विधवा भाभी को नवरात्रि पे चोदा
अजय भैया के गुजरने के बाद से रितु का जीवन एक ऐसी खामोशी में डूब गया था जिसे शब्दों से बयान करना मुश्किल था। पच्चीस साल की उम्र में विधवा होना, समाज की उंगलियों का सामना करना, और हर रात अकेलेपन में सिसकना – यह सब रितु की नियति बन गया था। विधवा भाभी को नवरात्रि पे चोदा
रितु ने अपने आसपास एक अदृश्य किला बना लिया था। उसकी आँखों में हमेशा एक ऐसी उदासी रहती थी जो किसी भी व्यक्ति को उसके करीब आने से रोक देती थी। वह हमेशा सफेद साड़ी में रहती, बालों में गजरा नहीं बाँधती, और चेहरे पर कोई मेकअप नहीं करती थी। उसका यह रूप लोगों को यह संदेश देता था कि वह अपने पति की मृत्यु के बाद “मरी हुई” है।
लेकिन रितु के भीतर एक ज्वाला सुलग रही थी। पच्चीस साल की जवानी, जिसमें इच्छाएँ, जरूरतें, और प्यार की भूख सब कुछ जिंदा था। रातों-रात वह अपने बिस्तर पर करवटें बदलती और अपने शरीर की तपिश को दबाने की कोशिश करती। वह अपने हाथों से अपने शरीर को छूती, लेकिन फिर अपने पति की याद में रोने लगती और खुद को दोषी महसूस करती।
उसी घर में रमेश रहता था – अजय भैया का छोटा भाई, जो अपनी पढ़ाई पूरी करके घर लौटा था। रमेश, जो अब बाईस साल का जवान लड़का था, उसमें एक अलग ही ताकत और समझ थी। उसने अपनी भाभी को पहली बार देखा था जब वह शादी के बाद इस घर में आई थी। तब रितु की सुंदरता ने उसे मंत्रमुग्ध कर दिया था – उसके लंबे काले बाल, गोरे गाल, और वो आँखें जिनमें एक अनोखी चमक थी।
लेकिन अब वही रितु एक जीवित लाश बन गई थी।
भाग पहला: धीमी आग का जलना
रमेश ने रितु को इस हालत में देखकर तय कर लिया था कि वह उसे इस अंधेरे से बाहर निकालेगा। लेकिन वह जानता था कि यह कोई आसान काम नहीं है। रितु की दीवारें बहुत मजबूत थीं।
रमेश ने छोटी-छोटी चीजों से शुरुआत की। वह जानता था कि रितु को पढ़ना पसंद है, खासकर प्रेम कहानियाँ। वह चुपचाप उसके कमरे में नई-नई किताबें रख आता। कभी-कभी उसके पसंदीदा लेखकों की किताबें जो उसे उम्मीद की एक किरण दिखा सकती थीं।
एक दिन रितु ने अपने कमरे की मेज पर गुलाबी रंग की एक किताब देखी – “एक दुर्लभ प्रेम कहानी”। उसने उसे उठाया और पहला पन्ना खोला। अंदर एक छोटा सा चिट्ठी था जिस पर लिखा था: “आपकी मुस्कान इस किताब से भी खूबसूरत है। – रमेश”
रितु ने वह चिट्ठी फाड़कर फेंक दी, लेकिन किताब रख ली। रात को जब वह अकेली थी, तो उसने वह किताब पढ़नी शुरू की। कहानी एक विधवा और एक युवक के प्रेम की थी जो समाज की बंदिशों को तोड़कर एक हो जाते हैं। रितु की आँखें नम हो गईं और उसका दिल धड़कने लगा। वह सोचने लगी – क्या यह संभव है? क्या मैं भी…?
लेकिन फिर उसने खुद को डांटा। “नहीं, मैं एक विधवा हूँ। मेरे लिए यह सब गुनाह है।” विधवा भाभी को नवरात्रि पे चोदा
दिन बीतते गए। रमेश का व्यवहार हमेशा सम्मानजनक रहा। वह कभी भी रितु को अपनी नजरों से नहीं तारता था जिससे उसे बुरा लगे। वह बस उसकी देखभाल करता रहा। सुबह उसके लिए चाय बनाना, शाम को उसके कमरे में पंखा चालू कर देना, बिना कहे उसके काम में मदद करना।
एक शाम रितु बालकनी में खड़ी थी। अचानक बारिश शुरू हो गई। रितु भीगने लगी, लेकिन वह हिली नहीं। उसे अपने अंदर की आग को ठंडा करना था। रमेश वहाँ से गुजरा और उसे भीगते देखा। उसने तुरंत एक तौलिया लाया और रितु के कंधों पर डाल दिया।
“भाभी, आप भीग जाएंगी। बुखार हो जाएगा,” रमेश ने चिंता से कहा।
रितु ने पलटकर देखा। रमेश की आँखों में सच्ची चिंता थी, कोई लालच नहीं। उसके बाल बारिश में भीगे हुए थे और उसकी सफेद कमीज़ उसके शरीर से चिपक गई थी, जिससे उसके अंदरूनी कपड़ों की झलक मिल रही थी।
रितु को अचानक अपने शरीर में एक अजीब सी गर्माहसूस हुई। उसने तुरंत तौलिया पकड़ा और अपने कमरे में चली गई, दरवाजा बंद कर लिया।
उस रात रितु नहीं सो सकी। वह रमेश की उन आँखों को याद कर रही थी जो उसे देखते ही चमक उठी थीं। क्या वह मुझे…? नहीं, यह गलत है। मैं उसकी भाभी हूँ। लेकिन फिर एक आवाज़ आई – “तुम तो विधवा हो, तुम्हारे पति नहीं रहे। तुम्हें अपनी जिंदगी जीने का हक है।”
यह आंतरिक संघर्ष रितु को खा रहा था।
भाग दूसरा: बर्फ का पिघलना
नवरात्रि का महीना आ गया। पूरे घर में रौनक थी, लेकिन रितु का कमरा अंधेरे में डूबा रहता। रमेश ने तय किया कि वह इस नवरात्रि में रितु को खुशियों के रंग में रंगेगा।
उसने रितु के लिए एक खूबसूरत लाल साड़ी खरीदी। लाल रंग – जो विधवाओं के लिए मना था, लेकिन जो जिंदगी का प्रतीक था। वह चुपचाप वह साड़ी रितु के बिस्तर पर रख आया।
रितु ने वह साड़ी देखी तो चौंक गई। लाल रंग! कौन है जो मुझे यह दे रहा है? उसने साड़ी को छुआ – बेहद नरम, शुद्ध रेशम। उसके हाथ कांपने लगे। कितने महीनों बाद किसी ने उसके लिए कुछ सोचा था।
उस रात रितु ने वह साड़ी पहनी। आईने में देखा तो वह खुद को पहचान नहीं पाई। लाल रंग में उसकी सुंदरता और भी बढ़ गई थी। उसके गालों पर एक हल्की लाली थी, आँखों में चमक। वह फिर से वो जवान लड़की लग रही थी जो कभी अजय की दुल्हन बनकर आई थी।
दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई। रितु ने मुड़कर देखा – रमेश वहाँ खड़ा था, उसके हाथ में एक थाली थी जिसमें दीया जल रहा था। रमेश रितु को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। लाल साड़ी में रितु बेहद खूबसूरत लग रही थी।
“रमेश… तुम?” रितु की आवाज कांप रही थी।
“भाभी, आज अष्टमी है। मैंने सोचा… आप भी इस खुशी में शामिल हों,” रमेश ने हल्की सी मुस्कान देते हुए कहा।
रितु का दिल तेजी से धड़कने लगा। वह जानती थी कि यह गलत है, लेकिन उसके पैर जमे हुए थे। रमेश अंदर आया और दीया रितु के हाथ में देते हुए बोला, “आपको यह साड़ी पहननी चाहिए। आप इसमें बहुत खूबसूरत लग रही हैं।”
रितु ने दीया लिया और रमेश की आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो आग थी जो किसी भी औरत को पिघला सकती थी। रितु ने अपनी आँखें झुका लीं।
“रमेश, मैं… मैं एक विधवा हूँ। मेरे लिए यह सब…” रितु की आवाज रुक गई।
रमेश ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। उसका स्पर्श इतना नरम और गर्म था कि रितु के शरीर में एक करंट सा दौड़ गया।
“रितु… मैं जानता हूँ कि आप क्या महसूस कर रही हैं। लेकिन जिंदगी तो अभी बाकी है। अजय भैया चाहते भी यही होंगे कि आप खुश रहें,” रमेश ने धीरे से कहा।
रितु ने अपना हाथ छुड़ाया और पलटकर खड़ी हो गई। उसकी पीठ रमेश की तरफ थी और वह रोने लगी।
“तुम नहीं समझोगे… समाज, रिश्तेदार, सब क्या कहेंगे? मैंने खुद को इस कैद में रखा है और अब मुझे इसकी आदत हो गई है,” रितु ने रोते हुए कहा।
रमेश ने पीछे से उसके कंधों पर हाथ रखा। रितु ने विरोध नहीं किया। रमेश ने धीरे से उसे अपनी तरफ मोड़ा। रितु का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
रमेश ने अपने अंगूठे से उसके आँसू पोंछे। “रितु, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। मैंने यह कभी नहीं सोचा था, लेकिन तुम्हारी यह हालत देखकर मेरा दिल टूट जाता है। मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूँ, बस।”
रितु ने रमेश की आँखों में देखा। उसे वहाँ सच्चाई और प्यार दिखा। वह रमेश के सीने से लगकर रोने लगी। रमेश ने उसे गले लगा लिया। यह पहली बार था जब रितु किसी के बाहों में इतनी सुरक्षित महसूस कर रही थी।
वे दोनों वहीं खड़े रहे, एक-दूसरे में समाए हुए। रितु को रमेश की धड़कन सुनाई दे रही थी – तेज़ और प्यार से भरी। रमेश को रितु की सांसें महसूस हो रही थीं – गर्म और कांपती हुई।
“रमेश… यह गलत है,” रितु ने धीरे से कहा, लेकिन वह रमेश से अलग नहीं हुई।
“क्या गलत है, रितु? प्यार करना गलत है? जीना गलत है?” रमेश ने उसके बालों को सहलाते हुए पूछा।
रितु ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस उसकी बाहों में रही, अपने दिल की धड़कन को शांत करने की कोशिश कर रही थी।
भाग तीसरा: नवरात्रि की रात – आग का विस्फोट
नवरात्रि की आठवीं रात थी। पूरा शहर जागरण में डूबा हुआ था, लेकिन इस घर में सन्नाटा था। रितु अपने कमरे में बैठी थी, उसने वही लाल साड़ी पहनी हुई थी। उसका दिल कहीं न कहीं जानता था कि आज कुछ होने वाला है।
रात के ग्यारह बजे थे। अचानक बिजली चली गई। रितु अंधेरे में डर गई। वह अपने बिस्तर पर बैठी थी और उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
तभी दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई। रितु ने देखा – रमेश हाथ में मोमबत्ती लिए खड़ा था। मोमबत्ती की रोशनी में रमेश का चेहरा और भी handsome लग रहा था।
“रितु, मैं… मैं देखने आया था कि आप ठीक हैं,” रमेश ने धीरे से कहा।
रितु ने उसे अंदर आने का इशारा किया। रमेश अंदर आया और मोमबत्ती मेज पर रखी। कमरे में एक पीली रोशनी फैल गई। दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे।
रितु खड़ी हुई। उसके हाथ कांप रहे थे। रमेश ने उसके पास आकर उसके हाथ पकड़े। “क्या तुम… क्या तुम मुझे अपनी जिंदगी में जगह दोगी?” रमेश ने पूछा।
रितु की आँखों में आँसू थे। उसने हामे में सिर हिलाया। यह एक छोटी सी हरकत थी, लेकिन इसमें उसकी सारी जिंदगी की कसम थी।
रमेश ने धीरे से उसका चेहरा अपने हाथों में भरा। उसकी आँखों में वो प्यार था जो रितु ने कभी नहीं देखा था। वह धीरे-धीरे उसके चेहरे के करीब आया।
रितु की सांसें तेज हो गईं। उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि वह सुनाई दे रहा था। रमेश ने धीरे से उसके माथे पर चुंबन किया – एक हल्का, प्यार भरा चुंबन।
रितु की आँखें बंद हो गईं। उसके शरीर में एक सुकून सा महसूस हुआ। रमेश ने उसके नाक के पास चुंबन किया, फिर गालों पर, फिर ठोड़ी पर।
“रितु… मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ,” रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा।
रितु ने अपने हाथ रमेश की छाती पर रखे। उसकी धड़कन उसके हाथों में महसूस हो रही थी। रमेश ने धीरे से उसका चेहरा ऊपर उठाया और उसके होंठों के करीब आया।
रितु कांप रही थी। यह उसके लिए नया था, अजीब था, लेकिन वो चाहती थी। वह चाहती थी कि रमेश उसे छुए, उसे प्यार करे, उसे जिंदा महसूस कराए।
रमेश ने धीरे से अपने होंठ रितु के होंठों पर रखे। एक हल्का सा स्पर्श – जैसे कोई तितली बैठी हो। रितु ने कसकर आँखें बंद कर लीं। रमेश ने धीरे से उसके होंठों को चूमा, फिर थोड़ा दबाया। विधवा भाभी को नवरात्रि पे चोदा
रितु ने एक हल्की सी आह निकाली – “उम्म्म…” यह उसकी पहली आवाज़ थी जो प्यार से भरी थी।
रमेश ने अपने होंठों से उसके होंठों को खोलने की कोशिश की। रितु ने थोड़ा मुँह खोला और रमेश की जीभ उसके मुँह में घुस गई। रितु ने पहले तो चौंककर आँखें खोलीं, लेकिन फिर वह भी उस किस में डूब गई।
रमेश की जीभ रितु की जीभ से खेलने लगी। वे एक-दूसरे का स्वाद ले रहे थे। रितु ने भी अब रमेश की जीभ को अपने मुँह में खींचना शुरू कर दिया। उनके मुँह से आवाजें निकलने लगीं – “चुप… चुप… अम्म…”
यह एक लंबा, गहरा, और जुनूनी किस था। रमेश ने अपने हाथ रितु की कमर पर रखे और उसे अपनी तरफ खींचा। रितु का शरीर अब रमेश से सटा हुआ था। रितु को रमेश का कठोर अंग उसकी जांघों के बीच महसूस हुआ और वह शर्म से लाल हो गई।
“रमेश… यह…” रितु ने हकलाते हुए कहा।
“शhh… बस महसूस करो, रितु। आज रात सिर्फ हम दोनों की है,” रमेश ने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा।
रमेश ने रितु को अपनी बाहों में उठाया और बिस्तर की तरफ ले जाने लगा। रितु ने अपने हाथ उसकी गर्दन के पीछे बाँध लिए। वह हल्की थी, जैसे कोई पंखी हो।
रमेश ने उसे बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर आ गया। मोमबत्ती की रोशनी में रितु का चेहरा सुनहरा लग रहा था। रमेश ने फिर से उसके होंठों पर किस किया – इस बार और जोश से।
रितु ने रमेश के बालों में हाथ फेरना शुरू कर दिया। वह उसके किस का जवाब पूरी तरह से दे रही थी। उनके बीच की दूरी अब खत्म हो चुकी थी।
रमेश ने अपना हाथ रितु की साड़ी पर रखा। “क्या मैं…” उसने पूछा।
रितु ने शर्म से सिर हिलाया, लेकिन उसने रोका नहीं। यह एक हामी थी।
रमेश ने धीरे-धीरे उसकी साड़ी खोलनी शुरू की। लाल रंग की साड़ी धीरे-धीरे खुल रही थी और रितु का शरीर रमेश के सामने प्रकट हो रहा था। रितु ने अपने हाथ ऊपर उठाए और रमेश के सिर को अपने ऊपर खींच लिया।
रमेश ने उसके गले पर किस करना शुरू किया – गर्दन के एक तरफ से दूसरी तरफ। रितु की सांसें तेज हो गईं – “आहhh… रमेश… उम्म…”
रमेश ने उसके ब्लाउज के ऊपर से ही उसके स्तनों को सहलाना शुरू कर दिया। रितु के स्तन मध्यम आकार के थे, लेकिन बहुत सुडौल। रमेश ने उन्हें धीरे-धीरे दबाना शुरू किया।
“आह… रमेश… धीरे… पहली बार…” रितु ने कांपते हुए कहा।
रमेश ने उसके ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके तीनों बटन खुले और रितु का ब्लाउज खुल गया। अंदर एक सफेद रंग की ब्रा थी जो उसके स्तनों को ढक रही थी।
रमेश ने उसकी ब्रा के ऊपर से ही उसके निप्पलों को चूना शुरू किया। रितु ने कसकर आँखें बंद कर लीं और अपनी पीठ बिस्तर पर खिंच ली। उसके मुँह से आवाजें निकल रही थीं – “उहhh… अहhh… हायyy…”
रमेश ने उसकी ब्रा को पीछे से खोला और धीरे से उतार दिया। रितु के स्तन अब रमेश के सामने थे – गोल, गुलाबी निप्पलों वाले, और कसे हुए। रमेश ने एक स्तन को अपने हाथ में लिया और धीरे से दबाया।
“उम्म्म… रमेश…” रितु ने मुँह खोला और आँखें बंद करके सिर इधर-उधर घुमाने लगी।
रमेश ने अपने मुँह से उसके एक निप्पल को छुआ। रितु के शरीर में एक झटका सा लगा। रमेश ने धीरे से उस निप्पल को अपने होंठों में लिया और चूसना शुरू कर दिया।
“आहhh… हायyy… रमेश… बहुत अच्छा लग रहा है…” रितु ने कांपते हुए कहा।
रमेश दूसरे स्तन को हाथ से सहला रहा था और पहले को मुँह से चूस रहा था। वह निप्पल को कभी काटता, कभी चूसता, कभी जीभ से चाटता। रितु पागल हो रही थी।
“उफ्फ्फ… अहhh… ओहhh… मायyy गॉड…” रितु के मुँह से आवाजें निकल रही थीं।
रमेश ने उसके दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसा। रितु के शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी। उसकी जांघें आपस में रगड़ने लगीं।
रमेश ने अपना हाथ नीचे की तरफ बढ़ाया और रितु की पेटीकोट में घुसा दिया। रितु ने एक हल्का विरोध किया, लेकिन फिर शांत हो गई। रमेश ने उसकी पेंटी के ऊपर से ही उसकी योनि को छुआ।
रितु ने कसकर बिस्तर पकड़ लिया। “रमेश… वहाँ…”
“क्या हुआ, रितु? क्या तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा?” रमेश ने पूछा।
“नहीं… बहुत अच्छा लग रहा है… बस… मैं…” रितु शर्म से लाल हो रही थी।
रमेश ने उसकी पेंटी के ऊपर से ही उसकी योनि को सहलाना शुरू कर दिया। रितु की योनी गीली हो चुकी थी। रमेश ने महसूस किया कि उसकी पेंटी पूरी तरह से गीली हो गई थी।
“रितु, तुम तो पूरी तरह से गीली हो चुकी हो,” रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा।
रितु ने शर्म से अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। रमेश ने उसके हाथ हटाए और उसके होंठों पर फिर से किस किया।
“कोई शर्म की बात नहीं है, रितु। यह तो प्यार का हिस्सा है,” रमेश ने कहा।
रमेश ने उसकी पेंटी नीचे खींची और उतार दी। रितु की योनि अब सामने थी – गुलाबी, छोटी-छोटी फुलझड़ियों वाली, और गीली।
रमेश ने अपनी उंगली उसकी योनि पर रखी और धीरे से सहलाया। रितु ने कसकर बिस्तर पकड़ लिया और अपनी पीठ उठा दी।
“आहhh… रमेश… उहhh…” रितु की आवाज कांप रही थी।
रमेश ने धीरे से एक उंगली उसकी योनि में डाली। रितु की योनी बहुत तंग थी क्योंकि काफी समय से उसमें कुछ नहीं गया था। रितु ने दर्द से एक हल्की सी आवाज निकाली।
“दर्द हो रहा है?” रमेश ने पूछा।
“थोड़ा… लेकिन चलो… मुझे अच्छा लग रहा है,” रितु ने कहा।
रमेश ने धीरे-धीरे उंगली अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी। रितु की आवाजें तेज हो गईं – “आहhh… हायyy… उम्म्म… रमेश… और तेज…”
रमेश ने अब दो उंगलियाँ डाल दीं और तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। रितु पागल हो रही थी। उसने अपने स्तनों को खुद ही सहलाना शुरू कर दिया।
“ओहhh… मायyy गॉड… रमेश… मैं… मैं…” रितु कांप रही थी।
रमेश ने उसकी योनि को चूमना शुरू कर दिया। उसने अपनी जीभ निकाली और उसकी योनि के छोटे से बटन – क्लिटोरिस को चाटना शुरू कर दिया।
“आहhh… हायyy… उफ्फ्फ… रमेश… यह क्या हो रहा है… मैं पागल हो जाऊंगी…” रितु चीखने लगी।
रमेश ने उसकी योनि को जोर-जोर से चाटना शुरू कर दिया। उसने अपनी जीभ उसकी योनि में डाली और अंदर-बाहर की। रितु का शरीर कांपने लगा।
“आहhh… रमेश… मैं आ रही हूँ… मैं… उहhh… अहhh…” रितु ने चीखते हुए कहा और उसका शरीर एक झटके से ऊपर उठा।
रितु को ओर्गेज्म हो गया। उसकी योनि से एक तरल पदार्थ निकला और रमेश के मुँह पर लग गया। रमेश ने उसे चाट लिया। रितु बिस्तर पर निढाल होकर लेट गई, सांसें तेजी से चल रही थीं।
रमेश उसके ऊपर आ गया और उसके होंठों पर किस किया। रितु ने अपने होंठ खोले और रमेश की जीभ को अपने मुँह में ले लिया। उसने अपना स्वाद चखा – मीठा, खारा, और अजीब।
“रमेश… अब तुम…” रितु ने धीरे से कहा और रमेश की पैंट की तरफ इशारा किया।
रमेश खड़ा हुआ और अपने कपड़े उतारने लगा। उसने अपनी शर्ट उतारी – उसका शरीर गठीला और मजबूत था। फिर उसने अपनी पैंट उतारी। अंडरवियर के अंदर उसका लिंग एक टेंट की तरह खड़ा था।
रितु ने उसे देखा और उसकी आँखें बड़ी हो गईं। रमेश ने अपना अंडरवियर नीचे किया और उसका लिंग बाहर आ गया – लगभग सात इंच लंबा, मोटा, और कड़ा।
रितु ने डर से कहा, “रमेश… यह… यह तो बहुत बड़ा है… मुझसे नहीं होगा…”
रमेश ने मुस्कुराते हुए उसके पास आकर उसके माथे पर चुंबन किया। “डरो मत, रितु। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”
रमेश ने उसके पैरों को फैलाया और खुद उनके बीच में आ गया। उसने अपने लिंग को रितु की योनि के मुँह पर रखा। रितु ने कसकर आँखें बंद कर लीं।
“रितु, देखो मेरी तरफ। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी आँखों में देखो जब हम एक हों,” रमेश ने कहा।
रितु ने धीरे से आँखें खोलीं। रमेश ने धीरे से अपने लिंग को आगे बढ़ाया। रितु की योनी बहुत तंग थी और रमेश का लिंग मोटा था।
“आहhh… रमेश… धीरे… दर्द हो रहा है…” रितु ने कांपते हुए कहा।
रमेश ने धीरे से आगे बढ़ाया। लिंग का सिरा अंदर घुस गया। रितु ने दर्द से अपने नाखून रमेश की पीठ में गड़ा दिए।
“उहhh… रमेश… बहुत मोटा है…” रितु की आँखों में आँसू आ गए।
रमेश ने रुककर उसके होंठों पर किस किया। “थोड़ा सब्र करो, रितु। अभी दर्द जाएगा और मजा आएगा।”
रमेश ने धीरे-धीरे और अंदर डाला। आधा लिंग अंदर जा चुका था। रितु की सांसें तेज हो गईं। लेकिन फिर धीरे-धीरे उसे मजा आने लगा।
“रमेश… अब… अब चलो…” रितु ने कहा।
रमेश ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। पहले धीरे-धीरे, फिर थोड़ा तेज। रितु की आवाजें बदलने लगीं।
“आहhh… हायyy… रमेश… यह… यह बहुत अच्छा है… उम्म्म…” रितु ने कहा।
रमेश ने तेजी से धक्के लगाने शुरू कर दिए। उसका लिंग अब पूरी तरह से रितु की योनि में अंदर-बाहर हो रहा था। चप-चप की आवाजें कमरे में गूंज रही थीं।
“चप… चप… चप…” रितु की योनी से गीली आवाजें आ रही थीं।
“आहhh… रमेश… और तेज… मुझे बहुत मजा आ रहा है… हायyy… उफ्फ्फ…” रितु चीखने लगी।
रमेश ने उसके पैरों को और फैलाया और जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। बिस्तर पर थump-thump की आवाजें हो रही थीं।
“ठुम… ठुम… ठुम…” रमेश का शरीर रितु के शरीर से टकरा रहा था।
रितु ने अपने स्तनों को खुद ही दबाना शुरू कर दिया। उसके निप्पल कड़े हो गए थे। रमेश ने एक हाथ से उसके स्तन को दबाया और दूसरे हाथ से उसकी कमर पकड़कर धक्के लगाने लगा।
“आहhh… रमेश… मैं फिर से आने वाली हूँ… मैं… उहhh… अहhh…” रितु ने चीखते हुए कहा।
रितु का शरीर कांपने लगा और उसने दूसरा ओर्गेज्म महसूस किया। उसकी योनि ने रमेश के लिंग को कसकर पकड़ लिया और संकुचन होने लगे।
रमेश को भी अब अपना समीपन महसूस हो रहा था। “रितु… मैं भी… मैं अंदर ही…” रमेश ने कहा।
“हाँ… रमेश… अंदर ही… मुझे अपना बना लो…” रितु ने कहा।
रमेश ने कुछ और तेज धक्के लगाए और फिर अपना लिंग पूरी तरह से अंदर डालकर रोक दिया। उसका वीर्य रितु की योनि में निकलने लगा – गर्म, गाढ़ा, और बहुत सारा।
“आहhh… रितु… मैं आ गया… उहhh…” रमेश ने कसकर रितु को पकड़ा और उसके ऊपर गिर गया।
दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए पड़े थे। रमेश का लिंग अभी भी रितु की योनि में था और धीरे-धीरे छोटा हो रहा था। रितु ने रमेश के बालों में हाथ फेरे।
“रमेश… यह… यह बहुत खूबसूरत था,” रितु ने धीरे से कहा।
रमेश ने उसके माथे पर चुंबन किया। “रितु, मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ।”
भाग चौथा: नई शुरुआत – पीछे का रास्ता
कुछ देर आराम करने के बाद दोनों ने फिर से एक-दूसरे को देखा। रितु का शरीर पसीने से तर था और वह बेहद खूबसूरत लग रही थी। रमेश का लिंग फिर से खड़ा होने लगा था।
रितु ने यह देखा और शर्म से मुस्कुराई। “रमेश, तुम फिर से…?”
रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “रितु, तुम इतनी खूबसूरत हो कि मेरा मन नहीं भरता।”
रितु ने उसे अपनी ओर खींचा और उसके होंठों पर किस किया। यह बार रितु थी जो ज्यादा उत्साहित थी। उसने रमेश को अपने ऊपर खींचा।
“रमेश, इस बार… कुछ अलग करें?” रितु ने शर्माते हुए कहा।
“क्या मतलब?” रमेश ने पूछा।
रितु ने पलटकर लेट गई और अपनी गांड ऊपर उठा दी। “मैंने सुना है… पीछे से भी… लेकिन मैंने कभी नहीं किया…”
रमेश समझ गया। उसने कभी सोचा नहीं था कि रितु यह कहेगी, लेकिन वह उत्साहित हो गया।
“रितु, अगर तुम चाहती हो तो… लेकिन पहली बार दर्द होगा,” रमेश ने कहा।
“मुझे तुमसे सब कुछ चाहिए, रमेश। मैं तुम्हारी हूँ,” रितु ने कहा।
रमेश ने उसकी गांड पर हाथ रखा। वह गोल, मुलायम, और बड़ी थी। रमेश ने उसे सहलाया और फिर अपनी उंगली उसके छेद पर रखी।
रितु ने कसकर तकिया पकड़ लिया। रमेश ने अपनी उंगली पर थूक लगाया और धीरे से उसके गुदा छेद में डाली।
“आहhh… रमेश… यह अलग है…” रितु ने कहा।
रमेश ने धीरे-धीरे उंगली अंदर-बाहर की। रितु को थोड़ा अजीब लग रहा था, लेकिन फिर वह आदत डालने लगी।
रमेश ने और थूक लगाया और दूसरी उंगली भी डाल दी। अब दो उंगलियाँ उसके अंदर थीं और उसे तैयार कर रही थीं।
“रितु, अब मैं अपना लिंग डालने वाला हूँ। अगर ज्यादा दर्द हो तो बता देना,” रमेश ने कहा।
रितु ने हामे में सिर हिलाया। रमेश ने अपने लिंग पर थूक लगाया और उसे रितु के गुदा छेद पर रखा। धीरे से आगे बढ़ाया।
सिरा अंदर घुसा। रितु ने दर्द से चीखा – “आहhh… रमेश… धीरे… बहुत तंग है…”
रमेश ने रुककर उसकी पीठ पर किस किया। “शांत रहो, रितु। थोड़ा सब्र करो।”
रमेश ने धीरे-धीरे और अंदर डाला। रितु की गांड बहुत तंग थी और रमेश को बहुत मजा आ रहा था।
“उहhh… रमेश… और अंदर… पूरा डाल दो…” रितु ने कहा।
रमेश ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका पूरा लिंग रितु की गांड में समा गया।
“आहhh… हायyy… रमेश… मैं… मैं पूरी भरी हुई महसूस कर रही हूँ…” रितु ने कहा।
रमेश ने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। पहले धीरे, फिर तेज। रितु को अब मजा आने लगा था।
“आहhh… रमेश… यह… यह बहुत गहरा है… उम्म्म… हायyy…” रितु की आवाजें तेज हो गईं।
रमेश ने उसकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। उसका लिंग पूरी तरह से रितु की गांड में अंदर-बाहर हो रहा था।
“चप… चप… चप…” की आवाजें गूंज रही थीं।
“आहhh… रमेश… और तेज… मुझे बहुत मजा आ रहा है… मेरी गांड फाड़ दो… उहhh… अहhh…” रितु चीख रही थी।
रमेश ने उसके बाल पकड़े और पीछे खींचा। रितु का चेहरा ऊपर उठा और रमेश ने उसके गले पर किस किया।
“रितु, तुम बहुत मस्त हो… तुम्हारी गांड बहुत तंग है…” रमेश ने कहा।
“हाँ… रमेश… मैं तुम्हारी हूँ… चोदो मुझे… और तेज…” रितु ने कहा।
रमेश ने अपनी गति तेज कर दी। वह अब पूरी तरह से रितु की गांड चोद रहा था। रितु का शरीर आगे-पीछे हो रहा था और उसके स्तन हिल रहे थे।
“ठुम… ठुम… ठुम…” की आवाजें तेज हो गईं।
“आहhh… रमेश… मैं आने वाली हूँ… मेरी गांड से…” रितु ने चीखते हुए कहा।
रितु का शरीर कांपने लगा और उसने तीसरा ओर्गेज्म महसूस किया। उसकी गांड ने रमेश के लिंग को कसकर पकड़ लिया।
रमेश को भी अपना समीपन महसूस हुआ। “रितु… मैं भी… मैं तुम्हारी गांड में ही…” रमेश ने कहा।
“हाँ… रमेश… भर दो मेरी गांड… अपने वीर्य से…” रितु ने कहा।
रमेश ने कुछ और धक्के लगाए और फिर अपना लिंग पूरी तरह से अंदर डालकर रोक दिया। उसका वीर्य रितु की गांड में निकलने लगा – गर्म और गाढ़ा।
“आहhh… रितु… मैं आ गया… उहhh…” रमेश ने कहा और रितु के ऊपर गिर गया।
दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए पड़े थे। रमेश का लिंग अभी भी रितु की गांड में था। रितु ने मुड़कर रमेश को किस किया।
“रमेश, यह रात मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत रात है,” रितु ने कहा।
रमेश ने उसे गले लगाया। “रितु, यह तो सिर्फ शुरुआत है। हमारी जिंदगी अब शुरू हुई है।”
भाग पाँचवा: सुबह की रोशनी
सुबह की पहली किरण खिड़की से आई तो रितु और रमेश एक-दूसरे में समाए हुए थे। रितु ने रमेश की बाहों में अपना सिर रखा हुआ था और रमेश उसके बालों में हाथ फेर रहा था।
रितु ने आँखें खोलीं और रमेश को देखा। उसके चेहरे पर एक अलग सी चमक थी – खुशी की, संतुष्टि की, और प्यार की।
“सुबह हो गई, रितु,” रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा।
रितु ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, और मेरी जिंदगी की नई सुबह भी।”
रमेश ने उसके माथे पर चुंबन किया। “रितु, मैं चाहता हूँ
रितु की आँखों में आँसू आ गए। “रमेश… तुम… सच में?”
“हाँ, रितु। मैं तुमसे प्यार करता हूँ और मैं तुम्हारे साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता हूँ,” रमेश ने कहा।
रितु ने उसे गले लगा लिया और रोने लगी। लेकिन यह आँसू खुशी के थे।
दोनों ने फिर से एक-दूसरे को किस किया। यह किस प्यार और वादे का था।
रातों-रात दोनों का प्यार और भी गहरा होता गया। वे हर रात एक-दूसरे के शरीर का आनंद लेते, एक-दूसरे की इच्छाओं को पूरा करते।
उस नवरात्रि की रात ने दो रूहों को मिलाया था – एक विधवा जो जिंदगी से हार चुकी थी और एक जवान लड़का जिसने उसे जीना सिखाया। उनका प्यार समाज की बंदिशों से ऊपर था, और उनकी यह कहानी हमेशा याद रखी जाएगी कि प्यार किसी सीमा को नहीं मानता।
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