अध्याय 1 — कस्बा, और वो पीली दीवार वाला मकान
मेरा नाम नरेश है। उम्र 35 साल, कद 5’11”, बदन कसा हुआ, और मैंने अपनी ज़िंदगी के तीस साल शहर की भाग-दौड़ में काट दिए थे। बैंक की नौकरी में तरक्की आई तो साथ में एक सज़ा भी आई — मुझे पहाड़ों के एक छोटे-से कस्बे में तीन साल के लिए भेज दिया गया। “फील्ड पोस्टिंग” कहते हैं इसे। शहर वाले पहाड़ों की तारीफ़ करते हैं, मगर असल में पहाड़ आपको अकेला कर देता है। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
कस्बा इतना छोटा था कि बस स्टैंड से लेकर बाज़ार तक पूरा रास्ता दस मिनट में पैदल तय हो जाता था। सड़क के दोनों तरफ़ दुकानें, जिन पर पुरानी पेंट के पोस्टर चिपके थे। चार दिन मैं सरकारी गेस्ट हाउस में सड़ा — बेड की चादर में नैप्थलीन की बू, और शाम को खिड़की से सिर्फ़ बादल दिखते थे। मुझे अपना कमरा चाहिए था। अपना एक कोना।
पाँचवें दिन चाय की दुकान पर बैठा था। सामने एक बूढ़े बाबा जी चाय फूँक रहे थे। उन्होंने मुझे दो दिन से देखा हुआ था।
“शहर से आए हो?” उन्होंने पूछा।
“हाँ बाबा। नौकरी में आया हूँ। कमरा ढूँढ़ रहा हूँ।”
“किराए के मकान यहाँ कम हैं।” उन्होंने चाय का प्याला रखा। “पर एक जगह है। ढलान के नीचे, पीली दीवार वाला मकान। छत पर लाल टीन।”
“किसका है?”
“मधु का। विधवा है। तीन साल पहले पति गुज़र गया। बेटी है, कॉलेज पढ़ती है। एक कमरा ख़ाली पड़ा है — उसी में पति का सामान रखा था, अब बेचना चाहती है। तू पूछ ले।” विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“ठीक है।”
“बाबा,” वो हँसे, “एक बात बता दूँ — वो घर शांत है। बहुत शांत।” फिर उन्होंने चाय की तरफ़ देख कर कहा, “शांति भी कभी-कभी झूठ बोलती है।”
तब मैं उनकी बात समझा नहीं। आज समझता हूँ। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
अध्याय 2 — मधु से पहली मुलाक़ात
ढलान के नीचे वो मकान अकेला खड़ा था — दो मंज़िला, पुराना, पीली दीवार पर काई चढ़ी हुई। लोहे का गेट खुला था, जिसकी चारों तरफ़ कोई चारदीवारी नहीं, बस जंगल की झाड़ियाँ। सामने आँगन, आँगन में नीम का पेड़, और नीम के नीचे एक बैलगाड़ी का पुराना पहिया — जिस पर सूखती चीज़ें रखी थीं। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मैं गेट पर खड़ा हुआ। भीतर से आवाज़ आ रही थी — चकला-बेलन की। आटा लगी हुई मांसल आवाज़। तीन-चार बार आवाज़ आई, फिर बंद हो गई। फिर आहट।
औरत बाहर आई। सिर पर चोटी, आँचल कमर में खुँसा हुआ, हाथों पर आटा लगा था। उसने मुझे देखा, ठहर गई, फिर आँचल से हाथ पोंछ कर बोली —
“कौन हो? किससे काम?”
आवाज़ में डर नहीं था, एक ऊँचाई थी। ज़मीन पर खड़े आदमी को नाप लेने वाली आवाज़। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“मैं नरेश। नई नौकरी में आया हूँ। बाबा जी ने भेजा है। कमरा किराए पर चाहिए था।”
वो एक पल रुकी। फिर बोली — “अंदर आओ।”
आँगन में आकर उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। यह नज़र बस देखने की नहीं थी — यह तौलने की थी। जैसे कोई तराज़ू पर रख कर नाप रहा हो।
मधु की उम्र कोई तैंतालीस-चवालीस थी। कद छोटा, पर बदन ऐसा गदराया हुआ कि कपड़ा उस पर हँसता नहीं, झुक जाता था। रंग गेहुआँ, आँखें बड़ी, और वो नमी जो विधवा की आँखों में बस जाती है — न दुख, न ख़ुशी, बस एक ख़ालीपन।
पति के जाने के तीन साल हो चुके थे। माथे से सिंदूर मिट चुका था, चूड़ियाँ भी उतर गई थीं, मगर बदन से वो स्त्रीत्व नहीं उतरा था जो औरत को औरत बनाता है।
“कमरा ऊपर है,” उसने कहा। “छोटा है। सोने-बैठने के लिए काफ़ी है। बाथरूम साझा करना पड़ेगा। खाना मेरे साथ बनेगा। पैसे महीने के आगे।” विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“ठीक है।”
“और नरेश…” उसने मुड़ कर देखा, “मैं विधवा हूँ। लोग बहुत बोलते हैं। तुम्हें रहना है तो लोगों को नहीं, मुझे देखना।”
वो बात भी तब समझ नहीं आई।
कमरा दिखाया। छोटा, साफ़, और उसमें एक आदमी की महक बसी हुई थी — पुरानी अलमारी में रखे कपड़ों से आती हुई। मैंने हाँ कर दी। उस दिन शाम को ही सामान आ गया, और मैं उस घर का किराएदार बन गया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
अध्याय 3 — मुस्कान, और पहली नज़र
मधु से मिलने के बाद मुझे लगा था कि घर में बस एक ही औरत है। मगर शाम को दूसरी आई। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मैं आँगन में बैठा चाय पी रहा था जब गेट खुला और लड़की भीतर आई — कंधे पर बैग, गीले बाल, और चेहरे पर कॉलेज की थकान। उसने मुझे देखा और ठिठक गई।
“आप?”
“मैं नरेश। नया किराएदार।”
“अच्छा!” उसने एक पल में चेहरा बदल लिया — थकान गई, हँसी आई। “मम्मी ने बताया नहीं।”
“अभी-अभी आया हूँ।”
“मुस्कान,” उसने हाथ बढ़ाया। मैंने मिलाया। हाथ नरम था, गीला, और मुट्ठी में एक अजीब-सी ताक़त। “मैं इस घर की बेटी हूँ। बाक़ी सब बाद में पता चलेगा।” विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
वो मुस्कुरा कर अंदर चली गई। और मैं वहीं बैठा रह गया — बस एक पल के लिए।
मुस्कान उम्र में इक्कीस की थी, कॉलेज की आख़िरी क्लास में। बाप के जाने के बाद उसकी पढ़ाई छूटते-छूटते बची थी — मधु ने पैसे जोड़-जोड़ कर उसे कॉलेज भेजा। लंबी थी, अपनी मां से उलटी। कमर पतली, ऊपर से भरी हुई, और चलने में वो झूला जो पहाड़ी लड़कियों में होता है — जैसे हवा उन्हें अंदर से हिला रही हो।
मगर असली चीज़ थी उसकी आँखें। ऐसी आँखें जो बोलती थीं, और जो बोलती थीं वो अक्सर सच होता था। जिस दिन उसने पहली बार देखा था, उस दिन उसकी आँखों में यही लिखा था — “मुझे सब पता है।”
तब मुझे नहीं पता था कि वो सच में सब जानती थी। और जो नहीं जानती थी, वो बनाने वाली थी।
अध्याय 4 — पहला हफ़्ता, और आँखों की चुपचाप चलने वाली लड़ाई
पहले हफ़्ते सब नॉर्मल दिखा। मगर मुझे लगता था कि घर की दीवारें हर दिन थोड़ी-थोड़ी सिकुड़ रही हैं। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
सुबह मधु चाय देने आती। उस वक़्त वो सलवार ऊपर तक चढ़ाए होती, कमर का कच्छ साफ़ दिखता, और चाय रखते हुए वो इतनी पास झुकती कि उसके आँचल की महक मेरे चेहरे से टकराती। एक दिन, दो दिन, तीसरे दिन मैंने गिनना शुरू किया — वो कितनी बार झुकती है, कितनी देर।
जवाब था: रोज़। बहुत देर।
मुस्कान का तरीक़ा अलग था। वो सीधे बात करती। बाथरूम से नहाकर निकलती तो गीली कुर्ती बदन से चिपकी होती, गीले बाल, और हर गोली अलग दिखती। एक दिन वो सीढ़ियों पर मेरे सामने से निकली — गीली, गरम, और जाते-जाते बोली, “अंकल, आपको चश्मा लग गया है क्या? इतनी देर से क्या देख रहे थे?”
“तेरी कुर्ती।” विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“कुर्ती या कुर्ती वाला?” वो हँस कर चली गई।
दोनों अलग-अलग मुझे बुन रही थीं — एक धीरे-धीरे, दूसरी तेज़-तेज़। मैं दोनों को देखता था और सोचता था कि मैं बस “अंकल” हूँ। बेचारी बेकार की भूल।
रात में मैं अपने कमरे में लेटा सोचता — मधु का बदन, मुस्कान की आँखें, मधु की चाय, मुस्कान की हँसी। और नीचे से कभी-कभी आती आहट — जैसे कोई करवट बदल रहा हो, जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
अध्याय 5 — पहला वार: मुस्कान
ग्यारह बजे की बात है। रात। मैं आँगन में बैठा था, नीम के नीचे, चाय ठंडी हो रही थी। नींद नहीं आ रही थी — पहाड़ में रात जल्दी आती है और देर तक रहती है। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
सीढ़ियों से आहट आई। मुस्कान निकली — नाइटी में, बाल खुले, चप्पल पैर में। उसने मुझे देखा और सीधे आकर बगल में बैठ गई। इतने पास कि उसकी जांघ मेरी जांघ से चिपकी रही।
“नींद नहीं आ रही अंकल?”
“तेरी मां जैसी चाय पिलाने वाली न हो तो नींद कहाँ आती है।”
“अच्छा। तो चाय में स्वाद मां का, और नींद की ज़िम्मेदारी भी मां की?”
“और तू?”
“मैं तो सिर्फ़ देखने वालों की नींद ख़राब करती हूँ।”
बात ख़त्म। मगर वो उठी नहीं। बस बैठी रही, और उसकी जांघ मेरी जांघ से चिपकी रही — इतनी देर कि वो चिपकन अब इत्तेफ़ाक़ नहीं लगती थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मैंने रिस्क ले लिया। हाथ बढ़ाया, और उसके घुटने पर रख दिया।
उसने न हटाया। उलटे अपना हाथ अपने घुटने के ऊपर ले आई — और मेरा हाथ फँस गया, ठीक जांघ के बीचोंबीच। जांघ नरम थी, गरम थी, और उसमें एक बारीक कंपन थी — जैसे भीतर कुछ चल रहा हो।
“अंकल, हाथ काँप रहा है,” वो फुसफुसाई।
“तेरी मां को देख कर काँपता है,” मैंने सच बोल दिया।
“तो मुझे देख कर क्या होता है?”
मैंने जवाब की जगह उसका ठुड्डी पकड़ कर चेहरा ऊपर उठाया। मुस्कान ने आँखें बंद कर लीं — बिना पूछे, बिना झिझके। यही तो परमिशन थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
पहले पल वो ठहरी रही, जैसे नाप रही हो। फिर उसका पूरा बदन एक साथ ढीला पड़ गया और वो मेरी गोद में चढ़ आई। मेरी बाँहें उसकी कमर पर लिपट गईं। उसने मेरे गाल पर, गर्दन पर, होंठों पर — चूमते हुए एक बार भी नहीं रुका।
उसकी चूत बस नाइटी की पतली सूती परत से ढँकी थी। और मेरा लंड सीधे उसके बीच चुभ रहा था — वो चुभन इतनी साफ़ थी कि उसने कमर हिला दी, हल्की सी। जैसे किसी ने स्विच ऑन कर दिया हो।

“अंकल… मां जाग जाएगी,” वो हाँफी।
“सो जाने दे। देखने भी दे।”
“देख लेगी तो लड़ेगी नहीं?”
“देख, बुरा नहीं मानेगी।”
मुस्कान पीछे हटी, मेरे चेहरे को दोनों हाथों में लिया, और गौर से देखा — जैसे किसी सौदे की आख़िरी शर्त पढ़ रही हो। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“पक्का?”
“पक्का।”
उसने मेरे कान में बोला, बहुत धीरे, बहुत साफ़ — “फिर अंकल, ये तो आपने मेरे हाथ में डोर दे दी।”
अब आगे कुछ ज़्यादा नहीं हुआ। उस रात हम बस चूमते रहे, सहलाते रहे। मैंने उसकी नाइटी का स्ट्रैप नीचे किया, उसकी छाती पूरी खोल दी — कसी हुई, भारी, और जैसे ही मेरी हथेली उन पर पड़ी, मुस्कान ने सिर पीछे कर लिया और आँखें बंद कर लीं। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“अंकल… दबाओ… ज़ोर से नहीं, आराम से।”
मैंने आराम से दबाया। फिर एक को मुँह में लिया। मुस्कान की साँस तेज़ हो गई। उसका हाथ नीचे बढ़ा, मेरी जांघ पर आया, फिर मेरे लंड पर — और चारपाई पर बैठे-बैठे उसने हल्का-सा हिलाया।
“अंकल, अंदर डालो ना,” उसने मचल कर कहा।
“अंदर डालूँ तो आज ही सब ख़त्म हो जाएगा।”
“तो हो जाने दो।”
फिर उसने नाइटी उठाई और मेरा हाथ अपनी चूत पर रख दिया। गीली थी — इतनी गीली कि मेरी उँगली सीधे अंदर फिसल गई। मुस्कान ने मेरे कंधे पर दाँत गड़ा दिए ताकि चीख बाहर न जाए, और मेरी उँगली के साथ-साथ कमर हिलाने लगी।
मैंने दो उँगलियाँ डालीं। अंदर पूरी गरमी थी, पूरी तैयारी थी। जब उसने झड़ना शुरू किया तो पूरा बदन अकड़ गया — पैर सीधे, पेट भीतर, और गर्दन मेरे कंधे पर।
“अंकल… अंकल… बस…”
वो ढीली पड़ गई। माथा मेरे सीने पर रख दिया। और मैंने उस रात उसे अंदर नहीं डाला — जान-बूझ कर। क्योंकि मुझे पता था, आगे बहुत रातें हैं। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
अध्याय 6 — बीच के दो दिन, और बदन का दो-तरफ़ा खिंचाव
अगले दो दिन घर में अजीब-सा माहौल रहा। मुस्कान नॉर्मल दिखती, पर हर बार जब मधु सामने होती, मुस्कान मुझे ऐसे देखती जैसे कोई राज़ साझा हो। और मधु? मधु को कुछ पता नहीं था — या शायद पता था और दिखाती नहीं थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मगर बदन झूठ नहीं बोलता।
अब मधु के पास आने का तरीक़ा बदल गया। चाय रखते हुए पहले से ज़्यादा झुकती। एक बार सीढ़ी पर सामान उतारते हुए उसका हाथ मेरी कमर पर टिक गया और वो उठी नहीं — पूरे तीन सेकंड। तीन सेकंड, जो घड़ी में कुछ नहीं, मगर आदमी के दिमाग़ में सब कुछ होते हैं।
एक रात मैंने नीचे आँगन में मधु को देखा — अकेली, बरामदे में, बाल खोले हुए। वो अपने हाथ की तरफ़ देख रही थी, जहाँ चूड़ियाँ हुआ करती थीं। उस उम्र में भी उसकी कलाई पतली और सुंदर थी। और उसकी आँखों में वो नमी थी — जो कह रही थी कि तीन साल बहुत हो चुके। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मैं वहीं खड़ा हो गया और सोचने लगा — अब किसका इंतज़ार? मुस्कान का, या मधु का?
जवाब था — दोनों का। और दोनों अलग-अलग।
अध्याय 7 — दूसरा वार: मधु, और वो दोपहर
अगले दिन मधु सामान लाने बाज़ार गई। मुस्कान कॉलेज। मैं घर में अकेला। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
दोपहर करीब डेढ़ बजे मधु लौटी। थकी हुई, साड़ी का पल्लू ढीला, माथे पर पसीना, हाथों में सब्ज़ी का थैला। उसने थैला टेबल पर रखा और पानी लेने रसोई में गई। मैं पीछे-पीछे।
उसने मटके से पानी निकाला, गिलास भरा। मगर पीने से पहले वो ठहरी — जैसे उसे पता था कि कोई पीछे खड़ा है।
मैंने उसकी कमर पर हाथ रख दिया।
मधु ठिठक गई। गिलास टेबल पर रखा, और बिना मुड़े बोली — “देखो नरेश, मैं विधवा हूँ। इतनी जल्दी…”
“तीन साल जल्दी नहीं होती मधु जी।”
“बात उम्र की नहीं… बात लोगों की है।”
“मुझे लोगों से क्या? तुम्हारी कमर में तो अभी भी जान है।”
वो धीरे से मुड़ी। आँखों में नमी थी, और होंठों पर वो मासूम डर जो औरत सिर्फ़ पहली बार पकड़े जाने पर दिखाती है — जब पता होता है कि बच नहीं सकती, और बचना भी नहीं है। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मैंने उसका चेहरा उठाया। मधु ने आँखें बंद कर लीं।
मैंने उसका पल्लू खींच दिया। आँचल कमर से निकला और फ़र्श पर गिरा। ब्लाउज़ के हुक — तीन, ऊपर से नीचे — एक-एक करके खोले। भीतर ब्रा की जगह सिर्फ़ पतला सूती कपड़ा था, और उसमें दो पके आम। जब मेरी हथेली उन पर पड़ी, मधु पूरी की पूरी काँप गई और रसोई की दीवार से लग गई।
“उईईई मां…” वो सिसकी।
“शोर मत करो, मुस्कान आ जाएगी।”
“आने दो। मर जाऊँगी तो यहीं मरूँगी।”
मैंने उसकी साड़ी कमर से नीचे गिरा दी। पेटीकोट में से जांघों की मासूमियत साफ़ दिख रही थी। मैंने उँगली पेटीकोट के भीतर डाली — चूत गरम, भीगी, और इतनी गीली जैसे किसी ने दूध छोड़ दिया हो। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“बहुत दिन बाद…” वो फुसफुसाई, आँखें बंद किए।
“अब रोज़ होगा।”
“पहले बताओ — क्या करोगे?”
“पहले तुम्हारी चूत चाटूँगा, फिर अंदर डालूँगा।”
वो शरमा कर हँसी — बच्चों जैसी हँसी, जो तीन साल से सूखी पड़ी थी। मैंने उसका पेटीकोट नीचे खींचा। मधु ने पहले पैर उठाए, फिर दूसरा। अब वो नीचे से पूरी नंगी थी, और उसके घने बालों में से चूत चमक रही थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मैं घुटनों पर बैठा, उसकी एक टाँग अपने कंधे पर रखी, और मुँह नीचे ले गया।
जैसे ही मेरी जीभ चूत के मुँह पर पड़ी, मधु ने एक लंबी साँस खींची — जैसे डूबते हुए आदमी ने पहली बार हवा ली हो। फिर उसने दोनों हाथ मेरे सिर पर रख दिए और हल्के-हल्के दबाने लगी।
मैं चाटता रहा — ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर, और बीच में उसका क्लिट पकड़ कर जीभ के सिरे से बार-बार सहलाता रहा। मधु की टाँगें काँपने लगीं। दस मिनट में उसने दो बार पानी छोड़ा, और दूसरी बार चीख मुँह में दबा न सकी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“आह्ह्ह… नरेश… नरेश… बस… बस करो…”
“बस नहीं, अभी तो लंड डालना है।”
उसने झटपट मुझे उठाया, मेरी कमीज़ खींच कर उतार दी, पैंट का बटन खोला। जब उसने मेरी बॉक्सर नीचे की और लंड निकला, वो एक पल के लिए रुक गई — फिर बोली, “देखो, बहुत बड़ा है।”
“बड़ा है तो अच्छा है।”
उसने लंड हाथ में लिया, नापा, फिर अपनी जांघों के बीच लगाया। मैंने कमर आगे बढ़ाई और घुस गया — एक ही झटके में आधा। मधु का मुँह खुला और बंद न हुआ। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“उफ़्फ़… रुको… रुको नरेश…”
“दर्द है?”
“नहीं… अच्छा है… पर रुको… अभी सहने दो…”
मैं रुका। अंदर ही रुका रहा — बस धीरे-धीरे हिलता रहा, ताकि मधु का बदन उस नए आकार के साथ सेट हो जाए। दो मिनट में उसकी टाँगें मेरी कमर पर चढ़ गईं और उसने ख़ुद कमर ऊपर करनी शुरू कर दी।
“अब… अब करो…” वो हाँफी।
फिर मैंने धक्के लगाने शुरू किए। धीरे से ज़ोर तक। रसोई की टेबल हिलने लगी, मटके का ढक्कन खड़खड़ाने लगा। मधु बाँहों से मुझे ऐसे जकड़े थी जैसे डूबती हुई हो। उसकी छातियाँ मेरी छाती पर रगड़ रही थीं, और हर धक्के पर उसके होंठों से वो आवाज़ निकलती जो उसने तीन साल से किसी के सामने नहीं निकाली थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
कुछ देर में उसकी टाँगें सीधी हो गईं, पेट भीतर खिंचा, और वो झड़ गई — मेरे कंधे पर दाँत गड़ाए हुए, पूरे बदन के साथ।
फिर वो ढीली पड़ गई। मगर मेरा लंड अंदर ही था। मैंने कान में पूछा, “और चाहिए?”
मधु ने आँखें खोलीं, मुस्कुराई, और बोली — “और चाहिए।”
उसने मुझे घसीट कर पास के कमरे में ले जाया, बिस्तर पर गिराया, और ख़ुद ऊपर चढ़ गई। अब वो चुद रही थी — बैठे-बैठे, घुटनों पर झूलती हुई। उसकी छातियाँ ऊपर-नीचे, गर्दन पर पसीना, होंठ खुले। यही वो नज़ारा था जो मैंने सोचा था कि इस घर में मिलेगा।
फिर हम दोनों एक साथ झड़े। मैंने उसकी चूत के भीतर ही छोड़ा। मधु ने आह भर कर मेरे सीने पर लेट गई और कुछ देर कुछ नहीं बोली। बस उसकी साँस मेरे सीने पर गरम-गरम पड़ती रही।
और तभी — गेट की आवाज़। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
अध्याय 8 — मुस्कान ने मां को पकड़वाया
हम दोनों झटपट उठे। मधु ने साड़ी सँभाली, मैंने पैंट। पर देर हो चुकी थी।
मुस्कान आँगन में आई, बैग रखा, और हमें देखा — मधु की साड़ी की तहें टेढ़ी, मेरी कमीज़ का बटन आधा खुला, और रसोई का ढक्कन अब भी टेढ़ा।
उसने कुछ नहीं पूछा। बस मुस्कुरा कर पानी पीया और अंदर चली गई। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
रात में, जब मधु सो गई, मुस्कान मेरे कमरे में आई।
“अंकल, मां को भी पता है।”
“क्या पता है?”
“मेरे बारे में, और आपके बारे में। मैंने ख़ुद बता दिया।”
“तूने बता दिया?!”
“हाँ। और मां बोली — ‘ठीक है, पर जवाबदारी भी तेरी।'”
“मतलब?”
मुस्कान बिस्तर के किनारे बैठी और मेरे चेहरे को गौर से देखा। “मतलब ये कि मां ने रास्ता साफ़ कर दिया है। अब आप दोनों को छिपाना नहीं है। और मुझे भी नहीं।” विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मेरे होश उड़ गए। मैं सोचता था मैं दो औरतों को अलग-अलग सँभाल रहा हूँ। पता चला, मां-बेटी ने मिल कर मुझे सँभाल रखा था।
“अंकल, कल रात मां आपके कमरे में आएगी। आप तैयार रहिए।”
“और तू?”
“मैं साथ रहूँगी। सिर्फ़ बैठ कर देखूँगी।”
“सिर्फ़ देखेगी?”
मुस्कान ने आँख मारी — “देखते-देखते जो हो जाए, वो मेरी गलती होगी?”
अध्याय 9 — वो रात: तीन बदन, एक बिस्तर
अगली रात ग्यारह बजे दरवाज़ा खुला। मधु भीतर आई — हाथ में कोई चादर नहीं, बस एक पतली-सी मैक्सी, और भीतर कुछ नहीं। नज़र झुकी हुई, गाल लाल, और चलने में वो अजीब-सी हिचक जो पहली बार किसी और के कमरे में आने वाली औरत में होती है।
पीछे मुस्कान — अपनी नाइटी में, दीवार से टिकी खड़ी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“आ जाओ,” मैंने कहा।
मधु बिस्तर के किनारे बैठी। मैंने उसका चेहरा उठाया, होंठ चूमे। मैक्सी के स्ट्रैप नीचे खिसके। मुस्कान चुपचाप पास आई और पीछे से अपनी मां के बाल सहलाने लगी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मधु की आँखें बंद हो गईं — बेटी का हाथ, प्रेमी का मुँह, और बदन पर सिर्फ़ कपड़े की एक परत। यही वो पल था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था।
“मुस्कान, तू यहाँ क्यों खड़ी है?” वो फुसफुसाई।
“देखने मम्मी। और कुछ नहीं।”
“शरम आ रही है।”
“तो आने दो। आज रात शरम काम नहीं आएगी।”
मैंने मैक्सी नीचे खींच दी। मधु की चूत पूरी नंगी थी — घनी, गरम, और उस रात चमकती हुई। मैंने मुँह नीचे किया और चाटने लगा।
मधु की कमर उठ गई। मुस्कान ने अपनी मां की छातियाँ पकड़ कर मलनी शुरू कर दीं, और मधु के मुँह से वो आवाज़ निकली जो उसने तीन साल से किसी के सामने नहीं निकाली थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“आह्ह्ह… मुस्कान… छोड़ ना…”
“मम्मी, चुप रहो। मज़ा लो।”
मुस्कान ने अपनी मां के मम्मों को ऊपर से पकड़ कर दबाया, निप्पल अपनी उँगलियों के बीच रखे और धीरे-धीरे मरोड़े। मधु हर मरोड़ पर सिसकती रही। और मैं नीचे चूत पर — जीभ, होंठ, उँगली, सब लगा रहा था। जब मैंने दो उँगलियाँ भीतर डालीं, मधु की टाँगें मेरे कंधों पर चढ़ गईं और उसने पूरा बदन मेरे मुँह पर दबा दिया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
कुछ देर में वो झड़ गई — बेटी के हाथ से और प्रेमी की जीभ से एक साथ। चीख इतनी तेज़ थी कि बाहर कुत्ते भौंकने लगे।
“अंकल, अब डालो,” मुस्कान ने कहा। “मम्मी और इंतज़ार नहीं कर सकती।”
फिर मैं ऊपर आया। लंड चूत के मुँह पर रखा और एक ही झटके में भीतर। मधु पूरी चीख पड़ी — “उईईई मां… मर गई…”
“कुछ नहीं मम्मी,” मुस्कान ने कहा, “बस शोर मचाती हैं। ज़ोर लगाओ अंकल।”
मैं ज़ोर लगाने लगा। हर धक्के पर मधु की सिसकारी, और हर सिसकारी पर मुस्कान की हथेली अपनी मां के मम्मों पर और कस कर दबती। बिस्तर चरमरा रहा था। मधु का पूरा बदन पसीने से चमक गया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मुस्कान पीछे से मेरी पीठ पर लेट गई, मेरे चूतड़ों पर हाथ रखे और हर धक्के के साथ मुझे आगे धकेलने लगी। जब मैं पीछे जाता, वो मुझे पकड़ लेती; जब आगे, तो छोड़ देती। इस तरह मेरा धक्का और गहरा होने लगा। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“मुस्कान… तू… तू ये कहाँ सीखी?” मधु हाँफी।
“अम्मा, बस देख-देख कर।”
दस मिनट में मधु फिर झड़ गई — इस बार शरीर अकड़ा, नाख़ून मेरी पीठ में गड़े, और वो फिर ढीली पड़ गई। मगर मेरा लंड अभी भूखा था। और मुस्कान यही इंतज़ार कर रही थी।
“अब मेरी बारी,” उसने नाइटी ऊपर खींच दी और मधु के बगल में लेट गई। उसकी चूत पहले से गीली थी — पूरी रात की तमाशबीन।
मैंने मुस्कान की टाँगें खोलीं। मधु ने करवट ले कर देखना शुरू किया — अपनी बेटी को, ठीक उसी पोज़ में जिसमें अभी वो थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“अंकल, आराम से,” मुस्कान ने कहा।
“तूने पहले बताया नहीं कि पहली बार है।”
“पहली बार है, इसलिए तो आराम से।”
मैंने लंड मुस्कान की चूत के मुँह पर रखा और धीरे से दबाया। अंदर जाने में ज़ोर लगा — टाइट थी, कसी हुई। मुस्कान ने होंठ भींच लिए, आँखें बंद कर लीं, और मेरी बाँहों को पकड़ लिया।
“दर्द हो रहा है?” मधु ने पूछा।
“नहीं मम्मी,” मुस्कान हाँफी, “अच्छा लग रहा है… थोड़ा और…”
मैंने पूरा डाला। मुस्कान के होंठ खुले, और उसकी आँखों से एक बूँद आँसू निकल आया — ख़ुशी का। मधु ने उसका माथा सहला दिया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“अब करो,” मुस्कान ने कहा। “अब धीरे-धीरे।”
मैं धक्के लगाने लगा। पहले धीरे, फिर तेज़। मुस्कान की चूत अब गीली हो चुकी थी और हर धक्का आसान होता जा रहा था। उसने अपनी टाँगें मेरी कमर पर चढ़ा दीं और ख़ुद कमर ऊपर करने लगी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
अब मैं मुस्कान को चोद रहा था और मधु उसका माथा सहला रही थी। यही तो वो नज़ारा था जो मुस्कान ने रचा था।
“मम्मी, देखो… कैसा लग रहा है?” मुस्कान ने हाँफते हुए कहा।
“बहुत अच्छा लग रहा है बेटा।”
“तो अब… अब आप भी हाथ लगाओ…”
मधु ने हाथ बढ़ाया और मेरी गोलियाँ पकड़ कर धीरे-धीरे मलने लगी। मेरी उत्तेजना और बढ़ गई। मुस्कान कुछ देर में झड़ी — पूरी चीख के साथ, और फिर मेरे हाथ पकड़ कर बोली, “रुको मत… अंकल रुको मत।”
तब मधु ने अपनी बेटी की गांड में उँगली डाल दी। मुस्कान एक बार फिर काँपी — पूरे बदन के साथ।
“उफ़्फ़ मम्मी…”
“अब मज़ा आएगा,” मधु मुस्कुराई।
फिर मैंने मुस्कान को घोड़ी बनाया — पीछे से। उसने घुटने और कोहनी पर भार डाला, गाल बाहर निकाले। मधु ने उसके गाल फैला कर मेरी मदद की, और मैंने पूरा लंड भीतर डाल दिया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“ले… ले मेरी रानी…” मैं हाँफा।
“और ज़ोर… अंकल… और…”
मुस्कान की गांड पीछे से देखने में इतनी सुंदर थी कि मैं रुक-रुक कर देखता रहा। मधु ने पीछे से अपनी बेटी की कमर पकड़ कर सहारा दिया। आधे घंटे में मुस्कान भी बेहाल पड़ी थी।
अब बारी आख़िरी थी।
मैंने मधु को पलट कर घोड़ी बनाया, उसकी गांड फैलाई, और जो रस बचा था वो उसकी गांड में डाल दिया। मधु ने एक लंबी चीख मारी और उसी पोज़ में बिस्तर पर गिर गई। उसकी गांड कसी हुई थी, और जब मैंने पहला धक्का मारा तो वो पूरी मुट्ठी में चादर भर कर चीखी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“बहुत दर्द?”
“नहीं… नरेश… अच्छा है… बस धीरे…”
मैंने धीरे-धीरे पेला। मुस्कान पास आई और अपनी मां के बाल पकड़ कर सहलाने लगी। कुछ मिनट में मधु की गांड ढीली पड़ गई और मैंने पूरा ज़ोर लगा दिया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
जब मैं झड़ा, मुस्कान ने मेरे चूतड़ दबा दिए, और मधु ने पूरी चीख के साथ चादर भींच ली।
तीनों पसीने में लथपथ, बिस्तर पर अधलेटे। मुस्कान मेरे सीने पर सर रखे थी। मधु मेरी बगल में, आँखें बंद, होंठ मुस्कुरा रहे थे। कमरे में सिर्फ़ तीन साँसों की आवाज़ थी, और बाहर नीम के पत्तों की।
कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
फिर मुस्कान ने धीरे से कहा, “अंकल, मैंने कहा था न — आप मेरे हाथ में आ गए।”
“अब क्या करेगी?”
“अब? अब हम दोनों आपको छोड़ेंगे नहीं।”
मधु ने बीच में टोका — “शादी तो मुझसे होगी। तू तो सिर्फ़ बोनस है।”
“अच्छा? फिर देख लेना मम्मी, रात किसकी होती है और दिन किसका।”
“रात तो बारी-बारी चलेगी,” मधु हँसी।
“बारी-बारी? मैंने तो सोचा था साथ।”
मैं हँस पड़ा। मुस्कान ने मेरी छाती पर अपनी उँगली से गोल घुमाया और बोली, “अंकल, अब एक बात का जवाब दो।”
“पूछ।”
“जब तक ये घर है, ये बिस्तर एक ही रहेगा ना?”
मधु ने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा। दोनों औरतें जवाब का इंतज़ार कर रही थीं — एक मां, जो तीन साल से अकेली थी, और एक बेटी, जिसने अभी-अभी दुनिया देखी थी। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“हाँ,” मैंने कहा। “एक ही रहेगा।” विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
मुस्कान मुस्कुराई और मेरी बाँहों में घुस गई। मधु ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी छाती पर रख दिया।
उस रात हम तीनों ने कपड़े नहीं पहने। कमरे की खिड़की खुली थी, और बाहर ठंडी हवा आ रही थी। नीम के पत्ते खड़खड़ा रहे थे। और मैं सोच रहा था — पाँच महीने पहले, चाय की दुकान पर, बाबा जी ने कहा था, “वो घर शांत है। बहुत शांत।”
शांत था। अब नहीं है। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
अध्याय 10 — सुबह, और नई शुरुआत
सुबह मेरी नींद खुली तो मुस्कान मेरी बाँहों में थी, और मधु मेरी पीठ के पीछे लिपटी हुई सो रही थी। धूप खिड़की से आ रही थी और हम तीनों पर पड़ रही थी।
मैं हिला तो मुस्कान ने आँखें खोलीं। “गुड मॉर्निंग अंकल।”
“गुड मॉर्निंग।”
“मम्मी कहाँ हैं?”
“पीछे। तेरी मम्मी ने पूरी रात मेरी कमर पकड़ी हुई थी।”
मुस्कान हँसी। फिर धीरे से बोली, “अंकल, एक बात।”
“बोल।”
“आज चाय मैं बनाऊँगी। मम्मी ने बहुत साल काम किया है।”
वो उठी, नाइटी पहनी, और चली गई। मधु जागी, और जब उसने मुझे देखा तो पहले शरमाई, फिर मुस्कुराई, फिर मेरे सीने पर सर रख दिया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“नरेश, एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“कल रात के बाद… अब घर में कुछ बदलेगा?”
“कुछ नहीं बदलेगा। सब बदलेगा।” मैंने उसका माथा चूमा। “पर एक चीज़ बदलनी है।”
“क्या?”
“अब तुम मुझे ‘नरेश’ नहीं बुलाओगी।”
“तो?”
“तुम बुलाओगी… अपने मर्द को।”
मधु ने आँखें भर लीं। तीन साल पहले जब उसका पति गया था, तब उसने सोचा था कि औरत का जीवन ख़त्म। मगर यहाँ, एक पहाड़ी कस्बे के पीली दीवार वाले घर में, दो औरतों और एक आदमी ने एक नई दुनिया बना ली थी।
नीचे से चाय की खुशबू आने लगी। मुस्कान ऊपर आई, तीन गिलास लिए। बिस्तर पर बैठ गई, एक गिलास मां को दिया, एक मुझे, और एक ख़ुद पकड़ लिया। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
“चाय पी लो,” उसने कहा। “फिर आगे का प्लान करेंगे।”
“क्या प्लान?” मैंने पूछा।
“पहले ये तय हो कि रात किसकी होगी। बाक़ी बाद में।”
तीनों हँसे। धूप बढ़ रही थी। और उस पहाड़ी कस्बे में, एक विधवा, उसकी बेटी, और एक किराएदार — अब बस किराएदार नहीं रहे थे। विधवा माँ और उसकी बेटी की चुदाई
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