भाग 1: Lift Mein Chudai: अचानक रुकावट
सोमवार की सुबह साढ़े नौ बजे थे। आदित्य अपने ऑफिस के बिल्डिंग के लॉबी में खड़ा था, हाथ में कॉफी का कप और दूसरे हाथ में लैपटॉप बैग। उसने अपनी घड़ी देखी – 9:35 AM। “शिट, मीटिंग शुरू होने वाली है,” वह बड़बड़ाया। Lift Mein Chudai: Office Colleagues Ki Dabi Vasna
लिफ्ट का दरवाज़ा खुला। अंदर तारा खड़ी थी। नीली साड़ी, सफेद ब्लाउज, बाल खुले हुए। वह हमेशा की तरह शांत दिख रही थी।
“गुड मॉर्निंग,” आदित्य ने कहा, अंदर आते हुए।
“गुड मॉर्निंग,” तारा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
आदित्य ने 14वां बटन दबाया। लिफ्ट ऊपर चढ़ने लगी। 5वां माला… 8वां… 10वां… अचानक एक ज़ोरदार झटका और अंधेरा। लिफ्ट रुक गई। लाइट्स बुझ गईं, फिर आपातकालीन लाइट जल उठी – एक घनीभूत पीली रोशनी। Lift Mein Chudai: Office Colleagues Ki Dabi Vasna
“क्या… क्या हुआ?” आदित्य घबराकर बोला।
तारा ने आराम से कंधे उचकाए, “शायद लिफ्ट खराब हो गई।”
आदित्य ने इमरजेंसी बटन दबाया। अलार्म बजा लेकिन कोई जवाब नहीं आया। उसने अपना फोन निकाला – नो सर्विस।
“ओ माय गॉड, हम यहीं फंस गए,” आदित्य ने घबराहट में कहा, “मेरी मीटिंग… मेरा प्रेजेंटेशन…”
“शांत हो जाइए,” तारा की आवाज़ इतनी शांत थी कि आदित्य चौंककर उसे देखने लगा, “पैनिक करने से कुछ नहीं होगा। मैंने सुना है मैंटेनेंस टीम काफी तेज़ है।” Lift Mein Chudai: Office Colleagues Ki Dabi Vasna
लेकिन वक्त गुज़रता गया। 10 मिनट… 20 मिनट… आधा घंटा। आदित्य लिफ्ट में इधर-उधर टहल रहा था। पसीना उसके माथे पर आ गया था। उसने अपनी टाई ढीली की।
“आप इतने घबराए हुए क्यों हैं?” तारा ने पूछा, एक कोने में खड़ी होकर।
“मैं… मैं बस क्लॉस्ट्रोफोबिक हूँ थोड़ा सा,” आदित्य ने कहा, “और वो मीटिंग…”
“छोड़िए ना,” तारा ने कहा, “कभी-कभी ज़िंदगी हमें रोक देती है ताकि हम सांस ले सकें।”
आदित्य ने उसे देखा। पीरी आपातकालीन रोशनी में तारा का चेहरा कुछ और ही लग रहा था। शांत, सुंदर, रहस्यमय। Lift Mein Chudai: Office Colleagues Ki Dabi Vasna
“आप हमेशा इतनी शांत कैसे रहती हैं?” आदित्य ने पूछा।
तारा ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्योंकि मैंने ज़िंदगी की असली परेशानियाँ देखी हैं। यह लिफ्ट तो कुछ भी नहीं है।” Lift Mein Chudai: Office Colleagues Ki Dabi Vasna
भाग 2: दीवारें टूटती हैं
एक घंटा हो चुका था। आदित्य फर्श पर बैठ गया था। तारा भी उसके पास बैठ गई। लिफ्ट में गर्मी बढ़ रही थी। आदित्य ने अपनी सूट जैकेट उतारी। उसका सफेद शर्ट पसीने से चिपक गया था, छाती का हल्का आकार दिख रहा था। Lift Mein Chudai: Office Colleagues Ki Dabi Vasna
“मैंने आपको कभी इतनी रिलैक्स्ड हालत में नहीं देखा,” तारा ने कहा, “हमेशा तनाव में रहते हैं।”
“आप मुझे नोटिस करती हैं?” आदित्य ने आश्चर्य से पूछा।
“क्यों नहीं,” तारा ने कहा, “आप हमेशा दौड़ते रहते हैं, कभी रुकते नहीं। कभी किसी से बात नहीं करते। मैंने सोचा था आप अरrogant होंगे, लेकिन अब लगता है आप बस डरे हुए हैं।”
“डरे हुए?” आदित्य ने पूछा।
“हाँ, ज़िंदगी से, नाकामी से, अकेलेपन से,” तारा ने कहा।
आदित्य चुप हो गया। वह सच था। 32 साल की उम्र में, एक अच्छी नौकरी, अच्छा खासा पैसा, लेकिन कोई नहीं था जिससे वह सच में बात कर सके। रात को खाली अपार्टमेंट में वापस जाना, फ्रिज से बीयर निकालना, सोफे पर गिर जाना।
“आप क्या जानती हैं मेरे बारे में,” आदित्य ने कहा, थोड़ी चिढ़ के साथ।
“मैं जानती हूँ कि आप हर शाम 7 बजे के बाद ऑफिस में अकेले रह जाते हैं,” तारा ने कहा, “मैंने कई बार देखा है।”
आदित्य ने उसे देखा। “आप भी?”
“मैं भी,” तारा ने कहा, “मैं भी देर तक रुकती हूँ। मेरा भी कोई नहीं है घर पर इंतज़ार करने वाला।”
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। पीली रोशनी में, पसीने में लथपथ, वे दोनों अजनबी नहीं लग रहे थे। वे दोनों एक ही दर्द साझा कर रहे थे।
“मैंने कभी किसी से नहीं कहा,” आदित्य ने धीरे से कहा, “लेकिन मुझे लगता है मैं डिप्रेशन में हूँ।”
तारा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके हाथ पर रख दिया। उसका हाथ ठंडा था, आदित्य के गर्म हाथ के बिल्कुल विपरीत।
“मुझे पता है,” तारा ने कहा, “मैं भी।”
भाग 3: पहली छुअन
दूसरा घंटा। गर्मी और बढ़ गई थी। तारा ने अपनी साड़ी का पल्लू हटाया। उसकी गर्दन और क्लीवेज़ पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। आदित्य की नज़रें वहाँ टिक गईं।
“माफ़ कीजिए,” उसने तुरंत आंखें हटाते हुए कहा।
“क्या माफ़ करना?” तारा ने पूछा, “हम इंसान हैं, हमें गर्मी लगती है।”
लेकिन आदित्य का धड़कन बढ़ गया था। वह तारा को देख रहा था – उसकी साड़ी में कमर, उसकी पीठ जो ब्लाउज से झलक रही थी, उसके होंठ जो थोड़े सूखे लग रहे थे।
“पानी…” आदित्य ने कहा, “मेरे बैग में एक बोतल है।”
उसने अपना बैग खोला, पानी की बोतल निकाली। पहला घूंट उसने खुद लिया, फिर तारा को दी।
तारा ने बोतल उठाई और उसी जगह से पीना शुरू किया जहाँ आदित्य के होंठ लगे थे। यह एक अनजाना इशारा था। आदित्य ने नोटिस किया।
“आप शादीशुदा हैं?” तारा ने पूछा।
“नहीं,” आदित्य ने कहा, “थी… दो साल पहले तलाक हो गया।”
“मैं भी नहीं,” तारा ने कहा, “कभी शादी नहीं की। एक रिश्ता था… पांच साल का… वो… वो धोखा दे गया।”
आदित्य ने देखा तारा की आंखों में आंसू भर आए। बिना सोचे, उसने अपना हाथ उसके गाल पर रख दिया। तारा ने उसकी तरफ देखा। वे दोनों एक-दूसरे के करीब थे, बहुत करीब।
“मुझे माफ़ करना,” आदित्य ने हाथ हटाने की कोशिश की।
लेकिन तारा ने उसका हाथ पकड़ लिया। “रहने दीजिए,” उसने धीरे से कहा, “अच्छा लग रहा है।”
वे एक-दूसरे की आंखों में देखते रहे। लिफ्ट की पीली रोशनी, गर्मी, अकेलापन, और वो पल जब दो टूटे हुए दिल एक-दूसरे को ढूंढ लेते हैं।
तारा ने आगे बढ़कर आदित्य के होंठों पर एक हल्का चुंबन लगाया। इतना हल्का कि शायद कल्पना ही थी। लेकिन आदित्य ने महसूस किया। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
“मैं… मैं…” आदित्य कुछ कहना चाहता था।
“शhh…” तारा ने उंगली उसके होंठों पर रखी, “कुछ मत कहिए। बस महसूस कीजिए।”
भाग 4: कपड़े उतरते हैं
तीसरा घंटा शुरू हो चुका था। अब वे एक-दूसरे को जानते थे। नाम से नहीं, रूह से।
तारा ने पीछे मुड़कर अपनी साड़ी का नाड़ा खोला। हरे रंग की साड़ी फर्श पर गिरी। अब वह सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में थी। उसकी पीठ, उसकी कमर, उसकी गर्दन – सब कुछ आदित्य के सामने था।
“आप…” आदित्य की सांसें फूल रही थीं।
“हाँ,” तारा ने कहा, पीछे मुड़कर, “मैं चाहती हूँ। मैं महीनों से अकेली हूँ। मुझे किसी की ज़रूरत है।”
आदित्य खड़ा हुआ। उसने अपनी टाई पूरी तरह खोली, फिर शर्ट के बटन। एक-एक करके। तारा उसे देख रही थी। जब उसकी शर्ट उतरी, उसकी छाती सामने आई – पसीने से तर, छाती के बाल, पेट की मांसपेशियां।
“आप बहुत हैंडसम हैं,” तारा ने कहा।
आदित्य ने अपनी पैंट की बेल्ट खोली। वह अब सिर्फ अंडरवियर में था। उसका लिंग पहले से ही कठोर हो चुका था, अंडरवियर में एक उभार साफ दिख रहा था।
तारा ने अपने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए। एक… दो… तीन… चार। ब्लाउज खुला। सफेद ब्रा के अंदर उसकी वक्ष उभार स्पष्ट थे। वह ब्लाउज उतारकर फेंक दिया।
“क्या आप…” आदित्य ने रुककर पूछा।
“हाँ,” तारा ने कहा, “मैं चाहती हूँ।”
तारा ने अपनी ब्रा के पीछे का हुक खोला। धीरे-धीरे ब्रा सरकी। उसके स्तन बाहर आए – गोल, भरे हुए, निप्पल कड़े हो चुके थे। आदित्य की सांस रुक गई।
“सुंदर…” वह बड़बड़ाया।
तारा ने मुस्कुराते हुए अपने हाथ पीछे किए और अपना पेटीकोट खोला। वह नीचे सरका। अब वह सिर्फ सफेद पैंटी में थी। उसकी जांघें, उसकी कमर, उसका पेट – सब कुछ।
“आपकी बारी,” तारा ने कहा।
आदित्य ने अपना अंडरवियर नीचे किया। उसका लिंड बाहर आया – लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ, टॉप की तरफ झुका हुआ। तारा की आंखें बड़ी हो गईं।
“वाह…” उसने कहा, “कितना बड़ा है…”
भाग 5: पहला स्पर्श
वे दोनों नंगे थे। लिफ्ट की पीली रोशनी में उनके शरीर चमक रहे थे। पसीना, गर्मी, और वासना।
आदित्य ने तारा को अपनी बाहों में भर लिया। उसकी त्वचा ठंडी थी, नरम थी। उसने उसके स्तनों को अपने हाथों में लिया, धीरे-धीरे मसला।
“उम्म्ह… आह…” तारा ने हल्की सी आवाज़ निकाली।
“क्या हुआ?” आदित्य ने चिंता से पूछा।
“कुछ नहीं,” तारा ने कहा, “बस… बहुत अच्छा लग रहा है।”
आदित्य ने उसके स्तनों को चूमना शुरू किया। पहले धीरे-धीरे, फिर एक निप्पल को मुंह में लेकर चूसा।
“आह… हाँ… ऐसे ही…” तारा ने सिर पीछे किया, अपने हाथ उसके बालों में फेरे।
आदित्य का एक हाथ नीचे गया। तारा की पैंटी के ऊपर से उसकी योनी को सहलाया। गीली। पैंटी पहले से ही गीली थी।
“आप… आप पहले से ही…” आदित्य ने कहा।
“हाँ,” तारा ने शरमाते हुए कहा, “मैं बहुत उत्तेजित हूँ।”
आदित्य ने उसकी पैंटी नीचे की। तारा की योनी सामने आई – गुलाबी, चिकनी, थोड़ी घनी झांटें ऊपर। उसने एक उंगली से छुआ।
“ओह्ह…” तारा ने कांपते हुए कहा।
“क्या यह पहली बार है?” आदित्य ने पूछा।
“नहीं,” तारा ने कहा, “लेकिन… इतने महीनों बाद… और आपके साथ… यह अलग है।”
आदित्य ने उसे फर्श पर लिटाया। उसकी योनी के पास गया। उसने अपनी जीभ से चाटना शुरू किया – पहले बाहर की तरफ, फिर अंदर।
“उई… आह… हाँ… वहाँ…” तारा ने अपने हाथों से फर्श पकड़ लिया।
आदित्य ने उसकी क्लिटोरिस को चूसा, जीभ से रगड़ा। तारा की सांसें तेज़ हो गईं।
“ओह माय गॉड… ओह्ह… हाँ… और तेज़…” तारा ने कहा, अपनी कमर हिलाते हुए।
आदित्य ने अपनी एक उंगली अंदर डाली। गीली, गर्म, तंग।
“आह्ह…” तारा ने चीखते हुए कहा, “और अंदर… प्लीज़…”
आदित्य ने एक और उंगली डाली। अब दो उंगलियां अंदर-बाहर हो रही थीं, और जीभ क्लिटोरिस पर काम कर रही थी।
“उई… आह… ओह्ह… मैं… मैं…” तारा कांपने लगी।
अचानक उसका शरीर अकड़ा, एक ज़ोरदार झटका, और वह झड़ गई। आदित्य ने महसूस किया उसके मुंह में गर्म तरल आया।
भाग 6: मुख-मैथुन
तारा अभी भी कांप रही थी। आदित्य उसके ऊपर आया। उसका लिंड अब पूरी तरह कठोर था, लाल हो चुका था, टॉप से तरल बूंदें निकल रही थीं।
“आपका…” तारा ने नीचे देखा।
“हाँ,” आदित्य ने कहा, “मैं भी बहुत उत्तेजित हूँ।”
तारा ने उसे धक्का दिया। आदित्य पीठ के बल लेट गया। तारा उसके पैरों के बीच आई। उसने उसका लिंड हाथ में लिया। गरम, कड़क, नसें फूली हुई।
“कितना सुंदर है,” तारा ने कहा, उसे सहलाते हुए।
आदित्य ने आंखें बंद कर लीं। तारा ने उसके लिंड को चूमना शुरू किया – पहले टॉप पर, फिर नीचे की तरफ, फरसे।
“उह्ह…” आदित्य ने आवाज़ निकाली।
तारा ने अपनी जीभ से लिंड के टॉप को चाटा, फिर धीरे-धीरे पूरा मुंह में ले लिया।
“ओह्ह… तारा…” आदित्य ने उसका सिर पकड़ लिया।
तारा ने ऊपर-नीचे करना शुरू किया। धीरे-धीरे, फिर तेज़। उसकी जीभ लिंड के नीचे की संवेदनशील जगह पर घूम रही थी।
“आह… हाँ… बहुत अच्छा…” आदित्य ने कहा, अपनी कमर हिलाते हुए।
तारा ने गहराई तक लेने की कोशिश की। लिंड उसके गले तक गया। उसने रुककर सांस ली, फिर फिर से शुरू किया।
“उई… आह… ओह्ह…” आदित्य की आवाज़ें लिफ्ट में गूंज रही थीं।
तारा ने एक हाथ से उसकी टॉपियों को सहलाया, दूसरे हाथ से लिंड के नीचे की गेंदों को। आदित्य पागल हो रहा था।
“रुको…” उसने कहा, “मैं… मैं झड़ने वाला हूँ…”
तारा ने रुककर उसे देखा, लिंड अभी भी उसके हाथ में था। “मुझे अंदर चाहिए,” उसने कहा।
भाग 7: पहला संभोग
तारा ने आदित्य को लेटे रहने दिया। वह उसके ऊपर बैठने वाली थी। उसने उसका लिंड अपने हाथ में लिया और अपनी योनी के मुंह पर रखा।
“धीरे से,” तारा ने कहा, “काफी समय हो गया है।”
वह धीरे-धीरे नीचे बैठी। लिंड का टॉप अंदर गया।
“उह्ह…” दोनों ने एक साथ आवाज़ निकाली।
थोड़ा और नीचे… और अंदर… तारा की योनी बहुत तंग थी, गीली थी, गर्म थी।
“ओह माय गॉड…” आदित्य ने कहा, “कितनी तंग है आप…”
“आपका… बहुत मोटा है…” तारा ने कहा, सांसें फूलते हुए।
थोड़ा और… अब आधा अंदर था। तारा रुकी, खुद को ढीला किया, फिर एक ज़ोरदार झटके में पूरा अंदर ले लिया।
“आह्ह्ह…” तारा ने चीखते हुए कहा, “भर गई… पूरी…”
वह उसके ऊपर बैठी थी, लिंड पूरी तरह उसकी योनी में समा चुका था। वे एक-दूसरे की आंखों में देख रहे थे।
“मैं हिलू?” तारा ने पूछा।
“हाँ…” आदित्य ने कहा।
तारा ने अपनी कमर घुमाना शुरू किया। पहले धीरे-धीरे गोल-गोल, फिर ऊपर-नीचे।
“उह्ह… आह… हाँ…” आदित्य ने आंखें बंद कर लीं।
“आप… आप इतने अंदर तक…” तारा ने कहा, अपने हाथ अपने स्तनों पर रखते हुए।
वह तेज़ हो गई। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। लिफ्ट में त्वचा की थपथपाहट की आवाज़ गूंज रही थी।
“तेज़… और तेज़…” आदित्य ने कहा।
तारा ने अपने हाथ पीछे आदित्य की जांघों पर रखे और और तेज़ उछलने लगी।
“ओह्ह… फक मी… तेज़ फक मी…” तारा ने कहा, “और तेज़… उई… आह…”
“आप… आप बहुत अच्छी हैं…” आदित्य ने कहा, अपनी कमर हिलाते हुए।
तारा का शरीर पसीने से लथपथ था। उसके बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। वह एक जंगली बिल्ली की तरह उछल रही थी।
“मैं… मैं फिर से…” तारा ने कहा, “झड़ने वाली हूँ…”
“मैं भी…” आदित्य ने कहा।
“अंदर… अंदर ही…” तारा ने कहा, “प्लीज़…”
कुछ और ज़ोरदार झटके और तारा फिर से झड़ गई। उसकी योनी ने लिंड को कसकर पकड़ लिया, अंदर-बाहर होने लगी।
“ओह्ह… माय… गॉड…” आदित्य ने कहा और एक गर्म धार उसके लिंड से निकली, तारा की योनी में भर गई।
तारा झुककर उसके ऊपर गिर गई। दोनों सांसें फूलते हुए, पसीने में नहाए हुए, एक-दूसरे की बाहों में।
भाग 8: दूसरा दौर
कुछ देर बाद, वे एक-दूसरे से लिपटे हुए लेटे थे। लिफ्ट में अब एक अजीब सी खुशबू थी – पसीने की, वासना की, और संतुष्टि की।
“कितना समय हुआ?” तारा ने पूछा।
आदित्य ने अपनी घड़ी देखी, “लगभग तीन घंटे।”
“और एक घंटा और,” तारा ने कहा, उंगली से उसकी छाती पर चक्कर बनाते हुए।
“आप…” आदित्य ने उसे देखा।
“मैं फिर से चाहती हूँ,” तारा ने कहा, उसकी आंखों में एक शरारती चमक।
लेकिन इस बार वह कुछ और चाहती थी। वह उठी, घुटनों के बल बैठी, और अपनी गांड आदित्य की तरफ उठा दी।
“इस बार यहाँ…” तारा ने कहा, पीछे मुड़कर।
आदित्य ने उसकी गोल, मुलायम गांड देखी। उसने कभी नहीं सोचा था…
“क्या आपने कभी…” आदित्य ने पूछा।
“हाँ,” तारा ने कहा, “लेकिन बहुत पहले। धीरे से… प्लीज़…”
आदित्य खड़ा हुआ। उसका लिंड फिर से खड़ा हो रहा था। उसने अपनी उंगली पर थूक लगाया और तारा की गांड के छेद पर लगाया।
“उह्ह…” तारा ने कहा।
वह धीरे-धीरे उंगली अंदर-बाहर करने लगा। तारा की सांसें तेज़ हो गईं।
“अब…” तारा ने कहा।
आदित्य ने अपने लिंड पर थूक लगाया, उसे चिकना किया। फिर उसने टॉप को उसकी गांड के छेद पर रखा।
“धीरे…” तारा ने कहा।
आदित्य ने धीरे से दबाया। टॉप अंदर घुसा।
“आह्ह… बड़ा है…” तारा ने कहा, “रुकिए… थोड़ा…”
आदित्य रुका। तारा ने सांस ली, खुद को ढीला किया। फिर आदित्य ने थोड़ा और दबाया।
“उई… आह… हाँ… अंदर…” तारा ने कहा।
थोड़ा-थोड़ा करके, पूरा लिंड अंदर चला गया। आदित्य ने महसूस किया – कितनी तंग, कितनी गर्म, कितना दबाव।
“मैं हिलू?” आदित्य ने पूछा।
“हाँ… धीरे-धीरे…” तारा ने कहा।
आदित्य ने धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करना शुरू किया। पहले बहुत धीरे, फिर थोड़ा तेज़।
“ओह्ह… यह… यह अलग है…” तारा ने कहा, अपने हाथ फर्श पर रखते हुए।
“दर्द तो नहीं हो रहा?” आदित्य ने पूछा।
“नहीं… बस… पहले थोड़ा… अब अच्छा लग रहा है…” तारा ने कहा, “और तेज़…”
आदित्य ने गति बढ़ा दी। उसके हाथ तारा की कमर पर थे, उसे पीछे की तरफ खींचते हुए।
“आह… हाँ… ऐसे ही… फक मी… मेरी गांड मारो…” तारा ने कहा।
“क्या?” आदित्य ने सुनकर चौंककर पूछा।
“हाँ… बोलिए… मेरी गांड मारो… तेज़…” तारा ने कहा।
“मैं… मैं तुम्हारी गांड मार रहा हूँ…” आदित्य ने कहा, “तेरी गांड बहुत तंग है… बहुत गर्म है…”
“उई… आह… हाँ… और तेज़… मेरी गांड फाड़ दो…” तारा ने कहा, अपनी कमर हिलाते हुए।
आदित्य पूरी तरह पागल हो चुका था। वह ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगा रहा था। त्वचा की थपथपाहट, उनकी आवाज़ें, लिफ्ट में गूंज रही थीं।
“ओह माय गॉड… ओह्ह… मैं… मैं…” तारा ने कहा, एक हाथ अपनी योनी पर रखा, उसे रगड़ते हुए।
“मैं भी…” आदित्य ने कहा, “मैं झड़ने वाला हूँ…”
“अंदर… मेरी गांड में ही…” तारा ने कहा।
कुछ और ज़ोरदार धक्के और आदित्य ने एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ झड़ गया। उसकी गर्म तरल तारा की गांड में भर गई।
वह झुककर तारा के ऊपर गिर गया, लिंड अभी भी अंदर था।
भाग 9: अंतिम घंटा
वे फिर से एक-दूसरे में लिपटे हुए थे। समय बीत रहा था। आदित्य ने तारा के बालों को सहलाया।
“मैंने कभी नहीं सोचा था…” आदित्य ने कहा।
“क्या?” तारा ने पूछा।
“कि मैं कभी किसी के साथ ऐसा…” आदित्य ने कहा, “मैं तो हमेशा डरता रहता हूँ।”
“अब नहीं,” तारा ने कहा, उसके होंठों पर चूमते हुए, “अब आप मुझसे डरते नहीं ना?”
“नहीं,” आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा।
“फिर से?” तारा ने पूछा, हाथ से उसका लिंड सहलाते हुए।
“आप… आप फिर से चाहती हैं?” आदित्य ने आश्चर्य से पूछा।
“इस बार मैं चाहती हूँ आप मुझे दीवार के सहारे लें,” तारा ने कहा, उसकी आंखों में वासना की चमक।
वे खड़े हुए। आदित्य ने तारा को दीवार की तरफ धकेल दिया। उसके हाथ उसकी जांघों के नीचे गए और उसे उठा लिया। तारा ने अपने पैर उसकी कमर के चारों ओर लपेट लिए।
“अब…” तारा ने कहा, सांसें फूलते हुए।
आदित्य ने अपना लिंड अपने हाथ में लिया और उसकी योनी पर रखा। एक ज़ोरदार धक्का और पूरा अंदर।
“आह्ह… हाँ… ऐसे ही…” तारा ने कहा, अपने हाथ उसके कंधों पर रखते हुए।
आदित्य ने उसे दीवार के सहारे चोदना शुरू किया। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे। तारा की पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
“तेज़… और तेज़…” तारा ने कहा, “उई… आह… ओह माय गॉड…”
“आप… आप इतनी अच्छी हैं…” आदित्य ने कहा, “मैं… मैं आपसे प्यार करने लगा हूँ…”
“मैं भी…” तारा ने कहा, उसे चूमते हुए, “आह… हाँ… और तेज़… फक मी… हार्डर…”
आदित्य ने पूरी ताकत लगा दी। वह जानवरों की तरह उसे चोद रहा था। तारा की आवाज़ें लिफ्ट में गूंज रही थीं – “उई… आह… ओह्ह… तेज़… और तेज़… मेरी चूत फाड़ दो…”
“मैं… मैं झड़ने वाला हूँ…” आदित्य ने कहा।
“मेरे मुँह में…” तारा ने कहा, “मैं चाहती हूँ…”
आदित्य ने उसे नीचे उतारा। तारा घुटनों के बल बैठ गई। आदित्य ने अपना लिंड उसके मुँह में डाला और झटके लगाने शुरू किए।
“उम्म्ह… उम्म्ह…” तारा ने आवाज़ें निकालीं, उसे चूसते हुए।
“आह… हाँ… अब… अब…” आदित्य ने कहा और एक ज़ोरदार धक्के के साथ झड़ गया।
तारा ने सब कुछ मुँह में लिया, निगल गई। फिर उसने उसके लिंड को चाटकर साफ किया।
भाग 10: अंतिम क्षण
चार घंटे पूरे होने वाले थे। वे एक-दूसरे में लिपटे हुए थे, थकी हुई, संतुष्ट, खुश।
“लिफ्ट खुलने वाली होगी,” तारा ने धीरे से कहा।
“हाँ,” आदित्य ने कहा, “मुझे नहीं चाहिए कि यह खुले।”
“मुझे भी नहीं,” तारा ने मुस्कुराते हुए कहा।
“क्या हम… क्या हम बाहर भी…” आदित्य ने पूछा।
“मैं चाहती हूँ,” तारा ने कहा, “लेकिन एक शर्त पर।”
“क्या?”
“आपको अपने डर पर काबू पाना होगा,” तारा ने कहा, “मैं आपके साथ हूँ।”
आदित्य ने उसे कसकर गले लगाया। “मैं करूँगा। तुम्हारे लिए।”
तभी बाहर आवाज़ें आईं। मेंटेनेंस टीम। लिफ्ट हिली, फिर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगी। 14वां माला। दरवाज़ा खुला।
बाहर मेंटेनेंस का स्टाफ खड़ा था, हैरान। अंदर दो नंगे लोग, पसीने में लथपथ, कपड़े इधर-उधर बिखरे हुए।
आदित्य और तारा ने एक-दूसरे को देखा, फिर हंस पड़े।
“सॉरी,” आदित्य ने कहा, “गर्मी बहुत थी।”
वे जल्दी से कपड़े पहने, एक-दूसरे का हाथ पकड़ा, और बाहर निकल गए।
लिफ्ट तो खुल गई थी, लेकिन जैसा कहानी में होता है – दोनों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल चुकी थी।
और वे दोनों जानते थे कि यह सिर्फ शुरुआत थी।
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