकड़ी और भीड़ में खींच लिया, “परसों दशहरा है। रावण जलेगा। और हम फिर यहीं खड़े होंगे। जैसे पिछले साल।”
और उसने मेरी कलाई नहीं छोड़ी। पूरे मेले में नहीं छोड़ी।
भीड़ में लोग हमें देखते रहे। कोई कुछ नहीं बोला। क्योंकि ये बरौंदा है — यहाँ लोग बोलते नहीं, बस करते हैं और चुप रहते हैं। और यही सबसे बड़ा सुख है।
रावण जला।
आग लगी, ढोल बजे, हजारों आवाज़ें एक साथ “जय श्री राम” बोलीं, और पूरा मैदान सुनहरा हो गया।
और उस सुनहरी रोशनी में, भीड़ के बीच, एक काली शर्ट वाले लौंडे ने मेरी कलाई पकड़ रखी थी — और पीछे कहीं, उसी मेला मैदान के कोने में, झाड़ियों के सहारे, एक सफ़ेद फॉर्च्यूनर धीरे-धीरे हिल रही थी।