बरौंदा। नाम सुनते ही जो तस्वीर बनती है, वह किसी पुराने पोस्टकार्ड जैसी है — पक्की सड़क के दोनों तरफ़ गन्ना, बीच में लटकती सरकारी बस, और बस से उतरते ही पैरों में चिपकने लगती है मिट्टी की वह गंध जिसे शहर में रहने वाला आदमी धीरे-धीरे भूल जाता है। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मैं तीन साल बाद आया था। मौसी का फ़ोन आया था — “आदि, इस बार दशहरे पर ज़रूर आना। तेरे मामा की तबीयत ठीक नहीं रहती, और रुपाली भी तुझे बहुत याद करती है।”
रुपाली। मेरी मौसेरी बहन। इक्कीस साल की। पिछली बार मिला था तो स्कूल यूनिफ़ॉर्म में थी, और अब मौसी कह रही थी कि “शहरी हो गई है, कॉलेज में टॉप करती है।” मैं हँसा था।
मेरी उम्र अट्ठाईस है। शहर में एक कोचिंग में पढ़ाता हूँ। दिखने में न ज़्यादा गोरा, न काला — साधारण देसी चेहरा, थोड़ा सा कसा बदन, क्योंकि सुबह वर्कआउट छोड़ता नहीं। और एक बात जो मेरे बारे में कम लोग जानते हैं — मुझे लड़कियाँ पसंद हैं, और लड़के भी। जवान, तगड़े, पसीने की महक वाले देसी मर्द। ऐसा नहीं कि मैं इसे लेकर उलझन में रहा हूँ; शहर में रहकर आदमी इस बात से जल्दी सुलह कर लेता है। पर बरौंदा जैसे गाँव में यह सुलह अजीब हो जाती है — यहाँ हर गली में इतने तगड़े जवान लौंडे भरे पड़े हैं कि आपका ध्यान भटकना मजबूरी है।
बस से उतरते ही मैंने एक लंबी साँस ली। हवा में मिट्टी, गोबर, गन्ने का रस और कहीं दूर जलते उपलों का धुआँ घुला हुआ था। यही महक बचपन की थी।
मौसी का घर पुराना पक्का मकान है — बाहर बरामदा, अंदर आँगन, और आँगन के कोने में तुलसी का चौरा। मुझे देखते ही मौसी दौड़कर आई, गाल खींचे, सिर सहलाया और बोली, “सूख गया है साला शहर में। चल, हाथ-मुँह धो, ठंडा पानी रखा है।”
रुपाली बरामदे के खंभे से टिकी खड़ी थी।
पहली नज़र में मैं चौंक गया। सच में चौंक गया। जो लड़की दो साल पहले स्कूल बैग ढोती थी, वह अब किसी फ़िल्म के सीन से उतरी लग रही थी। लंबे बाल, हल्का सा मेकअप, और एक ऐसा टॉप जिसे देखकर आप पहले चेहरा देखते हैं, फिर टॉप, और फिर यही सोचते हैं कि ये माँ-बाप कहाँ जाते हैं जब बेटी ऐसे कपड़े पहनती है।
“भैया!” वो मुस्कुराई। “आ गए आप।”
“आ गया,” मैंने कहा। “बड़ी हो गई तू।”
“हूँ तो,” वो हँसी, और मुड़कर अंदर चली गई। उसके जाते हुए मैंने देखा कि बरामदे से लगी कुर्सी पर बैठे एक मर्द की नज़र भी उसी की तरफ़ थी। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
वो थे रोहित फूफा। रुपाली के फूफा — यानी उसके पिता के छोटे भाई। उम्र होगी अड़तीस-चालीस। महाराष्ट्र के पुणे में रहते हैं, किसी कंपनी में मैनेजर हैं। घर में सब उन्हें “फूफा जी” कहते थे, भले ही नाता असली फूफा का था। शरीर कसा हुआ, बाजुओं में उभार, ठुड्डी पर काली घनी दाढ़ी, और एक बड़ी मूँछ जिसे वो बार-बार अंगूठे-उँगली से घुमाते थे। उनका पहनावा भी गाँव के हिसाब से अलग था — टाइट ब्लैक टी-शर्ट, नीचे जींस, और हाथ में ऐसा घड़ी जो गाँव में सिर्फ़ बैंक मैनेजर के हाथ में दिखती है।
“आदि, आ जाओ बेटा,” उन्होंने उठकर हाथ बढ़ाया। हाथ मिलाते ही लगा कि पकड़ मज़बूत है, और उनकी बाँह से जो महक आई — वह सस्ती डियो नहीं, महँगी थी। “बहुत दिन हो गए।”
“जी फूफा जी।”
“दशहरा देखने जाएँगे आज?” उन्होंने पूछा।
“हाँ, मेला तो देखना है।”
“बहुत भीड़ रहती है,” मौसी बीच में बोलीं। “और साला तेरा मामा आज बुखार में लेटा है। मैं यहीं रहूँगी।”
“तो ठीक है,” फूफा जी ने मूँछ घुमाई। “गाड़ी है न। मैं ले जाऊँगा।”
मैंने कुर्सी की तरफ़ देखा। बरामदे से सटी सड़क पर खड़ी थी — सफ़ेद फॉर्च्यूनर। उसके शीशों पर काली फ़िल्म चढ़ी हुई थी, इतनी काली कि अंदर से बाहर दिखता हो, बाहर से अंदर कुछ नहीं।
उस पल मुझे नहीं पता था कि आज रात जो होने वाला है, उसमें यह सफ़ेद गाड़ी भी एक किरदार बन जाएगी।
रात को खाना खाते वक़्त मौसी ने बताया कि फूफा जी सुबह पाँच बजे उठकर दौड़ने जाते हैं और शाम को अखाड़े में कुश्ती देखने जाते हैं। “पुणे में जिम जाते हैं,” मौसी ने कहा, “इसलिए बदन ऐसा है।” दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
“गाँव में भी अखाड़ा है?” मैंने पूछा।
“है न,” रुपाली बोली, थाली से रोटी उठाते हुए। “उस्ताद गजेंद्र सिंह का। हर शाम जवान लौंडे वहाँ मिट्टी में लड़ते हैं। भैया, आपको ले चलूँ कल?”
“क्यों, तू भी जाती है?”
“जाती हूँ,” वो मुस्कुराई, और नज़र नीची करके बोली, “देखने में मज़ा आता है न।”
फूफा जी ने दाढ़ी में हँसी दबाई और मेरी तरफ़ देखा। हम दोनों की नज़र मिली। उस पल मैंने समझ लिया कि ये आदमी बेवकूफ़ नहीं है।
अध्याय 2 — अखाड़े की मिट्टी
अगली शाम हम अखाड़े गए।
बरौंदा का अखाड़ा गाँव के बाहर, तालाब के किनारे है। चारों तरफ़ मिट्टी की दीवार, बीच में चौकोर गड्ढा जिसमें पीली मुलायम मिट्टी डाली जाती है, और किनारे पर लगी एक टिमटिमाती ट्यूबलाइट। मंडे-मंगल में यहाँ कोई नहीं आता, पर शाम को जवान लौंडों की भीड़ लग जाती है। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
हम पहुँचे तो दंगल शुरू हो चुका था।
और मैंने पहली नज़र में उसे देखा।
मिट्टी में उतरा हुआ एक लौंडा। कमर पर लंगोट, बदन पर पसीना, और पीठ पर मिट्टी के लंबे-लंबे लकीर। मिट्टी उसके गोरे जिस्म पर किसी नक्शे की तरह चिपकी थी। उम्र लगभग बाईस। हाइट कोई पाँच फुट आठ। चेहरे पर हल्की दाढ़ी और मूँछ के बाल जो अभी पूरी तरह आए भी नहीं थे, पर थे ज़रूर। बाल बीच से पीछे की तरफ़ बँधे, साइड से बहुत छोटे — ऐसा स्टाइल जो गाँव में भी अब आ गया है और जो उसे बाक़ी लौंडों से अलग कर देता था।
उसके हाथ। हे भगवान, उसके हाथ। डोले ऐसे फूले हुए कि पहलवानी की सारी क़समें सच लगने लगीं। जब वो सामने वाले को पकड़कर उठाता, तो उसके बाइसेप्स अलग ही आकार ले लेते।
मैं चुपचाप दीवार के सहारे खड़ा हो गया। रुपाली भी पास ही खड़ी थी, आँखें उसी मिट्टी की तरफ़। पर वो लौंडा जिसके लिए वो तड़प रही थी, वो शायद कोई और था। और मैं जिसके लिए तड़प रहा था, वो वही था जिसे वो देख रही थी। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
“कौन है ये?” मैंने बेसुध होकर पूछा।
रुपाली ने देखा और हँस पड़ी। “वीर। वीर सिंह। उस्ताद का भाँजा। बी.ए. फ़ाइनल में है, पर असली चक्कर आर्मी का है। अभी भर्ती की तैयारी करता है। सुबह चार बजे दौड़ता है, फिर अखाड़े आता है। पगला है साला।”
वीर। नाम भी जिस्म जैसा।
कुश्ती खत्म हुई और वो मिट्टी झाड़कर कुएँ की तरफ़ चला। मैं उसकी चाल देखता रह गया — पैरों में वो हल्का अकड़लापन जो हर अखाड़े के लौंडे में आ जाता है, जैसे ज़मीन उसकी हो।
रुपाली मेरी कोहनी मारकर बोली, “क्यों भैया, पसंद आया?”
“अच्छा लौंडा है,” मैंने साधारण सा कहा।
“अच्छा?” वो हँसी। “आपकी आँखें तो अभी तक उसी की पीठ पर टिकी हैं।”
उस शाम उससे बात नहीं हुई। बस नज़र मिली। वो कुएँ से पानी डालकर नहाते वक़्त मुड़ा और उसकी नज़र सीधे दीवार की तरफ़ आई — जहाँ मैं खड़ा था। दो सेकंड रुकी। फिर हट गई। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
उस रात मैं बिस्तर पर लेटा छत देखता रहा। पंखा घूम रहा था, और मेरे दिमाग़ में बस वही दृश्य — पसीने से चमकता गोरा जिस्म, पीठ पर मिट्टी की लकीरें, और वो डोले।
दशहरा दो दिन बाद था। और मुझे लग रहा था कि इंतज़ार मुश्किल है।
अध्याय 3 — मंदिर, मन और रुपाली की नई ड्रेस
दशहरे का दिन आया।
सुबह मौसी ने सबको मंदिर भेज दिया। बरौंदा का मंदिर छोटा है, पर उस दिन वहाँ भी भीड़ थी। घंटियाँ बज रही थीं, पुजारी जी दुर्गा की आरती करा रहे थे, और बाहर प्रसाद की लाइन लगी थी। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मैंने भी माथा टेका। मन में कोई दुआ नहीं थी, बस एक तस्वीर थी — काली शर्ट, नीली जींस, और एक मुस्कान।
बाहर आकर रुपाली की नज़र उसी दुकान पर थी जहाँ चूड़ियाँ और चश्मे लटके थे। उसने मेरे पास आकर कहा, “भैया, आज मेला कितने बजे से है?”
“क्यों?”
“बस पूछ रही हूँ।” फिर वो थोड़ा झिझकी और बोली, “फूफा जी ने मेरे लिए एक ड्रेस लाई है। पहनूँ आज?”
“पहन ले।”
“मम्मी को पसंद नहीं आएगी।”
“तो?”
वो हँसी और दौड़कर घर की तरफ़ भाग गई।
उस दिन लंच के बाद मैंने फूफा जी को बरामदे में चाय पीते देखा। वो अपने मोबाइल पर कुछ देख रहे थे। मैं पास जाकर बैठा तो उन्होंने फ़ोन बंद कर दिया। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
“आज तुम मेले चलो,” उन्होंने कहा। “सब चल रहे हैं, तुम भी आ जाओ।”
“जी।”
“और हाँ,” उन्होंने चाय का कप रखते हुए कहा, “रुपाली को अकेला नहीं छोड़ना। मैंने उसके लिए एक कपड़ा लाया है, और उसमें… वो थोड़ी नज़र आती है। गाँव के लौंडे उसे घूरेंगे।”
“तो अच्छा ही है न,” मैंने कहा।
फूफा जी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मुस्कुराकर बोले, “हाँ। बहुत अच्छा है।”
शाम को रुपाली बाहर आई, और उस एक पल में बरामदा चुप हो गया।
उसने वही ड्रेस पहनी थी — ऊपर एक ब्लैक टॉप जिसका कट किसी स्पोर्ट्स ब्रा जैसा था, और वो ज़रूरत से थोड़ा टाइट था। दोनों तरफ़ से उसकी चूचियों का उभार साफ़ दिख रहा था, गोल और टाइट, किसी छोटे संतरे की तरह। नीचे डेनिम का छोटा स्कर्ट। कमर पर पतली थी और कूल्हे गोल — यानी वो कपड़ा जिसे देखकर माँ-बाप सिर पीटते हैं और बेटी मुस्कुराती है।
मौसी ने देखा और हाथ जोड़कर बोलीं, “हे भगवान, इसमें तो आधी नंगी है तू।”
रुपाली हँसी, “मम्मी, यही तो फ़ैशन है।” दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
और फूफा जी। वो चाय पीते-पीते रुक गए थे। कप हवा में अटका रहा, फिर रखा। उन्होंने ऊपर से नीचे तक देखा — बिल्कुल सीधा, बेशर्म देखा, जैसे गाँव में होने का बहाना खत्म हो गया हो।
“बहुत सुंदर लग रही हो,” उन्होंने कहा। आवाज़ साधारण थी, पर कुछ था उसमें।
रुपाली ने आँखें नीची कर लीं और “थैंक यू” कहकर गाड़ी की तरफ़ बढ़ गई।
और उस पल मुझे लगा — आज रात बरौंदा में सिर्फ़ एक कहानी नहीं लिखी जाएगी।
अध्याय 4 — दशहरा मैदान
दशहरा मैदान शहर से बाहर है, करीब डेढ़ किलोमीटर। बड़ा खुला मैदान, एक तरफ़ रामलीला का पंडाल और दूसरी तरफ़ मिट्टी की चबूतरी पर खड़ा रावण — जिसकी छत तक सीढ़ियाँ लगी थीं और जिसके चारों तरफ़ जवान लौंडे पहरा दे रहे थे।
हम गाड़ी से उतरे तो भीड़ ऐसी थी कि पैर जमाने की जगह नहीं। मौसी, मामा (जो बुखार से उठकर आ गए थे), रुपाली, फूफा जी और मैं — पाँच जने। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
भीड़ में गाँव-कस्बे के हर तरह के लोग थे। पर एक चीज़ जो सबसे ज़्यादा थी — जवान लौंडे। मेला ऐसा मौक़ा है जब लड़के नहाने-धोने, ऑयल लगाने, नई शर्ट पहनने और बाल सेट करने के बाद बाहर निकलते हैं। उस शाम बरौंदा के चारों तरफ़ के गाँवों से आए हुए सैकड़ों लौंडे वहाँ थे। साले, ऐसे लग रहे थे जैसे पूरी दुनिया में सिर्फ़ मर्द ही मर्द हों।
पर मेरा दिमाग़ किसी और पर टिका हुआ था।
आधा घंटा घूमते-घूमते मैंने भीड़ में उसे ढूँढा। मिला नहीं। मैंने सोचा शायद आज नहीं आया, और मन उतर गया।
फिर रुपाली ने मेरी कलाई पकड़ी और बोली, “भैया, देखो, रामलीला शुरू हो गई।”
हम थोड़ा आगे बढ़े। भीड़ में धक्के खाते-खाते मैं मंच के पास पहुँचा। वहाँ खड़ी लाइटों की वजह से चेहरे दिख रहे थे। और तभी —
और तभी मैंने उसे देखा।
मंच से करीब दो सौ मीटर दूर, भीड़ के उस पार, किसी ऊँची चबूतरी के किनारे खड़ा। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
काली सिली हुई शर्ट। नीली जींस। पीछे की जेब में पर्स जिससे उसकी गांड पर एक अलग उभार आ रहा था। और वो चेहरा — जिस पर हल्की दाढ़ी थी और वो सेक्सी स्टाइल वाले बाल।
वीर सिंह।
भीड़ में इतने लोग थे कि उसे ठीक से देखना मुश्किल था, पर दिल की नज़र ने पहचान लिया था। मेरे पैर अपने आप उसकी तरफ़ बढ़ने लगे।
रुपाली पीछे बोली, “भैया, कहाँ जा रहे हो?”
“तू मौसी के पास रह,” मैंने बिना मुड़े कहा। “मैं आता हूँ।”
“किसी जान-पहचान से मिलने?”
“हाँ,” मैं मुस्कुराया। “बहुत पुराने परिचित से।”
अध्याय 5 — काली शर्ट
पास पहुँचने में मुझे पाँच मिनट लगे, क्योंकि भीड़ दीवार की तरह खड़ी थी। दो-तीन बार धक्के खाए, एक आदमी ने कंधे से मारा, एक बुढ़िया ने बुरा-भला कहा। पर मैंने हार नहीं मानी।
और जब करीब पहुँचा, तो लगा कि सारी मेहनत वसूल हो गई।
वीर वहाँ खड़ा था, किसी ऊँची चबूतरी के किनारे, अपने दो दोस्तों से बात करता हुआ। काली शर्ट उसके जिस्म पर ऐसे चिपकी थी जैसे दर्जी ने नाप लेकर सिली हो — कंधे चौड़े, बाजू ऐसी भरी हुई कि आस्तीन में तनाव दिख रहा था, और सामने की खुली बटन से उसकी गोरी मर्दाना छाती का उभार साफ़। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
उसकी महक। भगवान, उसकी महक। भीड़ में इतने लोग थे, इतने पसीने थे, फिर भी जब मैं उसके पीछे खड़ा हुआ तो सिर्फ़ उसकी महक आई — वो महक जो पसीने और साबुन और सूखी कपास और जवानी की होती है। इत्र नहीं, शैम्पू नहीं, बस मर्द।
वो अपने दोस्तों से बात कर रहा था। कुछ हँसी, कुछ ठट्ठा। उसकी आवाज़ भारी थी, किसी बड़े आदमी की आवाज़, भले ही उम्र बाईस की थी। और जब वो हँसा, तो उसके गाल पर छोटे गड्ढे बने — कातिलाना।
अचानक उसने अपने एक दोस्त को कंधे से पकड़कर ऊपर उठा दिया, क्योंकि वो दोस्त रावण नहीं देख पा रहा था। उठाते ही उसके डोले फूल गए, शर्ट खिंच गई, और मुझे लगा कि अब बटन उड़ेंगे।
बस फिर क्या था। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मैंने हिम्मत करके, पीछे से ही, उसके बाएँ डोले को पकड़ लिया।
जो पकड़ आई, वो किसी लोहे के पाइप जैसी थी। बाजू में गर्मी थी, पसीने की हल्की नमी थी, और नीचे बाइसेप का उभार जो हाथ पकड़ते ही अंगुलियों के नीचे महसूस हो रहा था। मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
वो पीछे मुड़ा।
मैंने फ़ौरन हाथ हटाया और बेसुध होकर बोला, “भाई, आगे निकलने दे ना यार… भीड़ बहुत है।”
वो एक सेकंड मुझे देखता रहा। फिर मुस्कुराया — वही गड्ढों वाली मुस्कान — और बोला, “हाँ, निकल जा।”
और मैं उसके सामने से निकल गया। पर ठीक उसके सामने जाकर, जहाँ से मुझे उसकी छाती दिखे, मैं रुक गया।
अब मैं आगे था, वो पीछे। भीड़ की वजह से वो मेरे बहुत करीब आ गया। इतने करीब कि मेरी पीठ पर उसकी छाती का उभार महसूस होने लगा। और शायद उसे भी यह पता था, क्योंकि उसने पीछे हटने की कोशिश की, पर भीड़ ने हटने नहीं दिया।
फिर मैंने वो किया जो मैं करना चाहता था।
धक्के और भीड़ का बहाना बनाकर, धीरे से अपना हाथ पीछे ले गया और उसकी जींस के सामने वाले हिस्से को हल्का सा छू लिया। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
जो महसूस हुआ, उसने मेरा दम कर दिया। एक ठोस, भारी उभार, जैसे जींस के नीचे कोई सोया हुआ अजगर लिपटा पड़ा हो। सख्त नहीं, पर भारी। और लंबा। बहुत लंबा।
मैंने फ़ौरन हाथ हटा लिया और आगे देखने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
पाँच मिनट तक मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी पीठ पर उसकी छाती, मेरे पीछे उसकी गर्मी, और सामने जलती लाइटों में रामलीला। पर मुझे कुछ दिख नहीं रहा था।
फिर अचानक पीठ का सहारा हट गया।
मैंने पलटकर देखा — वो जा रहा था। भीड़ चीरकर, मेला छोड़कर, बाहर की तरफ़। रावण तो अभी जलना बाक़ी था, वो कहाँ जा रहा था?
मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
“हे भगवान,” मैंने मन में कहा, “अब इसे ढूँढूँगा कहाँ?”
और फिर मैंने बिना सोचे उसका पीछा करना शुरू कर दिया।
अध्याय 6 — सुनसान मैदान
मैं उसके पीछे-पीछे नहीं, बल्कि थोड़ा दूर रहकर, छिपकर चल रहा था। भीड़ से निकलते ही मैदान का वो हिस्सा आया जहाँ लोग कम थे — पीछे की तरफ़ खेत, कुछ पुराने खंडहर, और एक सूखा नाला।
वो सीधा उसी तरफ़ बढ़ रहा था।
काली रात, हल्की चाँदनी, और आगे-आगे चलती एक काली शर्ट। कभी वो किसी चबूतरी के पीछे छिप जाता, तो मेरा दिल धक्क से रह जाता, फिर वो फिर निकल आता और मैं साँस लेता।
करीब तीन सौ मीटर चलने के बाद वो एक टूटे-फूटे खंडहर के पास रुका।
वो खंडहर पुराने ज़माने का गोदाम लग रहा था — ऊँची दीवारें, आधी छत गिरी हुई, ऊपर लोहे की जंग लगी चादरें, और अंदर एक कमरा जिसमें एक छोटा रोशनदान था जिससे बाहर की लाइट आती थी।
वो खंडहर के पीछे गया। मैं दूसरी तरफ़ से होकर, दीवार से चिपकते हुए, सामने की तरफ़ आ गया और एक टूटी दीवार के पीछे छिपकर झाँकने लगा। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
और जो देखा, उससे मेरी हसरत पूरी हो गई।
वीर वहाँ खड़ा था — पैर फैलाकर, टाँगों के बीच हाथ डालकर, और मोटी धार से मूत रहा था।
दृश्य इतना मर्दाना था कि मैं साँस लेना भूल गया। उसके सोए हुए लंड की लंबाई लगभग छह इंच थी, मोटाई में किसी छोटे खीरे जैसी, और रंग में गोरी — जैसे उसके बाक़ी जिस्म की तरह। गोरे जिस्म पर उभरा हुआ एक मोटा, भारी, लटकता हुआ लंड।
मूतते वक़्त उसने सिर थोड़ा पीछे किया, गर्दन की नसें तनीं, और एक लंबी साँस छोड़ी। क़यामत।
धार पतली हुई, फिर बंद। उसने अपने लंड को झटके दिए और कुछ बूँदें नीचे गिरीं। फिर वो आसपास देखने लगा — शायद किसी की आहट पाकर। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मेरे पैरों ने मेरी सुननी नहीं की। बस चले आए।
वो मुड़ा, मुझे देखा, और थोड़ा बगल में हो गया — जैसे पूछ रहा हो “तू कौन है और क्यों घूर रहा है।”
उसने लंड अंदर किया, चेन खींची, और बोला। पहली बार कुछ बोला था जो मैंने सुना नहीं। तो फिर बोला, इस बार मुस्कुराकर, भारी मर्दाना आवाज़ में:
“हाँ भाई। क्या हुआ? क्या चाहिये?”
वो आवाज़। वो “भाई” कहने का तरीका। वो मुस्कान। खुली बटन से दिखती गोरी छाती। और वो छह इंच का लटकता लंड जिसे उसने अभी-अभी चेन में क़ैद किया था।
मेरे मुँह से निकला, “चलो इस खंडहर में।” दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
वो रुका। मुझे घूरा। फिर हँसा — छोटी, गहरी हँसी — और बोला, “चल।”
अध्याय 7 — “क्या चाहिये?”
हम खंडहर की तरफ़ चलने लगे। साथ-साथ, पर बीच में एक हाथ का फ़ासला।
“कहाँ रहते हो?” उसने पूछा।
“शहर में। मौसी के घर आया हूँ, बरौंदा। दशहरा देखने।”
“अच्छा।” फिर बोला, “मैं यहीं पास के गाँव से हूँ। और मैंने तुम्हें अखाड़े पर भी देखा था, कल। दीवार के पास खड़े थे न?”
मेरा दिल धक्क से रह गया। “देखा था तुमने?”
“हाँ।” वो मुस्कुराया और आगे देखने लगा। “भीड़ में भी तुमने मुझे छुआ। पहले डोले पर हाथ, फिर…” वो रुका।
“फिर?” मैंने पूछा।
“फिर नीचे।” उसने बिना मुड़े कहा।
मैं चुप हो गया। वो बोला, “साला ये लंड भी मानता नहीं है यार। तुम्हारे छूने से ही खड़ा होने लगा था। और एक बार खड़ा हो जाए, तो इसे सम्भालना मुश्किल हो जाता है। इसलिए वहाँ से भाग आया।”
“भाग?”
“भाग नहीं,” वो हँसा। “निकल आया। ठीक है?”
हम खंडहर के अंदर वाले कमरे में पहुँचे। वो कमरा जिसमें मकड़ी के जाले थे, फ़र्श पर धूल, और छोटे रोशनदान से आती हल्की लाइट।
अचानक उसने मेरी कलाई पकड़ी।
वो पकड़ ऐसी थी कि कोई बहस नहीं चलती। उसने मुझे खींचकर अंदर लिया — जैसे कोई देसी हस्बेंड अपनी नई बीवी को खींचता है। मैं एक अबला पत्नी की तरह उसके पीछे खिंचता चला गया, और मन ही मन यही सोच रहा था कि ये लौंडा मुझे कहीं और ले जा रहा है — किसी ऐसी जगह जहाँ से वापसी आसान नहीं। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
वो रुका। मुझे छोड़ा। दीवार के सहारे खड़ा हो गया।
“सुन,” उसने कहा। “मैं लड़कों में रुचि नहीं रखता। मैंने कभी लड़कों के साथ किया भी नहीं। पर आज तुमने इस अजगर को जगा दिया है। तो अब सम्भालना पड़ेगा। पिछले बीस दिन का ज़हर भरा है इसमें।”
यह कहते हुए उसने बड़े कामुक अंदाज़ में मुस्कुराकर अपने लंड को जींस के ऊपर से खुजाया। जींस के साइड में वो एक मोटी रॉड की तरह सख्त हो चुका था — और वो खड़ा हुआ लंड मोटाई में सोए हुए से भी बड़ा लग रहा था।
मैंने कहा, “आज मौक़ा दो। मैं पूरा मज़ा दूँगा। और अजगर का पूरा ज़हर भी पी जाऊँगा।”
और फिर मैं उससे लिपट गया।
धक्का देते हुए उसे दीवार से टिका दिया, और अपने जिस्म को उसके लंड पर ज़ोर से टच किया। उसके मुँह से “आह” निकल गई — सच में निकल गई, बनावटी नहीं। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
उसका लंड मेरे पेट पर, जींस के नीचे, झटके मार रहा था। मुझे साफ़ महसूस हो रहा था — वो सख्त, गर्म, और उसकी साँस तेज़।
मैं उससे लिपटा ही रहा। उसने भी मुझे अपनी भुजाओं में दबोच लिया — और फिर कपड़ों के ऊपर से ही तेज़-तेज़ झटके मारने लगा। साले में ताक़त बहुत थी। हर झटके में मेरा पूरा जिस्म हिल जाता और मेरी पीठ दीवार से टकराती।
धीरे-धीरे हम लिपटे हुए ही एक दीवार से दूसरी दीवार तक पहुँच गए। कमरे में गर्मी थी, और उसका जिस्म पसीने से भीग चुका था। काली शर्ट उसके गठीले जिस्म से चिपक गई थी और उसमें उसकी महक और तेज़ हो गई थी।
मेरे एक हाथ की उँगलियाँ उसकी कसरती पीठ के गड्ढों पर चल रही थीं, और दूसरा हाथ उसकी बाजू पर कसा हुआ था। और नीचे — नीचे उस लंड के झटके, जो हर बार मेरी नाभि से टकराता।
मेरी हसरत पूरी हो रही थी। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
फिर उसने झटके रोके, मेरा हाथ पकड़कर अपने लंड पर रखा और बोला, “ले। सम्भाल इसको।”
अध्याय 8 — नंगी छाती की महक
मैंने वो किया जो उसने कहा।
वो जींस के ऊपर से भी किसी खीरे जैसा महसूस हो रहा था — मोटा, कड़क, गर्म। मैंने उसे मसलना शुरू किया, और दूसरे हाथ से उसकी चिपकी हुई काली शर्ट के बटन खोलने लगा।
एक-एक बटन। ऊपर से नीचे।
पहला बटन खुला — उसकी गर्दन और कॉलरबोन दिखी। दूसरा खुला — छाती के ऊपरी हिस्से पर हल्के घुंघराले बाल। तीसरा खुला — और उसकी मर्दाना छाती का पूरा उभार बाहर आ गया। गोल, भरे हुए, टाइट — जैसे किसी पहलवान की छाती हो। निपल गहरे भूरे, थोड़े उभरे हुए। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
चौथा बटन खोलते-खोलते मैंने उसकी छाती पर अपना मुँह रख दिया।
वो सिसक उठा। “आह… जान…”
जान। पहली बार उसने मुझे “जान” कहा। और उस एक शब्द से मेरी हवस दुगनी हो गई।
मैंने उसकी छाती चूमी, चाटी, और निपल को जीभ से खेलाया। वो दीवार पर सिर टिकाकर आँखें बंद किए खड़ा रहा, और उसके होंठों से “आह… आह…” निकलता रहा।
शर्ट की आस्तीनें उसकी मोटी बाजुओं में फँस गई थीं। उसने खुद खींचकर शर्ट उतारी और फेंक दी। अब वो नंगे बदन खड़ा था — सिर्फ़ नीली जींस में। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
और मैंने उसके नंगे जिस्म को देखा।
गोरा। एकदम गोरा। शहर के जिम वाले लौंडों जैसा पॉलिश्ड नहीं — असली, मेहनत से बना हुआ, अखाड़े की मिट्टी में तराशा हुआ जिस्म। छाती पर बाल, पेट पर लकीर जैसे निशान, और बगल में वो महक जो मुझे पागल कर रही थी।
मैंने आव देखा न ताव, उसकी छाती को फिर चूमा, उसके डोलों को ऊपर-नीचे करते हुए चाटा, और फिर उसका हाथ ऊपर उठाकर उसकी बगल में अपना मुँह डाल दिया। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
वो हँसा। “बगल में क्या रखा है यार?”
“तेरी महक,” मैंने कहा, और वो चुप हो गया।
उसने कोई आपत्ति नहीं जताई, क्योंकि उस वक़्त तक मेरा हाथ उसकी जींस में घुस चुका था।
और जो वहाँ मिला, वो किसी मुट्ठी में भरने की चीज़ नहीं थी। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
उसका लंड गर्म, भारी, और लोहे जैसा सख्त था। मैंने उसे मुट्ठी में लेने की कोशिश की — पूरा नहीं आया। ऊपर से नीचे सरकाया, और नीचे जाकर उसके आंड भी खुजाए, जो मुट्ठी भर के थे, भारी, और गर्म। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
उसके लंड के टोपे से निकला प्रीकम मेरे हाथ पर लगा। मैंने हाथ निकाला और अपनी नाक पर लगाया।
और वो महक।
प्रीकम, पसीना, और लंड की वो भीनी-भीनी महक जो किसी भी आदमी को पागल कर सकती है। मैं वहीं खड़ा उस महक में डूब गया, और अंदर तक काँप गया।
जैसे ही मैंने हाथ हटाया, उसका लंड और तेज़ी से झटके मारने लगा।
अब उससे रहा नहीं गया। उसने मुझे दबोचकर नीचे बिठा दिया, और मेरा मुँह अपनी जींस के ऊपर से ही ज़ोर से दबा दिया। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मैं घुटनों पर था, मुँह उसकी जींस पर, और ऊपर से उसका हाथ मेरे सिर पर। वो बेल्ट खोलने लगा — जल्दी में, जोश में, आक्रोश में।
मैंने उसका हाथ रोका और कहा, “इस अजगर पर हमारा हक़ है। और इसे आज़ाद भी हम ही करेंगे। आप बेल्ट से हाथ हटाओ जी।”
वो रुक गया। मुस्कुराया। बेल्ट छोड़ दिया, एक हाथ कमर पर रखकर स्टाइल में खड़ा हो गया और हवस भरी आवाज़ में बोला:
“तो ले ना जान। ये लंड तेरी ख़ातिरदारी के लिए ही तो खड़ा है।”
अध्याय 9 — फ्रेंची और प्रीकम
मैंने जींस के ऊपर से ही उसके लंड को ज़ोर-ज़ोर से चाटना शुरू किया, और अपना चेहरा उस पर रगड़ने लगा।
वो सिसकारियाँ लेने लगा। “आह जान… आह जान… ले ले मुँह में… आह जानू ले ले… उम्म्ह… अहह… हय… याह… आह आह…”
वो आवाज़ें। साले की वो आवाज़ें। हर “जान” पर मेरा दिल कूदता और नीचे कुछ और कसता। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
फिर मैंने फटाफट बेल्ट खींचा, हुक और चेन खोलकर उसकी जींस नीचे सरका दी।
वो सिर्फ़ फ्रेंची में बचा।
और वो मंज़र।
फ्रेंची के कपड़े के नीचे से उसका लंड ऐसा फूला हुआ अलग दिख रहा था जैसे कपड़ा उसे रोक नहीं पा रहा। ऊपर की तरफ़ से टोपा बाहर निकल आया था, और फ्रेंची के किनारे पर एक गीला धब्बा बन चुका था — प्रीकम का।
मैंने उस बाहर निकले टोपे पर अपनी नाक लगाई, फिर जीभ।
जैसे ही जीभ लगी, वो पागल हो गया। “आह आह आह!” — तीन बार चिल्लाया, और अपनी अंडरवियर नीचे करने की कोशिश करने लगा।
पर मैंने नहीं करने दिया। मैंने अपना पूरा चेहरा उसकी फ्रेंची पर रगड़ दिया।
उस कपड़े में प्रीकम, पसीना, और लंड की मिली-जुली महक भरी थी। मैं वहीं स्वर्ग में था। मेरा दिल कह रहा था कि इस फ्रेंची को उठाकर घर ले जाऊँ, और हर रात मुँह पर ओढ़कर सोऊँ।
मैं यही सोच रहा था कि उसने ज़बरदस्ती अपनी अंडरवियर नीचे खिसका दी, मेरे बाल पकड़े, और मेरा मुँह खोलकर अपना लंड भींच दिया। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
अब वो लंड खड़ा हुआ करीब नौ इंच का था। नौ इंच, और मोटाई में किसी कलाई जैसा।
वो ठहरा पहलवान आदमी। उसने एक ही झटके में लंड गले तक उतार दिया और मेरा मुँह दबाए रखा।
मेरा दम घुटने लगा। मुँह से “ऊँ… उँ… ऊँ…” निकलने लगा। आँखों से पानी आ गया। पर मैंने हटने नहीं दिया, क्योंकि उस पल मुझे लगा कि मेरे अंदर उसका लंड ही साँस ले रहा है।
उसके लंड से कुछ बूँदें निकलीं और उसकी पकड़ ढीली हुई।
मैंने लंड बाहर निकाला, हाँफते हुए पूछा, “निकल गया क्या?”
वो हँसा। “इतनी जल्दी कहाँ बेटा। एक घंटे का स्टेमिना है। चूत फट जाती है, पर ये नहीं रुकता। ये तो प्रीकम है मेरी जान।”
एक घंटे का स्टेमिना। साले ने कहा और मेरी हवस तीन गुना बढ़ गई।
मैंने उसके लंड को ठीक से देखा।
सच में बड़ा मस्त लंड था यार। बिल्कुल सीधा, लोहे की तरह कड़क, ऊपर की तरफ़ थोड़ा टेढ़ा — जैसा किसी अच्छी लकड़ी की डंडी हो। टोपा गुलाबी-भूरा, चमकदार। गोरे जिस्म पर वो गुलाबी टोपा ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने गोरी दीवार पर फूल चिपका दिया हो। और अक्सर लंड काले मिलते हैं — पर ये पूरा गोरा था। साफ़, ताज़ा, और उस पर प्रीकम की चमकती बूँदें। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मैं हवस से भरा हुआ था। मैंने प्रीकम को जीभ से चाटा, और फिर उसके सुपारे की चमड़ी पीछे की तरफ़ खींच दी।
गुलाबी सुपारा बाहर आ गया। चमकदार, गीला, नाज़ुक।
उसने एक लंबी कामुक सिसकारी ली और बोला, “जान, कितना तड़पाओगी… बुझा दो इसकी प्यास।”
मैंने लंड हाथ में पकड़ा और टोपे को लॉलीपॉप की तरह चूसने लगा। धीरे-धीरे पूरा लंड मुँह में लेने की कोशिश करने लगा। पर पूरा नहीं आ रहा था — करीब डेढ़ इंच लंड अब भी बाहर ही रहता।
अब मैं गिनती गिनते हुए चूस रहा था — मेरी पुरानी आदत। सौ बार हो जाते तो थोड़ा रुककर साँस लेता।
सैकड़ों बार चूस चुका था। छह-सात सौ बार। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
थक गया था, पर मन भर नहीं रहा था। क्योंकि लंड था ही इतना अच्छा — और नया। इस पर किसी और का हाथ अब तक ठीक से नहीं पड़ा था। लौंडे पर नई-नई जवानी का जोश भी था, और गोरी चमड़ी की वो ताज़गी, जो हर चूसने पर मुँह में अलग तरह से लगती थी।
ऊपर देखता तो उसकी गोरी बॉडी, उसका वो सेक्सी, कामुक, कमीना चेहरा — और मेरी वासना के समंदर में फिर बाढ़ आ जाती। फिर मैं पागलों की तरह लंड चूसने लग जाता।
आधा घंटा हो गया और उसका कामरस नहीं निकला।
वो बोला, “जान, ऐसे तो रात गुज़र जाएगी। हमें चलना भी है। अब मुझे मौक़ा दो, मैं तुझे मस्त मज़ा देता हूँ।” दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
अध्याय 10 — गले तक की चुदाई
उसने मुझे उठाया और दीवार के सहारे पड़े एक पत्थर पर बिठा दिया। पत्थर की ऊँचाई ऐसी थी कि मेरा मुँह ठीक उसके लंड की बराबरी पर आ गया।
फिर उसने अपनी जींस मोड़कर तकिया बनाया और मेरे सिर के पीछे रख दिया, और कहा, “सिर दीवार से टिकाए रखना। और हटना मत।”
यानी अब वो मेरे मुँह की चुदाई करने वाला था। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मैं बहुत खुश था। वो इतनी तैयारी कर रहा था, तो मज़ा भी मस्त ही होना था।
वो तैयार था, तभी मैंने कहा, “अपनी शर्ट मेरे सिर पर डाल दो।”
“क्यों?”
“जब तक मुँह चुदाओगे, तब तक उससे तेरे जिस्म की महक आती रहेगी।”
वो हँसा और शर्ट उठाकर मेरे सिर पर डाल दी।
फिर उसने अपने दोनों हाथ मेरे पीछे की दीवार पर टिकाए और मेरी तरफ़ झुक गया। उसका लंड, झटके मारता हुआ, मेरे होंठों के सामने आ गया।
मैंने ऊपर देखा।
उसके हाथ दीवार पर टिके थे, और उसका पूरा वज़न उन पर था — इसलिए उसके बाइसेप्स अलग ही आकार ले चुके थे। भरे हुए, तने हुए, नसें उभरी हुईं। वो अब किसी जिम वाली पुश-अप पोज़िशन में था।
मतलब अब उसके हर पुश के साथ लंड मेरे गले तक उतरने वाला था।
मैंने जीभ से उसका लंड चाटना शुरू किया ही था कि वो बड़बड़ाया — “बहुत सुस्त करता है तू” — और उसने एक झटके में मेरे गले तक लंड उतार दिया। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
अब वो हवस के दरिया में डुबकी लगा चुका था।
उसने मेरे दोनों कान पकड़ लिए और ज़ोर-ज़ोर से एक के बाद एक झटके देने लगा।
हर झटके में लंड गले तक जाता। पीछे दीवार थी, आगे लंड के ज़ोरदार धक्के — बचने की कोई जगह नहीं। मेरे गले में उसका लंड ऐसे फँस जाता कि साँस लेने के लिए नाक ही बचती।
मेरे सिर पर पड़ी उसकी पसीने से भीगी शर्ट सरककर नाक तक आ गई थी, और उसमें से उस जवान मर्द के बदन की वो मस्त महक आ रही थी।
उस महक से उसके लिए मेरा प्यार और बढ़ता जा रहा था। मैं आँखें बंद करके उसकी हर बात की कल्पना कर रहा था — उसके गोरे जिस्म की, उसके बाइसेप्स की, उसकी छाती की, उसकी महक की। और उसी कल्पना से मुझे उसके झटके सहने की ताक़त मिल रही थी।
मैंने अपने हाथ ऊपर उठाए और उसकी मज़बूत बाजुओं को पकड़ लिया, और उसकी फूली हुई छाती पर हाथ फेरने लगा।
उससे और जोश आ गया। झटके तेज़ हो गए। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
मुझे सब कुछ मिल चुका था। मैं बस इसी पल में ठहर जाना चाहता था। ये महक, ऐसा जिस्म, ऐसा लंड — ये मुझे दोबारा कब मिलेगा? यही सोचते हुए मैं उसकी ताबड़तोड़ चुदाई का आनंद ले रहा था।
तभी उसने एक ज़ोर की आह भरी, अपना पूरा वज़न मेरे मुँह पर डाला, और लंड गले के टॉन्सिल तक घुसा दिया।
और इसी के साथ, एक गरम पिचकारी की धार ने मेरा गला भर दिया।
धार इतनी तेज़ थी कि आधा वीर्य अपने आप पेट में चला गया। मैंने लंड बाहर निकाला और बचा हुआ गरमागरम कामरस स्वाद लेते हुए पी गया।
सच में टेस्टी माल था।
मैंने उसके लंड को जीभ से साफ़ किया। वो निढाल होकर गिरने लगा। मैंने उसे पकड़ा और खुद खड़े होकर उसी पत्थर पर बिठा दिया। फिर उसके कसरती जिस्म की थोड़ी मालिश की — कंधे, बाजू, पीठ।
काफ़ी समय हो चुका था, इसलिए वो खड़ा हो गया।
मैंने उसे शर्ट पहनाई। आख़िरी बटन लगाने से पहले उसकी मर्दाना छाती पर एक किस किया, और हम बाहर निकल आए।
बाहर निकलते वक़्त उसने मेरी कलाई पकड़ ली। ज़ोर से नहीं, हल्का सा। जैसे कह रहा हो — अभी खत्म नहीं हुआ। दशहरा मेले में देसी लंड के दीदार
अच्छी बात ये थी कि रावण अभी जला नहीं था।
हम भीड़ में लौट आए। रावण जलने का इंतज़ार करते हुए, मैं उसे कम और उसकी महक ज़्यादा देख-सूँघ रहा था, बेझिझक होकर। वो भी कुछ नहीं बोला, बस खड़ा रहा, और कभी-कभी मुस्कुरा देता।
मैंने उसका नंबर लिया। उसने अपना पूरा नाम बताया — वीर सिंह, गाँव भरनौल। और भीड़ में खड़े-खड़े मैंने उसकी एक फ़ोटो भी खींच ली — काली शर्ट में, मोबाइल देखते हुए, एक पैर पर वज़न डालकर खड़ा। देसी। कातिलाना।
फिर रावण जला।
आग लगी तो पूरा मैदान रोशन हो गया। हजारों आवाज़ें एक साथ “जय श्री राम” बोलीं, ढोल बजे, फुलझड़ियाँ छूटीं। और उस रोशनी में, उस भीड़ के बीच, मेरी नज़र उस लौंडे पर थी, जिसका लंड अभी-अभी मेरे गले में था।
उसने भी मेरी तरफ़ देखा। और हम दोनों एक साथ हँस पड़े।
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