मैं रंजना हूँ। अठारह साल की, बदन गोरा और भरा हुआ, चूचियाँ छोटी पर गोल-मटोल और ठोस, कमर पतली, गांड उठी हुई। पापा पहलवान हैं — देह के पक्के, बाँहों में ऐसी ताकत कि पकड़ लें तो छूटना मुश्किल। और आज रात उन्होंने मेरी चूत फाड़ दी — अनजाने में, गलती से। पर मेरी चूत ने उसे दिल से क़बूल कर लिया। दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई 2026
दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई :- माहवारी की तड़प
पाँच दिन से मेरी हालत ख़राब थी। माहवारी चल रही थी, और उस दौरान जिस्म में एक अजीब सी गर्माहट बनी रहती है — चूत में खुजली, चूचियों में भारीपन, और सबसे बड़ी बात — चुदने की तड़प।
मेरा बॉयफ़्रेंड है, रोहित। दो महीने से हम एक-दूसरे को चूमते-सहलाते रहे थे, पर चुदाई नहीं हुई थी। उसने कई बार मेरी चूत पर हाथ रखा, उँगली डाली, पर सिर्फ़ ऊपर-ऊपर। और मैं भीतर तक लौड़ा लेने के लिए बेताब थी।
माहवारी के इन पाँच दिनों में तो मेरा बुरा हाल था। रात को लेटती, तो चूत अपने आप गीली लगती। कभी-कभी ज़ोर से उँगली डालकर हिलाती, पर असली बात तो लौड़े की थी। मैं मन में सोचती — जब माहवारी ख़त्म होगी, तो रोहित से चुदूँगी, चाहे कैसे भी।
मेला वाले दिन माहवारी आख़िरी दिन पर थी। मैंने मन बना लिया था — रात को रोहित आएगा, मम्मी पड़ोस में फंक्शन में जाएँगी, तो मौका मिल जाएगा। बस इसी बात की आस में पूरा दिन बिताया।
मम्मी की नाइटी — और ब्रा-पैंटी छोड़ना
शाम को मेला देखकर आई, थक गई, तो सीधे मम्मी के कमरे में लेट गई। बस थोड़ा आराम करने के लिए।
फिर मुझे लगा — अगर रोहित आएगा, तो ऐसी हालत में मिलना तो अच्छा नहीं लगेगा। नहा लूँ, ताज़ा हो लूँ। पर मेरी अपनी नाइटियाँ सब धुलने के लिए डाली हुई थीं। सूखी नाइटी एक ही थी — और वो भी बहुत पुरानी, बेढंगी।
तो मैंने मम्मी की अलमारी खोली। उनकी एक नाइटी पड़ी थी — हल्की मलमल की, पतली, बदन से चिपकने वाली, गहरे नीले रंग की। ऊपर से देखने में साधारण, पर पहनने पर जिस्म से ऐसी चिपकती कि चूचियों और कमर के घुमाव साफ़ दिख जाएँ। वो मम्मी के नाप से थी, तो मुझ पर थोड़ी ढीली थी — पर उसका कपड़ा इतना पतला था कि ढीलापन दिखता भी नहीं था।
और सबसे बड़ी बात — मैंने उस रात ब्रा और पैंटी दोनों छोड़ दी।
क्यों? क्योंकि माहवारी ख़त्म हो गई थी, और मुझे लगा कि अगर रोहित आएगा और हम चुदेंगे, तो कपड़े खोलने-पहनने की झंझट न हो। माहवारी की तड़प इतनी बढ़ी हुई थी कि बस एक बार चुदने की आस में बदन पहले से तैयार कर लिया।
तो मैं उसी पतली नाइटी में लेटी — नीचे नंगी चूत, ऊपर नंगी चूचियाँ, सिर्फ़ एक पतली मलमल की परत। नाइटी का कपड़ा मेरी चूचियों के ऊपर सटा हुआ था, निप्पल उसके नीचे उभरे हुए साफ़ दिखते थे। और नीचे, जाँघें जब खुलीं, तो पतली नाइटी मेरी चूत के ऊपर चिपक गई, और मुझे वहाँ ठंडी हवा का एहसास हुआ। दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई
बस इसी हालत में मैं सो गई। और सोचा — अब रोहित आएगा तो मज़ा आएगा।
पर रोहित नहीं आया।
आया तो… पापा।
पापा की गलती
रात गहरी थी जब पापा मेला देखकर और दोस्तों के साथ देर तक पीकर घर आए। मम्मी पड़ोस के फंक्शन में गई थी — यह बात पापा को पता नहीं थी। तो वो सीधे उसी कमरे में घुसे जहाँ मैं लेटी थी, और समझे कि पलंग पर मम्मी ही है।
दरवाज़ा बंद किया, बेड पर आकर बैठे, और मेरी जाँघ पर हाथ रखा। मैं आधी नींद में थी, पर उनका हाथ लगते ही जाग गई। उन्होंने धीरे से कहा —
“डार्लिंग… आज मुझे चोदने दे। पाँच दिन से तू रोक रही है, कह रही थी माहवारी है। आज तो ख़तम हो गया ना? आज मत रोकना। देख मधु, आज मेरा लौड़ा भी मोटा हो गया है, लंबा भी, और पूरा नशा चढ़ा है। और हाँ — तेरे लिए सेक्स पावर की टेबलेट भी खाकर आया हूँ। आज तो तेरी चूत फाड़ूँगा, पर आराम से। आज मत रोकना।”
मैं कुछ कहने ही जा रही थी कि उन्होंने मेरा मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया। पापा पहलवान हैं — हाथ जैसे लोहे के। मैं तड़प भी नहीं पाई। कमरे में अंधेरा था, बस खिड़की से हल्की चाँदनी आ रही थी।
और फिर उन्होंने मेरी — यानी मम्मी की — नाइटी को ऊपर सरका दिया।
जब उनका हाथ मेरी नंगी जाँघों पर पड़ा, तो एक झटका सा लगा। मैंने पैंटी नहीं पहनी थी, तो उनकी उँगलियाँ सीधे मेरी चूत के होंठों पर फिसल गईं। चूत सूखी थी, पर उनका अंगूठा वहीं रगड़ा — ऊपर-नीचे, गोल-गोल — और मेरी नींद पूरी उड़ गई।
वो फुसफुसाए, “अरे वाह मधु… क्या तेरी चूत तो काफी टाइट हो गई है।”
उन्हें क्या पता था कि यह मधु की नहीं, उनकी ही बेटी की कुँवारी चूत है।
चुदाई — पूरी तफ़सील से
फिर उन्होंने दोनों टाँगें अलग-अलग कर दीं। मैंने छुड़ाने की कोशिश की, पर उन्होंने ज़ोर से दोनों हाथों से मेरी टाँगें दबा दीं, कूल्हों को पकड़ा — और अपना मोटा लौड़ा सीधे मेरी चूत पर टिका दिया।
मैंने महसूस किया — वो गर्म था, मोटा, फूला हुआ, नस-नस में खून भरा हुआ। लौड़े का सिरा चूत के होंठों को चीरता हुआ अंदर घुसने लगा। मेरी चूत अभी गीली नहीं हुई थी, तो सिरा फँसा। पापा ने एक ज़ोरदार धक्का मारा —
“आँहह…!” मैं कराह उठी।
ऐसा लगा जैसे मेरी चूत फट गई। कुँवारी चूत, ऊपर से इतना मोटा लौड़ा — सिरा अंदर तक चला गया और मेरी चूत के होंठ तन गए। एक झनझनाहट पूरे जिस्म में दौड़ गई, आँखों से आँसू निकल आए।
पर पापा ने रहम नहीं किया। ऊपर चढ़कर ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगे। कमर ऐसे मार रहे थे कि पलंग चरमरा रहा था। पसीने की बूँदें उनके माथे से मेरे बदन पर टपक रही थीं।
“आह… मधु… क्या बात है… तेरी चूत तो काफी टाइट हो गई है… लौड़ा भी ठीक से नहीं जा रहा… पर अच्छा लग रहा है… ऐसा लग रहा है जैसे किसी अठारह साल की लड़की को चोद रहा हूँ…” — बोलते हुए वो और तेज़ हो गए।
मैं दोनों हाथों से उनकी बाँहें पकड़े कराह रही थी। मेरी चूचियाँ उनके सीने से रगड़ खा रही थीं — ब्रा नहीं पहनी थी, तो पतली नाइटी के नीचे निप्पल सीधे उनके सीने से टकरा रहे थे, और हर रगड़ से मेरे अंदर एक झुरझुरी दौड़ती। उन्होंने झुककर मेरे एक चूची को नाइटी के ऊपर ही मुँह में लिया, कपड़े समेत निप्पल खींचा — और मैं पूरी काँप गई। दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई
शुरू में सिर्फ़ दर्द था — ऐसा दर्द जो चूत के अंदर तक जाता। पर धीरे-धीरे दर्द में एक गुदगुदी घुलने लगी। हर धक्के के साथ चूत के अंदर एक गरम लहर दौड़ती, कमर झटके खाती।
और फिर — चूत पानी-पानी हो गई।
अब तो मज़ा आने लगा। मैंने हार मान ली — सोचा, जो होगा देखा जाएगा, पहले आज चुद तो लूँ, शायद ऐसा मौका फिर न आए। मैंने अपनी चूचियाँ ख़ुद दबानी शुरू कर दीं, निप्पल मरोड़े, और नीचे से गांड उठा-उठा कर पापा के लौड़े को और अंदर लेने लगी।
चूत से इतना रस बहा कि लौड़ा अब आराम से फिसलने लगा — चप-चप की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी। गांड के नीचे गद्दा तक भीग गया। मेरी कमर ऐंठने लगी, पैर काँपने लगे — और मैं झड़ गई। ऐसी झड़ी कि आँखों से आँसू निकल आए और पूरा बदन एक झटके में तन गया।
पर पापा नहीं झड़े। टेबलेट का कमाल — वो चोदते रहे, चोदते रहे। मैं हाँफ रही थी, “बस… पापा… बस…” पर उनके लौड़े पर कोई असर नहीं।
फिर उन्होंने रफ़्तार बढ़ाई। मेरी गांड उठाकर अपने हाथों में ले ली, कूल्हों को अपनी ओर खींच-खींचकर धक्के मारने लगे — गहरे, तेज़, बेरहम।
“आह… आह… आह… आआहह…” — वो ज़ोर से आवाज़ निकालने लगे।
और फिर एक आख़िरी ज़ोरदार धक्का — उनका पूरा वीर्य मेरी चूत के अंदर तक उड़ेल दिया। गरम-गरम, रसदार, बहुत सारा। मेरी चूत लबालब भर गई, और कुछ वीर्य बाहर भी निकलकर जाँघों पर बह गया। वो बेदम होकर मेरे ऊपर गिर पड़े, साँसें फूल रही थीं।
खुलासा
मैं किसी तरह उनके नीचे से निकली, नाइटी ठीक की, और अपने कमरे में चली आई।
लाइट जलाई तो देखा — मेरी चूत सूज गई थी, होंठ फूले हुए, और हल्का-हल्का खून भी आ रहा था। दर्द तो था, पर साथ में एक अजीब सी गर्माहट, एक तृप्ति भी। मैं कॉटन निकालकर अपनी चूत साफ़ करने लगी, तभी —
फ़ोन बजा।
पापा का फ़ोन। तीन-चार रिंग के बाद उन्होंने किसी तरह उठाया — “हेलो…”
फ़ोन मम्मी का था, वो पड़ोस से ही बोल रही थी — बस यह कन्फर्म करने कि पापा घर आए या नहीं।
पापा बोले, “क्यों? क्या बोल रही है तू? तू तो अभी मेरे साथ ही थी…”
मम्मी उधर से — “मैं कहाँ थी? मैं तो यहाँ पूजा में आई हूँ, थोड़ी देर में आ जाऊँगी।”
बस।
फ़ोन रखते ही पापा का होश उड़ गया। नींद ग़ायब, नशा उतर गया। वो तुरंत मेरे कमरे में आए। मेरे हाथ में रुई देखी — और समझ गए कि माजरा कुछ और है। दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई
“रंजना… तुम भी वहाँ पर थीं?”
“हाँ, मैं थी।”
“तो रोका क्यों नहीं?”
“रोकी तो थी पापा। पर आपने मुँह बंद कर रखा था, और आपकी ताकत तो पता है आपको… मैं तड़प भी नहीं पाई।”
पापा सिर झुकाए खड़े रहे। मैंने सोचा, बात बढ़ाने से बिगड़ेगी, तो ख़ुद ही बोली —
“कोई बात नहीं पापा। जो हो गया सो हो गया। ये बात यहीं ख़त्म। मैं मम्मी से नहीं कहूँगी।”
वो मेरे पास आए, मेरे सिर पर हाथ रखा, और धीरे से बोले —
“थैंक्स… ऐसा फिर नहीं होगा।”
और आख़िर में
सोचती हूँ — मैं तो पूरे पाँच दिन से रोहित से चुदने के लिए बेताब थी। माहवारी ख़त्म होते ही उससे मिलने की आस लगाए बैठी थी। मम्मी की पतली नाइटी पहनी, ब्रा-पैंटी छोड़ी, बदन पहले से तैयार कर लिया — बस इसी उम्मीद में कि रात को रोहित आएगा और हम चुदेंगे।
पर रोहित आया ही नहीं।
उसकी जगह… पापा आ गए। और वो भी नशे में, टेबलेट खाए, और इतने ताक़तवर कि मुझे छूटने का मौका ही नहीं दिया। जिस चूत को रोहित के लौड़े के लिए तरसाया था, उसे पापा ने पहले ही फाड़ दिया।
पर सच कहूँ दोस्तों — उस रात पापा ने गलती से मुझे चोदा था, पर मेरी चूत ने उसे दिल से क़बूल कर लिया था।
और अब जब भी रात होती है, मम्मी कहीं बाहर होती है… मैं अपने बदन को टटोलती हूँ, अपनी चूत को छूती हूँ, और सोचती हूँ —
ऐसा फिर कब होगा?
उस रात के बाद मेरी हालत कुछ और हो गई थी।
बदन पर पापा की गर्मी बसी रह गई थी। जब भी नहाती, चूत को छूती, तो लगता जैसे वो मोटा लौड़ा अभी भी अंदर धड़क रहा है। और सबसे बड़ी बात — पापा से चुदने के बाद मेरी चूत का पूरा नक़्शा ही बदल गया था। होंठ फूले, अंदर गहराई और चौड़ाई का एहसास, और वो तड़प — पहले से कई गुना ज़्यादा। दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई
तीन दिन तक मैं रोहित से मिल नहीं पाई। और इन तीन दिनों में मेरा दिमाग़ बस एक ही सवाल पर घूमता रहा —
अगर पापा ने मुझे इतना मज़ा दिया, तो रोहित कैसा होगा?
मैं ख़ुद को कोसती रही। पूरे पाँच दिन रोहित के लिए तरसी थी, उसके लिए नाइटी पहनी, उसके लिए बदन तैयार किया — और चुद गई किसी और से। रोहित को तो पता भी नहीं। उसे क्या बताऊँ? कि “सुन, तेरी चुदाई का इंतज़ार करते-करते मैं पापा से चुद गई”?
तो मैंने फ़ैसला किया — रोहित को कुछ नहीं बताऊँगी। जो हो गया, वो बीच में। और अब जो होगा, वो सिर्फ़ मेरा और रोहित का।
तीसरे दिन शाम को रोहित ने फ़ोन किया। “रंजना, कल रविवार है, घर पर कोई नहीं होगा? मिलते हैं?”
मेरी चूत ने अंदर से एक झटका खाया। “हाँ… आ जाओ। मम्मी-पापा किसी शादी में जा रहे हैं, रात को लौटेंगे।”
“तो पक्का?”
“पक्का।”
फ़ोन रखा और मेरे हाथ काँप रहे थे। कल… कल रोहित से चुदूँगी। असली, पहली बार, अपनी मर्ज़ी से।
रविवार
पापा-मम्मी सुबह ही निकल गए। पापा जाते-जाते मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए — और मुझे लगा कि वो भी उस रात को याद कर रहे हैं। मैं शरमाकर नज़रें चुरा ली।
फिर मैं तैयार होने लगी।
इस बार मैंने अपनी नाइटी निकाली — अपनी, मम्मी की नहीं। लाल रंग की, साटन की, छोटी। फिर सोचा… और इस बार भी ब्रा-पैंटी छोड़ दी। क्योंकि अब मुझे पता था कि मुझे क्या चाहिए — और कितना। बदन पर सिर्फ़ पतली साटन। चूचियाँ उसके नीचे उभरी हुई, निप्पल कपड़े को तानकर बाहर झाँकते हुए। नीचे जाँघें जब खुलतीं, तो हवा सीधे चूत से टकराती।
शाम छह बजे दरवाज़ा बजा। रोहित।
दरवाज़ा खोला। वो अंदर आया, पीछे से दरवाज़ा बंद किया, और फिर मुझे गले लगा लिया। पहली बार हम दोनों इतने पास, इतनी देर।
उसकी छाती मेरी चूचियों से टकराई — पतली नाइटी के नीचे मेरे निप्पल सीधे उसके सीने से रगड़ खाए, और मैं सिहर उठी। उसने सूँघा मेरे बालों को, गर्दन पर होंठ रगड़े, और फुसफुसाया —
“रंजना… तू आज कितनी ख़ूबसूरत लग रही है।”
“तुझे बहुत इंतज़ार कराया ना?” — मैंने धीरे से कहा, और मतलब सिर्फ़ आज का नहीं था।
“बहुत।” उसने कहा और झुककर मेरे होंठ चूम लिए।
पहला चुम्बन। शुरू में धीमा, फिर गहरा। उसकी ज़बान मेरे मुँह में फिसली, और मैं उससे लिपट गई। उसके हाथ मेरी कमर पर, फिर ऊपर सरककर मेरी चूचियों पर। जैसे ही उसकी हथेली मेरे निप्पल से टकराई, वो रुक गया और अलग होकर मेरी तरफ़ देखा —
“अरे… तूने ब्रा तो पहनी ही नहीं?”
“आज ज़रूरत नहीं थी।” — मैंने मुस्कुराकर कहा।
उसकी आँखों में चमक आ गई। वो मुझे उठाकर सीधे मेरे कमरे में ले गया और बेड पर लिटा दिया। खिड़की से आती हल्की रोशनी में, लाल नाइटी में मैं लेटी थी, और वो मेरे ऊपर झुका हुआ।
अब शुरू हुआ असली खेल।
रोहित की चुदाई
उसने पहले मेरी गर्दन चूमी, फिर कॉलरबोन, फिर नाइटी के ऊपर से ही मेरे चूची पर होंठ रखे। कपड़े समेत निप्पल मुँह में लिया और धीरे-धीरे चूसा। मैं कराह उठी — “आँह…” उसने एक हाथ से दूसरी चूची दबाई, उँगलियों से निप्पल मरोड़ा, और मैं काँप गई। दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई 2026
फिर उसने नाइटी ऊपर खींचकर मेरे पेट पर होंठ फेरे, नाभि पर ज़बान रगड़ी, और नीचे की तरफ़ बढ़ा। जब उसकी ठोड़ी मेरी जाँघों के बीच पहुँची — मेरा दिल धक-धक कर रहा था।
उसने मेरी जाँघें फैलाईं और चूत पर हल्की नज़र डाली। फिर अपनी उँगली चलाई — ऊपर से नीचे, होंठों पर, फिर अंदर की तरफ़।
“रंजना… तू तो पूरी गीली है।” — वो हँसा।
“तेरे लिए…” — मैंने हाँफते हुए कहा।
उसने उँगली अंदर डाली — एक, फिर दो। अंदर-बाहर करने लगा, और साथ में अंगूठे से ऊपर की गांठ (क्लिट) रगड़ने लगा। मेरी कमर उठने लगी। “आह… रोहित… आह…”
फिर उसने अपनी ज़बान चूत पर रखी। होंठों से चूसा, ज़बान से अंदर तक फिराई। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ये इतना अच्छा लगता है। पापा ने तो सीधा लौड़ा ही डाल दिया था — वो अपनी रफ़्तार में। पर रोहित धीरे-धीरे, मेरी मर्ज़ी से, मुझे तैयार कर रहा था।
उसकी ज़बान मेरी चूत पर नाचती रही, और मैंने उसके बाल पकड़कर उसका सिर दबाया। कुछ ही मिनटों में मेरी चूत पानी-पानी हो गई, और मैं पहली बार उँगली-ज़बान से ही झड़ गई।
“आआहह… रोहित…!”
वो ऊपर आया, मुँह पोंछा, और मुस्कुराया। “अब बारी असली की।”
उसने अपनी शर्ट उतारी, पैंट खोली। जब उसका लौड़ा बाहर आया — मैंने देखा। ठीक-ठाक, सीधा, गोल-मटोल सिरा। पापा के लौड़े से छोटा, पर मोटा और चुस्त। और उस पर चमड़ी तनी हुई, सिरा लाल और गीला।
वो मेरे ऊपर आया। मेरी जाँघें अपनी कूल्हों पर टिकाईं, लौड़े का सिरा चूत के होंठों पर रखा, और मेरी आँखों में देखकर पूछा —
“तैयार है?”
मैंने सिर हिलाया। और वो अंदर आया।
धीरे। बहुत धीरे।
पापा ने जहाँ एक झटके में घुसा दिया था, वहाँ रोहित ने मेरी चूत को फैलते हुए, खुलते हुए अंदर तक जाने दिया। पहले सिरा, फिर आधा, फिर पूरा। और जब पूरा अंदर गया, तो दोनों एक साथ साँस रोककर रुक गए।
“आँह…” — मैंने हल्की आवाज़ निकाली। दर्द बहुत कम था — क्योंकि चूत पापा से पहले ही खुल चुकी थी। शुक्र है उस रात का।
रोहित ने आँखों में देखा, “दर्द हो रहा है?”
“नहीं… आराम से कर।”
वो हँसा और चोदने लगा — आराम से, गहरे, हर धक्के के बीच एक-एक पल रुककर। उसकी रफ़्तार धीमी थी पर हर धक्का अंदर तक पहुँचता। मेरी चूत उसके लौड़े को चूसती हुई, लिपटती हुई।
मैंने अपनी टाँगें उसकी कमर पर लपेट दीं, गांड उठाकर उससे मिलने लगी। अब रफ़्तार बढ़ी। वो मेरे कान में बड़बड़ा रहा था — “रंजना… तू कितनी टाइट है… आह…”
मैं सोच रही थी — हाँ, टाइट तो हूँ… पर तीन दिन पहले किसी और ने इसे फाड़ा था।
हम दोनों ने पोज़ बदले। पहले मिशनरी, फिर वो पीछे से आया — मुझे घुटनों पर झुकाया, गांड उठाई, और पीछे से घुसा। इस पोज़ में उसका लौड़ा और गहरा जाता, और मेरी गांड के झटकों से पूरा बदन हिलता। उसने एक हाथ से मेरी चूची पकड़ी, दूसरे से कमर, और ज़ोर से धक्के मारे।
चप-चप-चप — मेरी चूत का रस नीचे बहकर जाँघों तक आ गया था।
मैं दो बार और झड़ी। दूसरी बार झड़ते हुए मेरी आँखें भर आईं, पूरा जिस्म काँप गया।
और फिर उसने भी अपनी हद पार की। “रंजना… आ रहा हूँ…”
“अंदर ही कर…” — मैंने कहा।
उसने कुछ ज़ोरदार धक्के मारे, और फिर गरम-गरम वीर्य मेरी चूत में छोड़ दिया। पापा की तरह बहुत सारा नहीं — थोड़ा कम, पर गरम और तेज़। वो मेरे ऊपर ढेर हो गया, साँस फूल रही थी।
हम दोनों चुपचाप लेटे रहे। पसीना, गर्मी, और एक अजीब सी शांति।
और फिर — तुलना
रोहित उठा, पानी पीने गया, और मैं पलंग पर लेटी रही — चूत से वीर्य बहता हुआ, जिस्म थका हुआ, पर दिमाग़ चल रहा था।
और सच कहूँ… मेरा दिमाग़ बस एक ही जगह अटका था।
तुलना।
रोहित अच्छा था। बहुत अच्छा। धीरे-धीरे करता, मेरी मर्ज़ी पूछता, मुझे झड़ने देता, मेरे बदन को तैयार करता। उसकी चुदाई में एक अपनापन था, एक कोमलता। पहली बार के लिए इससे बेहतर क्या होता? दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई 2026
पर…
पापा की चुदाई में जो बात थी, वो कहीं और थी।
पापा ने मुझसे पूछा भी नहीं। उन्होंने मुझे दबाया, वश में किया, और सीधे फाड़ दिया — इतनी ताक़त से, इतने ग़ुस्से से, इतनी भूख से। ऐसा लगा था जैसे कोई जानवर मुझे निगल रहा हो। और मज़े की बात — वो बेरहमी ही मुझे पसंद आई थी।
पापा का लौड़ा मोटा था, लंबा, और जिस तरह उन्होंने मेरी गांड उठाकर कूल्हे पकड़कर धक्के मारे थे — वो रोहित से अलग था। रोहित की चुदाई प्यार थी। पापा की चुदाई भूख थी।
एक में तृप्ति थी, दूसरे में आग।
मैं सोचने लगी — क्या हो अगर दोनों एक साथ हों? रोहित की कोमलता और पापा की ताक़त? एक जिस्म में?
रोहित वापस आया, पास लेटा, और मुझे गले लगा लिया। “कैसा लगा?”
“बहुत अच्छा।” — मैंने सच कहा। दशहरा मेले के बाद बेटी की चुदाई 2026
“फिर से मिलेंगे? जब भी मौका मिले?”
“हाँ… ज़रूर।”
पर मेरे दिमाग़ में एक तीसरा नाम भी घूम रहा था। और वो था — पापा।
उस रात रोहित चला गया। मैं अकेली लेटी रही, और दोनों चुदाइयों की याद मेरे बदन में चल रही थी। एक कोमल, एक क्रूर।
रोहित के जाने के बाद मेरा दिमाग़ कहीं नहीं लगा।
दो चुदाइयाँ, दो तरह की। रोहित की कोमलता, पापा की आग। और अब तीसरी बार के लिए मेरा बदन बेचैन हो गया था — पर इस बार मैं किसी और के भरोसे नहीं बैठना चाहती थी। इस बार पहल मैं करूँगी।
तीसरे दिन का इंतज़ार नहीं किया। दो दिन बाद ही मौका मिल गया — मम्मी को अपनी सहेली के यहाँ शादी में जाना था, और वो रात भर रुकने वाली थी।
तो घर में बस मैं और पापा।
मैंने सोच लिया — आज पापा को जवाब देना है। जो उन्होंने मुझसे छीन लिया था, वो आज मैं ख़ुद माँगूँगी।
पर मज़ा ये था कि पापा मुझसे ऐसे मिल रहे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो। नज़र चुराते, “बेटा कैसी है” पूछते, बस। शरमा रहे थे — दो मीटर का पहलवान, और उनकी बेटी से नज़र नहीं मिला पा रहे थे। ये देखकर मुझे हँसी भी आ रही थी और एक तरह की हिम्मत भी।
मैंने पापा को घेरा
रात के खाने के बाद पापा बैठक में बैठकर टीवी देख रहे थे। बेरंग। बस आँखें स्क्रीन पर टिकाए हुए, असल में ख्याल कहीं और।
मैं आई — इस बार नाइटी नहीं पहनी। सिर्फ़ एक पतली कॉटन की शॉर्ट्स और टी-शर्ट। शॉर्ट्स इतनी छोटी कि जाँघें पूरी खुली हुई। और ब्रा-पैंटी दोनों छोड़ दी थी। अब मुझे पता था — जब मुझे चुदना होता है, तो सबसे पहले बदन को आज़ाद छोड़ो।
पापा के सामने वाले सोफ़े पर बैठ गई। पैर सामने फैलाए, और जान-बूझकर थोड़ा झुककर बैठी। शॉर्ट्स का किनारा ऊपर सरक गया, और मेरी जाँघें — पूरी, गोरी, खुली हुई।
पापा की नज़र स्क्रीन से फिसलकर मेरी जाँघों पर आ गई। एक सेकंड के लिए रुकी, फिर वापस।
“पापा…” — मैंने धीरे से कहा।
“हाँ बेटा?”
“उस रात की बात… क्या अब ऐसे ही चलती रहेगी?”
पापा का हाथ रिमोट पर अटक गया। “क-कौन सी रात?” — वो जान-बूझकर भोले बन रहे थे।
“अच्छा? तो पापा को याद नहीं? जिस रात दशहरा मेला था… जब आपने मुझे मम्मी समझकर…” — मैंने आँखें मिलाईं।
पापा का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने गला साफ़ किया। “बेटा, वो तो गलती थी। मैं नशे में था, तू माँ के कमरे में सो रही थी, मुझे लगा…”
“गलती थी तो सही।” — मैंने कहा। “पर पापा, उसके बाद क्या? तीन हफ़्ते हो गए, आपने कभी… कभी मुझसे पूछा भी नहीं।”
पापा चुप।
मैं उठी और उनके सामने खड़ी हो गई। अब मेरी छोटी शॉर्ट्स उनकी आँखों के सामने। मैंने आगे झुककर उनका रिमोट हाथ से लिया और टीवी बंद कर दिया। फिर उनके पास बैठ गई — सोफ़े पर, बहुत पास।
“पापा… सच बताइए।” — मैंने उनकी आँखों में देखा। “उस रात कैसा लगा था? मेरी चूत… मम्मी से अलग थी क्या?”
पापा की साँस भारी हो गई। वो धीरे से बोले, “हाँ… अलग थी। टाइट थी। जवान थी।”
“और आपको मज़ा आया?”
“बहुत।” — वो इतना सीधा बोले कि मैं भी शरमा गई।
“तो फिर रोक क्यों रखा है?” — मैंने कहा, और उनकी जाँघ पर हाथ रख दिया।
बस वो पल था। पापा की आँखों में जो झिझक थी, वो टूट गई।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और एक झटके में मुझे अपनी गोद में खींच लिया।
मैंने पापा को मजबूर किया
अब मैं उनकी गोद में बैठी थी, चेहरा उनके चेहरे के सामने। पापा पहलवान हैं — बाँहें मज़बूत, छाती चौड़ी। उनकी गोद में बैठकर मुझे अपने आप को छोटा सा लगा।
पर इस बार मैंने दबना नहीं चाहा। मैंने दोनों हाथ उनके कंधों पर रखे और कहा —
“आज पापा… इस बार आप नशे में नहीं हैं। टेबलेट भी नहीं खाई। तो आज जो होगा, वो होश में होगा। और आज मुझे आपके नीचे दबना नहीं है।”
पापा मुस्कुराए। “तो फिर तू क्या करेगी?”
“आज मैं आप पर चढ़ूँगी।” — मैंने कहा।
पापा हँसे, और फिर उठकर मुझे गोद में लिए-लिए सीधे अपने कमरे में ले गए और बेड पर लिटा दिया। फिर ख़ुद मेरे ऊपर झुक गए, और पहली बार — होश में — मेरे होंठ चूम लिए।
पापा का चुम्बन रोहित से बहुत अलग था। रोहित धीरे से, हल्के से। पापा मज़बूती से, पकड़कर। उनकी दाढ़ी की खुजली मेरे गाल पर चुभी, उनकी ज़बान मेरे मुँह में घुसी, और मैं उनके सीने से चिपक गई।
उनके हाथ मेरी टी-शर्ट के नीचे गए — सीधे त्वचा पर। ब्रा नहीं थी, तो उनकी हथेली मेरे नंगे चूची पर पड़ी। उन्होंने पूरा चूची हाथ में लिया, दबाया, निप्पल अंगूठे और उँगली के बीच में रगड़ा। मैं उनके मुँह में कराह उठी।
उन्होंने मेरी टी-शर्ट ऊपर खींचकर उतार दी। अब ऊपर से पूरी नंगी। उन्होंने मेरे दोनों चूचियों को मुँह में लिया — एक-एक करके, ज़ोर से चूसा, दाँतों से निप्पल खींचा। मैं उनके बाल पकड़कर उनका सिर दबा रही थी। “आँह… पापा…”
फिर नीचे। उन्होंने मेरी शॉर्ट्स खींचकर उतारी। अब मैं पूरी नंगी थी, और वो कपड़ों में। ऐसा लगा जैसे वो मुझे निगल जाएँगे।
उन्होंने मेरी जाँघें फैलाईं और अपनी उँगली चूत पर चलाई। “इतनी गीली?” — वो फुसफुसाए। “कब से इंतज़ार कर रही थी?”
“तीन हफ़्ते से।” — मैंने सच कह दिया।
उन्होंने उँगली अंदर डाली — मोटी उँगली, अंदर तक। अंदर-बाहर करने लगे, और साथ में अंगूठा ऊपर की गांठ पर रगड़ते रहे। मेरी कमर उठने लगी।
फिर उन्होंने अपनी पैंट खोली।
जब उनका लौड़ा बाहर आया — अबकी बार मैंने होश में, रोशनी में, पूरे ध्यान से देखा। मोटा। बहुत मोटा। लंबा। और उस पर नसें उभरी हुईं, सिरा लाल और चमकता हुआ। रोहित के लौड़े से कहीं ज़्यादा बड़ा। पापा पहलवान हैं — और ये उनके जिस्म के हिसाब से ही था।
“पापा… ये इतना बड़ा है?” — मैंने हैरानी से कहा।
पापा हँसे। “पहली बार जब तू इस पर चढ़ी थी, तो बर्दाश्त नहीं हुआ था ना? आज भी उतना ही है।”
“आज चढ़ूँगी तो धीरे-धीरे।” — मैंने कहा।
और फिर मैंने उन्हें पीठ के बल लिटाया।
यही तो मुझे करना था। इस बार वो मेरे ऊपर नहीं, मैं उनके ऊपर।
मैं उनकी गोद में बैठी, घुटनों को उनके कूल्हों के दोनों तरफ़ रखा, और उनके लौड़े का सिरा अपनी चूत पर टिका दिया। गीली थी, तो सिरा फिसला। मैंने एक हाथ से लौड़ा पकड़ा, दूसरे से अपनी चूत के होंठ खोले, और धीरे-धीरे नीचे बैठने लगी।
“आँह…!” — सिरा अंदर गया, और मेरी चूत तन गई।
पापा ने मेरी कमर पकड़ी। “आराम से…”
“पता है…” — मैंने हाँफते हुए कहा।
मैं और नीचे बैठी। आधा। फिर पूरा। जब पूरा लौड़ा अंदर गया, तो ऐसा लगा कि मेरी चूत पूरी भर गई, अंदर तक चुभ रहा था। दर्द भी था, पर साथ में एक गहरा, अंदर तक जाता हुआ मज़ा।
फिर मैंने चलना शुरू किया।
ऊपर-नीचे। ऊपर-नीचे। पहले धीरे, फिर तेज़। मेरी गांड उठती, गिरती, और हर बार लौड़ा अंदर तक जाता। पापा मेरी कमर पकड़कर मेरी रफ़्तार में मदद कर रहे थे — पर इस बार निर्देश मेरा था। जब मैं तेज़ करती, वो तेज़। जब रुकती, वो रुकते।
“आह… पापा… आपका लौड़ा… इतना मोटा है…” — मैं बड़बड़ा रही थी।
पापा मेरी चूचियाँ दबा रहे थे, निप्पल मरोड़ रहे थे, और नीचे से मेरी गांड पर हाथ मारकर मुझे और तेज़ कर रहे थे। थप-थप-थप — मेरी गांड उनकी जाँघों से टकरा रही थी।
फिर उन्होंने मेरी कमर पकड़कर मुझे ऊपर उठाया और मुँह नीचे किया — मुझे पीछे से, घुटनों पर झुकाकर ले लिया। अब वो पीछे से चोद रहे थे, मैं उनके नीचे दबी हुई। यही तो उस रात वाली बात थी — वो ताक़त। मेरी गांड उठी हुई, और वो बेरहम धक्के मार रहे थे, हर धक्के से मेरी पूरी कमर झुक जाती।
उनका हाथ मेरे बालों में था, दूसरा कमर पर। वो मेरी गर्दन पर झुककर कान चूम रहे थे और बड़बड़ा रहे थे — “कितनी टाइट है… तेरी चूत… आह…”
मैं उसी हालत में झड़ गई। “आआहह… पापा…!” पूरा जिस्म काँप गया, आँखों से आँसू।
पर पापा अबकी बार भी नहीं रुके। मुझे पलटकर फिर अपने नीचे लिटाया, टाँगें कंधों पर रखीं, और ज़ोर-ज़ोर से चोदने लगे — गहरे, तेज़, ताक़त के साथ। उस रात जैसे। ऐसे जैसे मेरा पूरा जिस्म उनके हवाले था।
और फिर, कुछ मिनटों बाद, वो ज़ोर से कराहे — “आह… आआहह…” — और अपना पूरा गरम वीर्य मेरी चूत के अंदर उड़ेल दिया।
दोनों पसीने से लथपथ, हाँफते हुए लेटे रहे।
“अब माने पापा?” — मैंने मुस्कुराकर पूछा।
पापा हँसे और मेरा माथा चूम लिया।
पर मैं पूरी तृप्त नहीं थी। अंदर कुछ बाकी था। और मेरे दिमाग़ में एक प्लान पहले से तैयार था।
और फिर मैंने रोहित को बुला लिया
बेड पर पड़े-पड़े मैंने फ़ोन उठाया। पापा की बाँहों में लेटी हुई।
रोहित को मैसेज किया — “आज रात आ सकते हो? घर में बस मैं हूँ। पापा सो गए हैं।”
पापा ने पूछा, “किसे बुला रही है?”
“रोहित को।” — मैंने कहा, और पापा की तरफ़ देखा।
पापा के चेहरे पर एक नई शरारत आ गई। “अब? इस वक़्त?”
“हाँ।” — मैंने कहा। “उसने भी तो हक़ जताया है।”
रोहित ने मैसेज का जवाब दिया — “आ रहा हूँ, दस मिनट।”
अब मज़ा ये था कि मैं अभी भी पापा के बेड पर, उनके अगल-बगल, नंगी लेटी थी, और चूत से उनका वीर्य बह रहा था। और दस मिनट में रोहित दरवाज़े पर होगा।
मैं उठी, जल्दी से नहा लिया, पर फिर भी बदन से पापा की महक जाती नहीं। सूँघा — चूत से एक अलग सी गंध, वीर्य की। और रोहित को पता चल जाएगा?
तो मैंने फ़ैसला किया — आज सच बता दूँगी। नहीं तो हमेशा छिपाना पड़ेगा।
दरवाज़ा बजा। रोहित।
मैंने उसे अंदर लिया। वो मुझे गले लगाने आया, पर मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा —
“रुको। पहले एक बात।”
“क्या?”
“आज तुम्हें कुछ बताना है। और फिर तुम जो चाहो, सोचो।”
रोहित उलझन में था। मैंने उसे बैठक में बैठाया, और सामने बैठकर सब बता दिया — दशहरे की रात, पापा का नशा, गलती से चुद जाना, और फिर आज की रात। पूरा सच।
रोहित कुछ सेकंड चुप रहा। फिर बोला, “मतलब… तुमने मुझसे पहले अपने पापा से चुदाई कर ली?”
“हाँ।” — मैंने सिर झुकाया। “गलती से। पर फिर… फिर मैं ख़ुद भी चाहती थी।”
रोहित हँसा। “और अब?”
“अब?” — मैंने उसकी आँखों में देखा। “अब मैं चाहती हूँ कि तुम भी यहाँ हो।”
बस वो पल था जब पापा कमरे से निकले।
रोहित ने पापा को देखा — दो मीटर का पहलवान, चौड़ी छाती, और चेहरे पर वो शरारत। पापा ने रोहित को देखा — जवान, चुस्त, मेरी उम्र का। दोनों की नज़रें मिलीं।
और मैं बीच में खड़ी थी, दोनों के बीच।
“पापा…” — मैंने कहा। “ये रोहित।”
पापा ने हाथ बढ़ाया। “जानता हूँ, बेटा ने बताया है।”
रोहित ने हाथ मिलाया। “नमस्ते अंकल।”
मैं हँस पड़ी। “अंकल… बस अंकल ही रहेंगे? रात में तो ये कुछ और होते हैं।”
दोनों एक साथ — मेरी रात
मैंने दोनों को अपने कमरे में ले जाने का फ़ैसला किया। मेरा कमरा, मेरा बेड, मेरे नियम।
मैंने लाइट बुझाई और बस एक छोटा डिम लाइट जलाई। पूरे कमरे में एक गरम, धुँधली रोशनी।
और फिर मैंने अपने कपड़े उतारने शुरू किए — धीरे-धीरे, दोनों को देखते हुए।
पहले टी-शर्ट। फिर शॉर्ट्स। और अब मैं पूरी नंगी खड़ी थी, दो आदमियों के बीच। एक पहलवान, एक जवान लड़का। दोनों की नज़रें मेरे जिस्म पर।
मेरी चूत अब भी पापा के वीर्य से भरी हुई थी, और थोड़ी गीली। जब मैंने टाँगें खोलीं, तो जाँघों पर एक पतली लकीर बही हुई थी।
रोहित ने देखा और मुस्कुराया। “आज तो पहले से ही तैयार है।”
“तुम्हारे लिए नहीं, आधा तो इसने कर दिया।” — मैंने पापा की तरफ़ इशारा किया।
रोहित हँसा। “तो बाक़ी आधा मेरा?”
“बाक़ी आधा तुम्हारा।” — मैंने कहा। “पर आज सब मेरी मर्ज़ी से।”
मैंने पापा को बेड पर लिटाया और उनका लौड़ा मुँह में लिया। इस बार मैंने उन्हें चूसा — धीरे-धीरे, ज़बान से सिरा चाटा, पूरा मुँह में भरा। ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर। पापा कराह उठे, हाथ मेरे बालों में।
और साथ में रोहित पीछे से मेरे पास आया। उसने मेरी गांड उठाई, और अपना लौड़ा मेरी चूत में घुसा दिया — पीछे से, धीरे से।
अब मैं बीच में थी। आगे मुँह में पापा का लौड़ा, पीछे चूत में रोहित का। दोनों तरफ़ से भरी हुई।
रोहित पीछे से चोद रहा था — धीरे, गहरे, हर धक्के के साथ मेरी कमर झुकती, और पापा का लौड़ा मेरे मुँह में और गहरा जाता। मैं “उँह… उँह…” कर रही थी।
फिर हम पोज़ बदलते रहे। रोहित लेट गया, मैं उस पर चढ़ी — उसके लौड़े पर ऊपर-नीचे। और पापा पीछे से आकर मेरी गांड पर झुके — उनकी ज़बान मेरी गांड के छेद पर, फिर उँगली अंदर।
मैं कराह उठी। “आह… पापा… वहाँ भी?”
“वहाँ भी।” — पापा बोले, और अपनी उँगली और अंदर की।
अब मैं दोनों जगह से महसूस कर रही थी — चूत में रोहित का लौड़ा, गांड में पापा की उँगली। ऐसा लगा जैसे पूरा जिस्म खुल गया।
फिर पापा ने अपनी उँगली निकाली और मेरी गांड के छेद पर अपना लौड़े का सिरा रखा। “यहाँ भी डालूँ?”
“हाँ… हाँ पापा…”
पापा ने धीरे से अपना मोटा लौड़ा मेरी गांड में डाला। दर्द भी, और एक नई तरह की भरपूर भावना। मैं कराह उठी। रोहित अंदर था, पापा अंदर था — दोनों एक साथ।
फिर वो चलने लगे। पहले अलग-अलग, फिर एक लय में — जब पापा अंदर जाते, रोहित बाहर; जब रोहित अंदर, पापा बाहर। मेरा पूरा जिस्म झूला बन गया।
आह… पापा… रोहित… आह… — मैं दोनों के नाम बड़बड़ा रही थी।
ऐसा लगा जैसे कुछ ही मिनटों में मैं तीसरी बार झड़ गई — पूरे जिस्म की झड़ी, जिसमें आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
फिर रोहित ने पहले हार मानी। “रंजना… आ रहा हूँ…” — और उसने मेरी चूत के अंदर छोड़ दिया।
उसके थोड़ी देर बाद पापा भी — “आह… आआहह…” — और अपना वीर्य मेरी गांड में उड़ेल दिया।
दोनों मेरे अंदर, दोनों तरफ़। मैं बेड पर गिर पड़ी, हाँफती हुई, पूरे जिस्म से पसीना बहता हुआ।
तीनों चुप लेटे रहे। रोशनी धुँधली। और मेरे जिस्म में दोनों की गर्मी बसी हुई।
रोहित ने पहले तोड़ा — “अब बताओ, तुलना में कौन जीता?”
मैं हँस पड़ी। “जीत किसकी, वो तो रात ने बताया। पर हार मेरी हुई — पूरी हार।”
पापा बोले, “बेटा, ये तेरा कमरा है। नियम भी तेरे।”
“हाँ।” — मैंने कहा, और दोनों को पास खींचा। “और आज से नियम यही है — जब मन करेगा, बुला लूँगी।
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